कौन होइहैं गतिया

कौन होइहैं गतिया

“दूर हट, कुलक्षणी! आखिर तूने छू दिया न मेरी पूजा की आसनी। आचमनी का पानी भी नापाक हुआ और भोग की मिठाइयाँ भी।”

“आखिर है भी तेरी कोई जात, और राँड है कि सधवा, यह तो पता ही नहीं चलता? माँग में सिंदूर है या गुलाबी रंग, यह तो राम ही जाने!”

अमियाँ सहम गई। हाथ से आसनी छूट गई और उससे धक्का लग कर गंगाजली भी उलट पड़ी। उसकी मालकिन ने फिर कड़क कर कहा–“भाग जा यहाँ से! जूठे बर्तनों के अंबार पड़े हैं। नल के नजदीक बैठकर माँज उन्हें। बड़ी आई है पास का काम करने! फूहड़, बदतमीज।”

अमियाँ सकपकाती चली गई और अपने दोनों बच्चों को जूठे बासी भात पर जूझते हुए छोड़कर बर्तनों को माँजने में भिड़ गई। आँखें डबडबाई थीं और मानस पट पर स्मृतियों की अटूट रेखाएँ खिंच आईं–पहली शादी की रात–माँ ने घर की देवी के चौरे पर सर पटक कर आशीर्वाद माँगा था कि उसकी बेटी का सुहाग अचल रहे। भोर में बिदाई के समय सुहागिनों ने अपने-अपने सिंहोरे से उसे सिंदूर लगाकर उसके आजीवन सुहाग के लिए दुआ माँगी थी। और अमियाँ गद्गद हो उनकी छाती से लिपट गई थी। उसकी आँखों में आँसू थे और अधरों पर फीकी मुस्कान!

वह ससुराल आई। इन पद्धतियों को फिर से दुहराया गया। उसे पति का स्नेह मिला और सास-ससुर का आशीर्वाद भी। दिन कटने लगे–हँसी से भरे दिन थे, उमंगों से खिली रात। साल भी न गुजर पाया था कि गोद में एक जीवंत गुड्डा आ पड़ा। बालिका से कुलवधू बनी और फिर जननी। आँगन में गाँव की स्त्रियों ने बधावा गाया और बुढ़ियों ने बहू के लक्षणों को सराहा–बड़े अच्छे पैर की है, साल खतम होते ही पुत्र जन्मा।

उसका लल्ला घर का खिलौना बन गया। हर एक की गोद में खेलता, हर एक का प्यार पाता। फिर उसने बाल लीला दिखानी शुरू की। पलंग पर कलैया लेने लगा, हाथ-पैर उछाल-उछाल कर छाती के सहारे चलने लगा और फिर पैर पर खड़ा हो दौड़ने भी लगा। दौड़ता-दौड़ता वह माँ की छाती में समा जाता और वह अपने को धन्य समझती।

दिन पर दिन लदने लगे। फिर महीने बीते, साल बीते और माँ का लल्ला पाठशाला में दाखिल हुआ। उधर बच्चे ने कलम पकड़ी, इधर दादा ने पलंग पकड़ा। शीतला का भयंकर प्रकोप! गाँव के गाँव साफ होने लगे। खेतों को कब्रिस्तान में परिणत कर दिया गया। सात दिनों के बाद दादा चल बसे। मगर उनका पलंग खाली न रहा। उनके उठते ही बूढ़ी दादी भी आ पड़ी। आतंक और बढ़ा। पुत्र और पतोहू ने माता-पिता की अटूट सेवाएँ की मगर उन्हें प्राणदान न दे सके। दोनों उठ गए। मगर इतने पर भी खैर नहीं। माँ की तेरहवीं के दिन ही पुत्र को बुखार चढ़ा और दूसरे दिन से गोटियाँ उभर आईं। अमियाँ किसी अदृश्य आशंका से काँप उठी। वह घड़ी-घड़ी देवी के चौरे पर सिर पटक कर अपने सुहाग की भीख माँगने लगी और पति की सेवा में रात-दिन एक किए रही। परंतु पहले ही दिन उसने जो आँखें बंद कीं वह कभी खोल न सका! अमियाँ की सारी मिन्नतें असफल रहीं। भगवान की देन–उसके पति को मौत मिली और उसको जिंदगी। भविष्य के सुंदर सपने बिखर पड़े और वह सुध-बुध खो पत्थर की मूर्ति हो गई। पड़ोस में उसका एक देवर रहता था। उसने बड़ी सहानुभूति दिखलाई और बड़े भाई की लाश को अपने कंधे पर रखकर घर से बाहर निकाली। सुहागिन विधवा हो गई, कर्ज से लदी हुई उसकी जायदाद गाँव के महाजन के हाथ लगी और सुबह को सूखी रोटी तो शाम को उपवास, या रात में साग-भात तो सुबह को फाकामस्ती उसकी दिनचर्या हो गई। जो कभी चौखट नहीं पार कर पाई थी उसे पेट भरने के लिए घर-घर दौड़ कर पिसनी-कुटनी करनी पड़ी। उसका देवर कभी तरस खाता, तो कुछ अनाज या कपड़े दे देता। लल्ला की पढ़ाई तो बिल्कुल छूट ही गई थी। वह गाँव में मारा-मारा फिरता।

