कंधों पर सवार प्रेत

कंधों पर सवार प्रेत

‘कित्थे जाणां भैंण जी?’ सवारी को अपनी ओर आते देख कर रिक्शेवाली ने पूछा था।

गीतिका अचंभित थी, और इस असमंजस में भी कि क्या करे? आज तक उसने न ऐसा देखा था, न सुना था! किंतु जीवन में बहुत कुछ ऐसा घटित होता है, जिसकी हम कल्पना भी नहीं करते। निरंतर नया! दुनिया के इस छोर पर नहीं, तो उस छोर पर सही। वह सोच रही थी–रियली! औरत आज बंद गली से चौराहे तक आ पहुँची है। जंगल, खेत-खलिहानों में तो उसने सदियों से आदमी के साथ कंधे से कंधा भिड़ा कर काम किया ही है, शहरों में भी पढ़-लिख कर उसने हर क्षेत्र में कीर्तिमान स्थापित किए हैं। फिर भी कुछ काम थे, जिनके करने को लेकर औरत की कल्पना करना अजूबा लगता था। शायद वक्त की जरूरत या चुनौती ने उस अजूबेपन के मिथक को भी तोड़ा है। कुछ वर्ष पहले खबरें आई थी कि सिटी बसों में स्त्रियाँ टिकट काटेंगी, ट्रेन चलाएँगी। दिल्ली में एक औरत थ्रीव्हीलर चलाती है। आज अपने पैरों के दमखम से रिक्शा खींचनेवाली एक औरत उसके सामने खड़ी थी! गीतिका सोच में कुछ देर और डूबी रहती, यदि रिक्शेवाली ने अपना सवाल फिर से न दोहराया होता। उसकी सोच का धागा टूटा गया।

‘भैंण जी, आपको जाणां कहाँ है?’

‘हाँ! हाँ! वो…पर तुम’, गीतिका की दुविधा स्पष्ट हो रही थी।

‘छड्डों जी, आपके चक्कर में स्वारियाँ छुट जांणगियाँ।’ वह बड़बड़ाई।

‘तू चला लेगी? कहीं गिरा न देना…’

‘आप चिंता न करो जी! ये बताओ–जाणां कहाँ है?’

रिक्शेवाली मुस्कराई। उसके दाँत मटमैले थे। गेहुँए रंग का सुतवाँ चेहरा, मझोला कद, पतला पर कसा हुआ शरीर था। नीले आसमानी रंग की सलवार-कमीज पर गले में काले रंग का दुपट्टा। भूरे बालों की चोटी बना कर जूड़ी बँधी थी। जिसमें गुलाबी रंग का तितली जैसा फीता दूर चमकता था।

‘न्यूलाइट कॉलोनी…जानती हो?’

‘मिंदर को शहर का चप्पा-चप्पा पता ऐ…तुस्सी बैठो।’ कहकर उसने रिक्शे में सामान रख दिया। साड़ी सँभालती हुई गीतिका भी बैठ गई, एक हाथ से सूटकेस, दूसरे से रिक्शे की छतरी के फ्रेम को कस कर पकड़े हुए। उसे अभी भी विश्वास नहीं था कि वह सकुशल गंतव्य तक पहुँच पाएगी। मिंदर ने रिक्शे को पहले कुछ कदम पैदल घसीटा, फिर उछल कर गद्दी पर जम गई। एक लोकगीत उसके होंठों पर तिरने लगा–आजा वे माही तेरा रास्ता उडीक दीया…और रिक्शा हवा से बातें कर रहा था।

घर का इंतजाम बैंक ने ही किया था। अच्छा था। मेन फाटक के भीतर पहले लॉन, बरामदा, तीन बेडरूम का सेट। पीछे की तरफ छोटा किचन गार्डन भी। इसे छोटा बंगला कहा जा सकता था। अंदर से घर का मुआइना करते हुए गीतिका बाहर आई। मिंदर ने रिक्शे से सामान उतार कर बरामदे में टिका दिया था। गीतिका ने तय दाम से दस रुपये अधिक उसके हाथ पर रखे, तो वह अचरज से उसका मुँह देखने लगी।

‘तुने सामान भी तो चढ़ाया-उतारा है। दान नहीं दिया, तेरी मेहनत का है, रख ले!’ उसका आशय भाँप कर गीतिका ने कहा था। रिक्शेवाली पसीने से तर-ब-तर थी। उसकी हालत देखकर मन में विचलन सी हुई। सौहार्दवश उसने पूछ लिया, ‘पानी पीएगी’?

‘नहीं भैंण जी, धंधे का टैम है…सुवेरे कई गड्डियाँ आती हैं।’

‘तेरा नाम…क्या बताया था?’

‘नाम तो जी, महिंदर कौर है…पर बचपन से मिंदर ही आखदे हैं सब।’ वह मुस्कराई।

‘एक बात पूछूँ?’ गीतिका ने अपनी जिज्ञासा प्रकट की।

‘भैंण जी, कम्म कोई माड़ा नइ हुँदा…आप पढ़-लिक्खे हो! दफ्तर विच नौकरी करदे हो…साढ़े बरगे अनपढ़…मेहनत, मजदूरी ही…’

उसने वाक्य अधूरा छोड़ दिया। गीतिका अवाक! इसने कैसे जाना कि मैं यही पूछना चाहती थी! वह कुछ और कहती या पूछती–इससे पहले ही मिंदर मुस्करा कर कही, ‘चंगा भैंण जी, फेर मिलाँगे!’ और चली गई।

मिंदर खुद सोच में थी कि इस शहर में साल से ऊपर हो गया, पर लोग अभी भी यही पूछना चाहते हैं–मैं रिक्शा क्यों चलाती हूँ? घर में मर्द नहीं है क्या? कोई और काम क्यों नहीं? बहुतों को वह अपनी रामकथा सुना चुकी है। लेकिन फिर वही-मुड-मुड खोती वड़ थल्ले! क्या होता है पूछ कर? लोग बेचारगी की नजरों से देखते हैं। कोई पाँच-दस रुपया फालतू दे देता है रहम करके, बस्स! कोई किसी का नसीब नहीं बदल सकता।

अचानक मोड़ पर तेज रफ्तार टेंपो के कारण उसकी सोच का क्रम टूटा और बेसाख्ता उसके मुँह से गालियों की बौछार निकली। फिर स्वयं ही मन को शांत किया और सोचा–ओह! छड्डो मिंदर जी! वाहेगुरु दी महर-हादसा टल गया। अभी उसे स्टेशन लौटना था, दूसरी ट्रेन के लिए।

