खुशबू के शिलालेख

खुशबू के शिलालेख

निमेष :

आज दिनभर एक नदी बहती रही थी मेरे भीतर। मन फुँकता रहा था आवेग की तरह और भीतर में एक सन्नाटा पसरा हुआ था, रहम की तरह। फिर शाम दर्द से टूटी हुई लकड़ी की तरह आई थी और मेरे करीब बैठ गई थी। मैं उसे देखता रहा, देखता ही रहा कि तब तक वह मेरे भीतर की नदी में उतर गई। उसके परिधान किनारे पड़े रहे, हवा के झोंकों से रह-रहकर काँपते हुए।

‘निमेष, जब तुम यहाँ नहीं होगे, बड़ा खाली-खाली-सा लगेगा।’–मेरे भीतर की नींद से जैसे जागकर तुम्हारी उदास, काँपती आँखों ने झाँककर कहा था।

मैंने उन उदास आँखों की तहरीर को हौले से चूम लिया था खुशबू की तरह और वो आँखें मेरे रोम-रोम में पैवस्त हो गई थी दर्द की तरह।

अपनेपन की तरह इन आँखों ने पिछले दिनों मेरे भीतर जो बारिश कराई थी, उसकी झड़ी आज भी बदस्तूर जारी है। ‘रैगिंग गार्डेन’ के बीच खड़े भारी पेड़ की छाया में बाहर की बारिश से बचते और भीतर की बारिश में भीगते हम–मैं और श्वेता–बंद थे चुप्पी की तरह।

तभी तूफान की कसमसाहट ने तुम्हारी चुप्पियों के तमाम बंद खोल दिए थे।

‘निमेष! यह बिजलियाँ जो कौंधती हैं, वो कहीं-न-कहीं गिरती तो होंगी ना? कोई-ना-कोई जलता तो होगा ही इनकी आग में?’

‘अब ऐसा नहीं होता श्वेता। अब हर जगह लाइटनिंग कंडक्टर जो लगे होते हैं। अब तो…’

‘लेकिन हर आदमी लाइटनिंग कंडक्टर तो नहीं होता निमेष। और वह बिजली की दहक को अपने भीतर समेट नहीं पाता। उसे तो जलना ही पड़ता है…तड़प-तड़प कर पिघलना और पिघलकर बहना होता है…’–मेरी बात को काटते हुए कहा था तुमने। मेरे भीतर तब बादल घिर आए थे और तुम्हारे भीतर बारिश होने लगी थी।

‘निमेष, तुम्हें मालूम है, मैं शादीशुदा हूँ…?’ -अप्रत्याशित संदर्भ से कटा हुआ प्रश्न था तुम्हारा।

‘हाँ, मैं जानता हूँ, तुम शादीशुदा थीं…’ ‘थीं’ शब्द पर खास जोर देते हुए मैंने कहा था।

‘निमेष, त…तुम क्या आदमी…?’

‘नहीं श्वेता, मैं आदमी ही हूँ। देवत्व की धारणा मुझे ओछी जान पड़ती है, क्योंकि ऐसा करके हम अपने आपको छोटा ही करते हैं।’

श्वेता :

‘देवत्व की धारणा मुझे ओछी जान पड़ती है, क्योंकि ऐसा करके हम अपने आपको छोटा ही करते हैं।’ मेरे मन के अंदर बरसती साँझ और पथराए पल को तुम्हारे इस विश्वास ने धूप की नर्म चादर ओढ़ा दिया था। मैं भरी-भरी थी, और तुम खाली-खाली। मैं खाली होना चाहती थी तुम्हें भरकर, लेकिन जब छह महीनों की पहचान दगा दे सकती है तो छह दिनों की पहचान पर कितना भरोसा करूँ! मैं कर सकती थी, करती, लेकि…! ये ‘लेकिन’ प्रश्नवाचक चिह्न-सा मेरे सामने खड़ा था जिसे कोष्ठक में बंद करके मैंने तुम्हारे सामने रख दिया था।

‘श्वेता! पूरी पुरुष जाति को तो कठघरे में मत खड़ा करो। हर इंडीविजुअल की अपनी आइडेंटिटी होती है। इंडीविजुअल मस्ट बी इंडीविजुअल, नॉट आइदर अ मैन ऑर वुमेन, नॉट अ सोसाइटी एंड अ कम्युनिटी…। छह महीनों की पहचान ने दगा की इल्म देकर तुम्हारे भीतर एक पूरे कौम के लिए नफरत की गर्म शहतीरों को फैला दिया, छह दिनों की पहचान, हो सकता है, तुम्हें वफा का इल्म सिखा दे…!’–तुम्हारी इस बात से कोष्ठक में बंद प्रश्नचिह्न खुल गया था और मन पर जैसे पूर्णविराम लग गया था।