होली के दिन उसका देवर उस पर अनायास ही टूट पड़ा और अबीर से माँग तथा गोरे-गोरे गालों को लाल कर दिया। उसकी सुफेद साड़ी पर भी रंग के छींटे पड़े। वह ‘ना-ना’ करती घर में घुस गई। लल्ला तालियाँ बजाकर हँसते हुए चाचा का साथ देने लगा। गाँव की स्त्रियों ने ठठोली की–“रामू, तू विधुर है और यह विधवा! क्यों नहीं इसका हाथ थाम लेता। तुम्हारा घर बस जाएगा और उसकी जिंदगी निभ जाएगी।”

इन बातों को सुन कर अमियाँ सन्न हो गई! काटो तो खून नहीं। संध्या समय जब उसने देखा कि लल्ला नया कुरता-टोपी पहनकर सबों को अबीर-गुलाल लगाता चल रहा है, तो उसे अचरज का ठिकाना न रहा। उसने झट पूछा–“कहाँ से मिले ये नए कपड़े?”

“चाचा ने दिए।”

“हाय, हाय, यह तूने क्या किया। आखिर मुझे बर्बाद करके ही दम लेगा?”

उसने चट कुरते को फाड़कर निकाल फेंका और अबीर की झोली कुएँ में डाल दी। लल्ला बिलखने लगा और अमियाँ भी रात भर रोती रही, कभी चुप होती तो गुनगुनाने लगती–“ना जाने राम, कौन हुइहैं गतिया।”

होली के दूसरे ही दिन से रामू ने अमियाँ पर नजर गड़ानी शुरू की और वह बिचारी उसके साय से भी दूर भागने लगी। अब रामू उसके यहाँ अनाज भेजवाने में ज्यादा तत्पर रहता और प्रतिदिन लल्ला को मिठाइयाँ तथा खिलौना थमाता। अमियाँ उसकी चाल को भाँप गई और कई बार अनाज भेजने से मना भी किया मगर वह तो किसी की एक न सुनता। एक दिन संध्या समय, अमियाँ जब गाँव के कुएँ से पानी भर कर लौट रही थी, तो वह छेड़ बैठा–“भाभी क्यों अपनी जिंदगी गवाँ रही हो? मैं तो तुम्हें अपनाने के लिए तैयार बैठा ही हूँ। गाँव के पंच भी इस प्रस्ताव को स्वीकार कर लेंगे। केवल तुम्हारे हाँ की देर है।”

“छी:, आखिर आप क्या कह रहे हैं? मेरा धर्म…” वह दौड़ती घर में घुस गई।

अमियाँ को एक सुनहरे भविष्य का सपना दिखा-दिखा कर ललचाने से जब रामू असफल रहा तो उसने अपना दाव बदल दिया। उसने अमियाँ के चरित्र पर आघात पहुँचाना शुरू किया और गाँव के चंद शोहदों को मिला कर गाँव वालों को उभारने लगा। घूँघट ताने अमियाँ उनकी फबतियों को सहती और आँख के आँसू को आँखों में ही सुखा देती। उसकी बेबसी को किसी ने नहीं समझा। उसके सर पर किसी ने स्नेह का आँचल नहीं रखा। कुछ दिनों बाद उसकी गणना गाँव की पतित नारियों में होने लगी और घर-घर जाकर पिसनी-कुटनी करने की भी मनाही हो गई। अंतर की ज्वाला के उपरांत पेट की ज्वाला भी उभर आई और अक्सर लल्ला रात में भूख से तड़पता-बिलखता सो जाता। बेटे की तड़प माँ के लिए असह्य हो चली। सोची, रात में फाँसी लगाकर भाग जाऊँ इस पतितों के देश से।