उसका तयशुदा रोजनामचा था–सुबह के सुरमई अँधेरे में गुरुद्वारे जाकर मत्था टेकना, उसके बाद ठेकेदार के स्टैंड से रिक्शा लेकर स्टेशन जाना, बाबा टी कॉनर पर फैन के साथ चाय पीना। स्टेशन पर एक घंटे के अंतराल से आने वाली दो गाड़ियों की सवारी देखना। दो-तीन चक्कर की सवारियाँ मिल ही जाती है। नौ-दस बजे तक ‘पंजीब पराँठा’ से नाश्ता कर, शहर के बस अड्डे पर पहुँचना। जब से वह इस शहर में आई है, उसने घर पर खाना नहीं बनाया। सोचती है–अकेली जान के लिए फिजूल का टंटा! किसके लिए बनाए! कौन है जो चटखारे लेकर तारीफ करेगा। इसलिए दोपहर में वहीं खाना खा लेती है। दिन में तीन घंटे के लिए घर लौटती है, जिसमें साफ सफाई, नहाना-धोना और थोड़ा सा आराम। शाम को फिर बस अड्डा, स्टेशन, बाजार की सड़कें और कॉलोनियों के चक्कर…

गीतिका के लिए यह शहर नया था। किसी महानगर की तुलना में बहुत मामूली भी, पर नयेपन या अजनबीपन में उतना ही गैर मामूली। गीतिका को यही महसूस होता है कि नये लोग, नयी भाषा, अपरिचित सड़कें, अलग मेले, त्योहार, नये संदर्भ, नयी पहचान! और नये संकट भी। किंतु यह सब उसका ही वांछित है, अभीष्ट है। उसने ही चाहा कि वह अपने कैरियर में किसी असंभाव्य स्थिति या किसी संबंध को अवरोध नहीं बनने देगी। किंतु निखिल की हकीकत खुलने तक तथा उसके बाद विवशता में बेटी के बड़े होने तक स्वयं को बाँधे रही। अब भी उसे लगता है, लड़ाई खत्म नहीं हुई…जंग अभी जारी है।

यहाँ आकर उसे लगने लगा है कि अकेले रहना भी मुसीबतों को दावत देने से कम नहीं! दफ्तर में वह शाखा की ग्रुप लीडर है। स्त्री होने के कारण पुरुष सहकर्मियों में लिहाज या अतिशय विनम्रता दिखती तो है, लेकिन बिना पति और परिवार के अकेली औरत उनके आकर्षण का, विनोद तथा कटाक्ष का प्रिय विषय भी बनती है। परोक्ष रूप से उसकी हर गतिविधि पर उनकी नजर रहती है–मैडम कब किसके साथ हँसती हैं…फोन पर किससे देर तक बात करती हैं…कहाँ जाती हैं…घर कब पहुँचती हैं…कहाँ से क्या खरीदती हैं…उन्हें क्या पसंद है, क्या नहीं। घर पर बहाने से पहुँच कर यह जानने की कोशिशें की जाती है। ऐसा लगता है उनके जीवन में इस खुफियागिरी से अहम काम दूसरा नहीं है। घर के पड़ोस में रहने वाली तथाकथित कुलीन घरों की सभ्य-सुसंकृत गृहणियों की भी कमोबेश यही स्थिति है। उसकी ओर देख कर कानों में फुसफुसाती हैं…कभी मिलती हैं तो पति-बच्चों के बारे में ही बात करती हैं–बच्चे नहीं हैं क्या? साथ क्यों नहीं रहती? छुट्टियों में तो आएँगे? जब उन्हें मालूम होता है कि वह अलग हो गई है और एक लड़की है जो हॉस्टल में रहती है, तो आश्चर्य से उनके मुँह खुले रह जाते हैं। मन शंकालु हो जाता है। एक दूसरे को सचेत करती हैं कि पड़ोस बहुत गंदा हो रहा है…अब पतियों पर ज्यादा पैनी नजर रखनी पड़ेगी। उसे एक सवाल हमेशा मथता है–आजादी की हसरत में जीने वाली औरत, स्वछंद सोच की औरत को देख कर खुश क्यों नहीं होती? उसके चलन में हमेशा खोट क्यों देखती है?

गीतिका को मिंदर से मिलकर आश्चर्य तो जरूर हुआ, पर अच्छा भी लगा। उसकी बेपरवाही, साफगोई और किर्चियाँ छोड़ती हँसी! कैसे? किस कीमत पर? पता नहीं, कितने वर्षों की साधना के बाद इस अवस्था को प्राप्त हुई है, फिर भी उसका रिक्शे पर आदमी-औरतों को ढोना हजम नहीं हो रहा था। खुद की सोच पर उसे हैरानी भी हुई कि बराबरी की माँग है, फिर काम का बँटवारा क्यों, काम तो काम है। कुछ तो कारण होगा, कोई तो मजबूरी रही होगी! वरना दुनिया के सामने ऐसे अजूबा बनना किसे अच्छा लगता है। उसने सोच लिया–दोबारा उससे भेंट हुई तो पूछ कर रहेगी। यदि कोई खास कारण न हुआ तो उसे अपने घर का काम करने के लिए कहेगी। उसकी मशक्कत भरी भटकन बचेगी और अपना खालीपन कुछ कम होगा…बोल-बतिया लेने का जरिया हो जाएगा। उसको लंबा इंतजार नहीं करना पड़ा। मिंदर से जल्दी ही मुलाकात हो गई थी।

गीतिका शाम को ऑफिस से अक्सर देर से निकलती थी। ब्रांच की जिम्मेदारी उसकी थी। सब के जाने के बाद ही वह सीट  से उठती, सुरक्षा इंतजामों का मुआयना करती। जब सड़क पर आती तो सूरज डूब रहा होता। अभी सितंबर था, आने वाले दिनों में तो इस वक्त बत्तियाँ जल जाया करेंगी।

उस दिन शाम को घर आने के लिए वह बैंक से निकली थी। सड़क पर पहुँचते ही जो पहला रिक्शा उसे मिला वह मिंदर का ही था। वह एक साथी रिक्शे वाले से गाली गलौज कर रही थी। गीतिका ने तो उसे दूर से ही पहचान लिया। वह पास जाकर खड़ी हो गई। रिक्शा वाला बचाव की मुद्रा में दिखा और जल्द ही वहाँ से खिसक गया, जिससे उसने अंदाजा लगाया कि मामला अवश्य बदतमीजी और छेड़छाड़ का रहा होगा। उसने मिंदर की ओर उन्मुख होकर–न्यूलाइट कॉलोनी कहा। मिंदर ने बोलने वाली को गौर से देखा! और कुछ पलों में ही उसके चेहरे का भाव बदल गया।

‘भैंण जी आप! बैठिए…मार्किट आए थे?’ वह मुस्कराई।

‘नहीं, वो सामने बैंक है, उसमें नौकरी करती हूँ।’ अल्पविराम के बाद पूछा, ‘अच्छा तू लड़ क्यों रही थी? और ऐसी गालियाँ! बाप रे!’

