तवायफ माँ

तवायफ माँ

लाला धनपत हुस्ना की कब्र पर आकर दो फूल चढ़ाने लगा तो उसके आँख से दो आँसू भी टपक पड़े। रुँधे गले से बोला–‘जिंदगी किसको क्या दे दे मालूम नहीं, कौन सा इम्तहान कब ले ले पता नहीं, हुस्ना तुमने हमदर्द बनकर मुझे जो दर्द दिया है, वह हर पल मुझको टीस देता रहता है। अपने कुकृत्यों को याद करके खुद से घृणा होने लगती है। तुम मरकर भी मेरे बच्चों की यादों में जिंदा हो और जीवित होकर भी मेरा उनके सामने कोई वजूद नहीं। हुस्ना तुमने तवायफ होकर भी एक बाप की भावनाओं, मजबूरियों और जरूरतों को समझ लिया और मैं गृहस्थी वाला होकर भी तुम्हारी भावनाओं और अरमानों को नहीं समझ सका। देखो हुस्ना मैं अपनी दौलत की वैशाखी लेकर बेटे के लिए किडनी ढूँढ़ता रहा, पर खुद अपनी किडनी देने का विचार मेरे मन में नहीं आया, जबकि मैं उसका बाप था। कितनी संवेदनहीनता और कायरता थी मुझमें, और तुमने कितनी सहजता से मुझ जैसे पापी के बेटे को अपनी किडनी दी, तुम्हारे त्याग की यह आरी मुझे सदा लहूलुहान करती रहती है कि मैं कितना निर्दय इनसान हूँ। थू है मुझ पर और जैसे ही लाला ने थूका, उसे हुस्ना का चेहरा सामने दिखा और यह शब्द सुनाई दिए–धनपत आज आप मुझ पर थूक रहे हैं पर एक दिन ऐसा आएगा कि आप खुद पर थूकेंगे, यह मेरा अभिशाप है, विवशता से घिरी माँ का श्राप है। तुमने सच कहा था हुस्ना, मैं आज भी पश्चाताप की आग में जलता हूँ। मेरे जीवन सत्य को जानकर मेरा बेटा मुझसे दूर चला गया, नफरत करता है। वह तो तुझ जैसी देवी की बेटी ही है जो मुझ जैसे इनसान के जीवन में सुगंध फैलाए है। धन्य हो तुम हुस्ना और देखते-देखते लाला धनपत अतीत की सुरंग में कैद होकर यादों के सागर में गोता लगाने लगे। हुस्ना जो गंधर्व जाति की मानी जाती थी, सारे कलकत्ते में अपने समय में ठुमरी, ख्याल और गायकी के लिए प्रसिद्ध थी। जद्दनबाई की तरह हुस्ना बेगम भी एक की पाबंदी में रहीं। एक बार राजा महमूदाबाद के घर मुजरा करने गईं और वहीं पर हुस्ना का राजा साहब के साथ गहरा संबंध बन गया। कालांतर में राजा साहब ने दो सौ बीघा जमीन हुस्ना को नजर कर दी, एक मकान भी बनवा दिया। राजा साहब से हुस्ना की दो बेटियाँ हुईं। राजा साहब को तपेदिक की बीमारी ने ऐसा घेरा कि धीरे-धीरे शरीर सूखता गया और एक दिन हुस्ना को दोनों बेटियों की जिम्मेदारी सौंपकर भगवान को प्यारे हो गए। राजा साहब के जाने के बाद हुस्ना का मन शहर से उचट गया। वह अपनी बेटियों को पढ़ाकर शादी कर देना चाहती थी। इस पेशे से दूर रखना चाहती थी, इसलिए राजा साहब के दिए गाँव के घर में आ गईं। जमीन को अधबँटाई में देकर वह घर चला रही थी।

इसी बीच लाला धनपत की निगाह हुस्ना की बेटी पर पड़ी और वह हुस्ना के पीछे पड़ गया कि अपनी बेटी को मेरी पाबंदी में रख दे। पर हुस्ना ने उसकी उम्र और नीयत देखकर मना कर दिया। उसने अपनी बेटी के लिए जो सपने संजोये थे उसमें यह बुड्ढा कहीं नहीं था। हुस्ना के मना करने पर धनपत और अड़ गया। वह जगह-जगह कहता कि तवायफ गाँव में रहेगी तो गाँव खराब होगा, इसे हटाना होगा, पर धनपत की गंदी आदतों के कारण कोई उस पर ध्यान नहीं देता था, इससे धनपत और चिढ़ गया। हुस्ना से बदला लेने का मौका ढूँढ़ने लगा।

