वातभक्षा-2

वातभक्षा-2

शुरू से पढ़ने के लिए क्लिक करेंhttps://nayidhara.in/katha-dhara/vaatbhaksha/

देर रात तक श्यामल से अपने बचपन की बात करती रही थी वीथिका। खेल की बातें, लड़ाई झगड़े की बातें, पढ़ाई-लिखाई की बातें। सारा कुछ कहती वीथिका सचमुच जंगल किनारे वाले शहर में चली गई। फूल तितली बाँस का वन, बेंत और सागवान का वन, महोगनी और शीशम का वन याद आया। जंगल की जानलेवा आग याद आ गई। पिता का व्यवसाय ठप्प होना याद आया और याद आया उनका डिप्रेशन में चला जाना। तभी श्यामल के पिता जो वन के सर्वोच्च अधिकारी थे का तबादला राजधानी में हो गया था। यह इन दोनों बहनों के लिए उदासी का सबब था। उन सभी उच्चाधिकारी तथा अनेक छोटे कर्मचारियों को सजा के तौर पर तबादला कर दिया गया था, यह सब बाद में समझ सकी वीथिका। अपने घर के उस दुर्दिन को याद कर गला भर आया था वीथिका का। ऐसे सुख दुःख के बालसंगी को लेकर इतनी हल्की बात सोच भी कैसे सकते हैं सर! मैं समझ रही थी कि श्यामल, हँसी खुशी का वातावरण क्यों सृजित कर रहा था। उसे लगता था कि मैं कच्ची उम्र के उस दुःख को याद कर भावुक न हो जाऊँ। जानती है निधि, हमारा दुःख हमारे सारे सुखों से अधिक भारी था। मैं भी माँ पापा का मुँह, सारे के सारे अधिकारियों का मुँह देख मर्माहत हो चुप हो गई थी; तबादले के वक्त हम तीनों मिलकर बहुत रोये थे। और उस रोने वाले दिन के बाद हम इत्ते दिनों पर मिल रहे थे। सचमुच श्यामल एक संपूर्ण मानव है; बड़े सोच वाला मानव। दूसरे दिन दोनों पहुँची विभाग। पहले प्रो. शिवरंजन के विभागीय चैंबर में गईं। वहाँ विभाग के सभी लोग थे। इन दोनों के आने से रौनक बढ़ गई। एक मात्र सीनियर प्रोफेसर अस्मिता ने अपने पास की कुर्सी पर दोनों को बैठने का निर्देश दिया। एक प्रोफेसर ने ऊँची आवाज में कहा–

‘सुना है कि वीथिका जी का आलेख सबसे अच्छा था और ये बोली भी बढ़ियाँ।’

‘अपने नये विभाग का नाम ही तो रौशन हुआ न।’ दूसरे ने कहा–‘जिस विभाग की शोधार्थी इतना बढ़िया लिखेगी बोलेगी, वहाँ के सीनियर लोग कैसा बोलेंगे?’

‘सर शर्मिंदा न करें, सारा श्रेय हमारे गाइड को जाता है। खुद विभागाध्यक्ष सर ने लिखवाया…।’–वीथिका की बात स्वयं प्रो. शिवरंजन ने काट दी।

‘मेरा काम गाइड करना है सो किया, लिखा तो इसने स्वयं ही। मैंने थोड़ा सुधार दिया।’–कहा उन्होंने। सभी लोग एक दूसरे को देखकर मुस्कुराये। ऐसा कैसे हो सकता है कि स्टेनो टाईपिस्ट ने डिक्टेशन किससे ली आलेख की, वह न कहता। उसने सारी बातें बताई लोग समझ गये।

‘कोई बात नहीं सर, वीथिका थोड़ी ज्यादा विनम्र हो गई है।’

‘मुझे बतायें कि आपलोग ने मार्केटिंग की या नहीं?’–अस्मिता थीं।

‘ये हुई न असली बात।’–एक प्रोफेसर थे।

‘वीथिका मेरे लिये चिकन की साड़ी लाई है।’–निधि ने कहा।

‘आपलोग को मैम, यही सूझता है। सचमुच वीथिका और हिमाचल वाली रिसर्च स्कॉलर ने सत्र बंक किया और साड़ी खरीद लाईं।’–प्रो. शिवरंजन ने कहा। सब हँस पड़े। वीथिका संकोच से लाल हो गई।

‘तो सर आप नहीं गये बाजार? मैम के लिए साड़ी अपने लिये कुरता वगैरह लाते।’–एक ने कहा।

‘अब छोड़ो यार, और अस्मिता जी यह टॉपिक छोड़िये, कहीं मेरी मैडम के कानों में पड़ जाएगी तब मेरी शामत है।’–प्रो. शिवरंजन ने कहा।

‘और तुम निधि उन्हें मत अपनी साड़ी की खरीदारी पहुँचा आना’–उसकी बात पर सभी ने निधि को हिदायत दी।

‘न, न, मैं कहे बिना न रह पाऊँगी वरना मेरा पेट फूल जाएगा। मैं साड़ी पहन कर जाऊँगी और उन्हें दिखाऊँगी।’–निधि थी।

‘ऐसा न करना।’–अस्मिता ने कहा।

‘मैं ऐसा करने न दूँगी।’–वीथिका थी।

देर तक सब हँसते बोलते रहे। उस दिन काम की कोई बात नहीं हुई। लेकिन इन लोगों को अपना शोध प्रबंध लिखकर टाइप करवाना तो था सो अगले दिन गयीं। अपराह्न में, अक्सर सब अपने अपने काम में लगे हों तो प्रो. शिवरंजन भी अपने पुस्तकालय वाले कक्ष में रहते। वीथिका उनके पास और निधि अस्मिता के कक्ष में गईं।

‘सर, ये कुछ लिखे हैं मैंने, तीन अध्याय हैं।’–विनीता ने कहा।

‘रख दो, देख लूँगा। दो दिन बाद आना।’–कटा हुआ उखड़ा स्वर।

‘ठीक है सर, नमस्ते मैं जाऊँ?’

