जरीवाला जाकेट

जरीवाला जाकेट

जैसे ही जूठी प्लेटें उठाकर एक ओर रखे ड्रम में डालने के लिए जग्गू झुका कमर में दर्द की एक लहर ऊपर से नीचे तक दौड़ गई। एक आह निकली जो सिर्फ उसने सुनी। बाकी सब तो मस्ती में डूबे थे। दुःख उसका अपना था। जग्गू को न ड्रम से आ रही जूठन की गंध ने छुआ, न नीम के पेड़ से ड्रम में झरी नीम की पत्तियों ने। छुआ होता तो पता चलता कि कड़ुवाहट कहाँ ज्यादा घुली है–पत्तियों में या खुद उसके अंदर! पर अपनी पीर लिए वह देर तक वहाँ खड़ा नहीं रह सकता था। केटरर हरनाम सिंह देख लेता तो काम-चोरी के लिए डाटता या आइंदा काम पर न आने का फरमान जारी कर देता। लँगड़ाता हुआ, जग्गू फिर से स्वागत-समारोह में आए अतिथियों के बीच जाकर जूठी प्लेटें इकट्ठी करने लगा। उसे प्रभु पर, यदि वह कहीं है तो, क्रोध हो आया। क्यों उसने…लकवे के हल्के अटैक के कारण उसके बाएँ पैर को कमजोर कर दिया। इस विकलांगता की वजह से ही उसे वेटर का पद न देकर केवल प्लेटें उठाने का काम दिया गया। शाम सात बजे से कोल्हू के बैल की तरह जुटा है। अब काँटा बारह को छूने को है। दिसंबर माह की दिल्ली की कड़कड़ाती ठंड। दाँत किटकिटा रहे हैं उसके। हरनाम सिंह ने सफेद-पीले रंग की नकली जरी टँकी जाकेट दे रखी है। वह एक तरह से केटरर द्वारा दिया गया पहचान-पत्र है। जाकेट ने एक हद तक उसकी गरीबी भी ढँक रखी है। प्लेटें उठाने वालों का यही ड्रेस कोड है।

भूख के कारण अँतड़ियों में आँटे पड़ने लगे हैं। पेट में गैस भर आई है। समारोह की समाप्ति के बाद बेरा आदि लोगों के साथ उसे भी बचा-खुचा खाना मिलता है। मगर वह ठीक से खा नहीं पाता। घर पर बीबी-बच्चे शायद भूखे बैठे हों। अपने खाने से थोड़ा बचाकर वह अक्सर घर ले जाता है। पर वह पूरे परिवार के लिए पर्याप्त नहीं होता। ऐसे में उसने एक तरकीब ढूँढ़ निकाली! प्लेटों में जो खाद्य सामग्री बिल्कुल अछूती रह जाती है, ड्रम में डालने से पहले पेड़ के पीछे छिपाकर परिवारजन जूठन को बड़े चाव से खाते हैं। तन और पेट है तो यह सब करना पड़ता है। भूख के आगे सारे आदर्श और सिद्धांत धरे रह जाते हैं। जग्गू को आश्चर्य होता कि एक ओर तो उसके जैसे लोगों को दो जून की रोटी नसीब नहीं होती तथा दूसरी ओर भरे पेट लोग इतना कुछ जूठा छोड़ देते हैं।

वह गाँव से शहर आया था। शुरू में यहाँ-वहाँ छिटपुट काम करता रहा। बाद में स्टील फैक्ट्री में काम मिल गया। गाड़ी चल निकली। लेकिन जो अपने हिस्से में दुर्भाग्य लिखाकर आया हो, उसका क्या? मंदी का दौर आया। फैक्टरी बंद हो गई। वह सड़क पर आ गया। कई दिनों तक बेकार भटकता रहा। उसे अपने पर खूब हँसी आई। लोग उसे जग्गू कहते हैं, पर उसका असली नाम तो जगन्नाथ है। वह कैसा जगत का नाथ है कि उसके बच्चे अनाथों की तरह भटक रहे हैं।

उस दिन भट्ट साहब के विवाह समारोह में नाचती-गाती, ढोल बजाती, आतिशबाजी के साथ बारात आई तो जग्गू को अपने ब्याह की याद हो आई। कैसे तो गाँव में गिनती भर बारातियों के साथ, साइकिल पर सवार हो लड़की वालों के यहाँ पहुँचा था। आगे-आगे एक शहनाईवादक था जो बेसुरा हो केवल अपनी उपस्थिति दर्ज करा रहा था। याद है उसे, दावत में बेसन, रोटी और कांदा परोसा गया था, पत्तल पर। लौटते में घूँघट काढ़े पत्नी को खटारा साइकिल पर बैठाकर घर लाया था।

