मकान

मकान

दीनानाथ ने लालपुर में बड़े शौक से एक बड़ा-सा मकान बनवाया था। सोचा था, दोनों बेटियों की शादी हो जाएगी फिर चैन से पत्नी के साथ अपने घर में रहेंगे। दोनों बेटियों की शादी हुए अरसा हो गया। एक बेटी मुंबई में है और एक बेंगलुरु में। दोनों अपने-अपने परिवारों में सुखी हैं। सुखी तो अब तक दीनानाथ भी थे। उनकी उम्र सत्तर साल हो गई। पत्नी पैंसठ की हैं। इंटर कॉलेज में प्रिंसिपल पद से रिटायर हुए। नौकरी के दौरान कई शहरों में रहे। नौकरी के अंतिम वर्षों में लालपुर में पदस्थ रहे। यहीं उन्होंने मकान बनवाया। बागवानी के शौकीन हैं, इसलिए अपने मकान के आगे और पीछे उन्होंने सुंदर बगीचे लगाए। अपने उपयोग के लिए सब्जियाँ वे अपने बगीचे में ही उगा लेते हैं। मकान के बगल में सरकारी जमीन है, जिस पर बड़ा-सा मैदान है, वहाँ वे सुबह दौड़ते हुए 2-3 चक्कर लगा लेते हैं, यह उनका नियमित व्यायाम है। कुल मिलाकर उनकी जिंदगी शांतिपूर्ण ढंग से बीत रही थी।

सबसे पहले उनके मकान के बगलवाली सरकारी जमीन ने उनके जीवन में व्यवधान पैदा किया। मालूम हुआ प्रदेश के कृषि मंत्री बाबूलाल यादव के किसी रिश्तेदार चंद्रवली यादव को उस जमीन का पट्टा मिल गया है। पूरे लालपुर में यह बात खूब प्रचलित है कि चंद्रवली यादव कृषि मंत्री के नजदीकी रिश्तेदार हैं। वे रसूखदार आदमी हैं इसलिए उन्हें यह सरकारी जमीन का पट्टा मिल गया। चंद्रवली यादव के आदमियों ने बहुत जल्द उस जमीन की घेराबंदी कर ली और वहाँ गाय-भैंसों का एक बड़ा तबेला बना लिया। उनके तबेले में तरह-तरह के लोगों का आना-जाना शुरू हो गया। खूब हो-हल्ला होता उनके तबेले में दिन-रात। दीनानाथ अपने घर के बगल में इस तबेले से परेशान होने लगे। प्रायः उस तबेले में असमाजिक तत्त्वों का जमावड़ा रहता। वहाँ टेंपरेरी सेड लगाकर कई कमरे बनाए गए थे, जहाँ तबेले का मैनेजर और कई कर्मचारी रहते थे। सुबह-सुबह शहर से कई गाड़ियाँ आतीं और यहाँ से दूध भरकर ले जातीं। दोपहर में गाड़ियों से पशुओं का आहार आता। चारा, भूसा और दाना आदि पशुओं के लिए लाया जाता। इस प्रकार दीनानाथ जी के बंगले के ठीक बगल में इस तबेले में दिन-रात गहमागहमी मची रहती, जिसके कारण दीनानाथ के शांतिपूर्ण जीवन में खलल पड़ने लगा।

उन्होंने समस्या पर काफी विचार किया। उन्हें उसका हल समझ में नहीं आया। समस्या ने अपनी गंभीरता तब दिखाई, जब एक दिन अपने दल-बल सहित उस तबेले के मालिक चंद्रवली यादव वहाँ पधारे। वे बहुत देर तक तबेले का मुआयना करते रहे। उन्होंने तबेले के मैनेजर मधुकर सिंह को तरह-तरह के निर्देश दिए। उन्होंने वहाँ विभिन्न प्रकार के निर्माण कार्यों की योजना मधुरकर सिंह को समझाई। शाम को वे अपने चंद सेवकों के साथ दीनानाथ से मिलने उनके घर आए। उन्हें यह मालूम था कि दीनानाथ यहाँ अकेले (पति-पत्नी) रहते हैं। उनकी दोनों बेटियाँ क्रमश: मुंबई और बेंगलुरु में ब्याही हैं। उन्होंने परिचय की औपचारिकता के पश्चात स्पष्ट कहा–‘दीनानाथ जी, आप यहाँ अकेले रहते हैं। शहर में भी आपके कोई नाते-रिश्तेदार नहीं हैं। आप अपनी बेटियों के पास क्यों नहीं चले जाते?’

‘बेटियाँ अपने परिवार में सुखी हैं। वहाँ उनका अपना परिवार है। मैं किसी पर बोझ बनकर नहीं रहना चाहता। मैंने बड़ी लगन से अपने लिए यह मकान बनवाया है। मुझे बागवानी का शौक है। घर के आस-पास पर्याप्त जगह है। मैं इसमें फूल और सब्जियाँ उगाता रहता हूँ। अपने जीवन से संतुष्ट हूँ। अपने घर में अपने ढंग से रहता हूँ।’ दीनानाथ ने जवाब दिया।

‘दरअसल मैं यह चाहता था कि आप यह मकान मुझे बेच देते तो मेरे डेयरी फॉर्म के लिए एक अच्छा-सा ऑफिस हो जाता। बुढ़ापे में वैसे भी आपको सहारे की जरूरत है। मेरी मानिए तो आप अपनी बेटियों; जिसके पास आपका मन लगे चले जाइए। आपकी दो बेटियाँ हैं, आप अलग-अलग भी अपनी बेटियों के पास रह सकते हैं। आखिर देर-सवेर तो यह मकान बिकेगा ही। यदि आप मुझे बेच दें तो खुशी होगी।’ चंद्रवली ने अपना मंतव्य पूरी तरह स्पष्ट कर दिया।

दीनानाथ को चंद्रबली की बात सुनकर बहुत गुस्सा आया। मन में तो आया कि वे तुरंत चंद्रबली को अपने घर से चले जाने के लिए कह दें। उनकी साँसें तेज होने लगी थीं। चंद्रवली रसूखदार आदमी हैं। प्रदेश के कृषि मंत्री के रिश्तेदार हैं, यह सोचकर उन्होंने संयम बनाए रखा, परंतु स्पष्ट और दृढ़ स्वर में उन्होंने कहा–‘मैंने बड़ी लगन से अपने लिए यह मकान बनाया है। मैं इसे कभी नहीं बेचूँगा।’

चंद्रवली ने उन्हें एक बार और समझाया–‘आप यहाँ बिल्कुल अकेले हैं। कल आपको कुछ हो गया…मेरा मतलब है इस उम्र में आपको अपने परिवार वालों के साथ रहना चाहिए। फिर जैसी आपकी मर्जी। मेरे डेयरी फॉर्म के लिए आपका यह मकान बहुत जरूरी है। कुछ समय पश्चात मैं इसे खरीदूँ, इससे बेहतर है कि आप अभी मुझे बेच दें तो ज्यादा अच्छा रहेगा।’

अब दीनानाथ के नथुने फूलने लगे। माथे पर पसीना आ गया। वे गुस्से में खड़े हो गए। परंतु कुछ बोले नहीं। चंद्रवली भी वातावरण की गंभीरता को देखते हुए खड़े हुए और दीनानाथ को नमस्ते करके चले गए। उनके साथ आए लोग बड़ी दयनीय नजरों से दीनानाथ को देखते हुए वहाँ से विदा हुए।

दीनानाथ की जिंदगी में अब परेशानियों का सिलसिला शुरू हो गया। एक दिन उनके घर के पीछे की बाउंड्री वॉल टूटी हुई पाई गई, जिसमें से भैंसों ने घुसकर उनकी बगीया तहस-नहस कर दी। वे दौड़कर तबेले के मैनेजर मधुकर सिंह के पास गए और उसे उन्होंने बहुत खरी-खोटी सुनाई। मधुकर सिंह और तबेले के कर्मचारी लड़ने के लिए तैयार हो गए। उनका कहना था–‘आपकी दीवाल बहुत कमजोर थी। जानवरों ने तोड़ दी और आपकी बाउंड्री में घुस गए तो इसमें हमारा क्या दोष है? जानवर तो जानवर, उनमें कोई समझ थोड़े ही होती है!’