‘जाने की हड़बड़ी है तो जाओ।’

‘आपने कहा दो दिन बाद आने सो…।’

‘ओह, तो बैठ नहीं सकती।’

‘सॉरी सर।’

‘क्या सॉरी, आपका रवैया ठीक नहीं मिस वीथिका सान्याल।’

‘मैंने क्या किया है?’

‘आप अपने को समझती क्या हैं? मुझसे भागती रही हैं। क्यों?’

‘नहीं तो सर।’

‘मैं सब समझता हूँ। उस श्यामल दास के साथ आपकी चोंचलेबाजी मुझे खूब दिखाई पड़ रही थी। उसी ने मेरे खिलाफ आपको भड़का दिया है।’

‘वह क्यों भड़कायेगा सर, आप मेरे हेड हैं, मेरे गाइड हैं, वह क्यों भड़कायेगा? आपको गलतफहमी हुई है। वह अच्छे घर का अच्छा लड़का है।’

‘तो जाइये उसी से शोध पत्र दिखाइये। वहीं जाकर क्यों नहीं पढ़ाती हैं? जाइये।’–डपटा उन्होंने। तभी दरवाजे की घंटी बजी।

‘निधि?’–वीथिका बोली और रोने लगी। प्रो. शिवरंजन उत्तेजना में खड़े हो गये थे सो बैठ गये।

‘प्रणाम सर,’–निधि ने कहा।

‘मैंने समझा बातें हो गई होंगी, मेरी अस्मिता मैम से हो गई। मैंने देखने के लिए फाइल उनके पास छोड़ दी है। सो इसे साथ करने आ गई।’–निधि ने बिना पूछे सफाई दे डाली।

‘आओ बैठो निधि, और इन मोहतरमा को समझाओ–कि सिर्फ दुखी होने से नहीं होता है समाधान। कर्म पर डटे रहो कर्म पर।’

निधि चूँकि बाहर देर से खड़ी थी उसने सारी लड़ाइयाँ सुन ली थी। वीथिका ने इनके पॉजिसिवनेस के बारे में जरूर कहा था। अभी की बातों से यही तो जान पड़ता रहा था। उसने अपने हाथों से आँसू पोंछे और चलने को कहा।

‘सर इसे जाने दीजिये, हम साथ हैं।’

‘चलो छोड़ देता हूँ।’–उठे और नीचे आ गये। ये चुपचाप गाड़ी में बैठ गई और गाड़ी से ही आवास पर आ गयी। छोड़कर वे चले गये।

कमरे में आकर कपड़े बदलने, हाथ पैर धोने तक दोनों मौन थी। वीथिका ने चाय बनाई और आराम से बिस्तरे पर बैठ कर चाय पीने लगी। निधि कुर्सी पर बैठी। चाय खत्म कर, निधि अपने तख्त पर आकर लेट गई।

‘वीथि, मामला गंभीर है। मैं डर गई हूँ।’–निधि ने कहा।

‘क्या सोच रही हो, बताओ तो।’–क्लांत थी वीथिका।

‘जब वो तुमको डाँट रहे थे तब मैं वहीं थी। सोचा, शांत हों तो आऊँ लेकिन, मामला बदतर होने लगा तो मैं भीतर आ गई उनकी सारी बातें चौंकाने वाली लगीं।’

‘हाँ निधि, जान पड़ता है मैं उनकी जरखरीद गुलाम हूँ।’

‘पर वो उस बेचारे श्यामल दास के पीछे क्यों पड़ गये थे। कहीं इनके ही मन में कोई खोट तो नहीं है?’

‘कैसे कहूँ?’

‘चुपचाप रहकर पीएच.डी. तो कंप्लीट हो जाय। सो तू चुप ही रह।’

‘मैं तो चुप ही हूँ।’

‘दोनों ने दो दिन बाद बुलाया है। सोमवार को चलते हैं।’

‘जाना होगा ही, चाहे डरूँ या घबड़ाऊँ।’

‘किसी से राय विचार भी तो नहीं ले सकते हैं हम! चारों ओर शोर मच जाएगा। तुम्हारी ही भद्द पिटेगी।’–दोनों बेसहारा लड़कियाँ अपनी इस अवस्था से विचलित थीं। दुःख बहुत सारे ऊँच-नीच सिखाता है। वीथिका ने चुपचाप प्रो. शिवरंजन के सारे वाचिक प्रहार सह लिये। काम करती रही। प्रो. शिवरंजन की कृपा समझिये या परिश्रम वीथिका की पीएच.डी. की डिग्री इसे मिल गई। कॉलेज में अभी भी वी.सी. एपायंटमेंट के कार्य विस्तार पर चर्चा चल रही थी।

अगला दो सेमिनार प्रस्तावित था, एक लखनऊ में दूसरा हिमाचल में। लखनऊ वाले में शहरी स्लम पर आधारित विषय था तथा हिमाचल में जनजातियों पर आधारित। लखनऊ के सेमिनार में अस्मिता तथा निधि गईं और हिमाचल के सेमिनार में प्रो. शिवरंजन और वीथिका। वीथिका इस बार जाना नहीं चाहती थी। उसने कहा भी कि उसे माँ के पास जाना है, उसका स्वास्थ्य ठीक नहीं है। इन दिनों माँ यूथिका के साथ दिल्ली में थी। प्रोफेसर साहब ने उसके आग्रह को टाल कर कहा–‘तुम्हारी माँ दिल्ली में है न! वहीं से चली जाना।’–अब इसके पास कोई चारा नहीं था। जाने से पहले वीथिका और निधि प्रोफेसर साहब के आवास पर गये। गेट में घुसते ही रम्या जी के रियाज की स्वर लहरी सुन ये दोनों मंत्रमुग्ध थीं। लॉन में रखी कुर्सी पर बैठ चुपचाप सुनती रहीं।

‘कितना मीठा स्वर है न, निधि।’

‘हाँ, कमाल का गाती हैं।’–कहीं कोई नहीं था। रियाज समाप्त कर स्वयं रम्या जी बाहर आईं। ‘अरे तुमलोग यहाँ चुपचाप बैठी हो, कब आई?’