बाहर बारिश के तड़पने का अंदाज और तीखा हो चला था। मैंने तुम्हारे मजबूत कंधों पर अपना सिर रख दिया था और ऐसा करके मैंने बारिश का ये तीखा, बेचैन करने वाला अंदाज भी जैसे तुम्हारे कांधे पर धर दिया था। उस घुमड़न में से एक ही बेचैन आवाज मेरे भीतर उतर रही थी, ‘श्वेता, तुम बोलो श्वेता, आगे क्या हुआ था…?’

निमेष :

‘यह छह महीनों की पहचान, जो तब मेरे भीतर रौशनी बनकर उतरी थी, उसका नाम था–रंजन सिंह…’ तुम्हारी आँखें दूर, कहीं धूप के किसी अदेखे टुकड़े में उलझी थीं।

‘ये रंजन सिंह कौन…?’ मैंने धूप के उस टुकड़े को पकड़ने की कोशिश करते हुए पूछा था।

‘रंजन सिंह, मेरी जिंदगी का धब्बा’, तुम्हारी आँखों में धूप की जगह, सूरज की लाली उतर आई थी। तब मन में, सही-सही नहीं कह सकता, फिर भी ऐसी जरूर जागी थी कि काश…मैं उस लाली को आँख-भर पी पाता।

‘निमेष…जानते हो तुम…आय वॉज चीटेड…? वह मेरे घर आता था। हमेशा उदास-उदास रहा करता। टूटा-टूटा-सा,थका-थका-सा, हारा-हारा-सा। अपने जीवन के कठोर पलों के बारे में उसने बताया था मुझे…कि कैसे वह संघर्ष कर रहा है, अपने अंदर से, और अपने बाहर से भी। शायद तभी मेरे मन के किसी कोने में इस आदमी के लिए प्यार जागा था, और बड़ी शिद्दत से जागा था। मैंने खुद को तभी छोउ़ दिया था बहने के लिए प्यार की इस नदी में।’

‘पापा दिल्ली से कभी-कभी छुट्टियों में ही आ पाते, इसलिए उन्हें उतना ही मालूम होता, जितना मम्मी उन्हें बताती। मम्मी को तो सारी बातों का पता था ही, जया और मनु भी, जो मुहब्बत के लिहाज से कम उम्र की थी, हमारी एक-एक हरकत पर सवालिया निगाह उठाती थीं।’

‘और तभी फैसला किया था मैंने…, मैंने और रंजन ने मिलकर… या शायद अकेले रंजन ने…। शादी का फैसला…। दस हजार रुपए दिए थे मैंने उसे मंगलसूत्र के लिए। फिर रातों-रात हम राँची पहुँचे थे…’ तुम्हारी आँखें झलमला आई थीं। मेरे हाथ आगे बढ़े थे, पर उस आगे बढ़े हाथ को बड़ी कोमलता से बरज दिया था तुमने…। श्वेता की यह घबराहट निमेष को अच्छी लगी। उसे बड़े जोरों की हंसी आई, ‘अरे नहीं भाई, वो वाला चक्कर नहीं…नौकरी का चक्कर…नौकरी का…’ श्वेता की घबराहट देख निमेष को जल्दी से बोलना पड़ा।

‘क्यों, क्या हुआ…? नहीं…पहले बोलो, चाय पियोगे या कॉफी…?’ अपनी घबराहट पर काबू पाने के उद्देश्य से श्वेता जल्दी से बोल पड़ी।’

‘चाय तुम बहुत बुरी बनाती हो, कॉफी ही ठीक रहेगी’, निमेष ने कुछ ऐसा बुरा-सा मुँह बनाकर इस बात को कहा कि श्वेता अपनी हँसी नहीं रोक पायी थी।

जब वह दो मगों में कॉफी लेकर लौटी तो निमेष किसी पुरानी पत्रिका के पन्नों में उलझा हुआ था।

‘कौन कहेगा कि ये जुलाई का मौसम है…सितंबर की सुबह जान पड़ती है’, श्वेता ने अपने बीच अचानक घिर आई खामोशी को तोड़ने के उद्देश्य से कहा। वैसे वह निमेष के इतनी सुबह अचानक आ जाने से आश्वस्त नहीं थी कि उसका आना सहज है। जरूर कोई बात है।

‘शाम में तो तुमसे मिलना हो नहीं पाता, सो सुबह ही आ धमका।’ निमेष ने अत्यंत सहजता से कहा था।

‘हाँ, तुम्हें बता नहीं पाई, मेरी इधरी नाइट-ड्यूटी चल रही है।’

‘तुम कुछ दुबली भी लग रही हो। क्या बहुत मेहनत करनी पड़ रही है?’

