धूप, धूल और धक्के

धूप, धूल और धक्के

चौरासी बरस का शिंगारा सिंह मैली-सी सफेद दाढ़ी, मैले-से सफेद कुर्ते-चादर और मसली-सी सफेद पगड़ी में बहुत पहले सफेदी किए हुए किसी पुराने ‘कोठे’ जैसा लगता है। गाँव से बाहर दो या शायद तीन जामुन और टाहली के पेड़ों के नीचे, एक पुराना नल के और शीरू की चाय-पकौड़ियों वाली ‘हट्टी’ से मिलकर बने इस तथाकथित ‘बस-अड्डे’ पर कभी बैठे…कभी खड़े…कभी टहलते हुए किसी ठीक-ठाक सी बस का इंतजार करते…उसे चार-पाँच घंटे से भी ज्यादा हो गए हैं।

उसे शहर जाने वाली पहली बस के छूट जाने का बेहद अफसोस है जो उसके ‘अड्डे’ पर पहुँचने से पहले ही निकल गई थी। हालाँकि वह बाहर खेतों में बने अपने घर से ‘मुँह-अँधेरे’ ही निकल पड़ा था। बायें घुटने में रह-रहकर उठने वाली पुरानी टीस के बावजूद उससे जितना तेज चला जा सकता था, वह चला था, पर पहली बस उसके अनुमान से जरा-सी पहले आ गई थी। वह अभी शहर वाली सड़क से आधा-पौना फर्लांग दूर ही था कि पहली बस उसके सामने से होती हुई गुजर गई। उसने बस को जाते देखकर दूर ही से लगभग भागते-से हुए…हाथ हिलाकर आवाजें भी मारी थीं…‘रोको…ओए…रोको…’…। बस के ड्राइवर ने उसे देखा या नहीं देखा…पता नहीं। लेकिन बस रुकी नहीं…।

ये सरकारी ‘डरेवर’ होते ही बड़े ‘पुट्ठे’ हैं…सवारी अड्डे से चार पैर ‘उरे-परे’ भी हो…तब भी एक बार ‘गेर’ डालने के बाद…क्या मजाल कि अगले अड्डे से पहले ‘माँ के शेर’ ब्रेक मार दें…घर में ‘टरेक्टर’ है…‘मोटर सैकल’ है…पर किसी को शर्म नहीं आती कि बापू को अड्डे तक ही छोड़ आए।

तब से तीन-चार बसें आई तो हैं, पर पीछे से ही भरी हुईं। एक बस तो ज्यादा भीड़ के कारण उसने खुद ही छोड़ दी थी। बाकी बसें तो अड्डे पर रुकी ही नहीं…कोई आगे जाके रुकी तो कोई पीछे ही रुक गई। लोग दौड़-दाड़कर चढ़ गया…चढ़ गया…। चढ़ क्या गया…लटक गया। एक बस तो अड्डे पर रुकी ही नहीं…‘डरेवर’ उसे बिना रोके ही भगाकर ले गया और सवारियाँ खड़ी रह गईं…मुँह ताकती…। इस उम्र में अब ऐसी भाग-दौड़ करना…उसके बस की बात नहीं बची।

अब तो दोपहर चढ़ने को आई है। बैसाख आधे से ज्यादा बीत चुका है। सुबह-सुबह हल्की ठंडक का एहसास कराने वाले झोंके…अब गर्म लू के थपेड़ों में बदल गए हैं जो गेहूँ के कटे हुए खेतों में से धूल और ‘तूड़ी’ उड़ाते हुए इधर-उधर टक्करें मारते फिर रहे हैं।

सयानों ने ठीक ही कहा है…‘बाहर जाओ तां तिन्न कम्म पक्के…धुप्प, धूड़ और धक्के…। भला हो…बेचारे नलके और उसके साथ ‘संगली’ में लटके ‘सटील’ के ‘गलास का…वर्ना पानी के बिना तो…लगातार चलते रहने से नलके का पानी ठंडा भी खूब है…।

अड्डे पर सवारियों की अच्छी-खासी भीड़-सी लगी हुई है। इनमें गाँव की औरतें और बच्चे ज्यादा हैं। बंदों के पास तो अपने-अपने साधन हैं…किसी के पास ‘सैकल’ है तो किसी के पास ‘मोटर सैकल’…वे नहीं पड़ते बसों के चक्कर में…। एक ओर पाँच-सात पढ़ने वाले ‘मुंडे’ भी झुंड बनाए खड़े हैं…जो बिना किसी बात के थोड़ी-थोड़ी देर में जोर-जोर से ‘हिड़-हिड़’ करने लगते हैं।