लल्ला सो रहा था परंतु अमियाँ की आँखें तो आधी रात की नीरवता को ढूँढ़ रही थीं। मध्य रात्रि के उपरांत जब तेल का दीया हवा के झोंके से बुझ गया, तो वह धीरे से उठी और छप्पर के शहतीर में फंदा लगा कर लटकने ही वाली थी कि लल्ला जोर से चिल्ला पड़ा–‘माँ’। हृदय कड़ा वह शीघ्रता करना चाहती थी मगर वह आवाज उस घुप अँधियारी में तीव्रतर होती गई और माँ की छाती में समा गई। स्नेहमई के हाथों से फंदा छूट पड़ा और उन्हीं हाथों से वह लल्ला का सर सहलाने लगी।

अमियाँ की स्थिति दिनोंदिन नाजुक ही होती गई और उसे कुछ सूझ नहीं रहा था। लल्ला को देखकर उसकी छाती फट जाती। इस नन्ही उम्र में ही भूख की ज्वाला से वह झुलस चला था। एक दिन आँगन में बैठी जब वह अतीत के चिताभस्म को कुरेद रही थी, तो गाँव की कुछ गरीब स्त्रियाँ उसे घेर कर बैठ गईं और सहानुभूति दिखलाती हुई बड़ी आजिजी से बोलीं–“बहन, इस तरह तुम्हारे दिन कैसे निभ पाएँगे? जीना है तो किसी का हाथ पकड़ना ही होगा। सुहागिन की मर्यादा या विधवा का नेम तो अमीरजादियों के बहाने हैं, हम गरीबों को तो दो जून जो रोटी दे दे वही हमारे सुहाग का सौरभ है या जीवन दाता। किसी दाता का हाथ पकड़ ले नहीं तो लल्ला तड़प-तड़प कर मर जाएगा और इस पाप की भागिन तू ही बनेगी। हमारा रामू ही क्या बुरा है? गाँव का जाना-सुना एक खुशहाल जवान है।”

“मगर बहन, हृदय तो फट चुका!”

“दुर पगली, जान कर भी अनबूझ बनती है। जो भूख से तड़प रहा है उसे हृदय की पुकार या हौसलों के ज्वार से मुँह मोड़ना ही पड़ेगा। हमारे रोने या हँसने में अंतर ही कितना! हमारे आँसू तथा मुस्कान का मोल ही कितना।”

“जैसी तुम्हारी मर्जी–”

अमियाँ के गालों पर लोर टपक पड़े। दूसरे दिन रात में रामू ने अँधेरी कोठरी में अमियाँ की माँग को फिर से सिंदूर से भरकर उसे छाती से लगा लिया। रामू की आँखों में ताड़ी की मस्ती थी और अमियाँ की आँखों में आँसू की दरिया। गाँव की स्त्रियों ने आँगन में बैठकर मंगल गाया और लल्ला गरम-गरम जलेबियाँ खाने में मग्न रहा। शादी के बाद अमियाँ के शरीर को जो सुख मिला हो, मगर हृदय की शून्यता तो क्या खाक मिटती। माँग में सिंदूर है या धूल इसकी परवाह उसे नहीं। उसे तो जीना है, लल्ला को जिलाना है और इसीलिए सब नेम निभाना है।

रामू गाँव में राज मिस्त्री का काम करता था। लड़ाई के दिनों से ही इस पेशे में उसे काफी पैसे मिल जाते थे। एक दिन कलकत्ता के मकानों के एक ठीकेदार ने उसे कलकत्ता में रुपयों से घर भर देने की लालच दिखा वहाँ ले चलने के लिए राजी कर लिया। अमियाँ और लल्ला को भी उसके साथ जाना था! उसे गाँव छोड़ने की इच्छा न थी, मगर बेबसी!

