पालनाघर

पालनाघर

मुरारी बाबू हमीरपुर जिला के एक प्रतिष्ठित समाजसेवी कार्यकर्त्ता हैं। उम्र तो पचहत्तर के पड़ोस में है मगर अभी भी समाजसेवा में अगली पाँती में ही रहना चाहते हैं। दिल क्या चाहता है यह तो वही जानें मगर किसी सभा-परिषद में उनकी नजर तो बराबर अगली ही कुर्सी पर रहती है। हमारे हरिजन-सेवक-संघ को केंद्रीय बोर्ड से आदेश मिला कि हमीरपुर शहर में भंगियों की संख्या बहुत ज्यादा है इसलिए हमारी भंगी-कष्टमुक्ति योजना के अंतर्गत वहाँ भंगी बच्चों के लिए पालनाघर खोले जाएँ ताकि भंगिनें जब अपने काम पर जाएँ तो उनके बच्चों की वहाँ देखभाल हो तथा उन्हें दूध भी दिया जाए। इस आदेश को कार्यान्वित करने के विचार से मैं एक दिन हमीरपुर पहुँचा। स्टेशन पर ही मुरारी बाबू से भेंट हो गई। वही चिरपरिचित चेहरा मगर उम्र की ढलान में इतना ही फर्क आ गया था कि सिर्फ दो भूरी-भूरी आँखों को छोड़कर सारा चेहरा सफेद बालों में ढँक गया था। उनकी चाल-ढाल तथा बोलने के तर्ज से मैं तो तुरंत ही उन्हें पहचान गया मगर वे मुझे देखकर जरा सकपका गए।

“वाह साहब! परेशानी तो मुझे होनी चाहिए थी मगर परेशान आप नजर आ रहे हैं। आखिर बात क्या है?”–मैंने बड़ी आजिजी से पूछा।

“अच्छा, तो आप हैं! संघ के मंत्री जी! माफ करेंगे, मोतियाबिंद ने मुझे तबाह कर दिया। आँख रहते हुए भी अंधा हूँ। अपने-गैर को पहचान नहीं पाता। लानत है ऐसी जिंदगी पर। बेटा, इस जाड़े में जब संघ की ओर से नेत्रदान शिविर हो तो मेरा ऑपरेशन अवश्य करा देंगे। बड़ा आभार मानूँगा आपका।”–वह रुआँसा चेहरा लिए मेरे सामने खड़े हो गए।

मैंने झट कहा–“वाह! आप इतने कातर क्यों हो रहे हैं? यह तो हमारा फर्ज है। आपका ऑपरेशन पहले ही दिन करा दूँगा–फिर तो बड़ी भीड़ हो जाती है।”

मुरारी बाबू ने चैन की एक लंबी साँस ली और वहीं प्लेटफार्म के बेंच पर बैठ गए। मैं भी उनकी बगल में बैठ गया। फिर देश की राजनीति और महँगाई पर चर्चा छिड़ी। वे सवाल और उसका जवाब खुद देते रहे। मैं चुपचाप उन्हें सुनता रहा। कुछ देर बाद उन्होंने अपने को कुछ समझाते हुए मुझसे पूछा–“अजी वाह! मैं तो अपनी ही कहता रहा। जरा आपकी भी तो सुनूँ! आखिर यहाँ कैसे आना हुआ?”

मैंने संघ की पालनाघर की स्कीम से उन्हें अवगत कराया। उनकी पथराई आँखों में चमक आने लगी। फिर जब सारी स्कीम उन्हें बताकर मैं चुप हुआ तो वह फड़कने लगे–“वाह साहब, वाह! क्या खूब! जिनकी जवानी, उनका जमाना। आज भंगियों पर आप ढल गए हैं। हमारे बाल-बच्चों को दूध मयस्सर नहीं मगर आप उन्हें दूध पिला-पिला कर आस्तीन का साँप पाल रहे हैं।”

मैंने झट टोका–“आखिर आप यह क्या ले उठे? आप शहर की हरिजनसेवी संस्थाओं के लीडर हैं। कोई सुन लेगा तो?”