दीनानाथ बहुत देर तक बड़बड़ाते रहे। बदले में मधुकर सिंह और उसके आदमियों ने भी खूब गाली-गलौज की। कोई बीच-बचाव करने नहीं आया। चंद्रवली के आदमियों से कौन उलझे, यह सोचकर मोहल्ले वाले तमाशा देखते रहे परंतु कोई कुछ नहीं बोला। दीनानाथ ने पुलिस में शिकायत की। बदले में मधुकर सिंह ने रिपोर्ट लिखवाई कि दीनानाथ ने मेरे साथ मारपीट की और मुझे जोर का धक्का दिया, जिससे गिरकर मेरे पैर में गंभीर चोट आई। एक दिन टी.आई. ने घर आकर दीनानाथ जी को बताया–‘आपके खिलाफ रिपोर्ट दर्ज हुई है कि आपने मधुकर सिंह के साथ मारपीट की और उसे धक्का देकर जमीन पर पटक दिया, जिससे उसके पैर में गंभीर चोट लगी। मुझे मालूम है, आप बुजुर्ग व्यक्ति हैं, आप क्या मारपीट करेंगे! परंतु शिकायत तो शिकायत है। आप जानते हैं कि मधुकर सिंह चंद्रवली का आदमी है और चंद्रवली मिनिस्टर का। आपको उससे पंगा नहीं लेना चाहिए था। अब मेरे पास ऊपर से फोन आ रहे हैं कि रिपोर्ट पर कार्रवाई करो। मुझे मजबूरन प्रकरण को जिला अदालत में प्रस्तुत करना होगा। आपके खिलाफ तबेले के कर्मचारियों की गवाही है और मधुकर सिंह के घायल होने की डॉक्टरी रिपोर्ट भी।’

‘लेकिन मैंने तो किसी के साथ कोई मारपीट नहीं की। इस झूठी रिपोर्ट पर भी आपने प्रकरण दर्ज कर लिया?’ दीनानाथ जी ने चिंतित स्वर में पूछा।

‘मैं मजबूर हूँ, दीनानाथ जी। हमारे पास आपके खिलाफ रिपोर्ट है। चश्मदीद गवाहों के बयान हैं। मधुकर सिंह के पैर में चोट लगी, इसका डॉक्टरी सर्टिफिकेट है। अब प्रकरण तो बनता है। यदि कुछ नहीं हुआ है तो आप कोर्ट से बरी हो जाएँगे।’ इतना कहकर टी.आई. चला गया। तबेले में जाकर उसने मधुकर सिंह और उसके आदमियों से भी बातचीत की। दीनानाथ ने वहाँ उसे हँसते हुए चाय-नाश्ता करते देखा। वे बहुत विचलित हो गए।

उनकी पत्नी ने उन्हें समझाया–‘ये तबेले वाले लोग अच्छे नहीं है। जो घटना घटी ही नहीं, अब उसका मामला कोर्ट में जाएगा। पेशियाँ होंगी। दोनों तरफ से गवाह प्रस्तुत करने होंगे। उनके गवाह तो मजबूत हैं। उनके ही आदमी हैं। हमारे पास गवाह कहाँ, जो कोर्ट में यह कहें कि हमने उस समय वहाँ कोई मारपीट होते नहीं देखी। इस प्रकार हम परेशान हो जाएँगे। आप मधुकर सिंह से सॉरी कहके प्रकरण को यहीं समाप्त करो।’

दीनानाथ ने पत्नी के सुझाव पर गंभीरतापूर्वक विचार किया। वह ठीक ही तो कह रही है कि हमारे पक्ष में कौन गवाही देगा? इस बुढ़ापे में कोर्ट के चक्कर लगाते हुए हम परेशान हो जाएँगे। मधुकर सिंह से सॉरी कह देने में क्या हर्ज है। घर के पीछे अब वे पक्की बाउंड्री बनवा लेंगे। बगिया भी वे फिर से सजा लेंगे। इस झंझट से तो मुक्ति मिले, ऐसा सोचकर वे शाम को तबेले में मधुकर सिंह के पास गए और विनम्रतापूर्वक बोले–‘भाई, जो हुआ सो हुआ। मैं उस दिन की बहस के लिए आपसे क्षमा माँगता हूँ। कृपाकर आप अपनी रिपोर्ट वापस ले लो।’

हँसते हुए मधुकर सिंह ने कहा–‘मैं आपकी बात कैसे मान लूँ। आप भी तो किसी की बात नहीं मानते। उस दिन भैया चंद्रवली जी आपसे कितना निवेदन करते रहे कि ये मकान हमको बेच दो, आप माने क्या? नहीं माने न। इतने बड़े आदमी आपके घर से निराश होकर लौटे। हम अब भी आपसे कहते हैं मास्टर जी, ये मकान हमें बेचकर आप अपनी बेटियों के पास जाकर सुख से रहो। इस मकान की हमको बहुत जरूरत है।’

‘मकान तो हम नहीं बेचेंगे। आपके जानवरों ने हमारी बाउंड्री वॉल तोड़ दी। मेहनत से लगाई गई हमारी बगिया उजाड़ दी। हमने आकर आपके सामने आपत्ति की तो आपने हमारे खिलाफ मार-पीट का झूठा प्रकरण दर्ज करा दिया। अब हम आपसे क्षमा माँगने के लिए आए हैं तो आप मकान बेचने की बात कह रहे हैं। यह ठीक नहीं है, हम मुकदमा लड़ लेंगे परंतु अपना मकान नहीं बेचेंगे।’ इतना कहकर गुस्से में दीनानाथ अपने घर आ गए।

उन्होंने पत्नी को मधुकर सिंह के साथ हुआ पूरा वार्तालाप बताया। पत्नी को सुनकर दुख हुआ। उसकी समझ में न आया कि अब वह अपने पति से क्या कहे? मकान खाली कराने के लिए तबेले वाले इस तरह दबाव बना रहे हैं। वे चाहते हैं कि हम परेशान होकर औने-पौने दामों में उन्हें यह मकान बेचकर कहीं और चले जाएँ। हमने बुढ़ापे में सुखपूर्वक रहने के लिए पाई पाई जोड़कर यह मकान बनाया है, हम इसे ऐसे कैसे बेच दें? दीनानाथ की पत्नी अपने पति की परेशानियों से बहुत चिंतित हैं। सोचती हैं, लड़कियों और उनके पतियों को अपनी परेशानियों से अवगत कराया जाए। उसने अपने मन की बात पति से कही।

दीनानाथ पत्नी की बात सुनकर बोले–‘बेटियाँ और दामाद क्या कर लेंगे? यहाँ की समस्याएँ हमें अपने ढंग से निपटानी पड़ेंगी। बेटियाँ तो पहले से ही यही कह रही हैं कि बाबू जी वहाँ का मकान बेचो और यहीं आकर हमारे साथ रहो। उनका ऐसा कहना उनका कर्तव्य है। वहाँ उनके पति का परिवार उनके साथ रहता है। हमारा भी उनके पास जाकर रहना उचित होगा क्या? हमने यह मकान बड़ी मेहनत और लगन से अपने लिए बनवाया है? हम यहीं इसी मकान में रहेंगे। माना कि चंद्रवली यादव के कारण अभी हम परेशान हैं परंतु समस्या का कोई-न-कोई हल जरूर निकलेगा। बच्चों को अपनी समस्याएँ बताने से कुछ नहीं होगा। हमें अपनी लड़ाई खुद ही लड़नी पड़ेगी।’

दीनानाथ की पत्नी अपने पति का स्वभाव अच्छी तरह जानती हैं। शांत प्रकृति के हैं। किसी से कोई झगड़ा-फसाद नहीं करते। अपने काम से काम रखते हैं परंतु जीवन में कोई परेशानी आ जाए, मुश्किल आ जाए तो उससे डटकर जूझते हैं। अब बुढ़ापा है, हम दोनों का। इस उम्र में ज्यादा दौड़-धूप नहीं हो सकती। परंतु दौड़-धूप करने का अवसर आ गया। मधुकर सिंह की रिपोर्ट पर टी.आई. ने प्रकरण बनाकर कोर्ट में पेश कर दिया था। दीनानाथ को पहली पेशी की तारीख मिल गई। अब उन्हें एक वकील करना था, उसे प्रकरण समझाकर नियत तारीख को कोर्ट में उपस्थित होना था। उन्होंने एक सीनियर वकील से मिलकर उसे समस्या बताई। वकील का कहना था–‘मधुकर की ओर से चश्मदीद गवाह उपस्थित होंगे। मैं उनसे प्रश्न, प्रति प्रश्न करूँगा परंतु आपकी ओर से भी कोई-न-कोई गवाह अवश्य होना चाहिए। या डॉ. अवधेश, जिन्होंने एम.एल.सी. रिपोर्ट बनाई है, वे अपने बयान में गंभीर चोटों को नकार दें तो बात बन सकती है।…खैर देखेंगे, आगे क्या होता है।’