कलकत्ते में एक अँधेरी गली के अंदर दो कमरे का एक पुराना मकान मिला। उसी में अमियाँ ने अपनी नई दुनिया बसाई। इस शहरू वातावरण में वह उभचुभ होने लगी। सुबह-शाम खाना बनाती, दिन भर उन्हीं कमरों में सड़ती रहती और रात में जब रामू शराब में चूर घर लौटता तो उसकी वासनाओं का शिकार बनती। लल्ला की पढ़ाई तो गाँव छोड़ते ही छूट गई थी। यहाँ तो वह गलियों के नुक्कड़ पर गोलियाँ तथा लट्टू खेलने में तल्लीन रहता था! इसी वातावरण में चंद महीनों बाद उसने एक दूसरे पुत्र को जन्म दिया। जन्मोत्सव में रामू इस तरह पी गया था कि दो दिन तक काम पर न जा सका। उसकी जेब जैसे-जैसे गर्म होती गई, वैसे ही उसकी पीने की आदत बढ़ती गई। अब तो दिन में भी ढाल कर वह पाँच मंजिले पर जुड़ाई करने बैठता। अमियाँ उसकी हालत को देखकर तरस खाती और घबराती भी। कभी टोकती, तो झिड़कियाँ ही सुननी पड़तीं।

एक दिन वही हुआ जो होने वाला था। उस दिन कुछ ज्यादा ढाल कर वह मचान पर चढ़ रहा था। चार-मंजिले तक पहुँचते-पहुँचते पैर काबू से बाहर हो गए और जो वे फिसले तो बेसाख्ता वह चौरंघी की चौड़ी सड़क पर ही मुँह के बल आ रहा। खोपड़ी चूर चूर हो गई। कुलियों में सनसनी फैल गई और उस दिन भर के लिए काम बंद कर दिया गया। ठीकेदार ने चार कुलियों के कंधों पर उसकी लाश उठवा कर घर पहुँचवाई। अमियाँ इस दृश्य को देखकर सिल हो गई। न आँख में आँसू, न हृदय में कंपन। बस मस्तिष्क में अतीत के चलचित्र और भविष्य के धुँधले दृश्य! लल्ला उसकी लाश पर लोट रहा था और गोद का बच्चा माँ के सूखे स्तन चूसने में लीन था। उसे जब एक बूँद भी दूध न मिला तो दाँत से स्तन को काट खाने लगा और अमियाँ “दूर हट रे हत्यारे” कहती उसे जमीन पर पटक कर वहीं धड़ाम-से गिर कर बेहोश हो गई। पड़ोस वालों ने राय दी–“ठीकेदार साहब, जाइए, उस लाश को फूँक दीजिए। भला इस अभागिन से क्या पूछना।”

अमियाँ की माँग दूसरी बार धुल गई। हाथ की चूड़ियाँ तो कब की फूट चुकी थीं। रामू के मरने के पहले उसकी खूँट में जो पैसे बचे थे उसी से उसने कुछ दिनों तक गुजर बसर की। मगर जब हाथ खाली हुआ, तो शहर में सलाम लेने को भी कोई तैयार नहीं। पेट में लाले पड़ने लगे, तो सोची गाँव लौट चलूँ। वहीं पिसनी-कुटनी कर गुजर कर लूँगी। मगर पैसे कहाँ जिससे गाड़ी का टिकट कटे और अकेली इतनी दूर का सफर तै करना उस-जैसी गँवारू स्त्री के लिए नामुमकिन था। पैसों के लिए ठीकेदार के सामने उसने हाथ पसारे और विनती भी की कि किसी कुली द्वारा उसे घर पहुँचवा दें। चट मूँछों पर ताव देता वह बोला–“अरी वाह, रामू चला गया, तो क्या अब तुझे पूछने वाला कोई है ही नहीं? बेटी मेरे घर चल! जब मैं गाँव चलने लगूँगा तो मेरे साथ चली चलना।”

ठीकेदार की सहानुभूति में उसे सच्चाई की झलक मिली। यह प्रस्ताव उसे जँच गया। वह झट उसके यहाँ चली गई।