पचास का होने को आया है, पर लगता अपनी उम्र से बड़ा है। सफेदी झाँकने लगी है। समय से पूर्व ही झुरियाँ उग आई हैं। बेटी कंगना सोलह पार कर चुकी है। फैक्टरी बंद हो जाने से उसकी पढ़ाई भी रुकी हुई है। बेकारी से त्रस्त हो, पड़ोसी चिंतामण के सुझाव पर वह केटरर के यहाँ काम करने को राजी हो गया था। मरता क्या न करता! पर परिवार का पेट पालने के लिए यह पर्याप्त न था। शादियों के समारोहों में उसने केटरर्स द्वारा लड़कियों के इस्तेमाल को देखा है। रंग-बिरंगी चुनरी ओढ़े युवतियों को मेवे-मिठाई की थाली, थमाकर खड़ा कर दिया जाता है। वे घूम-घूमकर अतिथियों को मिठाई-नमकीन पेश करती हैं। एक दिन जग्गू के मन में भी विचार आया कि क्यों न वह कंगना को भी अपने साथ वेट्रेस के काम पर लगा दे! बाप-बेटी के संयुक्त प्रयास से तंगहाली में कुछ कमी होगी। पिता के प्रस्ताव पर पुत्री कैसे मना कर सकती थी? घर के हालत से परिचित थी। परेशान पिता का हाथ बँटाने का गर्व भी उसने अपने अंदर महसूस किया। शुरू में घबराहट हुई, पर जल्द ही अभ्यस्त हो गई। समारोहों की चमक-दमक, चौंधियाती रोशनी, हवा में तैरता संगीत के बीच लकदक पोशाकों में सजे-धजे स्त्री-पुरुषों और उनकी अदाओं को देखती तो चकित रह जाती। आश्चर्य होता कि जब वह ठंड में ठिठुर रही होती, नकली हँसी हँसती, नकचढ़ी औरतें फैशन के नाम पर देह-प्रदर्शन करती, अधनंगी घूम रही हैं।

मशहूर बिल्डर खन्ना ने बेटी के विवाह की जोरदार तैयारी की है। शानदार डेकोरेशन। लॉन पर बिछी हरियाली। आस-पास पेड़-पौधे। विभिन्न व्यंजनों के अनगिनत स्टॉल। उन पर तैनात मुस्कुराती कन्याएँ। एक तरफ बार। दूसरी तरफ वेज। पल्ली और नॉनवेज डेढ़-दो हजार अतिथि आमंत्रित हैं। बाराती नाचते-कूदते, गाते-बजाते बैंड-बाजों के साथ आ रहे हैं। प्रवेश द्वार पर युवा वर्ग भटकने का मोह त्याग नहीं पा रहा है। घोड़े पर सवार दूल्हे के चेहरे से आलोक बिखर रहा है। एक ओर खड़ी कंगना वह सब देख रही है। देखते-देखते उसने आँखों में ढेर सारे सपने आँज लिए। उसे अपने सपनों का राजकुमार दिखाई देने लगा। गीत गूँज रहा था–‘राजा की आएगी बारात, रंगीली होगी रात, सजन संग नाचूँगी…।’ गीत के साथ कंगना के होंठ भी हिलने लगे। क्या कभी उसकी बारात भी इस तरह आएगी? तभी गाना अचानक बंद हो गया। वह खुरदुरी जमीन पर आ गई। गहरी उदासी ने जकड़ लिया। कुछ समय पूर्व गीत के जो बोल उसके कानों में मिश्री घोल रहे थे, अब सीसा घोलते लग रहे थे। तभी केटरर की तल्ख आवाज से उसकी तंद्रा भंग हुई–‘ए लड़की! यहाँ क्या कर रही है? जा अपना काम कर।’

पार्टी शुरू हुई तो कंगना ने अपनी कमान सँभाल ली। पार्टी पूरे शबाब पर थी। कुछ चोरी-छिपे बार की तरफ जाते थे और जल्दी से गिलास में रम भरकर, लोगों के बीच आकर ऐसे पीते थे, मानो रम के नहीं, कोका कोला के घूँट भर रहे हैं। कुछ इस तरह लुका-छिपी का खेल उन नॉनवेज वालों का भी था जो जीव-हत्या को महापाप घोषित करते हैं। इस बार ड्रम में प्लेटें डालकर जग्गू लौटा तो देखा कंगना, रंग-बिरंगे लंबे कुर्ते और गले में लंबे-लंबे दुपट्टे डाले युवा मेहमानों के सामने मेवे-मिठाई की प्लेट लिए खड़ी है। छान-छानकर आती आवाज सुन जग्गू ठिठक गया।