‘हमलोग चुपचाप बैठ कर आपकी स्वर लहरी का आनंद ले रही थीं। क्या स्वर्णिम स्वर है मैम।’–वीथिका ने कहा।

‘अरे यह तो रियाज कर रही थी। मुझे भी लखनऊ जाना है जब तुम वहाँ रहोगी निधि।’

‘वाह आंटी यह आपने लाख टके का समाचार सुनाया। हम सीधे स्टेज पर अपनी आंटी को सुनेंगे।’–निधि ने कहा।

‘लेकिन मैं तब हिमाचल में रहूँगी। बहुत बेकार लगेगा।’

‘तुम शिवरंजन के साथ जा रही हो। उसके साथ का सुख लो। बड़े-बड़े लोग तरसते हैं वीथिका। तुम भाग्यशाली हो।’–कहा रम्या ने।

‘जी मैम, पर आपको सुनती न!’

‘इस बार यहाँ भी कौमुदी महोत्सव के स्टेज पर मैं गा रही हूँ। तब सुन लेना।’… ‘सच मैम, यह हमारे लिये परम सौभाग्य की बात होगी।’

‘मैम क्षमा करेंगी, मैं हिमाचल से आपके लिए शॉल लाना चाहती हूँ। कौन सा रंग लें आऊँ? वह जो आपके पास न हो।’

‘रंग पूछ कर गिफ्ट लाओगी?’ वो हँसी।

‘आपकी पसंदगी पूछ रही हूँ।’

‘मस्टर्ड या मरून में कोई ले लेना। शिवरंजन से रुपये ले लेना।’

‘मैं स्वयं लाना चाहती हूँ, उनसे नहीं पूछूँगी। स्वस्ति है न, उसी के साथ जाऊँगी बाजार।’

‘अरे तो शिवरंजन नहीं लेगा क्या?’

‘मैम, वो तो सीनियर लोगों में बैठ कर वर्ल्ड के डेवलपमेंट पर बातें करते रहते हैं। हम उस बीच से चुपके से निकल जाते हैं।’

‘ठीक है, जैसी तुम्हारी मर्जी।’

पने कॉलेज में वीथिका ने फिर सेमिनार में जाने की अर्जी दी। प्रिंसिपल बहुत खुश हुईं। स्टाफ के सामने कहा–‘इसको देखो इसने छह महीने में दो सेमिनार में भाग ले लिया। आपलोग ध्यान नहीं देती हैं। बहुत बढ़िया वीथिका।’

‘नया विषय है, नये लोग हैं, अपना नाम दर्ज कराना है न! हम क्यों इतनी आपाधापी में रहें मैम?’–अर्थशास्त्र वाली ने कहा। बाहर निकली कि प्रो. शम्पा ने बुलाया अपने कक्ष में, वह साथ गई।

‘आओ बैठो वीथिका, तुम तो कभी दिखाई ही नहीं पड़ती।’–कहा।

‘विभाग के काम में उलझी रहती हूँ मैम।’

‘यह जरूरी है। किस जगह जा रही हो सेमिनार में?’

‘हिमाचल मैम।’

‘वाह, घूम फिर भी लेना। साथ में कौन है यहाँ के?’

‘हेड साहब हैं मैम?’

‘ओ? प्रो. शिवरंजन?’–मुस्कुराई विद्रूप से। वीथिका सहम गई पता नहीं क्या बोलेंगी।…‘जी मैम।’

‘काफी साथ मिलता है तुम्हें अपने गाइड का। जर्मनी में मेरी गाइड थी मैडम डिसिल्वा। बहुत प्यार करती थीं। मूडी भी थीं। मैंने उनको खुश करने के लिए शराब पीनी शुरू कर दी। सिर्फ साथ देने के लिए, अब छूटती नहीं। सो बेबी, याद रखना, गाइड के अजीबोगरीब शौक में उलझ मत जाना।’–वह हँसी।

‘सर में ऐसी कोई आदत तो नहीं है मैम।’–वीथिका ने कहा।

‘यू नेवर नो।’–चलो घर चलते हैं। यहाँ स्मोक करना नहीं है चलती हो?’

‘नहीं मैम तैयारी सारी पड़ी है।’–वीथिका ने कहा। तभी एन.सी.सी. की कैप्टन जूली राणा आ गई।

‘नमस्ते मैम’–उसने शम्पा के बाद वीथिका का भी अभिवादन किया। जूली राणा ने इस वक्त एन.सी.सी. का यूनिफार्म पहन रखा था, चाल भी वैसी ही थी। परंतु हिंदी ऑनर्स की यह लड़की लड़कों जैसे कपड़े पहनती। कॉलर वाला कुरता और पैंट, तस्में वाले जूते मोजे। बालों की चिपटी चोटी वाला जूड़ा जो एन.सी.सी. में कैप के नीचे विहित था। लड़कों जैसी बोली वैसी ही चाल। अपने आपको जूली राणा ने लड़के के रूप में ढाल लिया था।

‘जूली, चलेगी मेरे घर?’–शम्पा ने पूछा।

‘इसीलिये तो आई हूँ। आप कार से हैं मैं स्कूटर से। आप आगे बढ़िये मैं स्कूटर से आती हूँ।’–कहा उसने।

‘क्या तुम वीथिका को छोड़ने जाओगे?’–अनायास शम्पा ने कहा। जूली चौंक गई।

‘नहीं मैम; वैसे मैम आप किधर रहती हैं?’–चकित वीथिका ने कहा अपना पता, साथ ही मना भी कर दिया।

‘ओह तब तो आप वैसे भी उल्टी दिशा में हैं।’–जूली थी।

‘मुझे लगा–तुम इस ब्यूटी पर डोरे डालने चल दोगी।’–शम्पा ने कहा जूली हो हो कर लंपट की तरह हँसने लगी। यह पूरा वाद-संवाद वीथिका को कतई न भाया। वह चुपचाप बाहर आ गई। रिक्शा पकड़ा और लौट आई। आकर निधि से सारी बातें बताये बिना चैन तो पड़ता नहीं। उसने सब कुछ कह सुनाया।

‘धत्, वे लोग चौपट हैं। हमारे यहाँ भी इनकी कुख्याति है। शम्पा प्रसाद के किस्से सब जानती हैं। असल में ये लेस्बियन हैं। जूली राणा तो, लड़कियों का शिकार करती ही है। उसका शिकार शम्पा प्रसाद ने कर लिया। हूँ।’–निधि ने सर झटका, वीथिका देखती ही रह गई।

‘हमलोग उस दिन गये थे तब तुम्हें पता था?’