एक दिन जब हुस्ना अपनी छोटी बेटी को लेकर अपना अनाज बेचने गाँव से बाहर बाजार गई थी तो धनपत ने हुस्ना की बेटी के साथ जबरदस्ती की। जब हुस्ना लौटकर आई और उसको सारी बातें मालूम चली तो गुस्से से थर-थर काँपने लगी, उसके अरमान धराशायी हो गए। वह गुस्से से धनपत के घर गई और उसका गिरेबान पकड़कर चिल्लाई–‘तुझे मेरी बेटी को छूने की हिम्मत कैसे हुई? मैं तुझे छोड़ूँगी नहीं लाला।’

धनपत ने अपना गिरेबान छुड़ाकर उसे धक्का दिया और उस पर थूकते हुए कहा–‘अरे दो कौड़ी की तवायफ तू मेरा क्या बिगाड़ सकती है। जा-जा अब तेरी बेटी की शादी नहीं हो सकती। जा कर कहीं चकलाघर खोल ले–रंडी कहीं की।’

सुनकर हुस्ना का शरीर क्रोध से काँपने लगा। बोली–‘लाला, आज आप मुझ पर थूक रहे हैं, एक दिन ऐसा भी आएगा जब तू खुद पर थूकेगा–घर-परिवार से हारकर तू पश्चाताप करेगा, पर तेरे को एक पल का चैन नहीं मिलेगा। मेरी बेटी के बारे में तू चिंता न कर–हम रंडी नहीं हैं। हम गंधर्व जाति  की हैं, लाला हम तुम जैसे सेठ-गृहस्थों से ज्यादा शरीफ हैं समझे, मैं तेरा क्या बिगाड़ सकती हूँ यह तो वक्त ही बताएगा, बस मुझसे बचकर रहना।’ और गुस्से से पैर पटकती वापस आ गई। अब हुस्ना का लक्ष्य धनपत से बदला लेना हो गया, पर बदला लेने से पहले वह अपनी बेटी की शादी करना चाहती थी।

हुस्ना अपनी बेटी सावनी की शादी के लिए हर समय चिंतित रहने लगी। किससे कहे? कहाँ से अच्छा लड़का लाए। इस विषय पर किससे सलाह ले, वह कुछ समझ नहीं पा रही थी। बहुत सोचकर उसने एक दिन बनारस की सिद्धेश्वरी देवी को अपनी परेशानी बताई। सिद्धेश्वरी देवी ने अपने कुनबे की बेटी के अधिकारी बेटे के सामने हुस्ना की बेटी का प्रस्ताव रखा। चूँकि सिद्धेश्वरी देवी का बहुत मान था और उनकी बात कोई नहीं टालता था, इसलिए हुस्ना की बेटी के साथ शादी करने के लिए वह लड़का तैयार हो गया। धूमधाम से अपनी बेटी का विवाह करके हुस्ना निश्चिंत हो गई। निश्चिंत होते ही धनपत से बदला लेने का जुनून हुस्ना पर फिर हावी हो गया। कैसे बदला लूँ? क्या उसका कत्ल कर दूँ? नहीं-नहीं ऐसा करके तो मैं अपनी बेटियों के जीवन में दुःख भर दूँगी–यह बात उछलेगी तो मेरी बच्चियों का जीवन तो प्रभावित होगा ही–इतनी आसान मौत देकर मुझे तुष्टि भी नहीं मिलेगी। फिर क्या करूँ, क्या करूँ–धनपत को ऐसा दर्द देना है, ऐसी दुःख की आग लगानी है कि वह उस दर्दीली आग में सुलगता रहे, न जीए, न मरे, वह गीली लकड़ी की तरह धुआँ-धुआँ होता रहे। क्या करूँ…क्या करूँ, क्या रास्ता निकालूँ–यह सोचते हुए हुस्ना घर जा रही थी कि रास्ते में धनपत की दुकान पड़ी। हुस्ना का शरीर गुस्से से काँपने लगा। दुकान में लाला का बेटा बैठा था। अचानक हुस्ना की आँखें खुशी से चमकने लगीं और होंठ मुस्कुराने लगे। वह मुस्कुराती हुई दुकान पर गई। कुछ सौदा लिया और बोलीं–‘अगर कोई हो तो यह सामान घर पहुँचवा देना बेटा, गिरने से हाथ बहुत दर्द कर रहा है।’

लाला का बेटा बोला–‘आप परेशान न हों, मुझे पता दे दीजिए, घर जाते वक्त आपका सामान देता जाऊँगा।’

‘तुम्हारे पिता जी कहीं बाहर गए हैं, दिखाई नहीं दे रहे हैं।’

‘हाँ, वह पंद्रह दिन के लिए दिल्ली गए हैं, पर आप परेशान न हों, मैं आपका सामान पहुँचा दूँगा।’

‘ठीक है, भगवान तुम्हें खुश रखे।’ और अपना पता बताकर हुस्ना चली गई।

अब उसे रात का इन्तजार था। दुकान बंद होने का समय आठ बजे का होता है। वह पौने आठ बजे से ही इन्तजार करने लगी। जैसे ही दरवाजा खटका वह सतर्क हो गई।

‘खट-खट मत करो भाई, जो भी हो अंदर आ जाओ।’

लाला का लड़का सामान लेकर अंदर आया। ‘अरे, तुम! आओ-आओ।’

लाला के लड़के ने सामान दिया और जाने लगा। हुस्ना ने झट उसका हाथ पकड़ा और बोली–‘बेटा इतना बोझ उठाकर लाए हो, थोड़ा आराम कर लो, आओ बैठो शरबत पीकर जाना। क्या नाम है तुम्हारा बेटा?’