मुरारी बाबू होश में आ गए। उनकी जबान पर कुछ देर को ताला पड़ गया। फिर कह पड़े–“आप चिंता न करें। मैं सब भार ले लूँगा। मैं भी नगर निगम का एक प्रभावशाली सदस्य हूँ। मैं निगम से जगह दिला दूँगा–पानी-बत्ती का पूरा इंतजाम रहेगा। बच्चे भी खूब जुटेंगे। दूध का भी प्रबंध करा दूँगा। आजकल तो दूध में सभी जगह पानी मिला दिया जाता है मगर मैं ऐसा प्रबंध करूँगा कि ग्वाला पालनाघर के सामने ही दूध दूह दे। वाह! क्या स्कीम है! गरीबों के बच्चों को शुद्ध दूध और हमारे बच्चों को–।” मुरारी बाबू ने अपने होंठों को अपनी उँगलियों से दबा दिया।

“वाह मुरारी बाबू, आप जैसे निष्काम समाजसेवी से मुझे यही उम्मीद थी। आपने तो कमाल कर दिया। मेरा भार अपने पर ले लिया। अब बुजुर्गों की हम इज्जत नहीं करते–अपने को बावनवीर समझते हैं। मगर आपजनों में आज भी जो उत्साह और उमंग है उसकी जितनी भी प्रशंसा की जाए वह कम ही होगी।”

मुरारी बाबू के चेहरे पर मुस्कान की रेखाएँ आतीं और भागतीं मगर उस पर उगी हुई विशाल श्वेत केशराशि में सब छिप जातीं। मैंने आगे कहा–“मुरारी बाबू, पालनाघर में दस पालना, दस खटोला, एक आलमारी, गद्दा, तकिया, प्लास्टिक क्लॉथ, शीशा तथा खिलौने रखे जाएँगे। दो सेविकाएँ होंगी, बच्चों की दवा-दारू के लिए। हफ्ते में एक बार डॉक्टर आवेगा और केंद्र का एक प्रभारी भी रहेगा। पाँच सौ रुपये माहवार का बजट होगा और ढाई हजार का सामान खरीदा जाएगा।”

मुरारी बाबू नम्रता की मूर्ति बन गए। कहने लगे–“मंत्री जी, आप फिक्र न करें। आज से पालनाघर का भार मुझ पर रहा। मैं इसे चमका दूँगा। फिर आप देखेंगे कि आज भी मुझमें कितनी शक्ति छिपी हुई है। आपको शिकवा-शिकायत का कोई मौका ही नहीं दूँगा। भंगियों के मुहल्ले में हमारा पालनाघर खुलेगा और एक कमिटी भी बना लूँगा जो ऊपर से उसकी देखभाल करेगी। आप निश्चिंत हो वापस हो जाएँ। अब सामान भेजने की व्यवस्था करें, इधर मैं जगह ढूँढ़ता हूँ।”

मैंने सोचा कि अब शहर जाने की क्या आवश्यकता? स्टेशन पर ही सारी बातें तय हो गईं–अब गली-गली कार्यकर्त्ता खोजने की कोई जरूरत नहीं। जब इतना कर्मठ व्यक्ति पहले ही मिल गया तो अब आगे दौड़-धूप करने से फायदा? मैं वहीं से दूसरी गाड़ी पकड़ संघ के मुख्य कार्यालय लौट आया।

दूसरे दिन प्रभारी परमानंद जी को बुलाकर स्कीम की सारी बारीकियों से उन्हें अवगत कराया और समझाया कि हर नई स्कीम को लागू करने में दिक्कतें पेश होती हैं मगर लोकमानस तथा अपनी सेवा के बल पर सारी दिक्कतें दूर हो जाती हैं और अपना रास्ता साफ दीखने लगता है। परमानंद जी संघ के पुराने कार्यकर्त्ता हैं और उन्होंने बड़ी दिलचस्पी और उत्साह दिखाया। और जब मुरारी बाबू ऐसे समाजसेवी का योगदान उन्हें प्राप्त है तो फिर और क्या कहने! सोना में सुहागा है! स्कीम के मुताबिक मैंने सारा सामान खरीदवा दिया और एक दिन सारा सामान ट्रक पर लादे परमानंद जी हमीरपुर पहुँच गए।

मुरारी बाबू ने नगर निगम से पालनाघर खोलने के लिए एक सुंदर जगह दिला दी। उसे साफ-सुथरा कराकर प्रभारी महोदय ने चूना-गरदानी कराया और सारे सामान सजाए-सँवारे गए। पालनाघर के उद्घाटन के दिन भंगियों ने बंदन-वार, अशोक की पत्तियों का मेहराब तथा केले के स्तंभ लगाए। मुरारी बाबू ने नगर निगम के अध्यक्ष से टेप कटवा कर विधिवत उद्घाटन करवाया और फिर भाषण देने लगे–“बंधुओ! भंगियों की सेवा के लिए यह पालनाघर खोला जा रहा है। हम आज से उनके बच्चों को शुद्ध दूध देंगे तथा उनकी दवा-दारू की निःशुल्क व्यवस्था करेंगे। उन्हें हमारी बालसेविका तरह-तरह के खिलौनों से खेलाएँगी भी–जब उनकी माँ शहर की सफाई में व्यस्त रहेंगी। यह स्कीम शहर में पहली बार आई है इसलिए इसे आपका भरपूर सहयोग अपेक्षित है।”

