दृष्टि

दृष्टि

वह किसी बड़े स्टेशन के प्रतीक्षालय में सोफे पर बैठी किसी गाड़ी की प्रतीक्षा में थी। उसकी गाड़ी के आने में संभवतः एक-डेढ़ घंटे की देर थी। वक्त गुजारने के ख्याल से वह किसी हिंदी पत्रिका के पन्ने पलटती हुई कोई रुचिकर सामग्री ढूँढ़ने में व्यस्त थी। वह अपनी एक टाँग दूसरी टाँग पर चढ़ाकर कुछ इस तरह बैठी थी कि स्कर्ट के अंदर से उसकी गोरी, चिकनी जाँघ स्पष्ट दिखाई पड़ रही थी। प्रतीक्षालय के दूसरे कोने में बैठा बुजुर्ग उसकी इस स्थिति पर बुदबुदाया, ‘आजकल का पहनावा तो निर्लज्जता की हद को भी पार कर गया है…।’

‘जी हाँ, आपने सही कहा’, बुजुर्ग से सटकर बैठे एक दूसरे आदमी ने उसकी बात का समर्थन किया और चेहरे पर सायास विक्षोभ का भाव उगाकर लड़की की तरफ गहरी दृष्टि से देखा। फिर सामने के टेबल पर पड़े अखबार के पृष्ठों को पलटते हुए भी उनकी निगाह लड़की के चिकनी जाँघों पर फिसलती रही।

लड़की इस बात से अनभिज्ञ थी, किंतु उसकी माँ ने उस आदमी की निगाह को लड़की की जाँघों पर फिसलता महसूस किया। इसलिए उसने तत्क्षण लड़की को सावधान किया, ‘बेटी इधर…मेरी तरफ घूम जा।’

‘क्यों?’

‘देखती नहीं’ माँ बोली, ‘सामने बैठा आदमी किस तरह घूर रहा है।’

‘ले…लेकिन’ लड़की निस्संग भाव से बोली, ‘वह तो बूढ़ा है माँ।’

‘तो क्या हुआ, है तो मर्द ही न।’

माँ की हिदायत पर लड़की दूसरी तरफ मुँह फेरकर बैठ गई। अब उस आदमी के सामने लड़की की पीठ थी। उस आदमी के भीतर झुँझलाहट पैदा हुई और अनायास उसके मुँह से एक गाली निकली, ‘हरामजादी…कमीनी…।’

लेकिन इस बार की गालियाँ पहनावे की निर्लज्जता के लिए नहीं, बल्कि लड़की की माँ के लिए थी।


Image :Solitude
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Artist :Harriet Backer
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रामयतन यादव द्वारा भी