‘मेरा नाम गोपाल है।’

‘वाह कितना मोहिला नाम है। कान्हा के जैसा नाम और कान्हा के जैसा ही मन मोहने वाला रूप।’ तभी हुस्ना की बेटी शरबत ले आई।

गोपाल ने जब हुस्ना की बेटी को देखा तो अपलक निहारता ही रहा। ऐसा रूप तो उसने पहले कभी देखा ही नहीं था! सिर्फ कहानियों में पढ़ा था। उसकी पलकें पर्वत की तरह जड़ हो गईं। हुस्ना ने तेजी से खँखारा, पर गोपाल तो मानो पत्थर का हो गया। कुछ क्षण बाद हुस्ना ने उसे हिलाते हुए कहा–‘गोपाल क्या हो गया, शरबत का गिलास उठाओ बेटा।’

‘अं-हाँ-हाँ…लेता हूँ’ कहता हुआ गोपाल गिलास उठाने लगा, पर मन तो अस्थिर था, लिहाजा गिलास हाथ से छूट गया और तब गोपाल को होश आया। ‘अरे सॉरी, मेरी लापरवाही से आपका गिलास टूट गया, आई एम सॉरी।’

‘अरे इसमें सॉरी की क्या बात है, टूटने वाली चीज है तो टूटेगी ही, पर देखो न तुमसे हमारा रिश्ता जुड़ गया। मतलब आज तुमसे जान-पहचान हो गई। तुम हमारे घर आए, अब पता नहीं कब आओ–आओ भी या न आओ। गरीबों के घर कौन आना पसंद करता है। हमारा सौभाग्य कि कम-से-कम आज तुम आए।’

‘अरे आप ऐसा क्यों कहती हैं, मैं आया करूँगा। गरीब अमीर इनसान पैसे से नहीं होता है, मन से होता है और आपका मन तो बहुत बड़ा है।’ गोपाल सकुचाते हुए बोला।

‘कितने अच्छे विचार हैं तुम्हारे बेटा, लो मैं तुम्हें अपनी बेटी से मिलवाती हूँ, यह मेरी छोटी बेटी राधिका है।’

‘नमस्ते! आप माँ से बात करिए, मैं तब तक आपके लिए शरबत लाती हूँ।’

‘अरे रहने दीजिए, फिर कभी मैं शरबत पी लूँगा।’

‘अरे ऐसे कैसे रहने दूँ। आप हमारे घर पहली बार आए हैं, पहली बार पाहुना को मुँह मिठाए बिना भेज देंगे तो हमारे घर का अपमान होगा, अभी गई और अभी बस दो मिनट में आई।’ कहते हुए राधिका अंदर चली गई।

‘ठीक ही तो कह रही है राधिका, मेहमान बिना कुछ खाए-पिए जाए तो यह हमारे लिए शर्म की बात होगी बेटा।’ तभी राधिका शरबत और नाश्ता लेकर आ गई। गोपाल ने झटपट शरबत पिया और उठ गया।

‘अरे घर जाने की इतनी जल्दी है बेटा, थोड़ा रुक जाते।’

‘नहीं, बस अब मैं चलता हूँ। अगर कुछ काम हो तो बता दीजिएगा।’

‘अरे बेटा काम बताने तुम्हारे पास आऊँगी तो मैं काम ही नहीं कर लूँगी, कितने भोले हो तुम।’

‘सॉरी, सॉरी! अच्छा-अच्छा मैं रोज एक चक्कर लगाकर पूछ लूँगा कि कुछ काम तो नहीं है, ठीक है न।’

‘यह हुई न बेटे वाली बात, शाबास। ठीक है कल आना और रात का भोजन हमारे साथ ही करना, वैसे भी घर में माँ-बाबू जी तो हैं नहीं।’

‘अरे खाने का तकल्लुफ क्यों करती हैं आप।’

‘इसमें तकल्लुफ की क्या बात है बेटा, गरीबों का खाना बहुत सादा होता है। हाँ, तुम बड़े घर के वारिस हो, हमारे घर का भोजन कहाँ अच्छा लगेगा।’

‘ऐसा मत कहिए आप। ठीक है, मैं भोजन आपके साथ ही करूँगा।’ कहकर गोपाल चला गया।

हुस्ना ने एक सीढ़ी तो चढ़ ली थी धनपत के बर्वादी की, पर अभी तो बहुत कुछ करना होगा। 