करतालियों की तुमुल ध्वनि के बीच मुरारी बाबू का भाषण समाप्त हुआ और फूलों की माला से भंगियों ने उन्हें ढँक दिया। फिर नगर निगम के अध्यक्ष महोदय का भाषण हुआ। उन्होंने अपने भाषण में मुरारी बाबू की सेवा और लगन की भूरि-भूरि प्रशंसा की और स्कीम को सफल बनाने हेतु निगम की सेवाओं को संघ के हवाले किया। निगम के अध्यक्ष महोदय तथा मुरारी बाबू द्वारा बच्चों को दूध बाँटने के बाद सभा विसर्जित हुई।

दूसरे दिन से बड़े जोश-खरोश के साथ मुरारी बाबू प्रभारी महोदय को लेकर भंगियों की कॉलोनी में निकल जाते और उनके बच्चों को पालनाघर में सुलाने तथा दूध पिलाने के लिए उनकी माँ सहित बुला लाते। भंगिनें यह सार-सरंजाम देखकर भयभीत हो उठतीं। जिन्हें टूटी खाट भी मयस्सर नहीं उन्हें यह गावतकिया और तोशक, फैंसी पालना तथा खटोला! वे अचंभे में पड़ जातीं। मुरारी बाबू परमानंद जी को समझाते–“घबराइए नहीं, इनका संस्कार बदलना है, धीरे-धीरे सब ठीक हो जाएगा। बीस न सही–दस ही बच्चे आएँ–आने दीजिए उन्हें। बाल-सेविका को उनके मुहल्ले में भोर-तड़के ही भेजना होगा–आदत जो डालनी है उनकी।”

पंद्रह दिनों के बाद प्रभारी जी भोरे कार्यालय में पहुँचे। चेहरे पर परेशानी दीख रही थी। मैंने हालचाल पूछा–“कहिए, परमानंद जी, सब खैरियत तो है। मुझे तो रिपोर्ट मिली है कि आपका पालनाघर बड़े मजे में चल रहा है। बस, यही उत्साह-उमंग बनी रहे।”

“मंत्री जी, पालनाघर तो ठीक चल रहा है मगर कदम-कदम पर झंझटों का सामना करना पड़ रहा है।”

“प्रभारी महोदय, नए काम में ऐसा होना कोई नामुमकिन नहीं। मगर एक बार जब गाड़ी लीक पकड़ लेगी तो मंजिल साफ-साफ दीखने लगेगी। कहिए बात क्या है?”

“पहली दिक्कत तो यह है कि भंगिनें हमें सहमी हुई दृष्टि से देखती हैं। पालनाघर वाला बच्चा कहीं उनके घर पर बीमार पड़ जाता है तो कुछ न पूछिए, चिल्लाने लगती हैं–ना बाबा, ना, मैं अब अपना बच्चा वहाँ नहीं भेजूँगी। वहाँ भूत-प्रेत लग जाता है–मेरा बबलू तो मरने से बचा। वह बालसेविका कीचिन है, कीचिन! भर पाई मैं–मेरा बबलू मेरी छाती का ही दूध पीकर संतोष कर लेगा।”

“तब?”

“तब क्या? इस अंधविश्वास से जूझ रहा हूँ। देखिए, क्या होता है। पहले तो पंद्रह तक बच्चे पहुँच गए थे मगर अब पाँच ही रह गए हैं। सदर अस्पताल के बड़े डॉक्टर साहब को ले जाता हूँ, ढेर सारी दवाइयाँ खरीद दी हैं मगर क्या मजाल कि वे दवाइयाँ उन्हें खिलाएँ! डॉक्टर से छाती-पेट दिखाना तो कभी भी संभव नहीं।”

“खैर, घबराइए नहीं। समाजसेवक को समाज में फैले अंधविश्वास को मद्देनजर रखते हुए काम करना है। आप लगन और उत्साह से भिड़े रहें। देखिएगा–एक नहीं, दो-दो पालनाघर चलेंगे हमीरपुर में एक दिन।”

“मंत्री जी आशा ही पर तो मनुष्य जीता है। मैं तो आपकी आज्ञा का पालन कर ही रहा हूँ। भागूँगा नहीं। आसमानी भूत को भगाकर ही रहूँगा।”

“तो दूसरी दिक्कत क्या है?”

“मुरारी बाबू एक दूसरी समस्या हैं। पहले तो बालसेविका की बहाली पर ही चख-चुख चली, मगर डॉक्टर की बहाली पर तो आगबबूला हो गए। एक लड़का बीमार हो गया था–जब उसे दिखाने डॉक्टर को लेकर पहुँचा तो लिए हम दोनों को लखेद। मैं तो बगल हो गया मगर डॉक्टर साहब साइकिल पर सवार हो जो भागे तो अब हमारे यहाँ आने का नाम नहीं लेते। अब तो वे हमसे खार खाए बैठे हैं। रात-दिन पालनाघर की शिकायत करते हैं।”

“तो ऐसा मुरारी बाबू ने क्यों किया?”