‘नहीं यार, अपनी एक कलीग से कहा कि हम अपनी दोस्त के साथ शम्पा प्रसाद के घर गये थे। वे खासी इंटलेक्चुअल हैं।’

‘माई गॉड कब गई? कितनी देर रही?’–आश्चर्य से भरकर कहा उसने। ‘मैंने सब कुछ बताया। तब उसने यह सब कहा।’

‘अजीब बातें हैं।’–वीथिका ने कहा।

‘पहले जब तक उनके घर नहीं गई या हमारी कलीग ने न बताया तब तक उन पर दया आती थी, मोह होता था। रम्या आंटी का रूखा व्यवहार देख बुरा लगता था पर जब से मैंने यह सुना तब से मामला उलटा लगता है।’

‘अब दया की क्या बात हो गई? मस्त तो हैं।’

‘मैं सब जानती हूँ न, तुम नहीं जानती।’

‘क्या जानती है तू?’–खीझ गई वीथिका।

‘इनकी शादी हुई थी उस लड़के से जो फ्रांस में सेट्ल हैं। उसके पूरे परिवार के लोग वहीं हैं। शादी करके गईं, एम.ए. कर चुकी थीं, वहाँ पीएच.डी. करने लगीं। कुछ ही दिन ससुराल में रहकर स्वतंत्र रहने लगीं। पीएच.डी. करके यहाँ लौटीं अपनी नौकरी पर आ गईं।’

‘पहले से यहाँ थी?’

‘हाँ, पहले से थी।’

‘क्यों अलग हुई?’

‘कहा कि पति का किसी से चक्कर था। पर मुझे तो लगता है ये अपनी कुमारिका गाइड से चक्कर चला रही होंगी।’

‘दोनों बातें हो सकती हैं सच हों।’–वीथिका ने कहा।

‘हो सकती हैं।’

‘चलो, उन्हें जीने दो अपनी जिंदगी। हम क्यों सोचें?’–कहकर वीथिका ने बात खत्म की। मन जुगुप्सा से भर गया। लेकिन कई बार सोचती तो है कि लड़कियों का जीवन बहुत सहज नहीं होता। क्या पता अपने आप को बचाने के लिए, पुरुष से दूर रहने के लिए ये अपने खोल में सिमट आई हों। पर यह क्या बचाना अपने आप को? सिगरेट शराब में अपने आप को डुबो लेना! लेकिन प्रोफेसर के रूप में शम्पा प्रसाद की महिमा थी छात्राओं के बीच।

निधि और प्रो. अस्मिता लखनऊ विदा हुईं। उनका गंतव्य वहीं था। प्रोफेसर शिवरंजन तथा वीथिका हिमाचल के पर्वतीय प्रदेश में पहुँच गये। सेमिनार का सिलसिला वैसा ही था जैसा लखनऊ में था पर चूँकि यह स्थान मनोरम था सो वीथिका का मन प्रसन्न था। प्रो. शिवरंजन भी तनाव मुक्त लग रह थे। इस बार न उनकी आँखें इसकी चौकसी में चौकन्नी थी न पीछे पीछे फिर रहे थे। वे बेलौस होकर अपने साथियों से बातें करते। स्वस्ति ने समय निकाला और कुछ शॉलें खरीद लाई वीथिका। सभी विदा हो रहे थे लेकिन प्रो. शिवरंजन ने दो दिन के बाद का टिकट ले रखा था। घूमने-फिरने का बहाना था। स्वस्ति ने गाइड से संपर्क करा दिया था। वह थकी हुई थी। आराम करने चली गई। उस शाम देर तक सोते रहे थे प्रो. शिवरंजन। वीथिका उनके कमरे में गई। उन्हें अलसाया देखा। दोनों ने साथ चाय पी। प्रोफेसर साहब ने कहना शुरू कर दिया कि वे उदास हैं। उदासी का सबब है कि कोई उनका अपना नहीं है।

‘सर, आप देश विदेश में समादृत हैं, सब आपके अपने ही हैं।’–वीथिका ने उन्हें समझाया।

‘उस अपनेपन की कमी नहीं है वीथिका, मेरे अपने मन का कोना सदा उदास है।’

‘क्यों सर?’

‘जीवन में प्रेम प्यार नहीं है।’

‘इतनी गुणी हैं मैम, आपने पसंद से ही शादी की थी, सुना है।’

‘मैं संगीत प्रेमी हूँ। रम्या का गीत गाना मेरे रग रग में उछाह भर देता था। मैं सचमुच इसका दीवाना हो गया था। शादी भी कर ली। शादी के बाद पता चला कि उसकी स्प्लिट पर्सनालिटी है। यह कभी भी भयानक व्यवहार करने लगती है। दोनों बेटियों का पालन पोषण मैंने ही किया है।

‘ओह सर, यह मैं नहीं जानती थी।’–वीथिका ने कहा।

‘तुम कैसे जानती, मैंने कहा क्या?’