‘ओजी, कुछ नहीं! कुत्ते को डराने के लिए बिल्ली को अपना आप फुलाना पैंदा है।’ कह कर धीरे से बुदबुदाई–‘काम-धंधे को निकली औरत को तो खुला खेत समझते हैं स्माणे कमीने।’ गीतिका उसके हौसले से प्रभावित हुई।

‘मैं सोचती थी अब तुझ से मुलाकात नहीं होगी।’

‘छोटा सा शहर है जी! साड्डा ते कम्म ही सड़कां दे फेरे पाना…कैसे नहीं मिलते?’ मिंदर चहक बोली, ‘मैंनु पता हुँदा…आपके ऑफिस के सामणे खड़ी होती!’

‘हूँ! पर कभी-कभी एक मोहल्ले में रहते हुए लोग वर्षों एक दूजे से नहीं मिल पाते।’ गीतिका ने अचंभा जाहिर किया था कि जीवन में कुछ भी हो सकता है। मिंदर ने सुन कर जैसे चिल्ला खींच लिया। वह उदास हो गई थी। कुछ बातों का उसने हूँ-हाँ करके जवाब दिया। गीतिका ने गौर किया था और उसे सहज करने या उससे संपर्क बनाए रखने की गरज से ही पूछा, ‘तेरा बैंक में खाता है? नहीं है तो मैं खुलवा दूँगी।’

‘वहाँ तो जी रुपये जमा होते हैं!’

‘अब सरकार भी चाहती है, हर गरीब-गुरूबे का बैंक में खाता खुले…उसकी सुरक्षा रहे।’

‘भैंण जी, अपना तो रोज कमाना, रोज खाना! हम क्या रखेंगे उसमें?’ उसने बेचारगी से मुँह बनाया।

‘हूँ! यह तो है! अच्छा चाय पीएगी?’ गीतिका ने अपनत्व दिखाया।

‘नहीं भैंण जी, पानी पिला दें…रब तुव्वाडा भला करे!’ पानी पीकर, जाते हुए बोली…‘भैंण जी, कोई ऐसा बैंक नहीं है जिसमें औरत अपनी आबरू जमा करा सके और बेफ्रिक हो जाए?’ कहकर वह ठहाका मार कर हँस पड़ी। सुन कर गीतिका ठगी सी रह गई थी।

उस दिन से मिंदर के साथ एक सिलसिला कायम हो गया। गीतिका ने उसे ऑफिस जाने-आने के लिए माहवारी पर रख लिया। वह सहर्ष तैयार हो गई थी। मोबाइल नंबर का आदान-प्रदान कर लिया। रोज की मिलनसारी में उनके बीच निकटता बढ़ी, विश्वास बढ़ा। मिंदर अपनी बोली को लेकर भी सतर्क थी। वह मुसाफिरों को अपनी बात समझाने के लिए पंजाबी-हिंदी की खिचड़ी बना देती थी। अक्सर गाँव से शहर पहुँच कर काम करने वालों में भाषा का इस तरह का संक्रमण होता है। उसके साथ भी वैसा है।

कई महीने गुजर गए। एक शाम ऑफिस से लौटते समय गीतिका के सिर में दर्द था। रास्ते में उसने मिंदर से कोई बात नहीं की। स्वयं मिंदर ने उससे बात करने की कोशिश की, मगर गीतिका की ओर से कोई उत्साह नहीं दिखा।

घर पहुँच कर मिंदर ने पूछ लिया, ‘भैंण जी! अच्च बहुत खामोश हो जी! क्या तबीयत ठीक नइ हैद’

उत्तर में उसने हाँ में सिर हिलाया और कहा, ‘थोड़ा सिर दर्द है।’

‘चा सा, बना दूँ जी आपके लिए?’ मिंदर ने यों ही पूछ लिया।

गीतिका ने आश्चर्य से उसे देखा। जैसे पूछना चाहती हो कि तू चाय बना देगी? उसे और क्या चाहिए–अंधा क्या माँगे, दो आँखें! आज किचन में घुसने की बिल्कुल हिम्मत नहीं थी। फिर भी उसने कहा, ‘क्यों खमखां परेशान होती है, तुझे देर भी होगी।’ थोड़ी मुस्कराहट के साथ आगे कहा, ‘वो तेरा रिक्शा मालिक भी तुझे परेशान करेगा, खामखां!’

‘कोई गल्ल नइजी! परे करो जी ओनू…ऐंवेइ बोलता है। और जी वो मालिक नहीं मुंशी दरबान है…मालिक तो सीधे मुँह गल्ल नहीं करदा।’

गीतिका ने अंदर जाकर उसे किचन दिखाया और उपयोगी वस्तुओं से अवगत करा दिया।

चाय पीते हुए गीतिका ने प्रशंसा की, ‘चाय बहुत अच्छी बनाई है।’ मिंदर खुश हुई। बोली, ‘खाना भी स्वाद बनाती हूँ जी! कभी खाकर देखना!’

‘मतलब यह कि तू मेरी आदत खराब करेगी!’ हँस कर उसने आगे जोड़ा, ‘मैं तो कहती हूँ मेरे घर का काम सँभाल ले…छोड़ सारा दिन का बोझा ढोना…गर्मी-सर्दी, बारिश में खजख्वार होना। अच्छे पैसे भी आराम भी! बोल क्या कहती है?’ मिंदर किसी और सोच में डूब गई थी। जस्सी भी यही कहता था–मेरी आदत न खराब कर मिंदरे! मेरे से गड्डी ले के जाया नहीं जाणां…यहीं रह जाऊँगा। लोकी हँसणगे कि गबरू नूं नकरा कर छड्या।’ फिर भी छड गया मैंनु खसमानुखांणां! जाणें कित्थे खों गया, ऐ भी नई सोचिया मिंदर अकेली किवें जीवेगी!’ उसकी आँखें नम हो गई।

‘क्या हुआ री? कोई याद आ गया?’ गीतिका ने कुरेदा। किंतु मिंदर खामोश बैठी रही, फर्श पर बिछी कालीन के बेलबूटों को घूरती हुई।

‘कुछ तो बोल मिंदर! जी हल्का करे ले। दुःख साझा करने से घटता है! मैं तुझ से बड़ी हूँ, बड़ी बहन समझ ले।’ गीतिका ने रौ में कह तो दिया, फिर सोचा, यह कुछ ज्यादा हो गया…मिंदर से आखिर इतना लगाव क्यों दिखा रही हैं?’