ठीकेदार ने अमियाँ को सभी आर्थिक झंझटों से मुक्त कर दिया और उसके दोनों बच्चों को अपने पुत्र जैसा प्यार करता। उसके एहसान को चुकाने के लिए अमियाँ उसके घर की सारी गृहस्थी अपने ऊपर उठा ली और ‘इस हाथ ले, उस हाथ दे’ के सिलसिले में छ: महीने से ज्यादा गुजर गए। अमियाँ जब-जब घर जाने की कहती, तो किसी-न-किसी बहाने ठीकेदार उसे टाल देता। इधर कुछ दिनों से उसकी हरकतों को देख कर अमियाँ सशंकित-सी रहने लगी थी। कभी-कभी रात में पीकर जब वह लौटता, तो उसे छेड़ बैठाता और एक दिन तो ऐसा हुआ कि उसके गोद के बच्चे को चूमते-चूमते उस पर आघात भी करना चाहा। भोर में अमियाँ ने बड़ी आजिजी से कहा–“बाबू जी, आज मुझे घर भेजवा दीजिए। आखिर कितने दिन मैं इस तरह यहाँ पड़ी रहूँगी? हाथ पैर सबूत रहेंगे, तो कुछ गाँव में कमा ही लूँगी।” ठीकेदार ने तेवर बदलते हुए झट कहा–“बड़ी आई हो घर जाने वाली, इतने दिन खाकर यहाँ डकारती रही, उसका पैसा पहले लौटा दो। और रामू के क्रियाकर्म में सौ से अधिक ही लगे हैं, उसे भी रखती जाओ।”

वह सन्न रही। बड़ी मुश्किल से कह पाई–“गले में हँसुली बच गई है, उसे आप ले लें।”

ठीकेदार ने रुख बदल कर फिर कहा–“अरे पगली अनबूझ न बन। कुलियों की टोली में जमाने से खबर फैल गई है कि अमियाँ को ठीकेदार साहब ने रख लिया है। दुनिया जानती है कि तुम अब मेरी पत्नी हो। भला अब किस मुँह से तुझे अपने घर से निकाल दूँ!”

“आखिर, यह आप क्या कह रहे हैं?”

“मैं वही कहता हूँ जो दुनिया कहती है। चलो आज शाम को काली माई के दरबार में फैसला कर दूँ”–कहता ठीकेदार काम पर चला गया।

रात में जब वह लौटा तो पीकर टर्र था। आँखें सुर्ख थीं और मुँह से दूकानी की दुर्गंधि निकल रही थी। घर में घुसते ही उसने शोर मचाया “अरी मेरी अमियाँ, जरा इधर तो आ! आ! देख तेरे लिए काली माई की प्रतिमा से सिंदूर उठा लाया हूँ।” अमियाँ डर कर घर में घुस गई और अंदर से किवाड़ बंद कर लिए। ठीकेदार को तो पलीते में जैसे बत्ती छू गई। लपक कर घर की ओर बढ़ा और किवाड़ पर ऐसी लात जमाई कि पुरानी किल्ली चट से टूट गई और दरवाजा खुल गया। अमियाँ भागने लगी तो उसने कस कर मारा और वह जमीन पर जा गिरी। नशे में बुत ठीकेदार उसकी छाती पर सवार हो उसकी माँग को काली माई के सिंदूर से भर दिया। फिर वह ठहाका मारता उठा और आँगन में बैठ कर रातभर नशे में नाचता गाता रहा!

इस नए जीवन को अमियाँ ने विधाता का तीसरा प्रहार समझ कर अपना लिया। न आँखों में नीर, न अधरों पर हँसी की फूहियाँ। आखिर उसके पास था भी कुछ अपना जिसके लिए वह हँसती या रोती, उसके पास न अपनी इज्जत थी और न मर्यादा; न सुहाग, न अभिलाषा, न आकांक्षा। हाँ, उसकी छाती को चूस-चूस कर पनपे हुए दो बच्चे जरूर थे जिनके लिए वह जिए जा रही थी, मिटी जा रही थी। मातृत्व का यह भारी बोझ उसके सर पर न होता तो वह कब की गंगा की धारा में विलीन हो गई होती।