‘जी नहीं सर।’

‘इनकी माँ ने कभी इन पर ध्यान न दिया। बहन खुद नॉर्मल नहीं है। मेरी माँ, जब मैं छोटा था तभी गुजर गई। मैं अकेला ही गृहस्थी की गाड़ी धकेलता रहा।’

‘जी सर।’

‘यही कारण है कि मैं कभी कभी तुमसे प्यार की अपेक्षा करता हूँ। तुम मुझे जाने क्यों अपनी सी लगती हो।’

‘धन्यवाद सर।’

‘धन्यवाद क्यों? मैंने कई बार तुम्हें परेशान किया, गुस्सा किया। किसी के निकट जाते वक्त ईर्ष्या की, यह यों ही नहीं है। मैं मन ही मन तुमसे शायद अपेक्षा करने लगा हूँ कि तुम ही मुझे इस भँवर से निकालोगी।’–कहकर उसकी ओर देखने लगे प्रो. शिवरंजन, वीथिका जमीन की ओर खोयी सी जाने क्यों देखे चली जा रही थी।

‘पर यह मेरी भूल थी कि मैं तुममें आसरा ढूँढ़ूँ। तुम्हें हक है अपना जीवन अपनी तरह जीने का। मेरे दुःख से दुखी होने की बिलकुल जरूरत नहीं है।’–वीथिका चुप रही, पर उनके चेहरे को आर्द्र भाव से देखने लगी। गेहूँए रंग का सुंदर पुरुष, बड़ी बड़ी सम्मोहक आँखें, घने घुँघराले केश, जिसका एक गुच्छा अक्सर पेशानी पर झूलता रहता। इतना, सुंदर सुपुरुष टॉल डार्क ऐंड हैंडसम इनसान प्रेम के लिए तरस रहा है? जबकि मैम रम्या इंदु इनके सामने कहीं नहीं ठहरतीं। हाँ, उनका गायन जरूर दिल में उतर जाता है। काश! संगीत जीवन होता!

‘क्या सोचने लगी वीथिका? मैंने अपना गोपन तुम्हारे सामने खोल दिया है तो इसलिए नहीं कि तुम मुझसे सहानुभूति रखो। ऐसी चुप हो गई हो कि मुझे अफसोस हो रहा है, मैंने तुम्हारी ट्रिप खराब कर दी।’

‘नहीं सर, ऐसी बात नहीं है। मैं अब इतनी अज्ञानी नहीं हूँ। दुनिया में जो कुछ इनसान चाहता है वह मिल जाय ऐसा कहाँ होता है?’

‘जैसे तुम यदि श्यामल दास को चाहती हो, वह न मिले।’

‘मैं ऐसा नहीं चाहती सर, श्यामल मेरा बड़ा भाई समान है। उधर मेरा दिमाग नहीं जाता है कभी।’

‘मुझे लगता है उसके मन में जरूर है कुछ।’

‘अगर रहता तो वह फोन करता प्रेम पत्र लिखता, पर ऐसा नहीं किया। आप कैसे कह रहे हैं कि वह मुझे उस रूप में देखता भी है?’

‘तुमसे कुछ देर बातें करके मन हल्का हो गया। बुरा न मानना।’

‘नहीं सर, अच्छा लगा आप अब हल्के हुए।’

‘कोई शेयर करने वाला हो तो मन हल्का होगा न!’

‘बाहर निकलियेगा?’

‘अब आज रहने दो, कल हमलोग घूमने निकलेंगे।’

‘कुछ बाजार भी करना है?’

‘अभी खुला है तो अभी चल सकते हैं।’–प्रोफेसर शिवरंजन ने कपड़े पहने और बाजार निकल गये। इंपोरियम में जाकर कुछ शॉलें मफलर तथा बच्चों के लिए कोट खरीदा। एक कोट गहरे लाल रंग का वीथिका के लिए भी खरीदा।

‘इसे पहन कर दिखाओ’–कहा और पहनने में मदद करने लगे। मदद करते वक्त वीथिका को महसूस हुआ कि नितंब और सीने पर उनके हाथ सरसराते रहे। उसने कुछ न कहा। उसे अजीब भी नहीं लगा। टैक्सी में बैठे प्रोफेसर साहब ने उसका हाथ अपने हाथों में लेकर कहा कि उसने साथ देकर उनका मन प्रसन्न कर दिया है। वह मन ही मन विचार रही थीं कि उनका स्पर्श इसे अवांछित क्यों नहीं लग रहा है। ऐसा क्यों लग रहा है मानो यही व्यक्ति इसके काम्य हैं? यह महसूस करने की कोशिश कर रही थी कि क्या प्रो. शिवरंजन की, उसके साथ की यह कामना कर रही थी पहले से? बिलकुल उलझ गई थी। मन को तन नहीं समझ रहा है और तन बेहाथ हुआ चला जा रहा है। होटल में आकर नीचे डाइनिंग हॉल में ही इन्होंने रात्रि भोजन किया और सामान लेकर अपने कमरे में आ गये।

‘गुड नाइट सर, कल मिलेंगे।’–कहकर वह दरवाजे के बाहर से ही चली गई। प्रोफेसर शिवरंजन उसे बाँह पकड़कर खींच लेना चाहते थे पर न कर सके, वह अपने कमरे में चली गई। वह अकेली कितना सोचे? निधि होती तो कुछ समाधान होता। यह जरूर समझ रही थी कि दो दिन लगातार साथ रहने, घूमने का कार्यक्रम अधिक गिरहें खोलेगा। अपने मन पर नियंत्रण रखने को कृतसंकल्प हो वीथिका सो गई।

प्रो. शिवरंजन का मन प्रफुल्लित था। उन्हें अनुमान हो गया था कि वीथिका इनके हाथ आ जायगी। कोमल हृदय की लड़की है। उस पर इनकी निगाह पहले दिन से ही थी। ऐसा कभी नहीं हुआ कि जिसे पाना चाहा वह इन्हें नहीं मिला। संगीत प्रेम के कारण रम्या पर रीझे थे। रूपहीना रम्या इनके रूप पर पहले ही रीझ चुकी थी। प्रो. शिवरंजन अपने स्वभाव के गुलाम थे। उन्होंने अपनी ओर से आकर्षण का जाल फेंक दिया था। दूसरे दिन वादियों की ओर घूमने फिरने गये। जहाँ खुलकर इन्होंने अपने व्यवहार से प्रेम का इजहार किया। बेलौस रहने और दीखने में बड़ा फर्क होता है पर पहली बार किसी पुरुष के सन्निकट आई युवती वीथिका समझ न पाई। वह धीरे-धीरे उनके साथ हो ली। अब इनमें कोई दूरी न रही। वीथिका का संकल्प धरा का धरा रह गया।