‘नाइट-ड्यूटी पहली बार कर रही हूँ न, ठीक से खाना-सोना नहीं हो पा रहा…इसी से लग रह है तुम्हें।’ श्वेता ने निमेष के सहज प्रश्नों के पीछे छिपी असहजता को ढूँढ़ने की कोशिश करते हुए कहा।

‘श्वेता, मुझे ऑफर आया है सागर विश्वविद्यालय से। मुझे ये नौकरी लेनी चाहिए ना…? वैसे भी भागमभाग की अभी की इस नौकरी से तंग आ गया हूँ मैं।’

नहीं…श्वेता को लगा, यह बात भी ऊपर से जितनी सहज दिखती है, उतनी है नहीं…? तो फिर क्या है जो वास्तव में निमेष उससे कहना चाहता है…!

निमेष अचानक गंभीर हो उठा था। बोला, ‘श्वेता, तुम चलोगी मेरे साथ…?’

श्वेता कुछ क्षण सोचती रही, फिर बोली, ‘मेरा मन खुद भी उचटता-सा लग रहा है निमेष…! कई बार अपने से ही सवाल करती हूँ कि यहाँ क्या रखा है मेरे लिए…किस बात के लिए रुकी हुई हूँ मैं यहाँ…? खुद को तो धोखा दे ही रही हूँ, शायद दूसरों को भी दे रही हूँ। नहीं निमेष, तुम नहीं समझ सकोगे।’

‘श्वेता, तुम हमेशा यही कहकर टाल देती हो कि मैं ये सब नहीं समझ सकता…। लेकिन ये भी किस हद तक सच है…?’

‘निमेष, मैं किसी को भ्रम में नहीं रखना चाहती। लोग क्या सोचते हैं मेरे बारे में, क्या प्रचारित करते हैं, इसकी भी मुझे परवाह नहीं; लेकिन चिंता तब होती है, जब अपने ऊपर से ही विश्वास ढीला होने लगता है।… मैं यह सोच रही थी कि इस तरह तुम्हें अपने साथ घसीटना कहाँ तक ठीक है…! तुम्हारे काम का भी इतना हर्ज होता है…’

‘एक बात कहूँ…?’ निमेष ने श्वेता की बातों को अचानक काटकर कहा।

‘निमेष…फिर राँची के वो तीन दिन और तीन रातों की कहानी कभी नहीं भुला पाऊँगी, कभी नहीं…। उस सुबह वॉशरूम से मैं कैजुअली बाहर चली आई थी। परदे की दूसरी तरफ रंजन के मम्मी-पापा थे। माँ भोजपुरी में बोल रही थीं इस बात से बेखबर कि पर्दे की ओट में मैं खड़ी हूँ, ‘तू गलती कर रहल बाड़अ बबुआ…। दुलहिन के सबे बता देबअ तबे ठीक रही…।’

‘झन्न…! मेरे भीतर कुछ ऊँचाई से गिरा और टूट गया। मैंने रंजन से कुछ नहीं कहा, लेकिन दो दिनों के भीतर उसने खुद ही सब कुछ मेरे सामने उगल दिया था कि उसने गलत लोगों का साथ पकड़ लिया है, कि अब उनका साथ छोड़ना संभव नहीं…वो लोग बहुत ताकतवर हैं…और ये भी कि उसका संबंध मेरे से पहले कई लड़कियों से रहा है, और अब इन सबसे पीछे लौटना मुमकिन नहीं…।’

‘घृणा से मेरा रोम-रोम उबल रहा था…इतना बड़ा फरेब…छल…। मैंने अपने-आपको जैसे पत्थर बना लिया था। फिर पापा को फोन किया। पापा आए और रंजन को ये समझा कर कि महीने-भर में मुझे वापस भिजवा देंगे, मुझे लेकर चले आए थे।’

