खुशियाँ नहीं खुल पाती

खुशियाँ नहीं खुल पाती

वह दरवाजे की घंटी बजाता और मालिक चाबी फेंक देते। वह चाबी उठाता दुकान खोलता। उसे लगता चाबी नहीं जिंदगी उठाता है। बस रोज का यही क्रम। इधर ताला खुलता और उधर उसे अपने घर की खामोशी खुलती नजर आती। फिर भी उसे लगता दुकान का ताला रोज खुल जाता है, लेकिन जिंदगी पर जड़ा नहीं खुल पाता। उसे मालिक का इस तरह चाबी फेंकना बुरा लगता। आखिर एक दिन मालिक से कह ही दिया उसने ‘इस चाबी से आपके घर की खुशियाँ खुलती है और आप इसे रोज फेंक कर देते हैं।’ मालिक को बात सही लगी। उसने दरवाजे के हुक पर चाबी लटकाना शुरू कर दिया। वह आता चुपचाप चाबी उठा लेता। बगैर आवाज। एक दिन उसे कोफ्त हुई चाबी के साथ-साथ जिंदगी भी खामोश लगी और उसने चाबी उठाई और चाबी की आवाज़ सुनने के लिच पोर्च में फेंक दी।

जिंदगी की आवाज सुनाई दी उसे, लेकिन मालिक ने टोक दिया–‘चाबी फेंकने की आवाज क्यों आई? चाबी फेंकी क्या?’

‘मालिक! हाथ से छूट गई जरा!’

‘ध्यान से पकड़ो’–मालिक बोला, ‘हमारे घर की खुशियाँ खुलती हैं इनसे।’


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Artist : Josignacio
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