यूथिका को बैंक की विदेशी शाखा में पदस्थापन मिला। असल में इसे पसंद करने वाला एक रसूखवाला आर्किटेक्ट विदेश चला गया था। उसी ने इसे वहाँ बुलवा लिया। परंतु इनकी माँ ने शर्त रखी कि जब तक यूथिका शादी नहीं कर लेती वह उसके साथ नहीं जाएगी। भले ही वीथिका के पास रह जाय। लेकिन यह यूथिका के गले नहीं उतरता।

‘माँ, मैंने आप दोनों का जिम्मा लिया है। वीथि ने अभी अपनी पढ़ाई ही पूरी न की। पूरी करे, स्थाई नौकरी में लगे तब मैं उससे निश्चिंत होऊँगी।’

‘तो भी तुम मिस्टर चड्ढा से शादी कर लो।’–चड्ढा साहब पहले तैयार बैठे थे, यूथिका की ओर से हरी झंडी नहीं मिल रही थी। यूथिका और चड्ढा ने कोर्ट मैरीज कर ली। इसकी तरफ से सिर्फ श्यामल दास, माँ और बहन थी। निधि भी दिल्ली पहुँची थी। छोटे से समारोह के बाद श्यामल ने चड्ढा से हाथ मिलाते हुए कहा–‘बच के रहना मिस्टर चड्ढा, यह शेरनी साथ जा रही है।’–खूब हँसी खुशी से विदा हुई यूथिका। जाते जाते श्यामल को हाथ पकड़ कर कहा–‘मेरी इन दोनों छोटी बहनों का खयाल रखना।’

‘थैंक गॉड, तुमने यह नहीं कहा कि छोटी बहन समझना।’–हँसी का फव्वारा फिर छूटा। पहली बार यूथिका वीथिका के गले लग कर रोती रही देर तक। माँ का क्या कहना, वह रोती ही रहीं।

‘हर हफ्ता में एक ठो चीठी लिखेगी न?’–माँ कहती।

‘मैं अगर तीन लिखूँ तो कोई एतराज है माँ?’–वीथिका के भी आँसू निकल आते।

‘मुझे नहीं कहती हैं मासी माँ।’–निधि बोलतीं।

‘ना रे तुम दोनों एक दूसरे का हाल लिखना।’

रब देश का कायापलट हो गया था। तेल के अकूत भंडार का पता चल गया था। नई बस्तियाँ रेगिस्तान में बस रही थीं। डॉ. चड्ढा वहीं चले गये थे। विवाह के बाद यूथिका भी माँ के साथ वहाँ पहुँच गई। वीथिका का लगाव प्रो. शिवरंजन से बढ़ गया। शोध के बहाने वे अतिरिक्त समय निकाल कर मिलते। इसका और निधि का थीसिस साथ ही जमा हुआ, एक हफ्ते के अंतराल पर दोनों का वाइवा हुआ और ये डॉक्टर हो गईं। तभी एक दिन निधि की गाइड प्रोफेसर अस्मिता ने इसे उत्तर प्रदेश के इलाहाबाद विश्वविद्यालय में व्याख्याता बहाली का विज्ञापन दिखाया तथा भर देने को भी कहा। इसके विषय के चार व्याख्याता नियुक्त होने थे। उन्होंने निधि तथा वीथिका को आवेदन देने कहा। निधि ने आवेदन दे दिया परंतु वीथिका ने टाल दिया।

‘मुझे पटना में रहना अच्छा लगता है निधि। हड़बड़ा क्यों गई यहाँ भी विज्ञापन होने वाले हैं।’–वीथिका ने कहा।

‘तब यहाँ भी भर दूँगी। अभी अस्मिता मैम ने कहा है, कैसे टाल दूँ?’–

निधि ने फार्म पोस्ट कर दिया। उसका साक्षात्कार हुआ। स्वयं अस्मिता बोर्ड में थीं। निधि इलाहाबाद विश्वविद्यालय के लिए चुन ली गई। जाते वक्त बड़ा नेह उमड़ा इसे अपने जन्मस्थल से। जिस दिन इलाहाबाद से लौटी सबसे पहले गंगा किनारे के उस छोटे से देवी मंदिर में पहुँची। मंदिर के गर्भगृह में बड़ा वाला पीतल का प्रदीप जल रहा था। माता का शृंगार हो चुका था। परिचित सुगंध से वातावरण सुगंधित था। जो भी पुजारी है वह बाबा के मिजाज का है, सोचा निधि ने। माता को सर झुका कर घंटा एक बार बजा कर वह निकल आई। कहीं कोई नहीं था। आवास की तरफ सफाई थी फूल-पत्तियाँ खिली खिली हरी भरी थीं। आँवले का विशाल तरू फल से लदा हुआ था। उसके नीचे का स्थान सदा की तरह लीपा हुआ था। वहीं पार्श्व में एक चबूतरा था और एक प्रस्तर खंड जिस पर लिखा है–बाबा पं. राखालचंद्र भट्टाचार्य समाधि स्थल। वहाँ ताजे फूल चढ़े थे। अगरबत्ती जलकर खाक हो चुकी थी पर गुलाब की खुशबू फैल रही थी। निधि की आँखें भर आईं। वह बाबा की समाधि के नीचे बैठ गई, चबूतरे पर सर टेक कर फूट फूट कर रो पड़ी–‘बाबा ओ बाबा, आमि एरोची, तोभार खुकी बाबा, आमी प्रो. डॉक्टर निधि भट्टाचार्य हुए गेलाम, शुनचो?’