दूसरी ओर अपनत्व से भरे शब्दों की ताप से पीर का पर्वत जैसे पिघल गया और दर्द बह निकला। मिंदर कह रही थी–जब मैं बीस साल की थी, मेरी शादी हो गई। मेरा कंथ जसविंदर सिंह ट्रिक डाइवर था। पूरे देश लॉरी लेकर घूमता था–मद्रास, कलकत्ता, बंबई, जयपुर, बंगलौर…बड़े-बड़े शहर! कभी दस दिन, बीस दिन, कभी महीना भर बाहर रह कर पिंड लौटता था। बहुत प्यार करता था मुझे…जब आता था तो लगता था, अब कभी जाएगा ही नहीं। मेरे लिए सुर्खी, परांदे, मुश्की तेल, नए फैशन वाली छींट की कुर्ती, पटियाला सलवार, गोटेवाली ओढ़नी…कुछ न कुछ लै कर आता था। मेरे हाथ का खाना और चाय का तो मुरीद था। कहता था–ओय मिंदर तूं तो हाईवे के ढाबे-होटल बंदा करा छड़ेगी, सोनिए! करिश्मा है तेरे हाथों में! स्वाद भी, बरकत भी!

हमारे दो बच्चे हो गए थे। पहली बेटी रिंकी, दूसरा बेटा मिंकू। बेटी के कहता था, ‘अपनी लाड्डो को तो किसी बाबू लाल डोली चढ़ाऊँगा, ताकि ठाठ से सरकारी बंगले में रहे…और अपणां मिंकू वास्ते ट्रांस्पोट कंपनी खोलूँगा!’

मैं बीच में ही उसे टोकती थी…‘मतलब कि तू इनको पढ़ाएगा नहीं? अनपढ़ रखेगा हमारे जैसा।’ वह तैश में आकर कहता, ‘ओय अनपढ़ होइगी तूं! मैं सात क्लास पास कित्ती हैं, समझी! सेठ नूं भी पत्ता है, इसलिए चूना नहीं लगा सकता मुझे, हाँ।’

‘पर मालिक बनने के वास्ते तो अँग्रेजी पढ़नी पैंदी ऐ।’

‘हाँ ओय! तू ठीक कहती है।’

चार साल के होते ही रिंकी को अँग्रेजी स्कूल में दाखिल करा दिया। जिंदगी बड़ी खुशहाल थी। सोचते थे, इससे ज्यादा बाब्बेजी दी मेहर क्या हो सकती है? पर शायद साड्ढी खुशियाँ नूं किसी की बदनजर लग गई। एक दिन अचानक मेरी लाडो रिंकी हमें छोड़ कर चली गई। उसका स्कूल रिक्शा टेंपो से टकरा गया था। डॉक्टर बचा नहीं सके। और रब दी करनी देखो जी, अभी साल भी नहीं गुजरा था, हम अभी बेटी के गम से उबरे भी नहीं थे कि मिंकू को टाइफायड हो गया। बहुत इलाज करवाया जी, पर वो भी हमें बिलखता छोड़ कर चला गया। हमारी बगिया उजड़ गई। घर की खुशियाँ रूल गई, हम बरबाद हो गए, जीणं दा हौसला टूट गया!’

बीच में ही गीतिका ने अफसोस जताया, ‘उफ! बहुत बुरा हुआ।’ उसकी जिज्ञासा बरकरार थी। पूछा, ‘फिर क्या हुआ?’

‘फिर क्या भैंण जी, वाहेगुरु दी मर्जी! ओ दा किसने पार पाया! घर में हर वेले मातम! न असी जीन जोगे, न मरन जोगे…दो चलती-फिरती लाशें! न खाणं-पीणएं दा होश, न कोई गल-बात, न हँसी, ठ्ठटा! न नींद न सुपने! जस्सी गड्डी लैके चला जाता, तो मैं बिलकुल अकेली रह जाती। जस्सी लौटता तो अब वो छेड़छाड़, न चाय की चहक न खाने की वाह, वाह! मशीन के माफिक चलना-फिरना, उठना-बैठना…बस जरूरी कम्म करी जाणां। जब जस्सी भी घर पर ज्यादा दिन नहीं रुकता था। वह जल्द से जल्द घर से दूर भागने की फिराक में रहता था। कभी-कभी पिंड आता ही नहीं था। टोल पर या कंपनी के गोदाम पर ही दो रात बिताकर, गड्डी लोड करा के निकल जाता। कभी क्लीनर को भेज कर खबर कर देता कि आ नहीं सकेगा। धीरे-धीरे उसका घर आना कम होता गया जी। इक बारी गया तो पूरा साल बीत गया, वह घर पर लौटा ही नहीं, न क्लीनर से कोई सनेहा भेजा। उसके ठीहे-ठिकानों पर पूछताछ की, कंपनी गई, पर कुछ पता नहीं चला…जाने कहाँ गुम हो गया!’

‘वक्त किसके के लिए रुका है भैंण जी! मेरे सब्र का बाँध टूटने लगा। आखिरी कोशिश की। सूफी-संतों, नजूमियों के चक्कर लगाए, कि बाबा बताओ मेरा मरद कहाँ है, किस हालत में हैं? जिंदा भी है या…सब ने कहा तेरा सुहाग सही सलामत है, तू इंतजार कर!’ पर कब तक? इंतजार की कोई मियाद तो हो, कोई उम्मीद दा लिसकारा तो दिखे। भैंण जी क्या करती! जब तक साँस है, उसकी आस है। एक दिन मोहल्ले के एक हमदर्द ने बताया कि उसने जस्सी को मुक्तसर में देखा है। वह बस में था और जस्सी बाजार में घूमता दिखा था। इसलिए पूछताछ नहीं कर सका। मैंने कहा, ‘रब तेरा भला करे बीरा! मेरे लिए इतनी सी खबर भी राम जी की अँगूठी के बराबर है।’ बस जी, मैंने जरूरी सामान बाँधा और इस शहर आ गई।’

कहते हुए मिंदर खाली कप उठा कर अंदर चली गई। जब लौटी तो तरोताजा दिखी। शायद मुँह पर पानी के छींटे मार कर आई थी ताकि चेहरे का रुआँसापन कुछ कम हो जाए।

लंबी साँस खींच कर गीतिका ने उसे देखा और कहा, ‘बहुत अफसोस हुआ तेरी कहानी सुनकर!’ कुछ पल रुक कर पूछा ‘यहाँ आकर कुछ पता चला?’

