सभापति

सभापति

रायसाहब हुकुमचंद शहर के नामी-गिरामी रईस हैं। लाखों में उनकी पूछ है–हजारों में उनकी पैठ है। कौन ऐसी संस्था है जिसके वे सभापति या संरक्षक न हों! ऐसी बात न थी कि किसी फलाँ संस्था के वे सभापति न हों तो उनकी प्रतिष्ठा में कोई आँच आती। परंतु हाँ, जिस संस्था या सभा के वे सभापति होते उसके नाम में चार चाँद लग जाते। लक्ष्मी और सरस्वती की समान कृपा है उन पर। वाणी के वे ऐसे धनी हैं कि किसी सभा की सदारत करते तो अपने ओजस्वी भाषण से श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर देते। क्या भाषा और क्या भाव–दोनों का अभूतपूर्व मिश्रण रहता उनकी शैली में। किसी गोष्ठी में बैठते तो अपनी वाक्पटुता से सबको परास्त कर देते। कौमी एकता के वे खास हिमायतियों में हैं। क्या हिंदू और क्या मुसलमान, क्या ईसाई और क्या पारसी–सभी उनके खाने की मेज पर साल में अनेक बार भोजन करते और वे भी उनके तीज-त्योहार पर अपनी हाजिरी लगाने से बाज नहीं आते।

एक दिन टाउनहॉल में उनका भाषण सुनकर मैं मुग्ध हो गया। कौमी एकता सम्मेलन का अधिवेशन चल रहा था। वे बोल रहे थे–“हिंदू और मुसलमान, ईसाई और पारसी–सभी एक ही खुदा के बंदे हैं। धर्म तो एक बाहरी पोशाक है–हर को अलग-अलग पहचानने की एक कोशिश, मगर हर शरीर के अंदर तो एक ही रूह है–खुदा की एक ही रोशनी। फिर यह भेद कैसा? यह भेद जितना ही जल्द अभेद में परिणत हो जाए उतना ही सुंदर।” वे इसी लहर में एक घंटा बोलते रहे और बार-बार करतालियों से हॉल गूँजता रहा। मैं उनके भाषण से उस दिन बेहद प्रभावित हुआ।

सभा के बाद जब वे घर लौटे तो खाने की मेज पर उन्होंने अपने भाषण का अंश बड़े गर्व से अपनी पत्नी को सुनाया। उनकी पत्नी रुक्मिणी देवी आगबबूला हो पहले ही से बैठी थीं। बस, एकबारगी भभक पड़ीं–“अजी, चुप भी रहो। क्या अनाप-शनाप सभा में बक आए! यह भी लगन में कोई लगन है?”

“अच्छा, तो तुम्हें सब पता है! आखिर कैसे?”

“सभी नौकर-चाकर बातें कर रहे हैं।”

“उन्हें कैसे पता चला?”

“सुभानअली ड्राइवर ने पहुँचते ही सारी खबर नौकरों में फैला दी। बस फिर क्या था–आग भड़क गई। भला छोटी जात वाले कभी अंतरजातीय विवाह को तरजीह देंगे? हरगिज नहीं।”

“तुम भी क्या ले बैठी हो! भला तुम्हारे नौकरों के लिए मेरा भाषण हुआ था? सारी जनता ने मेरे भाषण को सराहा और करतालियों की आवाज से सारा हॉल गूँजता रहा!”

“तुम सिर्फ करतालियों की आवाज पर रीझ गए मगर मेरे पास जो जनता आती है–उसने तो तुम्हारी बातों को नहीं सराहा।”

“उनकी ऐसी की तैसी!”

तबतक बेटी मालती चिकन-रोस्ट बेकर से निकालकर पापा को परोसने चली आई तो रुक्मिणी देवी ने टोका–“अच्छा, अब चुप रहो। बच्चों को बरबाद न करो। भला उन पर ऐसे भाषण का क्या असर होगा?”