‘दीदी, बाबा सब सुन रहे हैं। वे सब जानते हैं, उनका आशीष है आप पर।’ स्वर सुन मुड़ी। देखा राधाकृष्ण मंदिर के प्रधान पुजारी का शिष्य संबंधी किशोर अब युवक है। त्रिपुंड के साथ सिंदूर ललाट पर तिलक के रूप में। युवक वहीं समाधि के निकट निधि के पार्श्व में बैठ गया।

‘तुमने ही पूजा की है भुवन?’–निधि ने पूछा।

‘जिन्होंने कब्जा किया उन्हें भगाया गया। दीदी, कॉलेज की ओर से प्रो. शिवरंजन की इच्छा से मैं ही पुजारी नियुक्त हुआ। मैं मनोयोग से पूजा करता हूँ दीदी। आपकी राह देखता रहता था। आज आप आई हैं दीदी। आप कहाँ रहती हैं वह नहीं जानता था और बाबा तथा माँ भगवती को छोड़कर जाना भी नहीं चाहता था।’

‘तुम हो तो सब ठीक रहेगा।’

‘भरसक वैसे ही करता हूँ जैसा आपने सिखाया था।’

‘तुम्हारा परिवार कहाँ है?’

‘मैं अनाथ बालक था, गुरु जी ने मुझे पाला संस्कार दिये और जीवन दिये। आपने वृत्ति दी। यह परिसर, इसके पेड़-पौधे ही मेरे परिवार हैं। पहले से जो अलगू पियुन का परिवार बाबा ने रखा था, वही अब भी है, बस।’

‘ओह, भुवन मेरी नौकरी लग गई है–इलाहाबाद विश्वविद्यालय में। मैं वहाँ जा रही हूँ। जाते ही पत्र दूँगी। तुम भी पत्रोत्तर देना।’ निधि के सीने पर से सिल सा भार उतर गया। मंदिर सुरक्षित हाथों में है। बाबा की और बाबा के प्रिय पेड़ों की परिचर्या हो रही है। वहाँ से उठकर गंगा किनारे गई, चुल्लू भर पानी लेकर मुँह पर मारा–हे गंगे मैं आपको छोड़कर स्वर्ग में भी नहीं रह सकती। सदा आशीर्वाद देती रहें, कभी अपने तट से विलग न करें।

भरे मन से निधि अपना सामान बाँध रही थी। सामान के साथ अपनी सुधियाँ भी समेट रही थीं। अटाला था भट्टाचार्य आवास में, वस्त्र आभूषण और मुहरों का। लोहे, बाँस काठ के अनगिनत फर्नीचर। सब कुछ बहनों ने बाँट लिया। दोनों निर्मम बहनें क्या उसी माता-पिता की थीं जिसकी ये स्वयं हैं? उनकी निर्मम चालें याद कर फूट-फूट कर रो पड़ी निधि। देर तक अकेली रोती-रोती फिर सो गई थी। बदन अब भी हिचकियों से काँप रहा था। दरवाजा मात्र सटा हुआ था बंद नहीं था। वीथिका आई तो देखा यह गहरी नींद में थी पर हिचकियाँ ले रही थी। उसे निधि पर मोह हो आया। वहाँ अकेली कैसे रहेगी? वीथिका के जीवन में तो प्रेमांकुर फूट चुका था जिसके सहारे अकेलापन न रहेगा पर निधि सचमुच अकेली हो जाएगी। थोड़ी देर बाद निधि को जगाया वीथिका ने, दोनों ने सैंडविचेज और कॉफी पीये। अलग से डिनर की जरूरत महसूस नहीं हो रही थी।

‘निधि, तू यहाँ भी साक्षात्कार के लिए आना। वहाँ अकेली तेरा मन न लगेगा।’–वीथिका ने कहा।

‘आऊँगी!’–संक्षिप्त उत्तर था इसका।

‘मैं यहाँ बिलकुल एकाकी रह जाऊँगी।’

‘इतना रो क्यों रही थी?’

‘बाबा के मंदिर गई थी। वहाँ वह लड़का भुवन शर्मा पुजारी नियुक्त हुआ है। उसी ने बाबा को अग्नि प्रदान की, उसी ने श्राद्ध किया, उसी ने उनकी समाधि बनवाई। वही बाबा का कर्त्तापुत्र है वीथिका। सामने से गंगा की धारा उसे देख रही हैं। वही धारा जिसने बाबा के पुत्र को छीन लिया था उसी ने उस अनाथ बालक को भेज दिया। अब सचमुच लगता है कि मनुष्य तो निमित्त होता है।’

‘ओह, अच्छा किया निधि कि वहाँ हो आई, जहाँ तुम्हारी नाल गड़ी है, जहाँ बाबा हैं। मैं चाहती हूँ कि तेरा यहीं इसी विश्वविद्यालय में स्थाई चयन हो जाय।’

‘होगा तो देखेंगे वीथि, तुम्हारा हो यह कामना करती हूँ।’–वह हौले से हँसी।…‘मैं राह देखूँगी तुम्हारी।’

‘मेरी गाइड ने मुझको वहाँ स्थान दिया अब तेरे गाइड और सर्वशक्ति संपन्न हेड साहब की मदद तुझे मिलनी चाहिए। मैं भी प्रतीक्षा करूँगी।’

लगातार दो साल तक जिस कॉलेज में पढ़ाती रही थी निधि वहाँ की शिक्षिकाओं तथा छात्राओं ने उसे बढ़िया विदाई दी। जाने से एक दिन पहले प्रो. शिवरंजन प्रसाद के आवास पर निधि गई। रम्या इंदु गर्मजोशी से मिलीं।

‘अरे जाओ निधि, वह हमारी यूनिवर्सिटी है। मैंने वहाँ पढ़ाई की है। शिवरंजन ने भी वहीं से पढ़ाई की, पढ़ाया। लंदन जा कर विशेष योग्यता प्राप्त की। बहुत मन लगेगा तुम्हारा।’

‘मैम, जैसे आपको वहाँ के लिए फील हो रहा है वैसे ही मुझे यहाँ के लिए लगता है। मैं अपनी यूनिवर्सिटी को सबसे बड़ा मानती हूँ। यहाँ का सब कुछ छूटना कुछ दिन तकलीफ तो देगा।’

‘अरे नहीं, तुम वहाँ रम जाओगी। सारे विश्वविद्यालय एक से होते हैं। सारे परिश्रमी लोग एक से ही होते हैं।’

‘जी आंटी, कोई दिक्कत होगी नहीं, क्योंकि आपलोग का हाथ सिर पर है।’…‘तुम्हारी दोस्त नहीं आई?’