गोपाल का घर गाँव के दक्षिणी छोर पर था, गाँव की आबादी के बीच और हुस्ना का घर उत्तरी छोर पर था आबादी से दूर। गोपाल जब घर पहुँचा तो हुस्ना का लाड़ और राधिका के हुस्न के जादू में उलझा रहा, उसे रात में नींद में भी राधिका ही दिखती रही। दूसरे दिन जल्दी दुकान बंद करके वह हुस्ना के घर जा पहुँचा। थोड़ी हिचक के बाद दरवाजे पर खट-खट की। 

‘अंदर आ जाओ’ हुस्ना की आवाज आई। ‘अरे बेटा तुम हो आओ-आओ।’

‘आंटी मैं पूछने आया था, कुछ काम तो नहीं है?’ गोपाल ने सकुचाते हुए कहा।

‘अरे बैठो तो सही, हम काम भी बताएँगे और सामान भी मँगाएँगे। गोपाल चुपचाप बैठ गया। तभी राधिका चाय लेकर आई। तीनों ने गप-शप करते हुए चाय पी। इसी बीच हुस्ना खाना लगाने के लिए किचन में चली गई तथा गोपाल और राधिका को एकांत दे गई। एकांत पाकर गोपाल राधिका के पास खिसक आया और बोला–‘आप क्या करती हैं दिन भर।’

‘मैं पुस्तकें पढ़ती हूँ। सितार बजाती हूँ, घर का काम करती हूँ, पेंटिंग बनाती हूँ और बाहर जो बगीचा देख रहे हैं, उसको सजाती हूँ।’

‘अरे आप सितार बजाती हैं। मुझे संगीत और पेंटिंग का बहुत शौक है। मैं भी सीखना चाहता था, पर पापा कहते हैं कि सितार और पेंटिंग सीखकर क्या करोगे, सामान तौलना सीखो।’

‘देखिए, अपने शौक जरूर पूरे करने चाहिए, वरना आगे जाकर जीवन में खालीपन पसर जाता है।’

‘अच्छा, आप मुझे सितार या पेंटिंग सिखाएँगी?’ गोपाल की भोली सूरत देखकर राधिका हँस दी और बोली–‘हाँ-हाँ, मैं आपको दोनों ही विद्या सिखाऊँगी, पर उसके लिए आपको रोज आना पड़ेगा।’

‘हाँ-हाँ, जरूर आऊँगा!’ गोपाल उत्साहित होते हुए बोला।

तभी हुस्ना ने कमरे में प्रवेश किया और बोली–‘बेटा, जब तुम्हारे पिता जी आ जाएँगे तो क्या वह तुमको यह सीखने देंगें। संगीत और कला भगवान के स्वरूप होते हैं, इनकी आराधना बीच में नहीं छोड़ी जाती है।’

‘आप उसकी चिंता मत कीजिए। मैं रोज आया करूँगा।’

‘अच्छा, चलो खाने की टेबल पर बाकी बातें करते हैं।’ खाना खाते हुए यह निश्चय हुआ कि कल से ही संगीत और कला की आराधना शुरू की जाए। 

खाने की तारीफ करते हुए मन में रंगीन स्वप्न संजोकर गोपाल ने कहा–‘ठीक है आज इजाजत दीजिए कल से राधिका जी का यह शिष्य समय पर हाजिर होगा, शुभरात्रि।’

‘शुभरात्री गोपाल।’ दोनों ने कहा।

सितार और पेंटिंग सीखने का तो एक बहाना था। वह तो राधिका के पास अधिक-से-अधिक रहना चाहता था। आज उसे इसका मौका मिला था। घर लौटते हुए गोपाल इन्द्रधनुषी सपनों के साथ हवा में तैर रहा था। अगले दिन जब गोपाल राधिका के घर पहुँचा तो दरवाजा राधिका ने खोला। वह लाल गुलाब लेकर उसके स्वागत में खड़ी थी।

‘वेलकम टू म्यूजिक क्लास’ राधिका लाल गुलाब उसकी तरफ बढ़ाते हुए बोली।

‘थैंक्स’ प्यार भरी नजरों से राधिका को देखते हुए गोपाल ने कहा।

‘चलिए अब पढ़ाई शुरू करते हैं।’

‘जरूर मैडम’ फिर राधिका उसे सितार की बुनियादी बातें बताने लगी। गोपाल बातों पर कम, राधिका के खुबसूरत चेहरे पर अधिक ध्यान दे रहा था। दूर खड़ी हुस्ना अपने तीर से आहत पक्षी को निहार रही थी।