लौटकर आने पर नीम बेहोशी की हालत में मैं सब देखती रही, जैसे कोई लाश अपना तमाशा देख रही हो–चूड़ियों को तोड़ा जाना…पाँव की बिछिया और मंगलसूत्र का उतारना, माँग के सिंदूर का पोंछा जाना…मानो किसी लाश के अंतिम संस्कार की तैयारी चल रही हो।’–तुम्हारी आँखों में कभी न रुकने वाली झड़ी लग गई थी, मानो वह अपने आसपास की तमाम चीजों को बहा ले जाएगी।

श्वेता :

‘श्वेता…लोहे को लोहा काटता है, जहर को जहर, ये सिद्धांत बड़ा ही अधूरा है। उस लोहे को काटने की जरूरत ही क्यों पड़े, जो किसी मशीन का अहम पुर्जा है। उसी तरह यदि आदमी जहर को पचा सकने की ताकत बटोर सके तो उसे जहर उतारने के लिए जहर की जरूरत ही क्यों हो…!’ तुम्हारी इस बात की गहराई को मैं थोड़ी देर तक समझ ही नहीं पाई थी। जबतक समझी तबतक तुमने मेरे चिबुक को पकड़कर मेरे माथे पर अपने होंठ रख दिए थे और तुम्हारी आवाज जैसे बहुत दूर से आ रही थी… ‘श्वेता…जिंदगी में माना कि बहुत से दर्द हैं, उदासी है, घुटन है, लेकिन उसके बाद भी दुनिया की सबसे हसीन चीज जिंदगी ही है। इसे जीने के ढंग आने चाहिए।’

श्वेता/निमेष : अंतः संगीत

सुबह की नर्म धूप ने अलसाकर जब अपने बदन का लिहाफ हटाया और बोगनबेलिया के फूलों ने पहली अंगड़ाई ली, श्वेता के फ्लैट की घंटी बज उठी। दरवाजा खोलते ही श्वेता चौंक उठी, ‘अरे तुम…मैं समझी कि तुम कहीं बाहर गए हो। तुम फिर आए ही नहीं! मैं भी उधर जा नहीं पाई। आओ, बाल्कनी में ही बैठते हैं। सुबह की धूप अच्छी लग रही है।’ श्वेता की आवाज की ताजगी ने निमेष को कहीं गहरे से छुआ।

‘नहीं…मैं तो यहीं था। दो दिन शाम में आया भी था, पर चक्कर…’

‘चक्कर…’ श्वेता एकबारगी काँप सी गई। बोली, ‘नहीं-नहीं…तब तो कमरे में ही बैठो…’

‘तुम मुझसे शादी कर लो…। विश्वास रखो, मैं तुम्हें किसी बात से नहीं बाँधूँगा…किसी भी चीज से नहीं…जब तक तुम्हारा जी चाहे, साथ रहना…जब जाना चाहो, चली जाना…मैं रोकूँगा नहीं….!’ निमेष की फैली हथेलियों, डबडबाई आँखों और उससे भी ज्यादा उसके चेहरे पर आकुल आमंत्रण का जो भाव पसरा था, उसे अनुभव कर श्वेता विचलित हो उठी थी।

‘निमेष….! इंद्रधनुषी जो रिश्ते होते हैं न, वे किसी नाम के मोहताज नहीं होते। उन्हें तो आँखों में बसी खुशबू से ही, दूर से पहचाना जा सकता है। और निमेष…तुम्हारी आँखों की खुशबू मेरी सबसे बड़ी धरोहर है, सबसे बड़ा संबल। इसके अलावा मुझे कुछ नहीं चाहिए। हमारा साथ रहना महत्त्वपूर्ण नहीं है, साथ होना ज्यादा मायने रखता है। हम अपने मोह से, जीवन की छलनाओं से कभी मुक्त नहीं हो सकते, पर अपने सुखों के लिए एक दूसरे को मुक्त देखने और मुक्त रखने में ही भलाई है।’

निमेष के हाथ क्षणभर को श्वेता की तरफ बढ़े, तब तक वह कॉफी के खाली मगों को उठाकर किचेन की तरफ बढ़ चली थी।


Original Image: Seated Man at the Table
Image Source: WikiArt
Artist: Elin Danielson Gambogi
Image in Public Domain
This is a Modified version of the Original Artwork


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किशोर सिन्हा द्वारा भी