मानसिकता

मानसिकता

न्नपूर्णा अपने गाँव गई थी। गाँव गए बहुत दिन हो गया तो गाँव पहुँच गई। उसे तीन महीने पहले कोरोना हुआ था। किसी तरह का कोई लक्षण परिलक्षित नहीं हुआ था फिर भी रिपोर्ट पॉज़िटिव हुआ तो क्वारंटाइन होना पड़ा। लगभग बीस दिनों के बाद रिपोर्ट निगेटिव आया। बहुत खुश हुई। बीमारी की अवस्था में किसी के सामने बीमारी की चर्चा नहीं की थी किंतु जब ठीक हो गई तो धीरे-धीरे सब को पता चल गया। वह स्वयं को कोरोना योद्धा कहती थी। लॉकडाउन टूटने के पश्चात आवोहवा बदलने गाँव पहुँची। अपने मकान जो कई महीनों से बंद था–साफ-सुथरा करा कर रहने लगी। मात्र एक दिन उसके एक संबंधी उससे मिलने आए। एहतियात के तौर पर वह सावधानी बरत रही थी। सैनिटाइजर बेसिन के पास रखवा दी थी। सुखा मिठाई और मिक्सचर मँगवा ली थी।

उसे आश्चर्य लगा। बच्चे लोग तो एकदम ही नहीं आते। पूछती तो बहाना बना देती।

एक दिन अर्द्ध-निद्रा में थी कि कुछ शब्द कान में पड़ी ‘इतने दिनों से बाहर थी। अभी गाँव में आने की क्या जरूरत थी। कोरोना लेकर आ गई।’

‘हाँ। मैंने भी सुना है, डॉक्टर ठीक कह भी दे फिर भी अंदर कीड़ा रहता ही है। इसलिए बच्चे सभी को आने नहीं देती। बार-बार बच्चों से मिलने की जिद करती है, उनको तो स्वयं समझ जाना चाहिए।’ दूसरी ने कहा।

आवाज़ साफ-साफ सुनाई पड़ रही थी। इन लोगों की मानसिकता पर हँस भी रही थी। किंतु क्या कर सकती, दूसरे दिन सामान बाँध अपने शहर के लिए चल पड़ी। अपने परिवार में समय बिताने के लिए।


Image : Entering a Village
Image Source : WikiArt
Artist : Camille Pissarro
Image in Public Domain