इस तरह रोज-रोज संगीत की कक्षा होने लगी। आठ दिन हो चुके थे। आज गोपाल जल्दी आया तो राधिका बोली–‘चलो आज दिन का उजाला है, इसलिए लॉन में बैठकर पेंटिंग करते हैं। वह लोग बाहर बगीचे के बीचोंबीच हरी घास पर बैठ गए। महीन मलमल सी हरी घास पर राधिका जैसी सुंदर साथी के साथ बैठकर गोपाल को इतना सुखद लगा, जैसे जन्नत मिल गई हो। राधिका ने कैनवास, ब्रश, रंग सब फैला दिए और पेंटिंग के विषय में बताने लगी और गोपाल उसके सौंदर्य में खो गया। अब राधिका का व्यवहार बदलता जा रहा था। उसकी आँखों में लालसा की परिछाई को गोपाल महसूस करने लगा था और आज जब उसने राधिका को खींचकर सीने से लगाया तो हलके प्रतिवाद के बाद वह उसके आगोश में खो गई, और अलग होते ही उसने मुस्कुराते हुए गोपाल को देखा तो गोपाल लड़कियों की भाँति झेंप गया।

आज घर में आकर भी गोपाल राधिका में ही खोया रहा। रात के अँधेरे में गोपाल का हृदय राधिका के रूप और आँखों में छिपे निमंत्रण की बात सोचकर जोर-जोर से धड़कने लगा। राधिका एक उन्माद थी, एक नशा थी। शत्रुपक्ष का छोड़ा हुआ एक ऐसा बाण थी जो गोपाल के समूचे अस्तित्व को धीरे-धीरे ध्वस्त कर रहा था और वह हुस्ना और राधिका के प्यार में वेबस हो रहा था।

अब गोपाल रात दिन उन्मादी की तरह राधिका के लिए तड़पता रहता और शाम होते ही वह राधिका के आगोश में खुद को भुला देता। गोपाल के यह कारनामे धनपत तक पहुँचे तो वह बौखला गया। वह हुस्ना के पास गया और बोला–‘तवायफ का काम ही घर उजाड़ना होता है और तूने वह कर दिया। मेरे बेटे के रास्ते से हट जा हुस्ना वरना…।’

‘वरना क्या करेगा धनपत, मैं तेरे बेटे के रास्ते में नहीं हूँ, तेरा बेटा ही यहाँ आता है, मेरी बेटी नहीं जाती है। तू अपने बेटे को रोक ले तो मैं बहुत खुश हो जाऊँगी। जा, आज से मेरे दरवाजे तेरे बेटे के लिए बंद हो गए हैं, यह एक तवायफ का वादा है। मेरी इस भीख से तू खुश हो जा लाला।’ और हुस्ना ने घर का मुख्य दरवाजा बंद कर दिया।

शाम को गोपाल हुस्ना के घर आया और दरवाजा खटखटाता रहा, पर अंदर से हुस्ना ने कहा–‘बेटा गोपाल तेरे पिता इस चौखट को तेरे लिए हमेशा के लिए बंद कर गए हैं, इसलिए तू वापस चला जा। राधिका तेरे बिना मर गई तो उस दर्द को मैं सह लूँगी पर तुझे अगर घर से बेघर होना पड़ा तो तेरे उस दर्द को मैं नहीं सह पाऊँगी इसलिए बेटा तू वापस चला जा।’

बहुत देर तक गोपाल राधिका के घर पर बंद दरवाजा खुलने का इन्तजार करता रहा। अंत में निराश होकर लौटा। बेटे को वापस आया देखकर धनपत खुश हो गया। पर गोपाल शराब के नशे में धुत्त था और उसकी आँखें आग बरसा रही थी। जैसे ही धनपत को देखा वह चिल्लाया–‘पिता जी आपने मेरे जीवन में जो आग लगाई है, उसमें मैं भस्म हो जाऊँगा। राधिका के बिना मैं जिंदा नहीं रह पाऊँगा। वह मेरी प्यास, मेरी आस, मेरी साँस और मेरा अहसास है, उसके विरह की आग में मैं जल जाऊँगा। राधिका…राधिका…रा-धि-का।’ और वह गिरकर बेहोश हो गया। रात बीती, सुबह हुई, दोपहर चढ़ आई पर गोपाल नहीं उठा। धनपत को चिंता हुई। वह जाकर वैद्य जी को बुला लाया। वैद्य जी ने नाड़ी देखी और चिंता की लकीरें उनके माथे पर चमकने लगी।

‘क्या बात है वैद्य जी गोपाल कैसा है?’

‘गोपाल को तेज ज्वर है, कोई बड़ा आघात लगा है, जिसकी वजह से ये मूर्छित है। पर मैं दवा देकर होश में लाने की कोशिश करता हूँ।’ कहते हुए वैद्य जी उपचार में जुट गए। बहुत देर बाद गोपाल ने आँखें खोली। पर वह चारों तरफ ऐसे देख रहा था मानो सब अजनबी हों। धनपत ने दौड़कर उसका हाथ पकड़ा और कहा–‘बेटा, तुम अब ठीक हो जाओगे, किसी तरह की चिंता मत करना।’

‘आप कौन हैं? मैं कौन हूँ, यहाँ क्या कर रहा हूँ?’