रायसाहब चुप हो गए। आगे कुछ बोलना उन्होंने उचित न समझा। मगर मालती कब चुप रहती! बोल पड़ी–“अम्मा! पापा पर बिगड़ रही हो? पापा ने ठीक ही तो भाषण दिया। मेरी सहेली अणिमा ने अंतरजातीय विवाह किया और दूसरी सहेली जया ने अंतरधार्मिक शादी कर ली।”

“लो सुनो, बेटी क्या सहक-सहक कर बोल रही है। और जाकर भाषण दो। या भगवान, घोर कलियुग आ गया। सारा संसार अब वर्णसंकर हो जाएगा। ये कलमुँहे तुम्हारी सारी सृष्टि बिगाड़ने जा रहे हैं। इसी वर्णसंकर की नौबत से बचाने के लिए भगवान कृष्ण ने सारथी बनकर महाभारत मचा दिया और आज के बुजुर्ग इसे ही तरजीह दे रहे हैं। सब सत्यानाश हो रहा है।” रुक्मिणी देवी बहुत गंभीर हो गईं। रायसाहब मुर्गी की टाँग चूसते हुए बिगड़ पड़े–“क्या बच्चों के सामने अनाप-शनाप बकती रहती हो, तुम्हें भगवान कब अकल देगा!”

“भला मुझ पर क्यों लाल-पीले हो रहे हो? मैं तो न तीन में न तेरह में। अपनी बेटी से लाज लगती है और भरी सभा में सबों की बेटियों को बरगलाने पर लगे हो।”

“रुक्मिणी, तुम बात समझती नहीं। इसी जात-पाँत, धर्म-अधर्म के चलते तो सारा देश आज बरबाद हो रहा है। हम टुकड़ों में बँटकर टुकड़ों के मोहताज हो रहे हैं। फिरकेवाराने झगड़े तथा जात-पाँत की तनातनी के चलते देश की इज्जत किस कदर मिट्टी में मिल रही है इसे तुम आँगन की चहारदीवारी में बैठी-बैठी क्या समझोगी! तुम्हारी खिड़की तो बराबर बंद रहती है। तुम्हें चहारदीवारी के बाहर देखने को दृष्टि कहाँ! मैं संसार घूमता हूँ–अपनी खिड़की खुली रखता हूँ–मैं सारी बातें समझ रहा हूँ। आज देश का कल्याण अंतरजातीय विवाह तथा अंतर-धार्मिक विवाह को प्रश्रय देने में ही है। तुम हिंदी का दैनिक तो पढ़ती हो। देखो, हर राज्य की सरकार ऐसे विवाहों पर इनाम तथा वजीफा दे रही है।”

रायसाहब अबतक एक मुर्गी चट कर चुके हैं। रुक्मिणी देवी ने मालती को डाँटकर वहाँ से भगाया और पतिदेव पर अपनी खीझ निकालने लगीं–“तुम अपने बच्चों को बरबाद कर दोगे। बेसिर-पैर की बात भला इनके सामने क्यों बकने लगते हो? सब तुम्हारी शह पाकर बहक जाएँगे। बुढ़ापे में भी तुम्हारी अक्ल की पिटारी बंद की बंद ही रह जाएगी। देखो, रात-दिन ऐसी शादियाँ हो रही हैं। तुम्हें भाषण देने को और कोई विषय नहीं मिलता कि रात-दिन इसे ही दोहराते हो? इतना राम का नाम लेते तो अबतक तुम्हें मुक्ति मिल गई होती।”

“मुक्ति हमें नहीं–तुम्हें मिलेगी। इसीलिए न रात-दिन माला फेरती रहती हो!”

“मिलेगी ही, मैं अधर्म का व्यापार गर्म नहीं रखती। मेरे राधकृष्ण मेरी आत्मा को, मिट्टी को अवश्य पार लगा देंगे।”

“तो भजो रात-दिन सीताराम-सीताराम, राधाकृष्ण-राधाकृष्ण। मोक्ष की तलाश तुम करो–मैं तो जनता की सेवा द्वारा मोक्ष प्राप्त करूँगा। जनता-जनार्दन की सेवा–निष्काम सेवा। और आखिर रुक्मिणी, तुम बात क्यों नहीं समझती? मैं कौमी एकता सम्मेलन का सभापति हूँ। भला मैं ऐसी बातों की अपने भाषण में चर्चा नहीं करूँगा तो कौन करेगा? मैं तो ऐसी शादियों के लिए पिता जी के नाम का वजीफा भी देने जा रहा हूँ।”

“हाय-हाय, हमारे ससुर जी-ऐसे धर्मात्मा पुरुष के नाम पर यह कुकर्म करने जा रहे हो! तुम्हें शर्म नहीं आती? उन्हें तो स्वर्ग में आराम से रहने दो।”

