विस्थापन

विस्थापन

वाजिब दाम तो नहीं मिले, फिर भी मैंने जमीर बेच दिया।

कब तक रखे रखता। शक-शुबहों के चलते जमीर का खर्चा उठाना मुश्किल होता जा रहा था।

जमीर बेच, फिर मैंने टकटकी लगा कोई सूना रास्ता मोल ले लिया। ‘जमीर तुमने बेच दिया, यह काम तो अच्छा किया, लेकिन उसके बदले में ऐसा सूना रास्ता खरीद लेना जरा जँचा नहीं।’

‘नहीं बात यह नहीं थी, मैंने पाया कि बात इससे भी आगे जा चुकी है। दुनिया जमीर को धोखे का पड़ाव समझती जा रही थी और यहाँ मौके ताड़ने से चूक कौन रहा? फिर जमीर सँभाले लोग पुस्तकों की तरह धूल खा रहे सो अलग।’

वो कहने लगे–‘देखो भई अंततः दुनिया भरोसों पर ही टिकी मिलती है। वर्ना लोगों का स्थापित प्रणालियों से विश्वास उठता चला जाएगा।’

मैंने कहा–‘जब तक भव्य घटित होता रहेगा, गरीब कहानी से बाहर नहीं आ पाएगा और जमीर भी। शायद भव्य के धोखे ही जमीर में बदलते जाते हैं। एक गरीब को अपने गुजारे लायक किस्से मर-मर जीते हुए बनाने ही पड़ रहे हैं।’

‘तो फिर, अब क्या कर रहे हो?’

‘इन सब बातों को ध्यान में रखते हुए नमक का काम शुरू किया है।’–मैं बोला।

‘देखो यार, बुरा मत मानना, ऐसा सुनने में आ रहा है, आसमान अपने चमकते पत्थरों के थैले में से नमक पर काम करते लोगों को अटाला चीजों की तरह बाहर फेंक देता है।’–यह कहते हुए वे चले गए।


Image : Portrait of Vallier
Image Source : WikiArt
Artist : Paul Cezanne
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चैतन्य त्रिवेदी द्वारा भी