‘बेटा, तुम गोपाल हो। मेरे बेटे हो, मैं धनपत तुम्हारा बाप हूँ।’ गोपाल ने कोई उत्तर नहीं दिया, वह छत की तरफ एकटक देखता रहा। 

धनपत ने वैद्य जी से पूछा–‘वैद्य जी मेरा बेटा ऐसा क्यों कह रहा है।’

‘आपके बेटे को तेज बुखार है, जिस वजह से इस तरह की बहकी-बहकी बातें कर रहे हैं। ठंडे पानी की पट्टी रखकर इनका बुखार तुरंत उतारना होगा, वरना बुखार दिमाग में चढ़ सकता है और नस फट सकती है!’ वैद्य जी ने कहा।

धनपत जल्दी से ठंडे पानी की पट्टियाँ गोपाल के सिर पर रखने लगा। दो घंटे की मेहनत के बाद गोपाल की तंद्रा टूटी और उसने आँखें खोलकर चारों तरफ देखा। धनपत लाला दौड़कर बेटे के पास आए–‘कैसे हो बेटे?’

गोपाल ने धनपत की तरफ देखा और पूछा–‘राधिका कहाँ है? राधिका राधिका…’ और चारों तरफ उसे खोजने लगा।

‘राधिका यहाँ नहीं आएगी, तुमको उससे संबंध तोड़ना होगा, वह तुम्हारे लायक नहीं है।’ लाला ने कहा।

‘बापू राधिका मेरी जिंदगी है। मैं पहले ही कह चुका हूँ कि मैं उसके बिना नहीं रह सकता। मैं जिंदगी से नाता तोड़ सकता हूँ पर राधिका से नहीं। राधिका कहाँ हो तुम राधिका, आओ न, मैं तुम्हारा इन्तजार कर रहा हूँ, मेरे लिए अपने दरवाजे बंद मत करो, राधिका को मुझसे मत छीनो, मैं मर जाऊँगा, राधिका…राधिका…राधि…’ और वह मूर्छित हो गया।

वैद्य जी ने गोपाल की नाड़ी देखी और कहा–‘लाला अगर तुम अपने बेटे की जिंदगी चाहते हो तो इस राधिका नाम की जड़ी-बूटी को खोजकर लाओ, वरना अपने बेटे से हाथ धो बैठोगे। यह उससे अलग रहकर जीवित नहीं रहेगा। अगर जीवित रहा तो उन्मादी या पागल हो जाएगा। इसका बुखार फिर तेज हो गया है। शीघ्रता से निर्णय लो वरना अगर सिर तक ज्वर का ताप पहुँच गया तो सिर की नस फट सकती है, यह बहुत तनाव में है। देखो, इसकी सिर की नसें कितनी तनी हुईं साफ दिखाई दे रही हैं लाला।’

गोपाल की हालत देखकर लाला फूट-फूटकर रोने लगे, एक तरफ बेटे का जीवन और दूसरी तरफ उसका अपना अहं, क्या करें। बेटे को कुछ हो गया तो अपने अहं को लेकर क्या करेगा। बुजुर्गों ने ठीक ही कहा है, ‘जो सारी जिंदगी अपना सिर नहीं झुकाता उसे भी अपनी औलाद की खातिर अपना अहं तोड़ना पड़ता है। इनसान की अपनी औलाद ही उसके मान का मर्दन करती है।’ गोपाल की जिंदगी के लिए मैं कुछ भी करूँगा, यह निर्णय लेकर लाला हुस्ना की चौखट पर गया, मन में दुविधा थी, ‘पता नहीं हुस्ना का क्या जबाव हो–हो सकता है वह मेरे बेटे के जीवन को लेकर मुझसे अपनी बेटी का बदला ले और अपनी बेटी को न भेजे। तब क्या करूँगा–नहीं-नहीं, मैं बेटे के लिए उसके आगे नाक रगड़ूँगा।’ हुस्ना के घर पहुँचकर लाला ने दरवाजा खटखटाया।

‘कौन है, अंदर आ जाओ।’ हुस्ना की आवाज आई। लाला डरते हुए आँखें नीची किए अंदर आया।

‘ओह, लाला धनपत। आपको यहाँ आने की क्या जरूरत आन पड़ी।’ हुस्ना पान का बीड़ा मुँह में डालकर चबाती हुई बोली।

‘हुस्ना गोपाल की हालत बहुत खराब है, अपनी बेटी के साथ चलकर मेरे बेटे को बचा लो, मैं तुमसे विनती करता हूँ।’

‘जब तुम्हारा मन करे हमें ठुकरा दो, जब मन करे अपना लो, यह क्या तमाशा है, हमारी भी कोई इज्जत है लाला धनपत। इस घर के दरवाजे तुमने ही बंद किए थे लाला, मेरी बेटी कहीं नहीं जाएगी। मुझे गोपाल जैसे मासूम बच्चे से हमदर्दी है पर तुम्हारे कुकर्मों की सजा उसे भोगनी पड़ रही है। अब तुम जाकर अपने पापों का प्रायश्चित करो।’ कहकर हुस्ना अंदर जाने लगी। 

