शक का दायरा

शक का दायरा

पिटते-पिटते बच गया मैं। यूँ कह लीजिए कि इज्जत बच गई।

इन दिनों कहीं भी किसी भी बात पर पिटाई की वारदात घट सकती है। कोई शख्स अगर सार्वजनिक स्थल पर पीटा जाता है तो उसका बचना नामुमकिन हो चला है। चाहे मौके पर या फिर अस्पताल पहुँचते-पहुँचते उसे मौत गले लगा ही लेती है। अब तो महिलाएँ-बच्चे भी सुरक्षित नहीं। कोई दया नहीं, ममता नहीं, डर नहीं। न कानून का, न समाज का। किसी को कोई रियायत नहीं। बच्चे भी कहाँ बच पाते हैं अब। हाथ पीछे बाँध कर दे दनादन। जैसे करनी हो ताकत की आजमाइश। कितना बेरहम होते जा रहे हैं लोगबाग। किसी भी झूठे-सही इल्जाम पर किसी एक का भी हाथ किसी बदनसीब पर पड़ता है तो उसके जिस्म पर ताकत आजमाने वालों की कमी नहीं पड़ती। भले ही वह रोता रहे, कराहता रहे, अपने बेगुनाह होने का सफाई पेश करता रहे भीड़ उसे अधमरा तो कर ही देती है। मर जाए तो उनकी बला से। अगर बच्चा चुराने का आरोप लग जाए किसी पर तो उसे फिर कौन बचाए। बाप रे बाप। मैं तो बच गया। शक के घेरे में आ गया था उनके।

इधर बच्चा चुराने की सुर्खियाँ भी अखबारों-चैनलों पर लगातार दिख रही थीं। लोग गुस्से में थे। थानों के घेराव तक आम बात होती जा रही थी। अभी हाल ही में तीन महिलाओं को इसी शक की वजह से भीड़ ने पीट-पीट कर मार डाला था। न जाँच, न पड़ताल, सीधे दंड। सजा-ए-मौत। इन वारदातों के बाद अस्पतालों के इर्द-गिर्द गरीब किस्म की महिलाएँ शक की निगाह से देखे जाने लगी थीं। आया-नर्सें भी।

खैर, न जाने किसकी कृपा से अपन इस कलमुँही फजीहत से बच गया था। जान से कम नहीं इज्जत की अहमियत। सरेआम नाहक इज्जत लुट जाए यह कौन चाहेगा। बच्चों से लगाव महँगा भी पड़ सकता है–कभी सोचा न था।

कितने खुशनसीब थे वे। कितना आदर था उनका। कितना सुनाम। उन्होंने लगाव दिखाया, प्रेम का, स्नेह का इजहार किया तो वे ‘चाचा’ कहलाए और अपन बदनाम होते-होते बचे।

वह एक प्यारी-सी गुड़िया थी–हँसमुख। फूले-फूले गाल, बड़ी-बड़ी आँखें, माथे पर काला टीका। बाँह पर बँधा ताबीज। थोड़ी चंचल। मेरे आगे जो महिला चली जा रही थी, उन्हीं की गोद में। नहीं, कंधे से लटकती हुई। मेरी तरफ देखकर मुस्कुरा रही थी वह गुड़िया। मुझे उस पर लाड़ आ गया।

‘कहाँ जा रही हो गुड़िया…बाजार…टॉफी खरीदने…? अचानक मेरे मुँह से ये सब निकल गया। मेरी आवाज सुनकर वह महिला पीछे मुड़ी। मुस्कान उनके चेहरे पर भी था।

–‘इसे मिठाई चाहिए, रसगुल्ला। टॉफी-चिप्स नहीं।’

क्यों नहीं चाहिए उसे रसगुल्ला। जब सारे बड़े गटके जा रहे हों सुबह-दोपहर-शाम रसगुल्ला तो बच्चे का मन क्यों न मचले।

–‘इसकी पसंद तो अच्छी है। लाजेंस-टॉफी से तो दाँत खराब हो जाता है।’

‘……..’

मैं बच्ची के थोड़ा करीब चला गया तो वह मेरी तरफ हाथ फैलाने लगी।

–‘मेरे पास आओगी?’

मेरे यह पूछने पर वह मचलने लगी। मैंने उस महिला से कहा–‘बिटिया आपकी मनमोहनी है। मुझे दीजिए उसे। मैं भी बाजार की तरफ ही चल रहा हूँ।’

–‘अंकल के पास जाओगी?’ उसने मनमोहनी से पूछा।

‘मनमोहनी’ उसका नाम नहीं था। मैंने ही उसे यह नाम दे दिया था।

–‘हाँ।’

उसने मेरी तरफ अपने नन्हें हाथ फैला दिए। अब तो उसे गोद में लेना ही था–‘आ जाओ नन्हीं परी।’

वह लपक पड़ी मेरी तरफ, जैसे बहुत पहले से मुझे जानती हो वह। मैंने उसे सँभाला। अब वह हल्की मुलायम मनमोहनी मेरे सीने से चिपकी हुई थी। इस तरह मानो बहुत पुराना नाता हो।

‘…यूँ ही नहीं दिल लुभाता कोई…’ मुझे उस गाने का मुखड़ा याद आ गया। लेकिन नहीं, उस तरह को कोई नाता नहीं था। बस इनसानी रिश्ता। बच्चे किसे अच्छे नहीं लगते…बच्चे मन के सच्चे…