शाम को दीनानाथ शहर के पार्क में घूमने जाते हैं। कुछ उनके जैसे उम्रदराज लोग वहाँ आ जाते हैं। सभी मध्यम वर्गीय परिवार के बुजुर्ग हैं। उन लोग ने एक ‘सीनियर सिटीजन क्लब’ बना लिया है। मिलजुल कर कुछ सांस्कृतिक-धार्मिक आयोजन करते रहते हैं। आज शाम को पार्क में घूमने के पश्चात सब लोग किशोरीलाल जी के यहाँ गए। वहाँ ‘सुंदरकांड पाठ’ का आयोजन है। दीनानाथ जी भी इस पाठ में सम्मिलित हुए। कार्यक्रम समाप्ति के पश्चात किशोरीलाल जी सभी लोगों को बाहर तक छोड़ने आए। दीनानाथ से उन्होंने पूछ ही लिया–‘आज आप कुछ परेशान से दिख रहे हैं?’ दीनानाथ जी ने अपनी व्यथा-कथा उन्हें बताई। वे बोले–‘आप डॉ. अवधेश से मिलो और उनसे पूछो, डॉक्टर साहब हमारी आपसे क्या दुश्मनी है? फिर हमारे खिलाफ आप क्यों गवाही देने वाले हैं। शायद डॉक्टर को बात समझ में आ जाए और वे आपकी मदद करें।’ दीनानाथ को किशोरीलाल का यह सुझाव पसंद आया।

अगले दिन दीनानाथ डॉक्टर अवधेश के घर पर थे। दीनानाथ की पूरी बात सुनकर डॉक्टर अवधेश बोले–‘देखिए दीनानाथ जी, मुझे आप से कोई लेना-देना नहीं। पिछले दिनों मेरा ट्रांसफर एक आदिवासी क्षेत्र में हो गया था। चंद्रवली यादव जी ने मेरा ट्रांसफर रुकवाया। उनका मेरे ऊपर बड़ा एहसान है, अब मैं उनकी ज़रा-सी बात न मानूँ? मुझे अपनी रिपोर्ट के अनुसार गवाही देनी पड़ेगी। मैं आपकी कोई मदद नहीं कर पाऊँगा। वैसे मेरा आपके लिए एक सुझाव है, आप चंद्रवली जी की बात मान क्यों नहीं लेते? कितने दिन आप उस मकान में रहेंगे? एक-न-एक दिन तो वह बिकेगा ही। आप नहीं तो आपकी बेटियाँ-दामाद बेचेंगे। इसलिए आप उसे बेचकर कहीं और जाकर बस जाइए। सुखी रहेंगे। चंद्रवली यादव प्रभावशाली आदमी हैं। जो सोच लेते हैं, उसे पूरा करके ही छोड़ते हैं। उन्हें अपने डेयरी फॉर्म के लिए आपका मकान चाहिए, तो दे दीजिए उन्हें और तमाम झंझटों से मुक्ति पाइए। वरना वे आपको मकान बेचने के लिए मजबूर कर देंगे।’

डॉक्टर की बातें सुनकर दीनानाथ को बहुत गुस्सा आया परंतु वे कुछ न कर सकते थे। चुपचाप घर आ गए। उन्होंने डॉक्टर से हुई बातचीत के विषय में अपनी पत्नी को बताया। पत्नी को सुनकर बहुत दुख हुआ और मन में घबराहट भी हुई। उसने पति से दबी जबान में कहा–‘क्या ऐसा नहीं हो सकता कि हम इस मकान को बेचकर इसी शहर में या किसी और शहर में दूसरा मकान लेकर उसमें शिफ्ट हो जाएँ।’

दीनानाथ ने पत्नी को समझाया–‘तुम तो जानती ही हो कितनी अभिलाषा, आकांक्षा के साथ  हमने ये मकान बनवाया है। अभी तक इसमें हम सुख-चैन से रहते आए। अब कोई दबंग, भूमाफिया हमारे मकान को हथियाना चाहे तो हमें लड़ाई तो लड़नी पड़ेगी।’

‘मुझे आपकी बहुत चिंता हो रही है। इस बुढ़ापे में बिना किसी कारण के ये मुसीबत और कोर्ट-कचहरी के चक्कर! कहीं आपको कुछ हो गया तो!’ पत्नी ने आशंका व्यक्त की।

‘घबराने की कोई बात नहीं है। हम ये मकान कभी नहीं बेचेंगे। भले ही हम ये मकान किसी संस्था को दान में दे दें परंतु इसे कभी बेचेंगे नहीं और जब तक जीवित हैं, इसी में रहेंगे।’ दीनानाथ ने दृढ़तापूर्वक कहा।

कोर्ट में पेशियाँ शुरू हो गईं थीं। डॉक्टर अवधेश की गवाही हो गई। अब मधुकर सिंह के दो चश्मदीद गवाहों की पेशी होनी थी, जो उसके तबेले के ही कर्मचारी थे। दीनानाथ जी के वकील एक सीनियर और नामी वकील हैं। कोर्ट के बाद जज साहब उन्हें अपने कक्ष में बुलाकर अक्सर उनसे बातचीत किया करते हैं। आज वे वकील साहब से बोले–‘हमलोग तो शक्ल देखकर ही अपराधी को पहचान लेते हैं। दीनानाथ, जैसे बुजुर्ग व्यक्ति क्या किसी से मारपीट करेंगे! परंतु चंद्रवली के आदमियों ने पुख्ता केस बनाया है। कोर्ट तो गवाहों और सुबूतों पर निर्भर है। देखते हैं दीनानाथ जी आगे क्या करते हैं।’

पुलिस इंस्पेक्टर मानता है कि दीनानाथ जी मारपीट नहीं कर सकते। जज को यह महसूस हो रहा है कि दीनानाथ क्या किसी से मारपीट करेंगे। परंतु अदालत में प्रकरण आया है और दीनानाथ जी पर मारपीट का मुकदमा चल रहा है, जिसमें उनको 2-3 महीने की सजा भी हो सकती है। सारे सुबूत उनके खिलाफ हैं। उनका वकील परेशान है कि वह किस प्रकार दीनानाथ को इस फर्जी केस से बचाए। एक दिन वह दीनानाथ से कह ही देता है–‘दादा जी, आपका केस कमजोर है। आपकी तरफ से कोई गवाह नहीं आएगा तो हम क्या कर लेंगे?’

दीनानाथ प्रकरण की गंभीरता को समझ रहे थे। डॉक्टर की गवाही मधुकर के पक्ष में हो चुकी थी। अब दो गवाहों के बयान और होने हैं, जो मधुकर के ही आदमी हैं। शाम को फिर दीनानाथ जी अपने बुजुर्ग साथियों के साथ पार्क में घूमने के लिए गए। आज वे बहुत चिंतित थे, उन्हें लग रहा था कि वे यह फौजदारी मुकदमा हार जाएँगे। उनके बुजुर्ग साथी हर मंगलवार को अपने किसी परिचित के घर में सुंदरकांड का पाठ आयोजित करते हैं। आज बाबू रामदीन के घर पर सुंदरकांड पाठ का आयोजन है। पार्क में कुछ देर घूमने के पश्चात सभी मित्र रामदीन जी के घर जाने लगे। रास्ते में दीनानाथ ने किशोरीलाल को डॉक्टर से अपनी मुलाकात का वाक्या सुनाते हुए उन्हें अपने प्रकरण की गंभीरता बताई। किशोरीलाल ने बेहिचक कहा–‘दीनानाथ जी, आप चिंता न करो। हमलोग चंद्रवली जितने प्रभावशाली तो नहीं है, परंतु इस प्रकार के अत्याचार के खिलाफ हम आपके साथ हैं। आप मेरा और रामदीन का नाम गवाहों में लिखा दो। मैं आज ही रामदीन से बात कर लूँगा। वो मेरा कहा नहीं टालेंगे। आप तो हमें पहले से पेशी की तारीख बता देना हम दोनों तैयार रहेंगे।’

सुंदरकांड पाठ का कार्यक्रम समाप्त हुआ। किशोरीलाल ने रामदीन को एक ओर बुलाकर सारी बात समझाई। उन्होंने तुरंत गवाही देने के लिए अपनी सहमति जाहिर कर दी। दीनानाथ ने किशोरीलाल को रामदीन से बातचीत करते देख लिया था। रामदीन ने ही आकर उन्हें आश्वस्त किया–‘आप चिंता न करें दीनानाथ जी, हमलोग आपके साथ हैं।’

अगली पेशी में मधुकर की ओर से दोनों गवाह प्रस्तुत किए गए। दोनों ने कहा कि हुजूर हमारी आँखों के सामने दीनानाथ ने मधुकर सिंह को पटक-पटक कर मारा, जिससे मधुकर जी को हाथ और पैर में जगह-जगह चोटें आईं। दीनानाथ के वकील ने दोनों से तरह-तरह के प्रश्न किए परंतु वे अपनी ही बात पर अड़े रहे कि हमारी आँखों के सामने दीनानाथ ने मधुकर सिंह को पटक-पटक कर मारा। अदालत में दोनों गवाहों के बयान दर्ज हुए और अगली पेशी में दीनानाथ को अपने गवाह प्रस्तुत करने के लिए तारीख दे दी गई। दीनानाथ ने अपने वकील के पास गवाहों में किशोरीलाल और बाबू रामदीन का नाम लिखवाया। वकील साहब चिंतित थे कि कहीं वे यह झूठा मुकदमा हार न जाएँ।