लाला दौड़कर हुस्ना के पैरों पर गिर पड़ा और बोला–‘हुस्ना मेरे पापों की सजा मेरी औलाद को देकर उसे बरबाद मत करो। जो सजा देनी है मुझे दो, मैं तुम्हारे सामने हाथ जोड़ता हूँ।’

‘ओह लाला, आज तुझे औलाद शब्द का दर्द महसूस हो रहा है। उस दिन तेरा यह अहसास कहाँ गया था। जब तूने मेरी औलाद को बरबाद किया था।’ विद्रूप-सी हँसी बिखेरते हुए हुस्ना ने कहा और अंदर जाने लगी।

‘नहीं-नहीं, हुस्ना इतनी कठोर मत बनो। तुम एक औरत हो, एक माँ हो और माँ इतनी कठोर नहीं होती। बिन माँ के मेरे बच्चे पर रहम कर हुस्ना। रहम कर–रहम कर…।’ कहते-कहते लाला की आवाज रुँध गई और वह फूट-फूटकर रोने लगा। लाला की हालत देखकर और गोपाल को यादकर हुस्ना को दया आ गई और वह बेटी के साथ लाला के घर चलने को तैयार हो गई।

जैसे ही हुस्ना ने गोपाल की हालत देखी उसकी आँखों से आँसू बहने लगे। गोपाल का सिर सहलाते हुए कहा–‘बेटा उठो, देखो राधिका तुमसे मिलने आई है।’

गोपाल ने धीरे-धीरे आँखें खोली और राधिका को देखा तो उठकर बैठ गया। उसने हुस्ना का हाथ पकड़ा और कहा–‘आप मेरे लिए अपने दरवाजे खोले रहेंगी न, राधिका के बिना मैं नहीं रह सकता माँ!’ उसकी आँखों से अश्रुधारा बहने लगी। गोपाल की बातों और माँ शब्द को सुनकर हुस्ना को लगा मानो संपूर्ण ब्रह्मांड का सुख उसे प्राप्त हो गया। लाला ने गोपाल को गले लगाया और कहा–‘बेटा तूझे तेरी राधिका जरूर मिलेगी मेरे बच्चे।’ सुनकर गोपाल रोने लगा।

राधिका और गोपाल की शादी संपन्न करके घर सूना हो गया था। हुस्ना का मन संसार से उचाट हो गया था। ‘जीवन के हर रंग को जी लिया, अब रहकर क्या करूँगी!’ हर समय हुस्ना यही सोचती। एक दिन गोपाल की अचानक तबीयत खराब हुई और पता चला उसकी दोनों किडनी फेल हो गईं है। डॉक्टर का कहना था कि जल्दी ही किडनी ट्रांसप्लांट करनी होगी, वरना जान जा सकती है। लाला पैसा लेकर दर-दर भटक रहा था पर कोई सफलता नहीं मिली? जब हुस्ना ने सुना तो वह डॉक्टर से मिली और अपनी किडनी देने की इच्छा जताई।

डॉक्टर ने हुस्ना का चेकअप किया तो पाया कि हुस्ना की एक किडनी ठीक है और दूसरी किडनी की हालत बहुत ठीक नहीं है। डॉक्टर ने हुस्ना से कहाँ–‘मैडम, आपकी एक किडनी ठीक है पर आपकी दूसरी किडनी डैमेज हो रही है, आप किडनी नहीं दे सकतीं। आप किडनी दे देंगी तो खुद कैसे जिएँगी? हम आपको ऐसा नहीं करने देंगे।’

‘डॉक्टर साहब, मेरी जिंदगी का मकसद पूरा हो गया, बहुत जी ली अब मरना चाहती हूँ। वैसे भी अब मेरी जिंदगी एक बोझ के सिवा कुछ नहीं है। इन बच्चों के जीवन की तो शुरुआत है, इसलिए मैं अपनी किडनी देना चाहती हूँ। माँ के सामने बच्चा जीवन के लिए संघर्ष करे और माँ चुप रहे, यह कैसे हो सकता है। मैं अस्वस्थ किडनी के साथ भी बहुत समय तक जी लूँगी, आप चिंता मत करिए। आपको अपने ईश्वर की सौगंध है, आप मेरी बात मानेंगे। एक बहन की इच्छा पूरी करेंगे डॉक्टर साहब।’ और डॉक्टर से अपने जीवन के बारे में बताते हुए हुस्ना दो दिन तक समझाती रही और आखिर में डॉक्टर को मनाने में सफल हो गई।

‘चिकित्सीय नियमों के तहत मुझे ऐसा नहीं करना चाहिए, पर आपकी इच्छा को देखकर मैं यह काम करूँगा।’ डॉक्टर ने कहा। 