‘नहीं जी!’ मिंदर ने एकदम पस्त होकर कहा, ‘अरे भैंण जी यह कहानी नहीं हकीकत है जी!’ दोनों के बीच कुछ समय तक खामोशी छाई रही। गीतिका ने खिड़की के पार देखा, अँधेरा गहरा गया था। वह उठकर बरामदे में गई और बल्ब जला दिया। दूर-पास कुछ कुत्तों के भौंकने की आवाजें सन्नाटे को बाँट रही थी। वह लौट आई। कमरे में अभी भी उदास पलों का जाला था।

सोफे पर बैठते हुए उसने पूछा, ‘पर तुने रिक्शा चलाना ही क्यों पसंद किया? मेहनत से रोजी-रोटी कमाने के कई काम हैं–दिहाड़ी मजदूरी, घर, दफ्तरों में साफ-सफाई, फैक्टरियों में छोटे-मोटे काम।’

मिंदर की नजर अब कालीन के बेल बूटों से उठ कर कमरे की छत से लटकते फानूश के शीशे की अनगिनित तराशों में अटकी थी।

गीतिका ने प्रश्न के रूप में उसका नाम पुकारा–‘मिंदर!’

उसने हुँकारा भरा, कहने लगी, ‘अजीब लगा था जी! और आसान भी नहीं था। दूसरे शहर में सर छिपाने को भाड़े की छत, दौ टैम की रोटी का जुगाड़ करना! मेरे पास सोने-चाँदी का जो थोड़ा सा जेवर था, उसे बेच कर एक कोठरी भाड़े पर ली और कम्म की तलाश करने लगी। भैंण जी, असल में मुझे तलाश तो जस्सी की करणी थी। सोचा–ऐसा कम्म करो जो घूमने-फिरने वाला होवे…शहर के हर इलाके से वास्ता पड़े। इसीलिए रिक्शा चलाने की ठान ली। शुरू में कोई मालिक गड्डी देने नूं तैयार नई, कई अड्डों के चक्कर लगाए, मिन्नतां कित्ती! पर ओ दुर-दुर करते और कहते–जा बीबी क्यों मजाक कर दी ए! किसी औरत नूं देख्या है रिक्शा चलाते हुए? तेरे से गड्डी दा किराया भी नहीं पुरना, रब दा वास्ता बीबी! एक्सीडेंट कर लिया तो होर स्पाया!–ओ नाजी ना, माफ कर बीबी! कोई होर कम्म कर!’

लेकिन जी, मेरी जिद और हिम्मत रंग लाई। रिक्शा चलाने वाले कई बंद हमदर्द हो गए, एक सेठ का मुंशी भी तरफदारी करने लगा। अपने भरोसे पर गड्डी दिलवा दी। पर मुश्किलें अभी भी बड़ी थीं। कुछ दिन गड्डी का किराया पल्ले से देना पड़ा। लोग देख कर ऐसे चौंकते थे जैसे मैं अजायबघर की कोई चीज हूँ। हँसते थे, इशारों में गंदी गल्लां भी करते थे। मर्द सवारी तो मेरा रिक्शा देख कर ही दुड़क जाती…उन्हें डर होता था कि मैं उनका बोझ खींच पाऊँगी भी या नहीं…कहीं बीच सड़क पर गिरा कर उनका मजाक न बनवा दूँ! सच्ची दस्सां भैंण जी, बच्चे , जनानियाँ ने हिम्मत दिखाई और मेरी गड्डी पर बैठने लगे। अभी भी ज्यादातर जनानियाँ ही बैठती हैं। पर उनकी पूछताछ, जाँच-पड़ताल से तंग पड़ जाती हूँ। तब मजबूरी में अपनी स्टोरी बतानी पड़ती है–कभी कुछ छुपाकर, कभी कुछ घूमा-फिरा कर!’

अंतिम वाक्य पर दोनों की दृष्टि एक दूसरे से टकराई। मिंदर के चेहरे पर झेंप थी, तो गीतिका के होंठों पर उलहाने से पगी मुस्कराहट थी। उसी भाव से उसने पूछा, ‘तो अभी कितना सच और कितना झूठ था?’

‘सौं रब दी, भैंण जी! आप से झूठ नहीं बोला।’

मिंदर जा चुकी थी। किंतु गीतिका के विचारों में वह सवाल बन कर अभी उपस्थित थी…उसकी तलाश कभी खत्म होगी? अगर वह जिंदा है तो उसके पास लौटा क्यों नहीं? इंतजार की वीरानी स्त्री के हिस्से ही क्यों? तीस साल की उम्र में उसे हठयोग के लिए किसने प्रेरित किया है? स्वेच्छा हो सकती है, पर यह भाव क्या संस्कारित वर्जनाओं से नहीं उपजा होगा? संभवतः पारंपरिक दबाव के वशीभूत स्वयं को एकनिष्ठ, आदर्शवादी बनाए रखने की विवशता! इसके लिए वह कितने इम्तहानों से गुजर रही है! कितने रंगीन प्रलोभनों को ठुकरा रही है।

उसने बताया था–‘लालेशाह का वो मुंशी–वीरसिंह नाम है जिसका…एक बार भयानक बाढ़ आई, गाँव डूबा, घर-टब्बर तबाह हो गया। अकेला बचा तो काम की खोज में शहर चला आया। कई साल मेहनत मजदूरी की, लालेशाह ने दुकान पर रख लिया। अब रिक्शों की गिनती, उनका मुआइना, हिसाब और चौकीदारी भी करता है। शाहन दिन में इक फेरा मारता है रकम उठाने के वास्ते। जान न पहचान भैंण जी! ओ मेरा सबसे बड़ा खैरख्वाह बन गया। बदकारी नहीं करता, बस यही कहता है–‘कोई हल्का काम कर लै, क्यों अपनी जिंदगी रोल दी ऐ!’ मैं भी हँस के कहं देती हूँ, ‘तेनु मेरी बड़ी फिकर है! जा गड्डिया दी गिनती कर!’

‘तू नइ समझेगी, भोलिए!’

‘अब इतनी भी भोली नहीं हूँ पाइया जी!’ मैं मजाक में उसे पाइया जी कह देती हूँ तो वह चिढ़ जाता है। कहता है, ‘चल चंगा!! अपनी गड्डी लै के जा ऐत्थे!’