विधि का विधान कोई समझ नहीं पाता। जिन बच्चों के लिए उसने सर्वस्व खोया वे ही कुछ दिनों बाद उसके तीसरे पति की आँखों की किरकिरी बन गए। एक दिन नशे के सरूर में ठीकेदार को सूझ गया कि लल्ला और उसका छोटा भाई कुछ उसके खून के कतरे की निशानी नहीं और बाद मरने पर न उसके नाम को ही उजागर कर पाएँगे वे। वे तो उसके उन रकीबों की निशानियाँ हैं जिनसे वह जन्नत में भी नफरत करेगा। बस गिर गए वे उसकी आँखों से। उनकी अब कोई पूछ नहीं, कोई बात नहीं। वे सड़कों पर खेलते रहते, माँ जो छिपाकर खिला देती, खा लेते और माँ जो छिपाकर पहना देती, पहन लेते। एक दिन बातों की लपेट में उसने कह भी दिया–“अमियाँ, ये तो गैर के बच्चे ठहरे, कोई मेरे नहीं। जब तक मेरा बच्चा जन्म नहीं ले लेता, ये कौड़ी के तीन भी नहीं। मेरे बच्चे के जूठन पर ये पल जाएँगे।” तीन पति की पत्नी बन कर अमियाँ अब पुरुषों की कमजोरी को पहचान गई थी। उसने मुँह सी लिया और रात-दिन एक तीसरे पुत्र के लिए मिन्नतें माँगती रही। उसकी बेकली चरम सीमा पर पहुँच गई थी। उसकी जिंदगी एक खिलौना बन गई थी, जो चाहे खेल ले, जो चाहे तोड़ दे। शरीर तो बस मिट्टी का एक पुतला था। और हृदय उसके जीवन की विराट शून्यता का प्रतीक।

अमियाँ की बेबसी पर विधाता भी शायद पिघल पड़ा। कुछ दिनों बाद उसे तीसरा पुत्र हुआ। अमियाँ ने सुख की साँस ली। सोची इस तीसरे के साथ उन दो का जीवन निभ जाएगा। उन्हीं के भाग्य से इसका जन्म हुआ। लल्ला और उसके छोटे भाई नए बच्चे के साथ खेलने के लिए सजाए-सँवारे गए। लल्ला बड़ा था। वह बच्चे के कपड़े साफ करता, दूध गरम करता और सुबह-शाम गोद में लेकर इधर-उधर घूमता भी! लेकिन यह लाड़-प्यार ज्यादा दिन तक न चल सका। चार-छ: महीने बाद ही ठीकेदार ने उनके प्रति अपना बर्ताव बदल दिया और वे फिर बिना माँ-बाप के बच्चे हो गए। अमियाँ के लिए यह बात असह्य हो गई। उसने विरोध किया तो ठीकेदार जामे से बाहर हो गया और गोद से नन्हे बच्चे को छीन कर उसे पीटता घर से बाहर निकाल दिया। वहाँ से निकल कर वह एक सेठानी के यहाँ काम करने लगी और वहीं दोनों बच्चे माँड़-भात पर जीने लगे।

आज इन स्मृतियों के जाल से जब वह निकली तो काफी दिन चढ़ आया था। वह फड़फड़ा कर उठी और बर्तनों को लेकर रसोईघर की ओर चल पड़ी, तो वही कड़कती हुई आवाज फिर सुनाई पड़ी–“हत्यारिन, भागकर यहाँ चली आई है। गोद के बच्चे का जरा भी ख्याल नहीं। रो-रोकर बेचारा काँटा हो गया है और तू यहाँ मजे मार रही है। चल, बच्चे को दूध पिला। बड़ी चली है भागने वाली!” बच्चे का नाम सुनते ही वह उसी घड़ी चलने को तैयार हो गई तो सेठानी ने बड़े कर्कश स्वर में कहा–“ठीकेदार साहब, इस बुढ़िया पर क्या रोब जमाते हैं। रहती कोई सुघड़ जवान तो चखा देती मजे आपको। किसी के घर में जाकर बस जाती और आप रह जाते हाथ मलते हुए।” सेठानी की बातें अभी खतम भी न हो पाईं थीं कि अमियाँ ने भर्राये हुए स्वर में झट कहा–

“माँ जी, पाँव पड़ती हूँ, मुझे ऐसा न कहें। आज आज्ञा दें, फिर सेवा में हाजिर होऊँगी।”

सेठानी चुप हो गईं और अमियाँ किसी कल्पना से काँप उठी। उसने अपनी लटों को चट घूँघट तले छिपा लिया और उसी पाँव ठीकेदार के साथ चल पड़ी। उसके ओठों से बरबस निकल पड़ते–“ना जाने राम कौन होइहैं गतिया।”


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Artist Name: Nandalal Bose
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उदय राज सिंह द्वारा भी