हुस्ना ने डॉक्टर से कहा कि जब तक ऑपरेशन न हो जाए आप मेरी पहचान गुप्त रखेंगे। फिर सारे टेस्ट करवाकर उसने डोनर प्रपत्र पर हस्ताक्षर किए।

लाला के बार-बार पूछने पर कि किडनी कौन दे रहा है, डॉक्टर ने कुछ नहीं बताया।

ऑपरेशन सफलतापूर्वक संपन्न हुआ। गोपाल और हुस्ना दोनों को होश आ गया था। लाला जब गोपाल को देखने आया तो बगल के बेड पर हुस्ना बैठी थी। उसे देखकर लाला का मूड खराब हो गया। ‘मुझसे पहले डॉक्टर आपने इन मैडम को मेरे बेटे से मिलाकर मेरा अपमान किया है।’ लाला गुस्से से बोला।

‘धनपत जी इन्होंने ही अपनी किडनी देकर आपके बेटे की जान बचाई है। आप पूछ रहे थे कि वह महान इनसान कौन है जिसने आपके बेटे को किडनी देकर आप पर अहसान किया है, तो यह वही मैडम हैं। सुनकर लाला के पैरों तले जमीन खिसक गई। वह पानी-पानी हो गया। हाथ जोड़कर हुस्ना के पास आया। कुछ कहता कि हुस्ना बोल उठी–‘लाला, तुम माफी मत माँगना और न ही अहसान की बात करना, क्योंकि मैंने तुम्हारे लिए कुछ नहीं किया। गोपाल ने मुझे माँ कहा था। मैंने माँ शब्द की लाज रखने के लिए और अपने बेटे गोपाल के जीवन को बचाने के लिए अपना फर्ज निभाया। 

गोपाल ने हुस्ना की तरफ देखा और भरे गले से कहा–‘माँ! मैंने अनजाने में आपको माँ का संबोधन क्या दिया कि आपने सच में ही माँ बनकर जीवनदान दे दिया। मैं खुशनसीब हूँ कि मुझे आप जैसी माँ मिलीं।’

‘बेटा अनजाने में ही माँ कहकर तुमने मुझे ब्रह्मांड की सारी खुशी दे दी। माँ सिर्फ शब्द नहीं है, यह जीवनस्त्रोत है। माँ अपने बच्चे के लिए सर्वस्व दे देती है। मैंने तो जिंदगी जी ली, तुम्हारे आगे सारा जीवन है। बेटा परेशान हो तो माँ सुकून से कैसे रह सकती है। मैंने अपना फर्ज निभाया है, कोई अहसान नहीं किया। चलो अब आराम करो कुछ सोचो नहीं।’ कहकर हुस्ना लेट गई। कमजोरी के कारण उसे थकान महसूस हो रही थी। डॉक्टर ने उसके ड्रिप लगा दी। 

शाम तक हुस्ना ठीक थी। पर रात होते-होते हुस्ना की हालत बिगड़ने लगी। काल की गति को कौन रोक सका है। खून की कमी, उम्र की थकान, जीने की अनिच्छा, अकेलेपन की विवशता और शिथिलता के कारण सुबह चार बजे हुस्ना ने अपने प्राण त्याग दिए। जाते समय हुस्ना गोपाल और राधिका को देखकर उदासी से मुस्कुराई। वह ममत्व भरा स्निग्ध मुस्कान तवायफ का नहीं, उसके अंदर की माँ का था। हुस्सा तवायफ थी, जो लाला से प्रतिकार लेना चाहती थी, लेकिन जब उसके अंदर की माँ जगी तो तवायफ का अंत हो गया और माँ ने बच्चों के लिए अपना बलिदान कर दिया। गोपाल और राधिका फूट-फूटकर रोने लगे। आँसू की धारा लाला और डॉक्टर की आँख से भी बहने लगी।

गरम आँसुओं का अहसास जैसे ही लाला को हुआ तो वह चौंका–‘यह आँसू तो स्वयं उसकी आँखों से गिरे थे।’ वह वर्तमान में आया–‘अरे, वह तो हुस्ना की कब्र में फूल चढ़ाते-चढ़ाते कब अतीत के चक्रव्यूह में चला गया, उसे पता ही नहीं चला।’ तभी राधिका अपनी बेटी के साथ वहाँ आई और बोली–‘अरे बापू आप यहाँ हैं, हम मंदिर जाने के लिए कब से आपको ढूँढ़ रहे हैं।’

लाला ने कहा–‘बेटा, अपनी बच्ची को भगवान से पहले इस देवी का आशीर्वाद दिलवाओ।’ लाला ने कब्र पर सिर झुकाया और कहा–‘हुस्ना मैं भगवान से प्रार्थना करूँगा कि मेरी नवजात पोती में तुम्हारे गुण आएँ मेरे नहीं। वह तुम जैसी देवी पर जाए, मुझ जैसे दानव पर नहीं।’ और लाला राधिका के साथ मंदिर की तरफ चल दिए।


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करुणा पाण्डेय द्वारा भी