“अच्छा, अब तुम अंदर जाओ। मैं पी. ए. को बुलाकर अपनी डाक तो देख लूँ।”

रुक्मिणी देवी बकती-झकती अंदर चली गईं।

पी. ए. साहब दिनभर की डाक लिए पहुँचे। रायसाहब ने पूछा–“कहिए, सब आफीसियल डाक आप पढ़ गए? सब खैरियत तो है? जनता का काम ऐसा क्या उठा लिया कि अपना काम देखने को अब कोई फुर्सत ही नहीं। उफ, जान आफत में है। बेटे राजू को अमेरिका से अब चला आना चाहिए। पढ़ाई समाप्त कर वहाँ अब रहना कैसा! अब नौकरी वह क्या करने लगा, समय काट रहा है–यहाँ करोड़ों की संपत्ति की परवाह नहीं। एक ही बेटा और वह भी बात नहीं सुनता।”

“सर, सभी जगह की खबर ठीक है। चीनी के मिल में ऊख की सप्लाई गत वर्ष से इस साल ज्यादा है। नई सरकार ने जो गन्ने के मूल्य में वृद्धि कर दी है उससे लाखों लाख का फायदा एक रात में हो जाएगा–”

रायसाहब ने टोका–“हुँ, हूँ, फायदा क्या होगा–सभी चुनाव के लुटमार लूटकर ले जाएँगे। खैर, आगे बोलिए–”

“जी सर, कोटा के मुताबिक विदेश भी चीनी भेजा जा चुका। पेंट की फैक्टरी की बोर्ड ऑफ डाइरेक्टर्स की मीटिंग 15 तारीख को ऑफिस में है–समय 12 बजे दिन। डाइरेक्टरों के रहने का प्रबंध गजराज होटल में कर दिया गया है। बैलेंस शीट में आमदनी पारसाल से भी कम ही दिखाई गई है। बाम्बे कॉटन मिल में फिर स्ट्राइक हो गया–कल से। यह तार है–फोन भी–”

रायसाहब चौंक पड़े–यूनियन वाले चैन नहीं लेने देंगे। मैनेजर को अभी फोन करो कि गोली चलवाकर रिंग लीडर को मरवा दें। अब उन्हें कैद देने से काम नहीं चलेगा।”

“मगर सर, आग और भड़क जाएगी।

“भड़कने दो। सबों को भून दूँगा।”–रायसाहब का मूड खराब देखकर पी. ए. चुप हो गए।

रायसाहब गावतकिये के सहारे लेट गए और गंभीर मुद्रा में लीन हो गए। पी. ए. और डाक वहीं छोड़कर बाहर चले गए। रायसाहब अपनी आँखें मूँद कुछ देर चुप रहे फिर घंटी बजाकर पी. ए. को बुलाया और कहा–“अभी बाम्बे ट्रंक कॉल बुक करो और शामलाल मैनेजर से कहो कि कल के प्लेन से चला आए। अब उससे बातें करके ही कोई कदम उठाना ठीक होगा। वह मौका चूक गया। रिंग लीडरों को मरवाकर समुद्र में फेंक देना ही ठीक रास्ता था। खैर…।”

पी. ए. चले गए। रायसाहब फिर डाक देखने लगे। एकाएक नजर राजू की चिठ्ठी पर पड़ी। अमरीका एयरमेल का खत। सब पत्रों को दरकिनार कर इसे ही पढ़ने लगे। पत्र पढ़ते गए और उनके ललाट पर पसीने की बूँदें उगती गईं। एकाएक चेहरे का रंग बदल गया। दिल की धड़कन बढ़ गई। गुस्से में थर-थर काँपने लगे। जोर से पुकारा–“मालकिन, मालकिन, देखो गजब हो गया!”

मालकिन झट दौड़ी चली आईं–“हाय राम! आखिर क्या हुआ? सब खैरियत तो है?”

“साहबजादे का खत है।”

“या भगवान, हमारा बेटा खुशहाल तो है?”

“खुशहाली तो बेहद की है; हजारों-हजार डालर कमा रहा है। मगर सर पर भूत सवार है दूसरे धर्म की लड़की से शादी करने का। अँगूठी बदलने का रस्म पूरा हो गया। साहबजादे ने हमारी इज्जत को मिट्टी में मिला दिया। खानदान का नाम हँसा दिया। भला मैं दूसरे धर्म की बेटी की कोख से जन्मे बच्चे को गोद में खेलाऊँगा?”