शाम को जब दीनानाथ जी घर आए तो बगल के तबेले में जश्न का माहौल था। मधुकर ने अपने दोस्तों और कर्मचारियों के साथ वहाँ पीने-पिलाने का कार्यक्रम आयोजित कर रखा था। वैसे तो अक्सर तबेले में इस तरह के कार्यक्रम होते रहते हैं। आज का आयोजन विशेष था क्योंकि आज दीनानाथ को मुकदमे में फँसाने का पूरा आयोजन किया जा चुका था। मधुकर और डॉक्टर अवधेश के बयान पहले ही हो चुके थे। आज दो चश्मदीद गवाहों के बयान पूरे हुए। अब दीनानाथ को इस मुकदमे में सजा हो जाने से कोई नहीं बचा सकता। तबेले में जोर-जोर से की जा रही बातें दीनानाथ को स्पष्ट सुनाई दे रही थीं…मास्टर साहब को अब सजा हो जाएगी…उसके बाद वे लालपुर छोड़कर कहीं भाग जाएँगे…तब यह मकान बिकेगा और यहाँ बनेगा हमारा डेयरी फॉर्म…।

पति पत्नी दोनों अपने मकान में तबेले से उठती हुई आवाजें सुनते रहे। दीनानाथ की पत्नी भीतर से बहुत डर गईं परंतु उन्होंने अपना डर पति के सामने जाहिर नहीं किया। दीनानाथ के मन में मुकदमे को लेकर तरह-तरह की शंकाएँ थीं। उन्हें लग रहा था कि यह कैसी व्यवस्था है, जिसमें किसी निर्दोष व्यक्ति को कितनी आसानी से दोषी बनाया जा सकता है।

अगली पेशी के एक दिन पहले दीनानाथ ने किशोरीलाल और रामदीन को अपने वकील से मिलवाया। वकील ने उन दोनों को भलीभाँति समझाया कि कल आपको कोर्ट में ये-ये कहना है तथा विपक्षी वकील के बार-बार पूछने पर भी आपको अपने बयान पर डटे रहना है। अगले दिन दोनों ने कोर्ट में बयान दिए–‘हमलोग उस दिन शाम को चार बजे दीनानाथ से मिलने उनके घर गए थे। दीनानाथ के घर के पीछे वाली बाउंड्री वॉल तबेले की भैंसों ने तोड़कर उनकी बगिया उजाड़ दी थी, इसकी शिकायत करने हमारे सामने दीनानाथ, मधुकर सिंह के पास गए थे। बस। वहाँ उन्होंने उनके साथ कोई मारपीट नहीं की। हमलोग वहाँ उपस्थित थे। उसके बाद हम साढ़े सात बजे तक दीनानाथ जी के घर पर ही रहे। तत्पश्चात अपने घर आए। उस शाम वहाँ कोई मारपीट की घटना नहीं हुई।’

मधुकर को स्वप्न में भी कल्पना नहीं थी कि दीनानाथ इस प्रकार अपने लिए दो गवाह जुटा लेंगे और उनकी इतनी प्रभावशाली गवाही कोर्ट में हो जाएगी। खैर…डॉक्टरी रिपोर्ट उसके पक्ष में थी इसलिए उसे पूर्ण विश्वास था कि केस का निर्णय उसके पक्ष में होगा और दीनानाथ को सजा हो जाएगी।

अगले सप्ताह केस का फैसला था। फैसला दीनानाथ के पक्ष में हुआ। कोर्ट में चपरासी से लेकर जज तक सब जानते थे कि सत्तर साल के दीनानाथ, पैंतीस साल के मधुकर को किस प्रकार पटक-पटक मारेंगे। मामला पूरी तरह फर्जी था परंतु पुख्ता सबूतों और मजबूत गवाहों के साथ बनाया गया था। किशोरीलाल और बाबू रामदीन ने चंद्रवली के मंसूबों पर पानी फेर दिया।

उधर चंद्रवली के खेमे में इस मुकदमे के हारने से कोई निराशा नहीं थी। वे इसी दुनिया के आदमी थे। स्वयं चंद्रवली और उनके आदमियों के खिलाफ विभिन्न अदालतों में कई मुकदमे चल रहे थे। हाँ, दीनानाथ ने अपने जीवन में पहली बार कोई केस लड़ा था, जिसमें अपनी जीत का पूरा श्रेय वे किशोरीलाल और रामदीन को दे रहे थे। अभी इस मुकदमें से निपटे हुए महीना भर भी न हुआ था कि एक दिन दीनानाथ के पास हरिजन थाने से फोन आया–‘आपके खिलाफ हमारे थाने में शिकायत आई है कि आपने मधुकर सिंह के तबेले में काम करने वाले एक कर्मचारी लगनू को जाती सूचक (चमार कहकर) गाली देते हुए उससे झगड़ा किया। आप थाने आकर अपना बयान दर्ज कराएँ।’

अभी-अभी दीनानाथ एक फौजदारी मुकदमे से बचकर निकले, अब हरिजन थाने में यह झूठी शिकायत। वे तबेले में कार्यरत किसी लगनू नाम के कर्मचारी को जानते तक नहीं। सामना हो जाने पर पहचान भी न पाएँ और उसने उनके खिलाफ शिकायत की है कि उन्होंने उसे जाति सूचक गालियाँ दीं। हद हो गई। जब किसी को परेशान करना होता है तो ऐसे ही हथकंडे अपनाए जाते हैं। दीनानाथ की पत्नी को इस नई मुसीबत का पता चला तो उन्होंने निराश होकर अपने पति से यही कहा ‘न हो तो इस मकान को बेचकर हम कहीं और दूसरा मकान लेकर रहने लगें।’

‘चंद्रवली हमें यह मकान दूसरे किसी को बेचने नहीं देगा। भू-माफिया ऐसा ही करते हैं। जिस प्लॉट या मकान पर उनकी नजर गड़ जाए उसे वे दूसरी पार्टी को बिकने भी नहीं देते। वे खरीददार को ही बहका देंगे या उसे परेशान करने लगेंगे। औने-पौने दामों पर उसे वे ही खरीदेंगे, किसी और को खरीदने न देंगे। फिर हमें ये मकान बेचना नहीं है। हमें इसमें रहना है, जीवन पर्यंत।’ दीनानाथ ने अपनी पत्नी को समझाया। पत्नी उदास थीं और दुखी भी। बेटियों और दामादों से भी कुछ नहीं कह सकतीं। वे मुंबई और बेंगलुरु में रहते हुए भला क्या कर सकते हैं?

दीनानाथ ने अपनी मुसीबत किशोरीलाल को बताई। वे भी चिंतित हुए। खैर…दोनों ने हरिजन थाने जाकर वहाँ के इंचार्ज से मिलने का निर्णय लिया। वैसे भी दीनानाथ को वहाँ बयान दर्ज कराने जाना ही था। वे अगले दिन किशोरीलाल के साथ हरिजन थाना गए। हरिजन थाने का इंचार्ज गुलाब दास जांगिड़ किशोरीलाल का परिचित निकला। किशोरीलाल जब वन विभाग में लेखापाल थे, तब गुलाब दास के पिता उनके विभाग में तृतीय श्रेणी कर्मचारी थे, वे अक्सर अपने बेटे के पुलिस विभाग में आ जाने के विषय में उन्हें बताया करता थे। एक दिन उन्होंने अपने बेटे गुलाब से उन्हें मिलवाया भी था। गुलाब और किशोरीलाल ने एक-दूसरे को भलीभाँति पहचान लिया। दीनानाथ की समस्या सुनकर गुलाब दास को कोई आश्चर्य नहीं हुआ। उसके पास इस तरह के केस अक्सर आते रहते हैं, जिसमें हरिजन एक्ट के अंतर्गत शरीफ लोगों को फँसाया जाता है। गुलाब, चंद्रवली यादव को भी अच्छी तरह जानता है, उसने बताया कि चंद्रवली यादव ने पास के कस्बे मनेंद्रगढ़ में हरिजनों की बहुत सारी जमीन को अपनी बताकर उस पर जबरदस्ती कब्जा कर लिया है। भू-माफिया है वो। मिनिस्टर का आदमी है। लेकिन एक-न-एक दिन उसके पाप का घड़ा जरूर फूटेगा। उसने दीनानाथ को संबोधित करते हुए कहा–‘रिपोर्ट आते ही मैं समझ गया था कि प्रकरण झूठा है। आप चिंता न करें। मैं एक बार लगनू से और पूछताछ करूँगा। फिर आपको बताऊँगा।’