शिंगारा सिंह अब कहीं नहीं आता-जाता। आना-जाना क्या…आने-जाने लायक ताकत ही नहीं बची है उसके शरीर में…। पुरानी खुराकें खाई होने और सत्तर-पचहत्तर तक खेतों में काम करते रहने के बावजूद अब उसमें वह हिम्मत नहीं रह गई हैं चाहे कुछ भी करो…सत्तर के बाद तो ‘सेहत ढीली’ होनी ही होती है…और अस्सी के बाद सभी की ‘आजकल-आजकल’ शुरू हो चुका है…। इतना करके भी यह हाल है तो नई पीढ़ी का क्या बनेगा जो मिलावटी खाती है…और जिनकी सारी खेती-बाड़ी ‘भैया लोग’ आकर कर जाते हैं।

पुराने यार नछत्तर के गुजरने की खबर उसे न मिलती और पोता मनप्रीत उसे साथ चले चलने की बात पर ‘झिड़क’ न देता तो वह अकेला घर से बाहर निकलता तक नहीं।

एक-एक करके सभी ‘साथी-बेली’ चले गए हैं। जस्सा…हरबंस…गिंदी…प्रीतम…लेकिन जब तक मकंद कौर रही, तब तक किसी भी यार-रिश्तेदार के जाने का ज्यादा गम नहीं हुआ। पर मकंद क्या गई…सारी दुनिया ही उजड़ गई है। साफ नजर आता है कि चौरासी सालों के लंबे सफर में मिला बहुत कम है…गँवाया बहुत अधिक है…। जब से होश सँभाला है…हर तीजे-चौथे साल कोई न कोई चल देता रहा है…। पहले दादी गई, फिर नाना…फिर पिता…फिर माँ…बीच-बीच में और भी कई रिश्तेदार…कभी इधर के तो कभी उधर मकंद के परिवार के…।

असल में हम आधी जिंदगी अपने माँ-बाप के साथ बिताते हैं…और बाद की आधी अपने बच्चों के साथ…। सोचा था…बाद की जिंदगी बच्चों के आसरे काटेंगे…पर हुआ क्या…बच्चे अपने-अपने बच्चों में मस्त हो गए। रह गए…मैं और मकंद…मकंद के जाने से पहले तक के आखिरी सोलह साल…हम दोनों ही एक-दूसरे का सहारा बने रहे। और अब तो मकंद को भी गए कल पाँच साल पूरे हो गए हैं। घर में किसे याद था…? खुद ही गुरद्वारे जाकर ‘परशाद’ करके ‘अरदास’ करवा आया था।

और अब…मछत्तर भी चला गया है। प्रीतम के भोग पर मिला था नछत्तर से…। उसने मजाक किया था…‘शिंगारे…अब आपां दोवें ही रह गए हां…बाकी सारे चले गए ओए…! देखते हैं…हम दोनों में से किसकी ‘वारी’ पहले लगती है?’…ले गया…नछत्तर पहले ‘वारी’…।

पिछली बस तो गए हुए अब घंटे से ऊपर हो गया था…। ‘यार शीरू…आज कोई ‘धुड़क्का’ भी नहीं आ रहा…क्या चक्कर है…?’ शिंगारा सिंह ने पकौड़ियाँ तलने में व्यस्त शीरू से पूछा। छकड़े में जीप के पुराने टायर…और ऊपर पानी खींचने वाला ‘बम्बा’ लगाकर बनाया गया ‘धुड़क्का’ भी रोजाना सवारियाँ और सामान ढोने में खासा कामयाब है। ‘वहीं बापू…सुना है आगे ‘पुलस’ वालों ने नाका लगाया हुआ है…ही-ही-ही…’ शीरू की ही-ही-ही अगले ही पल गरम तेल में पड़ी पकौड़ियों की शीं-शीं-शीं में गुम हो गई।

प्रीतम के भोग पर शिंकारा सिंह को कोई भी जान-पहचान वाला नहीं मिला था। पीढ़ियाँ कितनी जल्दी बदल जाती हैं…पिछले वालों का नामोनिशान तक नहीं रहता। अब अपना गाँव ही ले लो…दो चार पुराने लोगों को छोड़कर कौन जानता है उसे…। नई पीढ़ी तो ‘उक्का’ ही नहीं…। उसे भी तो पता नहीं लगता…चार-पाँच घंटे हो गए अड्डे पर…किसी ने ‘फतह’ तक नहीं बुलाई।