“क्या बताऊँ, वह किसी अपने रिश्तेदार को पालनाघर के डॉक्टर बनाना चाहते रहे मगर वह डॉक्टरी फेल है। मैंने उज्र किया तो उसी दिन से वह मुझसे नाराज हो गए। अब रोज मुझसे हिसाब माँगते हैं और पैसा कैसे आ रहा है और कैसे खर्च हो रहा है–इसका पूरा ब्योरा चाहते हैं।”

“आप मुरारी बाबू से झगड़ा न करें–सामंजस्य स्थापित करें। एक दिन उन्हें हमारे पास भेज दें। मैं उन्हें सारी बातें समझा दूँगा। शुरू-शुरू में गलतफहमियाँ हो ही जाती हैं।”

प्रभारी महोदय मुझसे कुछ असंतुष्ट होकर चले गए। जाते-जाते कहते गए कि सारा हिसाब-किताब जिला संघ की मीटिंग में हमें पेश करना होगा। और वे बैंक में खाता खोलने जा रहे हैं–वहीं सब पैसे जमा होंगे और वहीं से खर्च होंगे।

एक हफ्ते बाद मुरारी बाबू हमारे कार्यालय में पहुँचे। चेहरे पर के सभी उतार-चढ़ाव को दबाकर स्थितप्रज्ञ बनने की बहुत कोशिश कर रहे थे मगर सफल नहीं हो पाते। साफ-साफ झलकता कि वह बेताब हो रहे हैं–अब भड़के, तब भड़के! प्रणाम-बंदगी के बाद मैंने पूछा–“कहिए, आपका पालनाघर कैसा चल रहा है? सुना, आपने बड़ा उत्साह दिखाया है।” इतना कहना था कि वे भभक पड़े–“मेरा नहीं, आपका यह पालनाघर–आपके प्रभारी का यह पालनाघर।” मैंने झट उन्हें सँभाला–“आप इतने बेताब क्यों हो रहे हैं! कुछ बात तो बताइए। दुनिया में कौन सी ऐसी समस्या है जिसका हल नहीं?”

“मैं आपके प्रभारी के मातहत काम नहीं कर सकता। पैसा वह लें और बाँटें और मैं टका-सा मुँह लिए रहूँ–यह मेरे लिए बरदाश्त के बाहर की बात है।”–उनकी आँखें गुस्से में लाल हो गईं।

मुरारी बाबू का यह भयानक रूप मैंने कभी नहीं देखा था। लगा, वह मुझे ही खा जाएँगे। मैंने उन्हें समझाया–“मुरारी बाबू, समाजसेवा में कोई न किसी का अफसर है और न मातहत। सभी सेवक हैं–बस काम ठीक से चले–उन्हीं में से एक प्रभारी हो जाता है। संघ के नियमानुसार हम पैसे प्रभारी को ही ड्राफ्ट द्वारा भेजते हैं और उसी के ऊपर पैसे की सारी जिम्मेवारी रहती है। आप अपने क्षेत्र के अध्यक्ष हैं इसलिए आपकी राय-मशविरा से ही सारा काम चल रहा है और आगे भी चलेगा।”

मुरारी बाबू आपे से बाहर हो गए–“तो प्रभारी अपना पालनाघर–जहाँ बुझाए ले जाएँ। मेरे दिलाए घर में नहीं रख सकते। ये रही आपकी संघ की मेंबरी–।” और वह तैश में उठे और रिक्शा में सवार हो कुछ बुदबुदाते कार्यालय से निकल भागे। मैं अवाक हो उन्हें देखता रहा। उनका यह प्रचंड रूप तो मेरे लिए एकदम नया था।

दूसरे दिन प्रभारी महोदय मेरे निवास-स्थान पर ही भोर-तड़के की गाड़ी से पहुँचे। मैं लॉन में टहल रहा था। पूछा–“इतनी सुबह! आखिर बात क्या है?” वह घबराए हुए बोले–“मंत्री जी, आसमानी भूत से तो मैं परेशान ही था–अब इस समाजसेवी भूत को किस मंत्र से भगाऊँ–मुरारी बाबू ने आपके यहाँ से जाकर पालनाघर में ताला लगा दिया और भंगियों को भड़का दिया–खबरदार, इस पालनाघर में कोई भी बच्चा न जाने पाए। मैं जान दे दूँगा।”

मैं चुप हूँ। आकाश स्वच्छ है, नीलाभ और उदार। पूरब की ओर लालिमा फूटी पड़ रही है।


Image: Gipsy Children
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Artist: August von Pettenkofen
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