हरिजन थाने से आने के बाद, थाना इंचार्ज से संतोषप्रद बात होने के पश्चात भी दीनानाथ चिंतित थे। शिकायत तो शिकायत है। लालपुर के टी.आई. को भी मालूम था कि मारपीट की शिकायत झूठी है। जिला अदालत के जज भी जानते थे कि प्रकरण फर्जी है परंतु उसे निपटाते-निपटाते दीनानाथ की मिट्टी पलीत हो गई। अब यह हरिजन थाने में रिपोर्ट…।

एक हफ्ते बाद किशोरीलाल ने दीनानाथ को बताया कि हरिजन थाने में आपकी रिपोर्ट जाँच के पश्चात नस्तीबद्ध कर दी गई। गुलाब ने उन्हें फोन पर बता दिया था कि लगनू से जब उन्होंने कड़ाई से पूछ-ताछ की तो उसने मधुकर के कहने पर झूठी शिकायत करने की बात कबूल कर ली। इस प्रकार आपका यह प्रकरण समाप्त हुआ।

किशोरीलाल भी दीनानाथ की तरह अकेले रह रहे हैं, पति-पत्नी बस। बच्चे बड़े शहरों में नौकरी करते हैं। बाबू रामदीन को एक बेटा है। इसी शहर में नौकरी करता है। माँ-बाप से अलग किराये के मकान में रहता है। रामदीन ने एक दिन बताया था, बहू हमलोग के साथ नहीं रहना चाहती। घर में छोटी-छोटी बातों पर झगड़ा होता था। अंततः हमने बेटे को अलग रहने के लिए कह दिया। बेटा तो अक्सर मिलने आता रहता है। बहू जब से इस घर से गई है, आज तक नहीं आई। ठीक है, जहाँ भी बहू-बेटे रहें, सुख से रहें। हम भी अपने घर में पति-पत्नी सुखपूर्वक रह रहे हैं। सीनियर सिटीजन क्लब में पंद्रह सदस्य हैं। लगभग सभी अकेले रहते हैं, पति-पत्नी सहित। इनमें कुछ विधुर भी हैं। लालपुर एक छोटा जिला है। बच्चे पढ़-लिखकर महानगरों में जाकर नौकरी करने लगे। कुछ परिवारों में बच्चे ज्यादा पढ़ लिख गए तो वे विदेशों में नौकरी करने चले गए। यहाँ रह गए माँ-बाप, बिल्कुल अकेले। ये बुजुर्ग आपस में बातें किया करते हैं, यह समय ही ऐसा है। बुढ़ापे में सबको अकेले रहना है। बच्चे तो पढ़-लिखकर रोजगार की तलाश में बाहर जाएँगे ही। विवशता है। उन्हें अपने ही शहर में उनकी शिक्षा के अनुसार नौकरी नहीं मिल सकती। जिन्हें मिल जाती है, जैसे रामदीन का बेटा, वह भी अपने माँ-बाप के साथ कहाँ रहता है। इस प्रकार आने वाले समय में सबको अकेले रहने की मानसिक तैयारी कर लेनी चाहिए। दीनानाथ को इन दिनों बहुत परेशानियाँ झेलनी पड़ रही हैं, अब उन्हें अपना अकेलापन बहुत अखर रहा है। इसी प्रकार जब रात-बिरात तबीयत खराब हो जाती है, तब भी उन्हें अकेलापन बहुत सालता है। अब इस क्लब के सदस्य ही एक परिवार जैसे हैं। हर मंगलवार को किसी एक सदस्य के यहाँ सुंदरकांड का पाठ आयोजित होता है, सब लोग वहाँ मिलते हैं, एक-दूसरे का हालचाल मालूम हो जाता है। वैसे रोज शाम को शहर के इस इकलौते गार्डन में भी सबकी मुलाकात होती ही रहती है।

अगले महीने दीनानाथ के यहाँ झाड़ू-पोंछा करने वाली बाई कुंती ने दीनानाथ को संकोच पूर्वक बताया–‘बाबू जी, ये मधुकर हमको पाँच हज़ार रुपये का लालच देकर बोला कि सबेरे जब मालकिन मंदिर चली जाएँ तब अपने कपड़े फाड़ कर तुम चिल्ला देना कि साहब हमारे साथ गलत काम किए हैं। हम साले को चार ठो गाली सुना कर चले आए। परंतु बाबू जी वो किसी और को इस प्रकार रुपयों का लालच देकर आपको बदनाम करने की फिराक में है।’

दीनानाथ को सुनकर आश्चर्य हुआ कि कोई किसी को परेशान करने के लिए इस हद तक भी गिर सकता है। उनकी पत्नी को जब कुंती के कथन का पता चला तो उन्होंने सुबह-सुबह मंदिर जाना छोड़ दिया। अब वे ज्यादातर घर में ही रहती हैं, अपने पति के आसपास। उन्हें डर है कि मधुकर किसी दिन ऐसी-वैसी किसी महिला को घर में घुसाकर नया बखेड़ा खड़ा न कर दे फिर हम कहाँ-कहाँ सफाई देते फिरेंगे।

यह तो तय है कि चंद्रवली के खेमे में इन दिनों दीनानाथ को परेशान करने के नए-नए उपाय सोचे जा रहे हैं। एक दिन दीनानाथ ने अपने ड्राइंग रूम की खिड़की से मधुकर के तबेले में आने वाले दूध वाहन के ड्राइवर को झाँकते हुए देखा। वे उसे अक्सर दूध का छोटा ट्रक लाते, ले जाते हुए देख चुके थे। उन्होंने बाहर निकल कर देखा, खिड़की के पास कोई न था। अब वे बहुत घबरा गए। उन्हें लगा कि मधुकर ने ड्राइवर को आदमी ठीक से देख लेने के लिए खिड़की पर भेजा था। बस इसे ही निपटाना है। शाम को रोज बगीचे तक घूमने जाता है। उसी समय इसे ट्रक की चपेट में लिया जा सकता है। लोग दुर्घटना समझेंगे और हमारा काम हो जाएगा। फिर ये बुढ़िया तो घर बेचकर बेटियों के पास जाएगी ही। ऐसा सोचकर दीनानाथ को कँपकँपी छूट गई। गले में आवाज रुँध गई। बड़ी मुश्किल से वे पत्नी को चाय पिलाने के लिए कह पाए।

चाय पीते हुए भी उन्हें यही लग रहा था, हो-न-हो किसी दिन वे सड़क दुर्घटना के शिकार हो सकते हैं। अब यह बात वे किससे कहें? पत्नी से कहेंगे तो वो बहुत डर जाएगी। अपने बुजुर्ग साथियों से कहेंगे तो वे समझाएँगे, ऐसी-वैसी बातें मत सोचा करो। उन्होंने सिर्फ दूध वाहन के ड्राइवर को खिड़की से अपने कमरे में झाँकते देखा था, और कुछ नहीं। हो सकता है वो खिड़की के पास से यों ही गुजर रहा हो और उन्होंने यहाँ तक सोच लिया।

बाहर पोस्ट मैन ने जब आवाज दी, तब उनकी तंद्रा टूटी। उन्होंने दरवाजा खोलकर पोस्ट मैन से अपने नाम आए लिफाफे को लिया और ड्राइंग रूम में लिफाफा खोलकर पढ़ने लगे। उनकी नौकरी के प्रारंभिक दिनों में जब वे रोहित नगर (लालपुर जिले का संभाग) में पदस्थ थे, तब उनके प्रिंसिपल हुआ करते थे–ध्रुवनारायण शुक्ल, उनका पत्र आया था और साथ में छपा हुआ एक कार्ड। अगले महीने ध्रुवनारायण शुक्ल अपनी उम्र के सौ वर्ष पूरे करके एक-सौ-एकवें वर्ष में प्रवेश कर रहे हैं। इस अवसर पर उनका जन्मशताब्दी समारोह मनाया जाना है, जिसमें उन्होंने स्नेहपूर्वक दीनानाथ को आमंत्रित किया था।

दीनानाथ को ध्रुवनारायण जी की याद हो आई। उन दिनों वे नौकरी में आए थे। लोअर डिवीजन टीचर के पद पर उन्होंने ज्वाइन ही किया था। ध्रुवनारायण स्कूल के प्रिंसिपल–अनुशासन प्रिय, मिलनसार और हमेशा प्रसन्न रहने वाले। दीनानाथ ने उन्हें कभी किसी पर गुस्सा करते नहीं देखा, जबकि स्कूल स्टाफ में कई लोगों से गंभीर गलतियाँ हो जाया करती थीं। वे प्यार से समझा देते, परंतु गुस्सा कभी न करते। वे सेवानिवृत्त होकर रोहित नगर में ही बस गए थे। अब सौ बरस के होने जा रहे हैं। रोहित नगर में उनका शताब्दी समारोह आयोजित है। इसमें जरूर जाना चाहिए, ऐसा सोचकर दीनानाथ ने उनका निमंत्रण कार्ड सँभाल कर अलमारी में रख दिया।