‘कहाँ-कहाँ से, किस-किस से बचें भैंण जी!’ उसने आगे बताया था–और भी कई हैं, जो लार टपकाते रहते हैं…स्टेशन पर ‘बाबा टी कॉर्नर का बड़ा मुंडू! हमेशा चाय का गिलास पकड़ाते हुए हाथ छूने की कोशिश करता है…बात-बात में मजाक करना, आँख से इशारे करना, उसका शगल है। और बस अड्डे पर ढाबेवाला-काका भी दाना फेंकता है। मेरी थाली में अलग से सलाद, बिन माँगे रायता और दाल में ढेर मक्खन! लड़के से कहता है–अपने खास ग्राहकों का ख्याल रखा करो, समझे कि नहीं!’ लड़के आँखों-आँखों में हँसते हैं।

कभी-कभी मेरी आँखों में घूरता हुआ कहता है–सच्ची गल्ल तो यह है मिंदर, तेरे से पैसे लेने का दिल नहीं मानता।’ मैंने भी एक दिन कह दिया–‘ठीक है! रखड़ी वाले दिन मत लेना घास दे नाल यारी चंगी नहीं हुंदी बीर जी! तब उसने ऐसा मुँह बनाया, जैसे कुनैन की टिक्की मुँह में घुली हो।’

बोलते हुए मिंदर का गला सूख गया था शायद। उसने गीतिका से पूछा था–आपके लिए पानी लाऊँ? गीतिका ने कहा था–नहीं तू पी ले। फिर भी वह किचन से दो गिलास पानी ले आई। एक गीतिका के सामने रखा, दूसरे को गटगट करके खाली कर दिया था। गीतिका ने वॉल क्लॉक की ओर ताका–साढ़े आठ बज चुके थे। मिंदर ने उसकी नजर का आशय समझा और बोली, ‘चलती हूँ भैंण जी! बड़ा चिर हो गया…बस मैं ही बोलती रही, आपने तो कुछ दस्या नहीं? कह कर वह प्रश्नवाचक मुद्रा में उसे देखनी लगी।

कुछ असहज सी हुई थी गीतिका, ‘मैं…मैं! मेरा क्या! कुछ भी तो नहीं! मेरी एक बेटी है, पढ़ती है, वहीं हॉस्टल में रहती है…मैं अकेली हूँ।’

तब मिंदर ने बड़े खुफिया अंदाज में उसके चेहरे पर आँखें टिका कर कहा था, ‘मतलब! घरवाले ने छोड़ दिया? चच्च बच्च्! किन्नी सौंणी मुटियार…चंगा नई कित्ता! ये मर्दजात दा कोई भरोसा नइ।’

गीतिका की ग्रीवा तुरंत तन गई। उसे ऐसी हमदर्दी से वितृष्णा होती है। और यहाँ तो एक रिक्शेवाली उस पर तरस खा रही थी! उसने झट से अपनी खुदमुख्तारी और हिम्मत का सबूत दिया। बोली, ‘उसने नहीं, मैंने उसे छोड़ दिया।’ चहरे पर गुमान की रौनक साफ दिख रही थी। उधर मिंदर हैरानी से यों ताक रही थी, जैसे गीतिका के औरत होने पर उसे संदेह हो!

गीतिका कह रही थी, ‘मर्द कंधों पर सवार हो जाए, तो उस प्रेत को उतार फेंकना ही अच्छा है। और तू अभी तक उसका भरोसा किए बैठी है। रात दिन ढो रही है–उसे भी, और रिक्शा भी! चल छोड़! तू नहीं समझेगी। रात हो गई है, जरा होशियारी से जाना।’

मिंदर कुछ देर सन्नाटे में रही–भैंण जी ने क्या कह दिया! मैं उसे मुर्दें की तरह क्यों ढो रही हूँ? उतार कर फेंक दूँ! अगर वह कहकर छोड़ जाता या रब नूं प्यारा हो जाता है तो सब्र भी कर लेती। पर ऐसे कैसे भुला दे उसे? भैंण जी का तो निपटारा हो गया है, पर मैं कैसे?

गीतिका ने भी महसूस किया कि उसे इतना कठोर प्रतिवाद नहीं करना चाहिए था। मिंदर को निश्चित बुरा लगा होगा। उसे सहज करने की गरज से कहा, ‘क्यों खतरा उठाती है? आज यहीं रुक जा! मौसम कितना ठंडा है।’

यह अच्छा विकल्प था, लेकिन उसे मुनासिब नहीं लगा। मिंदर ने बड़ी बेफिक्री से कहा, ‘आप फिकर न करो जी! आज तक ऐसा साबका तो नहीं पड़ा, अगर ऐसा हुआ तो इंतजाम है मेरे पास! काट के उसके हाथ में…।’

वाक्य अघूरा छोड़ कर उसने आगे से अपनी कमीज ऊपर उठाई। कमर में बँधे फेंटे में उसने एक छोटी कटार खोंसी हुई थी, जिसे देखकर क्षणभर के लिए गीतिका की साँसों का आरोह-अवरोह जैसे थम गया और मिंदर मुस्कराती हुई चली गई थी।

गीतिका के चेहरे की मुस्कराहट छिन गई। उसे अफसोस हुआ कि उसने ऐसा आग्रह किया ही क्यों…अगर वो रुक जाती तो? नीयत बदलते देर नहीं लगती है भला! रात को पलभर में गला रेत कर उड़न छू हो जाता! पर ऐसा क्या है मेरे पास? पैसा, गहना तो बैंक में ही है लेकिन गलतफहमी में जान तो जा ही सकती थी। नहीं, नहीं! यह क्या सोचने लगी मैं! वह ऐसी नहीं है। उसके पास शायद ज्यादा कुछ है अभिमान करने के लिए। उसने गहरे अहसास और साफगोई से अपना माझी मेरे सामने खोल कर रखा दिया। और हौसला भी तो देखो! अँधेरे, उजाले कभी भी, कहीं भी घूमती है बनैले गैर मर्दों के बीच! सच्ची हूक के साथ, पति को ढूँढ़ती हुई।

गीतिका दोनों ध्रुवों से सोचती है–मैं कुछ ज्यादा ही महत्त्व दे रही हूँ उसे! मेरी उसकी बराबरी तो नहीं, हाँ! इनसानियत के नाते कुछ देर बोल-बतिया लेती हूँ। इसका मतलब यह तो नहीं, मैं उससे अपनी अतीत को साझा करूँ और हँसने का मौका दूँ। बेशक, वह हँसेगी! जब मैं उसे बताऊँगी कि मैंने जिस आदमी से प्रेम किया, उसके साथ ‘लिव इन’ में रही। उसी शख्स ने मुझे धोखा दिया…क्या वह समझेगी-लिव इन?

