विदारक भाग्य

विदारक भाग्य

अस्पताल के गलियारे में मरीजों, लाशों और हृदय विदारक विलापों की आवाजाही जारी थी। हताश परिजन, मायूस मरीज, अस्पताल में मरीजों के पास कुछ मास्क लगाए, कुछ बिना मास्क परिजन बैठे हैं। संक्रमित बीमारी की सावधानियों के बारे में ऐलान करती कोई गाड़ी अभी-अभी गुजरी।

वह आदमी भी छोटे कस्बे से इस छोटे से शहर के अस्पताल आया हुआ था। अस्पताल के बेड पर पत्नी लेटी हुई। साथ में जवान होता बेटा भी है। चारों तरफ अफरा-तफरी मची है। किसी की साँसें फूल रही हैं, कोई बुखार तो कोई दर्द से चीख रहा है। कहीं-कहीं विलाप फूट पड़े हैं। दो बेड छोड़कर पड़ी उस जवान लड़की की तरफ लड़का हतप्रभ देख रहा था। वह भी भरी निगाह से उसकी तरफ देखती रही–‘बचा लो! बचा लो!’ कहते हुए फूल आती साँसें थम गईं।

कुछ आखरी निवाले निगलने को है। पिता कह रहे हैं, ‘खाओ-खाओ! इधर-उधर मत देखो। यह सब ऐसे ही चलता रहेगा, तुम्हें जिंदा रहना है खाओ…!’ और उस जवान होते लड़के ने मायूस आँखें लिए, पिता की डबडबाई आँखों में निवाला डूबो निगल लिया। उस शाम डॉक्टर आए। जैसे अंतरिक्ष से कोई देवदूत अवतरित हुआ हो, सारे हाथ उठ खड़े हुए, डाक-सा। पहले इधर…पहले इधर की आवाज से वार्ड भर गया।

लड़का उस लड़की की लाश जाते देख रहा था। खिड़की से झाँका बाहर ठेलों पर, रिक्शों में, कंधों पर और भी लाशें थीं। तभी पिता की चीख ने उसका ध्यान भंग कर दिया। उसने देखा माँ की साँसें फूल रही हैं।

‘डॉक्टर!’–पिता चीख पड़े थे।

डॉक्टर ने फूलती साँसें देख स्वास्थ्य कर्मी से कहा इन्हें ऑक्सीजन लगा दो!

लेकिन देर तक कोई नहीं आया। रात बीतते बीतते माँ ने दम तोड़ दिया! पिता सिसक रहे थे, वह फूट पड़ा था। उस अधमरी सुबह में पता चला वह भी संक्रमित हो चुका है। गलियारे में मरीज के साथ खड़े परिजन पूछ रहे थे–‘कोई मरा क्या!’

‘रुको अभी! दो-चार दम तोड़ने की कगार पर है!’–वार्ड ब्वॉय ने कहा।

पिता ने डॉक्टर से कातर स्वर में गुहार लगाई–‘मेरे बेटे को बचा लो! जमीन पर लेटा है।’ डॉक्टर ने कहा–‘इसे यहीं लेटा दो। इसकी माँ के पलंग पर!’

पिता और अन्य रिश्तेदार माँ की लाश लिए जा रहे थे। वह रो रहा था, ‘मुझे बाहर तक आने दो! माँ को देख लेने दो आखरी बार!’

उसकी सिसकती आवाजें, अस्पताल के वार्ड के पंखों की कर्कश आवाजों में डूबती जा रही थी। पता नहीं, कोई उससे कह रहा था–‘तुम लकी हो। बर्ना ये बेड जिस पर तुम्हारी माँ की साँसें उखड़ी, हमारा था।’


Image : Head of a Tramp
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Artist : Laszlo Mednyanszky
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चैतन्य त्रिवेदी द्वारा भी