आजकल उन्हें सड़क पर चलते हुए बहुत डर लगता है। शाम को वे घूमने के लिए बगीचे तक जाते हैं। रास्ते में बहुत बच-बच के चलते हैं। मुड़कर कई बार पीछे देखते हैं, कोई वाहन उनका पीछा तो नहीं कर रहा। उन्हें भय है कि कभी भी कोई वाहन उन्हें कुचल कर आगे बढ़ जाएगा। कुछ दिनों तक पत्नी शोक मनाएगी। बेटियाँ और दामाद आ जाएँगे। फिर यह मकान बिकेगा, चंद्रवली किसी दूसरी पार्टी को खरीदने नहीं देंगे। उन्हें औने-पौने दामों पर इसे खुद खरीदना है। यहाँ बड़ा डेयरी फॉर्म बनाना है उन्हें। अंततः मकान वे ही खरीदेंगे और पत्नी अपनी किसी बेटी के साथ चली जाएगी। या दोनों बेटियाँ छह-छह महीने अपने यहाँ उसे रखने का निर्णय लेकर इस समस्या को निपटाएँगी। यह सब सोचते हुए वे सिहर उठते हैं। उन्हें आजकल बहुत डर लगता है। कोई पेशेवर हत्यारा उनकी कहीं भी हत्या कर सकता है।

धीरे-धीरे ध्रुवनारायण शुक्ल के शताब्दी समारोह में रोहित नगर जाने का दिन आ गया। उन्होंने कार्ड निकाल कर देखा, उसमें समारोह स्थल के रूप में भारत माता आश्रम का पता छपा हुआ था। वे रोहित नगर कई बार गए हैं परंतु ऐसे किसी आश्रम के विषय में कुछ नहीं जानते। कार्ड में पता लिखा है, ढूँढ़ लेंगे। कार्यक्रम शाम को चार बजे है। रात साढ़े सात बजे तक यदि वे फुर्सत हो गए तो आठ बजे की बस से वापस आ जाएँगे। दस बजे तक वे लालपुर में होंगे। कुल दो घंटे का रस्ता है, बस द्वारा लालपुर से रोहित नगर तक का। दोपहर को खाना खाकर वे एक बजे की बस से रोहित नगर के लिए निकल गए। तीन बजे वे रोहित नगर में थे। ऑटो वाले को उन्होंने कार्ड दिखाया, उसने ठीक भारत माता आश्रम में ले जाकर दीनानाथ को छोड़ दिया। वहाँ चारों तरफ कमरे बने हुए थे। बीच में एक बड़ा हॉल था, जहाँ कार्यक्रम के लिए तैयारी चल रही थी। दीनानाथ ने एक सज्जन से ध्रुवनारायण जी के विषय में पूछा। उसने उन्हें अपने साथ ले जाकर ध्रुवनारायण जी के आवास पर पहुँचा दिया। ध्रुवनारायण जी द्वार पर ही मिले। उन्होंने गर्मजोशी के साथ दीनानाथ का स्वागत किया और भीतर उन्हें सोफे पर बिठाया। दो कमरों का उनका सुंदर आवास था। उसमें उन्हें सारी सुविधाएँ दिखाई दीं। उन्होंने तुरंत अपनी जिज्ञासा प्रकट की–‘सर, आपका तो यहाँ अपना मकान था। फिर आप यहाँ इस तरह कैसे?’

शुक्ला जी सौ साल के हो गए। अभी पूरी तरह स्वस्थ और प्रसन्न हैं। उन्होंने शांतिपूर्वक दीनानाथ को बताया–‘पच्चीस साल पहले मैं विधुर हो गया था। एक बेटा है, वह कनाडा में सैटिल है। वहीं उसने शादी कर ली। अब तो पोता भी विवाह योग्य हो गया है। मेरे एक मित्र हैं सुरेंद्र मित्तल। राजधानी में रहते हैं। आज आए हुए हैं। अभी आपको मिलवाऊँगा उनसे। वे बड़े उद्योगपति हैं। उन्होंने कई शहरों में इस प्रकार के वृद्ध आश्रम खोल रखे हैं। भारत माता आश्रम नाम से। उनका एक बहुत बड़ा ट्रस्ट है, जो विभिन्न शहरों में वृद्ध आश्रमों की देखभाल करता है। मैंने इस ट्रस्ट को अपनी सारी संपत्ति दान दे दी और पिछले 25 सालों से, जब से विधुर हुआ, यहीं रहता हूँ। कई वृद्ध दंपत्ति भी इस आश्रम में रहते हैं। सबके लिए अलग-अलग आवास की व्यवस्था है। आश्रम में डॉक्टर है, नर्सें हैं और कई सेवकगण भी। हमें किसी तरह की कोई परेशानी नहीं है। आश्रम में रहता हूँ। उचित देखभाल होती रहती है इसलिए सौ सालों तक जी गया।’

दरवाजे पर किसी ने दस्तक देकर शुक्ला जी से कहा–‘सर, आपको मित्तल जी अपने कक्ष में याद कर रहे हैं।’

शुक्ला जी ने उठते हुए दीनानाथ से कहा–‘चलो तुम्हें अपने मित्र और भारत माता ट्रस्ट के चेयरमैन सुरेंद्र मित्तल से मिलवाते हैं।’

मित्तल जी का कमरा किसी ऑफिस जैसा लगा। बीच में एक बड़ी टेबल चारों ओर कई कुर्सियाँ। दीवाल की अलमारियों में फाइलों के ढेर। मित्तल जी ने अपनी कुर्सी से उठकर शुक्ला जी का स्वागत किया। शुक्ला जी ने अपने बगल में दीनानाथ को बिठाते हुए मित्तल जी से उनका परिचय कराया–‘ये दीनानाथ जी हैं। लालपुर इंटर कॉलेज के सेवानिवृत्त प्राचार्य। आजकल लालपुर में ही रहते हैं। रोहितपुर में हमलोग एक ही विद्यालय में थे।’

‘अच्छा…अच्छा आप लालपुर जिला मुख्यालय में ही रहते हैं?’ मित्तल जी ने दीनानाथ से पूछा।

‘हाँ, लालपुर में सेवानिवृत्त होने के पश्चात मैंने अपना एक मकान बनवा लिया है, उसमें अपनी पत्नी के साथ रहता हूँ।’ दीनानाथ बोले।

‘दरअसल लालपुर में भी हम भारत माता आश्रम की शाखा खोलना चाहते हैं। प्रदेश के मुख्यमंत्री श्री रामानुज चौधरी हमारे ट्रस्ट के संरक्षक हैं। हमने उन्हें जमीन दिलवाने के लिए आवेदन दिया है, जैसे ही लालपुर में हमें कोई उचित जगह मिल जाएगी, हम वहाँ भी अपना आश्रम खोल लेंगे।’ मित्तल जी ने कहा।

मित्तल जी का प्रस्ताव सुनकर दीनानाथ की आँखों में चमक आ गई।

वे उत्साहपूर्वक बोले–‘लालपुर में मेरे ही घर के बगल में सरकारी जमीन का एक बड़ा प्लॉट है। लेकिन उस पर एक भू-माफिया चंद्रवली यादव का कब्ज़ा है। वो वहाँ अपना डेयरी फॉर्म बनाना चाहता है। यदि उसे सरकार की ओर से विधिवत वह जमीन आवंटित नहीं हुई है तो भारत माता आश्रम के लिए वह जमीन बहुत उपयुक्त रहेगी। कहते हैं, चंद्रवली यादव प्रदेश के कृषि मंत्री बाबूलाल यादव का रिश्तेदार है।’

पास में बैठे हुए व्यक्ति से दीनानाथ का परिचय कराते हुए मित्तल जी बोले–‘आप धनंजय पांडेय हैं। तहसीलदार से कलेक्टर पद तक पहुँचे। अब सेवानिवृत्त होकर आश्रम में रहते हैं। रोहितपुर आश्रम के मैनेजर आप ही हैं। 2-3 दिन में जब आपको समय मिलेगा, लालपुर आकर वह प्लॉट देख लेंगे। जिला रेवेन्यू कार्यालय से उस प्लॉट की स्थिति भी पता कर लेंगे कि वह जमीन अब भी सरकारी है या चंद्रवली यादव को पट्टे पर दे दी गई है। आगे की कार्यवाही मैं राजधानी में रहते हुए देख लूँगा।’