‘हम घास-पूस नहीं खाते, कुछ लजीज चाहिए।’ एक ने कहा।

जग्गू को समझते देर न लगी कि लड़के गला तर किए हुए हैं। कंगना गई और तेजी से फ्राई मटन लेकर आई। हालाँकि इससे पहले उसने माँस-मच्छी को कभी छुआ तक न था। उबकाई आई, पर उसने अपने को नियंत्रित किया। ध्यान हो आई केटरर की वह सख्त हिदायत–‘मेहमानों को किसी भी कीमत पर नाराज नहीं करना है।’ कंगना ने जैसे ही प्लेट आगे बढ़ाई, एक मनचले ने कंगना की दहकती देह पर नजर फिसलाते हुए कहा, ‘अपने हाथ से खिलाओ न जानेमन।’ एक क्षण को वह ठिठकी, सकुचाई। आखिर उसने जैसे तैसे काँपते हाथों फरमाइश पूरी की। तीसरे ने जो ज्यादा ही पिए हुए था, कहा, ‘हम तो जिंदा गोश्त के शौकीन हैं।’ कंगना ने उसके मुँह में भी एक पीस डाल दिया। लगा, किसी विषधर के मुँह में हाथ डाल दिया हो। ‘हाऊ स्वीट’ बेशर्म ने कहा और कंगना के अंदर दारुण क्रंदन चल रहा था। उसका मन किसी काम में नहीं लग रहा था। समझ नहीं पड़ रहा था कि औरत के शरीर में ऐसा क्या है जिसके लिए उसे इतनी शर्मिंदगी झेलनी पड़ती है।

देर रात पार्टी खत्म होने पर मिला भोजन दोनों से खाया नहीं गया। दोनों चुप रहकर भी जैसे संवाद कर रहे थे। साइकिल के कैरियर पर बैठी कंगना समझ रही थी कि जो घटा उसकी सिर्फ वही पात्र है और वही एकमात्र प्रेक्षक।

जग्गू और कंगना दोनों अपनी-अपनी खोली में करवटें बदल रहे हैं। नींद का दूर तक अता-पता नहीं है। जग्गू सोच रहा है, जलालत की जिंदगी से बेहतर है, कंगना को काम पर जाने से रोक दे। अपमानजनक स्थिति झेलते रहने का क्या अर्थ? पर अगले ही क्षण विचारों ने करवट ली। यदि ऐसा किया गया तो सँवरती आर्थिक ढाँचा ढह जाएगा। इसी उधेड़बुन में था कि युवावस्था में फिल्मी मैग्जीन में पढ़ी वह टिप्पणी याद आ गई जिसमें उल्लेख था कि कई बड़ी अभिनेत्रियों के अभिभावकों ने खुद को कोशिश कर बेटियों को फिल्मों में प्रवेश कराया था। आज बेटियों को नाचते-कूदते, अंग-प्रदर्शन करते, चुंबन लेते-देते और बलात्कार की शिकार होते देख उन्हें तनिक लज्जा नहीं होती। बल्कि बेटियों की अनाप-शनाप कमाई पर गुलछर्रे उड़ाते हैं। वह तो मुश्किल का मारा है। परिवार की भलाई के लिए थोड़ी-बहुत ऊँच-नीच सह लेगा।

उधर कंगना की आँखों में आँसू हैं। वह उस माहौल की आदी नहीं है। उस छुअन से अभी भी उसके बदन में झुरझुरी हो रही है। उदासी का प्रेत अपमान, क्षोभ और शर्म जैसे साथियों को साथ ले आया है। नहीं, बेइज्जत हो काम नहीं करेगी। लेकिन कुछ ही देर बाद उसे वही चिंता सताने लगी, जिसका शिकार जग्गू हुआ था। भाइयों की पढ़ाई, माँ का इलाज, बढ़ता कर्ज।…अनिर्णय की स्थिति।…नहीं, वह सुबह बात करेगी!

अगले दिन दोनों की आँख देर से खुली। कई बार संवाद की कोशिश की, पर लगा, जुबान पर ताले पड़े हैं। संकोच और भय हावी है। दोनों एक-दूसरे से आँखें चुरा रहे थे। ऐसे कई अँधेरे होते हैं जिन्हें हम रोशनी में नहीं बाँट सकते। कंगना के हिसाब से तो बापू को कुछ पता ही नहीं है। वे उसके अंदर रिसती बेबसी से बेखबर हैं। क्यों अध्याय खोलकर उन्हें और परेशान करें! वैसे ही क्या कम दुःख है। कुछ बातें है। जो माँ के साथ बाँटी जा सकती है, पिता के साथ नहीं। पर माँ तो पूरे परिदृश्य में कहीं नहीं है।

अंदर-बाहर आते-जाते पूरा दिन बीत गया। शाम को जग्गू ने अपनी जरीवाली जाकेट पहनी और कंगना ने केटरर द्वारा दी गई चमकीली झीनी साड़ी। रोज की तरह कंगना साइकिल के केरियर पर बैठी है। आज जग्गू को पैडल पर कुछ ज्यादा ही जोर लगाना पड़ रहा है। दोनों तन और पेट को साथ लिए चले जा रहे हैं। दोनों की राह एक है और मंजिल भी!


Image : Peasant Wedding
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Artist : Pieter Bruegel the Elder
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सूर्यकांत नागर द्वारा भी