घर वालों ने उसे कल यही कहते हुए झिड़का था–‘बापू…क्यों पंगा लेना…आराम से घर बैठ…वहाँ तुझे कौन पहचानता होगा…एक नछत्तर था जो तुझे जानता था…वह रहा नहीं…अब किससे मिलने जाना है तूने…ऐवें धक्के खाता फिरेगा…नहीं भी गया तो किसे पता लगना है…कि तू आया भी था या नहीं…चुप करके घरे बैठ…’

पर शिंगारा सिंह का दिल नहीं माना…’ नछत्तर के साथ सदा जिंदगी की खुशियाँ साँझी की हैं…उसकी ‘अंतम अरदास’ के मौके उसे कैसे धोखा दे दूँ…ठीक है…मेरे जाने से कौन सा नछत्तर ने वापस मुड़ आना है…।’ पर मरने के बाद मछत्तर को ऐसे ‘आँख-परोखे’ करना उसे ठीक नहीं लगा। इसलिए सारी ‘दुश्वारियाँ’ को समझता-बूझता हुआ भी…वह अकेला ही…नछत्तर की ‘अंतस अरदास’ में शामिल होने को निकल पड़ा है…।

‘बस आ गई ओए…’ अचानक एक बस को आते देख काफी देर से इंतजार में खड़ी सवारियों की भीड़ में हर्षातिरेक की लहर दौड़ गई। शीशे-खिड़की विहीन इस पुरानी परंतु अपेक्षाकृत ठीक-ठाक सी रोडवेज की बस में काफी भीड़ लदी हुई थी। लेकिन फिर भी ड्राइवर ने पता नहीं किस ‘दिव्य-प्रेरणा’ के वशीभूत बस सीधे अड्डे पर ही आकर रोकी।

अड्डे पर खड़ी सवारियाँ झपट-झपट कर बस में घुसने लगीं…जिसे जहाँ…जितनी जगह मिली…अटक गया या लटक गया…।

शिंगारा सिंह ने भी अब के हिम्मत की और बस की सीढ़ियों में अड़े रहने भर की जगह बना ली। अगली किसी बस का इंतजार करने का हौंसला अब उसमें नहीं बचा था।

बस चल पड़ी। एक तो खड़की हुई बस…और उस पर टूटी-फूटी गड्ढों भरी सड़क…। भीड़ और बस के धचकों में खड़े रहना शिंगारा सिंह को बहुत मुश्किल लग रहा था। वह काफी देर तक खुद को सँभालने की कोशिश करता रहा…पर धीरे-धीरे उसकी कुव्वत जवाब देने लगी। उसे उम्मीद थी कि शायद आगे ठीक सड़क आ जाए…पर सड़क आगे भी वैसी ही निकलती आ रही थी…ऊबड़-खाबड़।

आखिर ऐसी हालत में और खड़े रहना उसके लिए मुहाल हो गया। उसने उधड़ी-कंकाली सीटों पर बैठे लोगों की ओर कातर दृष्टि से देखा…पर किसी ने उसकी परवाह नहीं की। उसने किसी तरह सीढ़ियों में बैठने की कोशिश भी की…पर वह सफल नहीं हो पाया…।

बस टूटी-फूटी सड़क पर हिचकोले खाती चली जा रही थी। एक ट्रैक्टर-ट्राली को साइड देते समय बस अचानक इतनी ज्यादा बाईं ओर झुक गई कि शिंगारा सिंह खुद को सँभाल नहीं सका और खिड़की में लटके ‘पढ़ने वाले मुंडों’ के बीच में से होता हुआ…बस से बाहर जा गिरा।

शिंगारा सिंह के गिरते ही बस में शोर मच गया…‘बापू गिर गया ओए…बापू गिर गया…’

ड्राइवर ने झट से बस रोक दी…बस रुकते-रुकते भी पंद्रह-बीस मीटर आगे निकल गई। बस का कंडक्टर भीड़ में से सिर बाहर निकाल कर चिल्लाया–

‘ओए बापू! इस उम्र में ‘अवारागरदी’ पे निकला है…खुद भी मरेगा और हमें भी मरवायेगा…घर में नहीं बैठा जाता तुझसे…’

शिंगारा सिंह ने कोई उत्तर नहीं दिया…वह किसी तरह उठा…धूल में लुढ़की पड़ी पगड़ी उठाई…और कपड़े झाड़ता हुआ…सड़क किनारे एक ‘कीकर’ के नीचे जा बैठा…।

उसे न आता देख…बस आगे बढ़ गई…और उसी तरह हिचकोले खाती हुई आँखों से ओझल हो गई।


Image: Qazi 1
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