आश्रम के हॉल में कार्यक्रम की तैयारी हो चुकी थी। धनंजय जी ने सबको वहाँ चलने का आग्रह किया। पूरा मंच फूलों से सजाया गया था। मंच पर आश्रम के प्रमुख ट्रस्टी सुरेंद्र मित्तल, स्थानीय आश्रम के निदेशक धनंजय पांडेय और बीचों-बीच ध्रुवनारायण शुक्ल विराजमान हुए। कार्यकर्ताओं ने एक बहुत बड़ा केक सामने टेबल पर लाकर रखा, जिसमें चॉकलेट द्वारा बहुत सुंदर अक्षरों में सौ का अंक लिखा हुआ था। हॉल में पचास से ज्यादा बुजुर्ग प्रसन्न मुद्रा में बैठे हुए थे। लगभग बीस वृद्ध दंपत्ति भी वहाँ दिखाई दिए। शुक्ला जी ने खड़े होकर केक काटा और फट-फट कर गुब्बारे फूटने लगे। चारों ओर से हैप्पी बर्थडे की आवाजें आने लगीं। मित्तल जी और पांडेय जी ने उन्हें गले लगाकर जन्म दिवस की बधाई दी। सबसे पहले धनंजय पांडेय का उद्बोधन हुआ, जिसमें उन्होंने बताया कि शुक्ला जी हमारे आश्रम के सबसे बुजुर्ग सदस्य हैं, आज उनकी जन्म शताब्दी मनाते हुए हमें बहुत हर्ष हो रहा है। हम पूरे आश्रम की ओर से उन्हें अनंत शुभकामनाएँ प्रेषित करते हैं। मित्तल जी ने अपने भाषण में कहा कि हमारे समाज के वरिष्ठ नागरिक, अपने आपको अकेला न समझें। हम उनके साथ हैं। भारत माता ट्रस्ट ने विभिन्न शहरों में इस प्रकार के सर्व सुविधा युक्त वृद्ध आश्रम बनाए हैं। आगामी योजना के अंतर्गत हम लालपुर जिले में ऐसा ही एक आश्रम बनाने जा रहे हैं। हमारे ट्रस्ट का एक ही उद्देश्य है कि समाज के वरिष्ठ नागरिक, जब तक जिएँ सुखपूर्वक जिएँ। (तालियाँ)

ध्रुवनारायण शुक्ल जी अत्यंत भावुक होकर बोले–‘मैं तो विधुर होने के पश्चात मर गया होता। जीवन संगिनी स्वर्ग सिधार गईं। बेटा कनाडा में जाकर बस गया। मैं अकेला जीकर क्या करता? उसी समय इस आश्रम के विषय में पढ़ा। फिर मित्तल जी से परिचय हुआ। मैं इनके उद्देश्य और सेवा कार्य से बहुत प्रभावित हूँ। आश्रम में आने के पश्चात मुझे मेरा परिवार मिल गया। अब मुझे इस परिवार के लिए जीना था। तब से मैं इस परिवार की सेवा में संलग्न हूँ। मुझे जीने का एक उद्देश्य मिल गया, इसलिए आज यह दिन देख पा रहा हूँ। मैं आप सबका बहुत-बहुत आभारी हूँ।’ इसके पश्चात देर तक हॉल में तालियों की आवाज गूँजती रही। स्टेज पर आ-आकर लोगों ने शुक्ला जी को गले लगाकर उन्हें बधाइयाँ दीं। दीनानाथ ने भी मंच पर आकर शुक्ला जी के चरण स्पर्श किए और उन्हें जन्मदिन की बधाई दी।

शुक्ला जी, मित्तल जी, धनंजय पांडेय और आश्रम के वरिष्ठ नागरिकों से विदा लेकर दीनानाथ आठ बजे की बस में लालपुर जाने के लिए बैठ गए। रास्ते भर वे आश्रम, वहाँ रहने वाले वृद्धजन, शुक्ला जी और मित्तल जी के विषय में ही सोचते रहे। जीवन की संध्याकाल में जब परिवार बिखर जाता है, तब अकेलेपन से बचने के लिए आदमी को पुनः अपना परिवार तलाश लेना चाहिए। यह वृद्ध समाज भी तो एक परिवार है। शुक्ला जी इस परिवार में रहते हुए अपनी जन्म शताब्दी के पार आ गए और अभी जिजीविषा से भरे हुए हैं।

रात साढ़े दस बजे दीनानाथ अपने घर में थे। उन्होंने प्रसन्नतापूर्वक भारत माता आश्रम में शुक्ला जी के जन्म शताब्दी समारोह का वर्णन विस्तार से अपनी पत्नी को बताया। सुबह उन्होंने फिर किसी अज्ञात व्यक्ति को अपने ड्राइंग रूम की खिड़की से भीतर झाँकते देखा। उन्होंने आवाज दी–‘कौन?’ बाहर जाकर देखा। वहाँ कोई न था। उनका डर घना होता जा रहा था। हो-न-हो मधुकर कोई नई चाल सोच रहा है। उसे किसी भी तरह मुझे अपने रास्ते से हटाना है। चंद्रवली ने उससे कह दिया होगा कि तुम तो जैसे भी हो गृहस्वामी को निपटाओ। मुझे हर हालत में वह मकान चाहिए।

दीनानाथ, मधुकर से सहज संबंध बनाना चाहते थे। वे उसे प्रेम से समझाना चाहते थे कि भई, मेरा मकान है। मुझे नहीं बेचना तो इसमें बुरा मानने की कौन-सी बात है। तुम नाहक मुझसे दुश्मनी माने बैठे हो। मधुकर जब कभी दीनानाथ के सामने पड़ जाता, तब वे उससे नमस्कार भी कर लेते परंतु वह दूसरी तरफ मुँह फेर लेता। वे उससे बात करना चाहते परंतु वह उन्हें कोई मौका ही न देता।

एक दिन सुबह धनंजय पांडेय ने दीनानाथ के घर पर दस्तक दी। दरवाजा दीनानाथ ने ही खोला। धनंजय जी को सामने देखकर वे बहुत खुश हुए। उन्होंने आदरपूर्वक उन्हें बिठाया। धनंजय ने बैठते ही पूछा–‘रोहितपुर में आपने एक सरकारी जमीन की बात की थी, मैं उसे ही देखने आया हूँ।’

‘आप पहले नाश्ता कर लीजिए। चाय पी लीजिए। फिर आपको जमीन भी दिखाते हैं। जमीन देखने कहीं जाना नहीं है। यहीं बगल में, मेरे मकान से सटी हुई है।’ दीनानाथ ने उत्तर दिया।

दीनानाथ को चाय-नाश्ते के लिए बोलना नहीं पड़ा। उनकी पत्नी समझ गईं कि रोहितपुर से उनके कोई खास मिलने वाले आए हैं। थोड़ी ही देर में पोहे की प्लेटें और चाय के मग ड्राइंग रूम की टेबल पर थे। धनंजय ने भाभी जी को नमस्कार की। नाश्ते के दौरान ही दीनानाथ ने धनंजय को बताया–‘घर के ठीक बगल में एक बड़ा सरकारी प्लॉट है, जिस पर चंद्रवली यादव के आदमियों ने एक तबेला स्थापित कर रखा है। टीन-टप्पर लगा कर मैनेजर मधुकर सिंह ने अपने और तबेले के कर्मचारियों के लिए अस्थाई निवास भी बना लिया है। वे लोग चाहते है कि मैं यह मकान उन्हें बेच दूँ ताकि वे यहाँ रहकर तबेले में बड़ा-सा डेयरी फॉर्म खोल लें। मैं जीते-जी अपना मकान किसी को बेचना नहीं चाहता।’

धनंजय ने पूरी बात ध्यान से सुनी। वे समझ गए कि दीनानाथ मधुकर सिंह से बहुत परेशान हैं। उन्होंने दीनानाथ से कहा–‘मुझे तबेले के भीतर जाकर नहीं देखना। बाहर से सिर्फ प्लॉट की लंबाई-चौड़ाई देख लेंगे। मैं कलेक्टर कार्यालय जाकर रेवेन्यू विभाग में यह मालूम कर लूँगा कि प्लॉट अभी भी सरकारी है या पट्टे पर किसी को दे दिया गया है।’ इतना कहकर धनंजय उठ खड़े हुए। दीनानाथ ने उन्हें बाहर ले जाकर प्लॉट की सीमा दिखाई। धनंजय आश्रम की गाड़ी से आए थे। प्लॉट को भलीभाँति देखने के पश्चात उन्होंने दीनानाथ से कलेक्टर ऑफिस जाने की अनुमति ली और कहा–‘शाम तक इस प्लॉट की यथा स्थिति मुझे मालूम हो जाएगी। फिर आपसे मिल कर जाऊँगा।’ इतना कहकर वे गाड़ी में बैठे और शहर में बस्ती की ओर निकल गए।