रुक्मिणी देवी चुप रहीं। एक क्षण को उन्हें भी कुछ धक-सा लगा। मगर दूसरे ही क्षण उनका एकलौते बेटे का प्यार जग गया। झट हँसती हुई बोलीं–“आज तुम्हारी कलई खुल गई। मैं तुम्हारी तरह तंग नजर की न हूँ। राजू तैंतीस वर्ष का हो गया। मेरे लाख लिखने पर भी वह किसी लड़की पर रीझ न सका। मैंने जाने कितनी लड़कियों का फोटो उसे भेजा–मगर उसने एक न ध्यान दिया। फिर प्रयास किया कि किसी तरह किसी लड़की से प्रेम भी कर ले। मगर वह तो रात-दिन किताबों में ही नाक गड़ाए रहता–किताबों से जब फुर्सत मिलती तो टेनिस के खेल के मैदान में रहता। टेनिस का बल्ला और किताबों का अंबार–बस ये दो ही उसके साथी रहे आजतक। यारबाशी तो उसे कभी छू नहीं पाई। लाख पूजा-पाठ कराया, जप-दान किया कि उसका मन फिरे मगर वह तो मुड़ने से रहा। या भगवान, आज तुमने मेरे मन की बात रख ली।” वह राधाकृष्ण की मूर्ति पर लोट गई।

इधर रायसाहब का चेहरा बदरंग होता गया। चेहरे पर अनेक भाव आते-जाते रहे। फिर पुकार कर उन्होंने कहा–“ओ रानी, ओ, जरा उठो–कुछ मेरी भी सुनो। अभी मेरे ड्राअर से फौरन इनलैंड लेटर फॉर्म निकालकर उसे लिखो कि मैं उसे सारी जायदाद से वंचित कर दूँगा अगर वह अंतरधार्मिक विवाह करेगा। सब मिलें अपनी बेटी को दे दूँगा। नहीं तो फौरन हिंदुस्तान लौटकर हमारी जाति में विवाह कर ले। मैं भी अपनी आन का धनी हूँ।”

रुक्मिणी देवी ने समझाया–“क्या बेसिर-पैर की बातें करते हो? मेरे बेटे को किसी लड़की से आखिर प्यार तो जगा! भला मैं इस अवसर को खो दूँ?”

“तुम तो वर्णसंकर की पोषिका नहीं हो। इस बात को तुम बर्दाश्त करोगी?”

“तुम तो पोषक हो। यदि तुम बर्दाश्त कर सकते हो तो मैं भी कर सकती हूँ। मैं तुम्हारी सहधर्मिणी ही नहीं, सहकर्मिणी भी हूँ। फिर तुम घबराते क्यों हो? बेटा-बेटी की जाति पिता की जाति से मानी जाती है।”

“देखो, मजाक की बात न करो। अभी भी मामला बन सकता है। हमें कोशिश लगाकर इस अंतरधार्मिक विवाह को रोकना चाहिए। हमारा एकलौता बेटा–इतनी जायदाद का उत्तराधिकारी–मेरा जीवनभर का सब कियाधिया उलट रहा है। मुझे बचाओ–बचाओ, मेरी नाव मझधार में है। आखिर किसके लिए यह मान-प्रतिष्ठा-धन-हीरा-जवाहरात उपार्जन किया–उस दोगले पोते के लिए? मैं इसे कतई बर्दाश्त नहीं कर सकता।”

रुक्मिणी देवी ने देखा कि रायसाहब बहुत विकल हैं। इस समय उनसे कुछ भी कहना बेकार है। हिम्मत करके कहा–“अब आप सो जाएँ…”

“मेरा घर जल रहा है और मैं सो जाऊँ?–नींद तो हराम है।”

“मैं कंपोज की दो टिकिया दे रही हूँ। आप बेफिक्र सोएँ–कल फिर बातें होंगी।”

नींद की टिकिया देकर देवी जी ने मसहरी गिराकर बत्ती बुझा दी और दरवाजा बंद कर दूर अपने कमरे में जाकर दाइयों को बैठाकर धीमे स्वर में मंगल गाने और गवाने लगीं।