किस्सा मुख्तसर यह है कि शादी के सात साल तक मैं बेवकूफ बनी रही। तब मुझे पता चला कि वह आदमी जो मेरा पहला प्यार था–वह पहले ही एक औरत का पति दो बच्चों का पिता था। एक अलग परिवार का मुखिया था। मैं कितनी भोली थी, नहीं शायद मूर्ख थी, जो अपना प्यार, पैसा और विश्वास सब न्यौछावर करती रही! और उसकी बदकारी का जरा सा अंदाजा नहीं लगा सकी। मेरी बेटी उस वक्त पाँच साल की थी। वह नहीं समझ सकी कि हम पापा के साथ क्यों नहीं रहेंगे। उसे छोड़ा ही नहीं, बल्कि उसके खिलाफ थाने में केस भी दर्ज करवाया। दोस्तों और घरवालों का विचार था कि उसे अपने किए की सजा मिलनी ही चाहिए। एक दूसरी औरत का भी विश्वास टूटा! एक और परिवार सड़क पर बिखरा! तब महसूस किया मैंने–‘संबंध वो पेड़ है, जो जड़ से टूटने पर आसपास की जमीन को दरकाता है।’ उसे छोड़ने के बाद बेटी को कुछ साल उसकी नानी के पास रखा। फिर अपने कैरियर पर कंसट्रेट किया। बाद में बेटी को बोर्डिंग स्कूल में रख दिया। पंजाब के इस शहर से इतना दूर चली आई। नहीं मिंदर को यह सब नहीं बताया जा सकता। उसकी हमदर्दी मुझसे बर्दाश्त नहीं होगी।

कई दिन बीत गए। गीतिका को उसका इंतजार है, पर मिंदर को कोई अता पता नहीं है। उसका मोबाइल लगातार स्विच ऑफ की घोषणा कर रहा है। ऑफिस आते-जाते भी वह मुड़-मुड़ कर इधर-उधर देखती है, शायद कहीं दिख जाए। आखिर कहाँ गुम हो गई अचानक? सोच-सोच कर गीतिका परेशान है। कहीं उस रात उसके साथ कोई अनहोनी न घटी हो। ईश्वर करे खैरियत से हो। वरना सारी उम्र गीतिका को पछतावा रहेगा। उसी ने रोका था उस रात देर तक। कितना हौसला दिखा रही थी एक कटार के दम पर! पर जहाँ चार-पाँच दरिंदे हों, वहाँ अकेली हिरनी का क्या वजूद? फिर उसके सींग चाहे जितने लंबे और नुकीले क्यों न हों!

उसकी अंतरात्मा का पश्चाताप या दैवीय कृपा का सुफल मानिए कि लगभग महीने बाद मिंदर यकायक हाजिर हो गई थी। छुट्टी का दिन था। गीतिका लॉन में सुबह की कच्ची धूप में अखबार पढ़ रही थी। चाय का खाली कप टेबल पर पड़ा था। सुखद आश्चर्य से वह उछल पड़ी।

‘कैसी है? अच्छी तो हैं न! कहाँ थी इतने दिन! मोबाइल क्यों बंद था?’

मिंदर मुस्कराई। बोली, ‘भली-चंगी हूँ! देखो!’

गीतिका को वह ठीक ही लगी–‘चलो शुक्र है ईश्वर का!’ सोचते हुए उसने पूछा, ‘चाय पिएगी?’

‘नहीं भैंण जी!’ उसका छोटा सा जवाब।

‘चल स्टूल ले आ अंदर से। आ बैठ। बता तो सही, कहाँ गायब हो गई थी? बिना बताए।’ कुछ देर मिंदर कभी जमीन की घास को, कभी गीतिका के चेहरे को देखती खामोश बैठी रही। फिर धीरे-धीरे उस दिन का किस्सा बयान किया–

बिना संयोग के कोई कहानी नहीं बनती, क्योंकि जिंदगी में इत्तिफाकन बहुत कुछ होता है। यहाँ भी ऐसा ही हुआ। जिस रात मिंदर गीतिका के घर से निकली तब उसका मिजाज उखड़ा हुआ था–इन बड़े लोगों का भी कोई भरोसा नहीं…एक पल में मोम, दूसरे में पत्थर! मैंने ऐसा क्या कहा, अफसोस ही जताया कि घर टूट गया…वह मुझे ही सुनाने लगी कि तेरा कंथ तो प्रेत बनकर तेरे कंधों पर सवार है, उतार फेंक! अरे! वाह! जनम-जनम का रिश्ता कोई काट के फेंकता है! अपने मजाजी रब को कोई प्रेत कहता है? मत मारी गई है भैंण जी की! सच्च कहते हैं–ज्यादा पढ़ाई-लिखाई मगज में चढ़ जाती है। उसने अपने सिर झटक कर खुद को समझाया–छोट नी मिंदर! जग स्यापा, ते रब राखा!

उस दिन मौसम काफी ठंडा था। सुना था–शिमला में बर्फ पड़ी है! चलो अच्छा है, माघ महीने की बर्फ बैसाखी तक मौसम गुलाबी रखेगी और मेले की रौनक बढ़ेगी। सोचते हुए लोई को कस कर लपेट लिया। काके के ढाबे से उसने दाल-रोटी पन्नी में बँधवानी थी। रात का खाना वह अक्सर डेरे जाकर ही खाती है, क्योंकि उस वक्त ढाबे पर खाना बड़ा जलालत भरा होता है। एक-एक बुरकी बमुश्किल हलक से नीचे उतरती है। ऐसा लगता है दर्जनों आँखें उसी पर चिपकी है–पीछे से, अगल-बगल से, आगे से, एक्सरे मशीन की तरह आर पार देखती हुई। यह भी संयोग ही था कि मेन रोड पर आते ही उसे सवारी ने रोका। दो गबरू सिक्ख लड़के थे–जीन-जेकेट से कसे हुए, कंधों पर बैग लटकाए, जल्दी पहुँचने की हड़बड़ी में। मिंदर को सवारी नहीं उठानी थी। उन्होंने बड़ी मिन्नतें की, रब का वास्ता दिया–‘आखिर बस है, छूट जाएगी।’ मिंदर को जाना भी बस अड्डे होकर ही था इसलिए मान गई। उसने मुँह लपेटे हुए ही इशारों से ही ना-हाँ की। दिल में धुड़क तो मची थी–इस वक्त दो जवान लड़के उसके रिक्शे पर! फिर भी हौसला बनाए रखा कि चल मिंदर! देखी जाउ…जिंदणी का आखिरी फेरा ही समझ…आज ये नहीं, या तू नहीं!