दिनभर दीनानाथ ऊहापोह में रहे कि यदि चंद्रवली को सचमुच इस प्लॉट का पट्टा मिल गया होगा, तब वे क्या करेंगे? धनंजय जी को शहर में कहीं और खाली सरकारी जमीन दिखानी पड़ेगी। यदि चंद्रवली को अभी तक कोई पट्टा नहीं मिला है, तब कृषि मंत्री का रिश्तेदार होने के कारण आश्रम वाले इस प्लॉट को पाने के लिए कहाँ तक प्रयास करेंगे या नहीं? इस तरह के ढेरों प्रश्न दीनानाथ के मस्तिष्क में आते-जाते रहे।

शाम को छह बजे एक फाइल हाथ में लेकर धनंजय आए और दीनानाथ से बोले–‘भाई साहब, अभी तक इस सरकारी प्लॉट का पट्टा किसी को प्राप्त नहीं हुआ है। हालाँकि कई लोग इसके लिए प्रयास कर रहे हैं। उनमें से चंद्रवली यादव भी एक हैं। फिलहाल चंद्रवली यादव यहाँ अवैध कब्जा किए हुए हैं। लोग उन्हें मंत्री का रिश्तेदार मानते हैं इसलिए कोई कुछ बोलता नहीं। मैंने पूरी फाइल बना ली है। यहाँ के कलेक्टर मेरे परिचित हैं। मैंने जब इस प्लॉट पर वृद्ध आश्रम खोलने की बात उन्हें बताई, तब वे बहुत उत्साहित हुए। मुख्यमंत्री के नाम हमारे आवेदन पत्र में उन्होंने अपनी अनुशंसात्मक टिप्पणी भी लिखकर दे दी है। अब यह फाइल मित्तल जी के पास भिजवा देंगे। देखते हैं, आगे क्या होता है।’

धनंजय जी की बात सुनकर दीनानाथ उत्साहित हुए। हालाँकि उनके मन में बार-बार यही शंका जोर मार रही थी कि चंद्रवली मंत्री का आदमी है, उसके प्रकरण में कोई क्यों दखल देगा? इतने में टेबल पर चाय और बिस्कुट की प्लेट उनकी पत्नी ने लाकर रख दी। धनंजय ने चाय पीते-पीते अपनी घड़ी देखी और रोहितपुर जाने के लिए दीनानाथ से आज्ञा माँगी। दीनानाथ ने उन्हें कार तक छोड़ते हुए यही कहा–‘फोन पर समाचार देते रहिएगा।’

‘जरूर! समय-समय पर हम इस कार्य की प्रगति के विषय में आपको बताते रहेंगे। भविष्य में यदि यहाँ आश्रम खुलता है तो उसका कार्यभार भी तो आपको ही सँभालना है।’ इतना कहकर धनंजय गाड़ी में बैठे और गाड़ी चल दी।

रात में दीनानाथ ने पत्नी से सलाह ली–‘यदि अपने घर के बगल में वृद्ध आश्रम बनता है तो हमलोग इस शर्त पर यह मकान उन्हें दान में दे देंगे कि जीवनभर हम इसमें रहेंगे। हमारे मरने के पश्चात यह मकान आश्रम का होगा। तुम्हारा क्या विचार है?’ पत्नी ने उत्साहित होकर कहा–‘आप हमेशा कहते थे, हम यह मकान बेचेंगे नहीं। जीवनभर इसमें रहेंगे। आपका संकल्प पूरा हो। हमारे बाद यह मकान हमारे जैसे वृद्ध लोगों के काम आए, इससे अच्छी बात भला क्या हो सकती है।’ पत्नी की बात सुनकर दीनानाथ बहुत खुश हुए।

कुछ दिनों पश्चात तबेले में मधुकर ने गिट्टी, रेत और सीमेंट आदि भवन निर्माण की सामग्री गिरवानी शुरू कर दी। दीनानाथ चिंतित हुए। अभी तक तबेले में टीन के अस्थाई सेड बने हुए थे, अब वहाँ पक्के कमरे बनाए जाने की योजना है। इसका मतलब है कि इस प्लॉट का पट्टा चंद्रवली को मिल गया है। दीनानाथ ने घबराकर धनंजय जी को फोन लगाया। उन्होंने बताया कि हमारे आवेदन की फाइल मुख्यमंत्री कार्यालय में विचाराधीन है। जल्द ही उस पर निर्णय होगा। दीनानाथ को उनकी बात से संतोष नहीं हुआ। मित्तल जी कहते थे कि मुख्यमंत्री श्री रामानुज चौधरी हमारे ट्रस्ट के संरक्षक सदस्य हैं। इसके बावजूद ट्रस्ट की फाइल अब तक उनके यहाँ विचाराधीन है! अभी तक उस पर कोई कार्यवाही नहीं हुई। चंद्रवली यादव भी तो कृषि मंत्री का रिश्तेदार है। उसके आवेदन को निरस्त करना, इतना आसान तो नहीं होगा! यह सब सोचते हुए दीनानाथ निराश होने लगे। फिर भी उन्होंने धनंजय की बात कि हमारे आवेदन की फाइल विचाराधीन है पर विश्वास करते हुए अपने मन को समझाया।

दो सप्ताह बाद अचानक मित्तल जी ने दीनानाथ से फोन पर बातचीत की। उन्होंने बताया–‘दीनानाथ जी, आपके घर से लगी हुई सरकारी जमीन भारत माता ट्रस्ट को वृद्ध आश्रम खोलने के लिए लीज पर दे दी गई है। दो दिन पूर्व स्थानीय प्रशासन को वहाँ से अवैध कब्ज़ा हटाए जाने के आदेश भी जारी हो गए हैं। अब वहाँ जल्द ही आश्रम बनने का काम शुरू हो जाएगा। वहाँ के आश्रम की व्यवस्था अब आपको ही देखनी है।’ दीनानाथ जी मारे खुशी के फोन पर ‘हाँ, हाँ’ के सिवा और कुछ नहीं कह पाए।

अगले दिन सुबह ही नगर निगम की दो जे.सी.बी. मशीनें तबेले के अंदर तोड़-फोड़ करती नजर आईं। दोपहर तक वहाँ चंद्रवली यादव भी पहुँच गए। उन्होंने नगर निगम के अफसरों को बहुत समझाया, परंतु वे नहीं माने। उनका कहना था, हमने आपको चौबीस घंटे पूर्व नोटिस दे दिया था। आपने अपना अवैध कब्जा नहीं हटाया। अब हमें सरकारी आदेशों का पालन करना है, शाम तक यह प्लॉट पूरी तरह खाली हो जाना चाहिए। चंद्रवली यादव कोने में खड़े होकर जाने कहाँ-कहाँ फोन लगाते रहे। इधर नगर निगम के कर्मचारी तत्परता से प्लॉट खाली करा रहे थे।

दूसरे दिन सुबह ही धनंजय लालपुर आ पहुँचे। वे कलेक्टर से मिलकर दीनानाथ के पास आए थे। उन्होंने दीनानाथ को बताया–‘आज से यह प्लॉट भारत माता ट्रस्ट का है। अब यहाँ वृद्ध आश्रम बनाए जाने से कोई नहीं रोक सकता। एक-दो सप्ताह पश्चात हम यहाँ निर्माण कार्य प्रारंभ कर देंगे। इस आश्रम की पूरी व्यवस्था अब आपको ही देखनी है। मैं आज ही यहाँ आश्रम का एक बड़ा बोर्ड लगवा देता हूँ।’ भाभी जी ने आज धनंजय जी को नाश्ते में हलवा खिलाया और आश्रम के लिए जमीन प्राप्त होने की उन्हें बहुत-बहुत बधाई दी।

शाम तक दीनानाथ के घर के बगल में एक बड़ा बोर्ड लग चुका था, जिस पर लिखा था–‘भारत माता ट्रस्ट द्वारा संचालित वृद्ध आश्रम, लालपुर।’ धनंजय राजधानी से प्राप्त जमीन के आदेश की फाइल दीनानाथ जी को सौंपकर रोहितपुर चले गए। बगीचे में पहुँचकर दीनानाथ ने अपने साथी बुजुर्गों को बताया कि उनके घर के बगल में भारत माता ट्रस्ट एक वृद्ध आश्रम खोलने जा रहा है, यह समाचार सुनकर उनके साथी उत्साहित हुए। कई लोगों ने तो अभी ही दीनानाथ से वहीं जाकर रहने की इच्छा व्यक्त की। दीनानाथ को बहुत संतोष हुआ। किशोरीलाल और बाबू रामदीन ने दीनानाथ को उनके संघर्ष में विजयी होने की बारंबार बधाई दी।

रात में दीनानाथ ने अपनी पत्नी से कहा–‘अब हम अपने मकान में रहते हुए पूरे सौ वर्ष जिएँगे।’ उनकी पत्नी ने हँसकर कहा–‘सिर्फ सौ वर्ष ही क्यों? हम अपने मकान में रहते हुए उससे भी ज्यादा जिएँगे।’


Image : The House at Rueil
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Artist : Edouard Manet
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