बाजार पास में ही था। दसेक मिनट बाद हम बाजार के एक किनारे पर थे। सड़क से ही लगी थी मिठाई की एक दुकान। मनमोहनी को रसगुल्ला कैसे ना खिलाता।

–‘रसगुल्ला खाओगी न?’ उसने अपनी माँ की ओर देखा…इजाजत की आस में।

–‘अरे खा लो गुड़िया, मम्मी नहीं डाँटेंगी…’ मेरे मनुहार को देख उसे इजाजत मिल गई। मैं उसे बेंच पर बैठा कर तीन जगह दो-दो रसगुल्ले का ऑर्डर दिया। लेकिन उस भद्र महिला ने खुद के लिए मना कर दिया।

–‘उसे एक ही दिलवाइए।…ऐ एकटाई खाबी, आमी आसची…’ यह कह कर वह बाजार की पहली गली में घुस गई। शायद उन्हें मछली लेनी हो।

मिठाई वाले ने दो प्लेट में दो-दो रसगुल्ला दे दिया तो मैं उसे चम्मच से खिलाने लगा और बातचीत जारी रखी।

–‘तुमी स्कूले जाओ?’

-हें, केजी टू ते, पोड़ी।’

–‘कोन स्कूले?’

–‘पीके गाँगूली ते।’

–‘बाबा की कोरे?’

–‘चाकरी।’

–‘आफिसे गेछे ना?’

–‘हें…’

तभी उस दुकान पर दो सज्जनों का पधारना हुआ। पैंतीस-चालीस के भरे-पूरे शरीर वाले।

‘अरे, तुई, ए खाने, इनी के?’

–‘अंकिल।’

–‘कोथाय थाकेन तोर अंकिल? आमी तो कोनो दिन देखी नी…’ उन दोनों ने मुझे प्रश्नवाचक नजर से देखा। शायद शक की नजर से ज्यादा। न जाने क्यों मेरे जिस्म में सिहरन सी दौड़ गई।

–‘मैं पास के मोहल्ले में ही रहता हूँ। आप कौन?’

–‘आमी येर काकू, आपनी ‘मे टा’ क?े (लड़की को) कोथाय पेलेन?’

–‘बैठिए पहले, फिर बताता हूँ।’

–‘ना, आगे बोलून तो…।’

‘अभी इसकी माँ आ रही होंगी, अंदर बाजार में शायद मछली लेने गई हैं। उनके साथ ही आ रही थी यह गुड़िया। बातों ही बातों में इसने मन जीत लिया सो रसगुल्ला खिला रहा हूँ, उनकी इजाजत से ही!’ मैंने उन्हें बताया।

–‘ताई ना की?’ दूसरे सज्जन ने मनमोहनी पर सवाल दागा।

उन दोनों को थोड़ा गुस्से में देख वह सकपका सी गई। फिर वह मेरी तरफ मुखातिब। मेरी नजर दुकानदार को तलाशने लगी। ताकि साक्षात गवाह से ही उनकी बात करा दूँ। पर वह आसपास में कहीं गया था।

–‘की दादा व्यापार टा की, एई भावे देखचेन केनो?’ शक की नजर से उन्हें देखते मुझसे रहा नहीं गया।

–‘ना-ना कोनो व्यापार नाई, आपना के तो आमरा कोनो दिन देखी नी, ताई…कौन पाड़ा ते थाकेन?’

–‘निरंजन स्वामी पल्ली ते। बोदी निश्चित भावे आमाके देखेचेन बा चीनेन, नाले आमार ऊपर भरसा कोरे ‘मे टा’ के आमार काछे छेड़े दितेन ना।’ उनके सवालों से मेरे शक को बल मिल रहा था सो मैं एक तरह से सफाई पेश कर रहा था। अंदर से भयभीत भी था। चेहरे पर शायद यह भाव उभर भी आया था। मैं मन ही मन कामना कर रहा था कि शक और न बढ़े इससे पहले मिठाईवाला या बच्ची की माँ जल्दी आ जाए। क्या पता कहा-सुनी की नौबत आ जाए। और मारपीट तो इन दिनों सामान्य बात हो गई है। अब उम्र का भी कहाँ कोई लिहाज। बस किसी बात पर विवाद भर हो जाए, फिर तो हाथ-पैर पर नियंत्रण कहाँ रहता।

बहरहाल, इस बीच मनमोहनी ने रसगुल्ला खत्म कर पानी की फरमाइश कर दी। मिठाईवाले का सहयोगी किशोर शीशे के गिलास में पानी पेश किया। मजे की बात यह कि तभी उसकी माँ अवतरित हुईं और दुकानदार भी। मेरी जान में जान आई।

‘फिर मिलते हैं गुड़िया।’ मैं चलने को हुआ तो उस महिला ने उससे कहा–‘अंकिल के थैंक्यू बोल।’

‘थैंक्यू अंकिल, आबार देखा होबें।’

मैंने मुस्कुराते हुए उसके एक काकू से हाथ मिलाया, जो दरअसल उसके पड़ोसी थे। और हाथ हिलाकर मनमोहनी को अलविदा कहा। मैंने गौर किया कि उनके चेहरे पर अपराधबोध के भाव तैर रहे थे। एक पचास पार शरीफ इनसान पर नाहक शक कर लिया था उन्होंने। लेकिन जिस तरह बच्चों के चुराने और दूसरे अपराध बढ़ रहे हैं, उसके मद्देनजर शक के दायरे का बढ़ना, स्वाभाविक भी है।


Image : A Fight
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Artist : Adriaen van Ostade
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शैलेन्द्र शांत द्वारा भी