उस रात का वह फेरा उसका आखिरी फेरा ही साबित हुआ। जैसे सब कुछ खत्म हो गया था। रास्ते में वे दोनों लड़के आपसी बातचीत में मशगूल थे। तीसरे की मौजूदगी को उन्होंने जैसे नकार दिया था। जैसे कोई लेना देना नहीं था–कौन सा अपना ग्वांडी है…रिक्शेवाला ही तो है।

‘नहीं यार! मुझे नहीं बनना क्लीनर, डराईवर! इस कम्म में फेमिली का तो सुख नहीं…आप बाहर अकेले ते बीबी घर में अकेली!’ एक कह रहा था। तब दूसरे ने अपनी आवाज को सीरे में डुबा कर कहा–‘ओय! दूसरे जो सुख ही सुख हैं यार! हर तरह का नशापानी! देसी-विलायती, अफीम, गाँजा हेरोइन, स्मैक कुछ भी…नवे-वे शहर, नई जनानियाँ! और तेनू फैमिली की सुक्खी रोटी की फिक्र है! छड्ड परां।’

‘ओय रहने दे, पता है मैनु! इस मौजमस्ती के बड़े बुरे नतीजे भी हुँदे है कई बारी…

‘ओय, तूं भी न झल्ला ही है। भई, मैं तो गड्डी ही चलाणी ए! गल्ल बात भी हो गई है।’ दूसरे ने उसके जोश को परे धकेलते हुए अपनी बात जारी रखी, ‘यारा जरूर चला गड्डी! अच्छा सुन तो ले–मेरे मामे का मुंडा क्लीनर सी। अब खुद गड्डी लैके जाता है कलकत्ता। हाँ तो उसके उस्ताद, भला सा नाम था–हाँ जसविंदर! जस्सी कहते थे उसको। उस भले माणंस ने पहले ही दो रखी हुई थीं–इक जयपुर, दुजी दिल्ली। और तीसरी पिंड में, दो बच्चों के साथ घरवाली भी! बच्चों के प्यार में पिंड आता-जाता था। नसीब खराब समझो कि दोनों बच्चों रब नूं प्यारे हो गए! जस्सी ने हौली-हौली घरवाली से पीछे छुड़ा लिया। दो-ढाई साल हो गए, मुड़ के पिंड नहीं गया।’

जस्सी का नाम सुनकर मिंदर के कान खड़े हो गए थे। दिल धकधकाने लगा था। वह गौर से सुनने लगी।

‘ओए! पिंड विच रखा ही क्या था? जनानियाँ तो कोई राशन थोड़े ही लग्गा सी यार! सगो आजाद हो गया…मौज करता होगा यार मेरा!’ दूसरे ने खुश होकर बीच में ही अपनी राय दी। पहला खीज कर बोला, ‘गल्ल तो पूरी सुन लै! कहते हैं–ऐसी बीमारी लगी है कोई जनानी पास नहीं फटकती…बस इलाज ही इलाज…वड़ गई सारी मौज, टँगा दे विच!’ ‘पिंड क्यों नहीं गया बीबी के पास…तीमारदारी तो हो जाती।’ ‘हाँ, लोगों ने कहा था उसको, पर वो गया नहीं!’

दूसरा ठहका मार कर हँसा, ‘यार मेरा! जानता होगा कि बीबी कौन सा सुमरनी लै के बैठी होएगी उसकी खातिर।’

साँस रोक कर मिंदर ने सब सुना था। पल-पल उसके लिए पैडल मारना भारी होता गया। उसने खाना नहीं बँधवाया। अड्डे पर सवारियाँ उतार कर जैसे-तैसे रिक्शा ठेके पर पटका। वीर सिंह ने उससे क्या कहा-सुना, उसे बिलकुल होश नहीं। वह बस डेरे जा कर पड़ गई थी। बहुत बार उसके जी में आया था कि सवारी से कुछ और पूछे, पर जुबान को ताला पड़ गया था। जानने को बचा भी क्या था? और भी कुछ जान कर क्या करती? कई दिनों घर में बंद पड़ी रही। मोबाइल बंद कर दिया था। हफ्ते बाद ढूँढ़ता हुआ वीरसिंह डेरे पर आया। उस दिन उसे बुखार था। बड़ा नाराज हुआ।

‘बीमार पड़ी है! एक फोन नहीं कर सकती थी? हद कर दी मिंदर, हैं! चल डॉक्टर कोल।’ न चाहते हुए भी गई थी उसके साथ। बीच-बीच में भी खैर-खबर लेने आता रहा। वह चुप हो गई।

गीतिका सुन रही थी। उसकी तंद्रा भंग हुई, तो कहा, ‘मैं तो कहती थी तुझे–उतार फेंक उस प्रेत को…खमाखां में जिंदगी बेजार की! अच्छा फिर?’

‘फिर क्या भैंण जी! मैं परेशान थी। किसी से मिलने का दिल ही नहीं करता था। आपसे मिलना चाहती थी। दिल करता था, पर खुद को रोक लेती थी। मुझे लगता था, सारी दुनिया मेरा मजाक उड़ा रही है। एक दिन वीरसिंह ने कहा कि यहाँ आंडी-ग्वांडी भी खुसपुस करते हैं! चल तू डेरा ही बदल ले। और जी मैंने डेरा बदल लिया। कहकर मिंदर शर्मिंदगी जैसा भाव लिए लॉन की हरी दूब को पैर के अँगूठे से मसलने लगी। यकायक वह उठ गई जैसे कुछ याद आ गया।

‘अच्छा भैंण जी अब चलती हूँ जी!’

‘चाय तो पीकर जा…बैठ थोड़ी देर।’

‘नहीं जी, बाहर वीरसिंह खड़ा है रिक्शा लेकर।’

मुस्करा कर उसने गीतिका को एक नजर देखा और पलट गई। जाते हुए इतना और कहा, ‘भैंण जी! ऐसा भी होता है–प्रेत कंधों पर हो तो गल्ल-बात कर के सफर चंगा कट जाता है।’

अवाक् गीतिका देख रही थी–सामने सड़क पर रिक्शा उड़ा जा रहा था और मिंदर उसमें बैठी तितली-सी दिख रही थी।


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राजकमल द्वारा भी