दूसरे दिन रायसाहब पार्क में टहलने नहीं आए। मेरा उनका साथ प्रतिदिन पार्क में होता। टहल कर हमलोग एक साथ उनके महल में जाते और चाय-बिस्कुट लेकर अखबार के पन्नों को उलटकर मैं अपने घर लौटता। मेरा माथा ठनका–शायद रायसाहब अस्वस्थ हों। क्या जाड़ा और क्या बरसात–हर मौसम में वह टहलने अवश्य आते। चीनी की फैक्ट्री उनके शरीर के अंदर तथा चंपारण के इलाके में दोनों जगह समान रूप से चलती रहती।

उस दिन भोर में उन्हें अपने निवास-स्थान के बरांडा में अकेले चाय पीते देखकर मैं बेहद परेशान हुआ। उनके चेहरे की दीप्त कांति मुरझा गई और वह वर्षों के बीमार-से लग रहे हैं। मैंने झट पूछा–“रायसाहब, मिजाज तो ठीक है? मैं पार्क से भागा-भागा आपसे ही मिलने चला आ रहा हूँ।”

“कुछ न पूछिए, मुन्ना बाबू, मैं तो लुट गया!”

“भगवान आपके दुश्मनों को भी यह कष्ट न दे। कुछ सुनूँ भी तो!”

“राजू अंतरधार्मिक विवाह करने जा रहा है–मेरी तो सारी जिंदगी के अरमान धूल में मिल गए। आगे और पीछे–हर ओर अँधेरा-ही-अँधेरा है। इसी धन और प्रतिष्ठा के अर्जन में सारी जिंदगी खपा दी–अब तो लोक और परलोक दोनों से गया!”

“राय साहब, आप इतने बुद्धिमान व्यक्ति हैं फिर भी इतने अधीर हो रहे हैं! गीता में भगवान ने ही तो कहा है कि जो मुझमें है वही हर एक प्राणी में है इसलिए विभेद के भेद को हमें दफना देना चाहिए। अभी कल ही तो आपने भरी सभा में हमें यही सीख दी और सिर्फ बारह घंटे में आपको क्या-से-क्या हो गया!”

“मगर मुन्ना बाबू, उसी गीता में तो वर्णसंकर की भी बात भगवान ने कही है।”

“तो यहाँ वर्णसंकर कहाँ हुआ–अपनी बीवी का बच्चा।”

“तो दोगला हुआ।”

“फिर वही दकियानूसी खयालात! आप कल शाम किस ऊँचाई पर थे और आज किस दोजख में जा गिरे!”

“क्या बताऊँ, आज कोई सिद्धांत–कोई उसूल कारगर नहीं हो रहा है। मन को जितना ही समझाता हूँ और उलझता ही जाता हूँ। सब पर हावी है हमारा संस्कार। आज राधाकृष्ण–सीताराम की भक्ति भी खोखली नजर आती है। किसी पल चैन नहीं। लोकनिंदा के भय से तो मैं रातभर में भीगी बिल्ली बन गया।”

“आप इतना दिल कच्चा न करें। मैं सारी तरकीब निकाल दूँगा। राजू विदेश में है। उसका दिल न तोड़ें। बड़ी मुश्किल से तो वह शादी करने को तैयार हुआ। भगवान यह शुभ दिन दिखाए तो! आप दोनों को झट बुलाइए। अपनी प्रथा से शादी करा दीजिए। वही बारात और वही महफिल। वही द्वाराचार और वही भात। आखिर मैं आपका पुराना दोस्त किस दिन काम आऊँगा! रायबहादुर मानिकचंद ने अपने बेटे की शादी इसी तरह मंडप में करा दी, नकुल सेन साहब ने भी वैसा ही किया। अमीरों की बात यों आई और यों गई होती है। मैं आपका समधी बन जाऊँगा। मेरे नए मकान में बारात लगेगी। कुछ कानाफूसी होगी मगर शादी के लकदक में सब खो जाएगी। तुलसीदास ने तो ठीक ही लिखा है–‘समरथ के नहिं दोष गुसाईं।’ कल से दरवाजे पर शहनाई बजने लगे। इसी लगन में मंडप में शादी हो जाए।”

मुन्ना बाबू ने तो सारी धारा ही बदल दी। रायसाहब खिल उठे। रुक्मिणी देवी ने गहनों तथा साड़ियों की खरीदारी का बाजार गर्म कर दिया। रायसाहब की धूल में मिली हुई प्रतिष्ठा फिर लौट आई। फैक्ट्रियों से उसी तरह रुपये बरसने लगे।

आकाशवाणी के सौजन्य से