‘वो तो यहीं रहेगी। मेरे लिये वो कुछ पक्वान्न बना रही है।’–हँसने लगी निधि।…‘यह तो बहुत बढ़िया बात है। सामान सब ले लिया?’

‘जी, अभी तो एक अटैची है और एक होल्डऑल। वहाँ कुछ दिन यूनिवर्सिटी होस्टल में रहूँगी फिर घर देखकर शिफ्ट कर जाऊँगी।’

‘बिलकुल सही सोचा है निधि।’–मैडम रम्या इंदु ने कहा।

निधि ने दूसरी बार इलाहाबाद की यात्रा की। अपने परिवेश में वह जानती थी कि इलाहाबाद में संगम है, गंगा यमुना और लुप्त सरस्वती का जहाँ कुंभ लगता है। थोड़ी बड़ी हुई तो जाना कि वहाँ अपने प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू का घर है। जब एम.ए. करने के बाद पीएच.डी. करने लगी तब अंदाजा हुआ कि इलाहाबाद बहुत यशस्वी विश्वविद्यालय है। कभी-कभी आश्चर्य होता कि मात्र संस्कृत और बांग्ला के ज्ञान वाले पुजारी पिता की खुकी को इतना ज्ञान क्यों और कैसे हो गया? मानो वह गंगा की धारा में खड़ी थी ज्ञान का सैलाब इस पर से गुजर गया।

निधि के लिए इलाहाबाद में रहना और अध्यापन करना आसान नहीं था। एक तो बिलकुल नया माहौल दूसरे अपरिचित लोग। पटना की भाषा और इलाहाबाद की भाषा का अंतर इसे अब समझ में आया। उच्चारण की विसंगतियों से यह त्रस्त रही कुछ दिन तक। तभी एक दिन देवदूत की तरह श्यामल दास अवतरित हुआ। निधि को सुखद आश्चर्य हुआ।

‘श्यामल सर, आप किस सिलसिले में यहाँ आये हैं?’

‘जिस सिलसिले में आप आई हैं मिस भट्टाचार्य।’

‘मैं तो पढ़ाने आई हूँ। आप लखनऊ…’

‘वहाँ था, अब यहाँ आ गया हूँ। आपको अच्छा नहीं लगा?’

‘अगर यह सच है तो भगवती की बड़ी कृपा है।’

‘सच है, मैंने रीडर के पद के लिए आवेदन दिया था, चुन लिया गया।’–उसने हँसकर कहा।

‘ओह, आप सोच नहीं सकते मैं कितनी खुश हूँ। मेरा मन यहाँ बिलकुल नहीं लग रहा था। मैं पटना को बहुत मिस कर रही थी। आपने आकर मुझे उबार लिया।’

‘रुकिये रुकिये, जरा बताईये कि पटना को आप क्या अपनी दोस्त वीथिका के लिए मिस कर रही हैं या और कोई वजह है?’

‘अगर मैं वीथिका के साथ यहाँ होती तो चल जाता, जैसे अब आपके आ जाने से।’–हँसी निधि। श्यामल दत्ता ने गौर किया निधि गुलाबी आभा लिये गोरे रंग की युवती है। बड़ी-बड़ी नीलेपन लिये काली आँखें हैं। घनी बरौनियाँ और उन्नत भाल हैं। बिलकुल सीधा लंबा केश है जिसकी कस कर चोटी बनी है। हँसती है तो ओठों के कोनो पर अत्यंत छोटे गड्ढे पड़ते हैं। कुल मिलाकर निधि एक अति सुंदर लड़की थी जिसकी ओर श्यामल का आज ध्यान गया। लखनऊ में यह अपनी गाइड अस्मिता के साथ सदा चिपकी रही थी। बढ़िया पेपर पढ़ा था परंतु वीथिका जितना न तो पेपर तगड़ा था न बोलने का अंदाज। इसे वीथिका की परम मित्र के रूप में जानता था। वीथिका ने पत्र लिखकर बताया था कि निधि की नियुक्ति वहाँ हो चुकी है। वह वहाँ अकेली है, उसका मन नहीं लग रहा है, पर श्यामल ने जब उसे बताया कि वह भी वहाँ जा रहा है तब वीथिका को बहुत अच्छा लगा। श्यामल ने पत्र में कहा कि उसे अभी न बताये, जाकर एकबारगी चौंका देगा। श्यामल का यही नाटकीय अंदाज है। उसने निधि को न बताया। अब दोनों ने अलग-अलग पत्र वीथिका को लिखा। निधि को अब इलाहाबाद में मन लगने लगा।

क्लास खत्म कर वीथिका घर लौटने की तैयारी कर रही थी कि शम्पा प्रसाद आईं शिक्षिकाओं के कक्ष में।

‘वीथिका, मुझे कुछ मार्केटिंग करनी है, क्या तुम मेरे साथ चलोगी कि तुम्हें यूनिवर्सिटी जाना है?’–शम्पा ने पूछा।

‘नहीं मैम, मैं घर ही जा रही थी आज कहीं नहीं जाना है।’–कहा उसने सहज भाव से।

‘काम न भी हो तो तुम जा सकती हो, आफ्टरऑल तुम्हारे हेड साहब जो हैं।’–व्यंग्य किया उसने।

‘जी मैम, उनसे कई बार कुछ पूछने या विभागीय पुस्तकालय से पुस्तकें लेने जाती हूँ। यहाँ तो है नहीं।’ सपाट ढंग से कहा, यह कहते-कहते वे कार तक आ गये। शम्पा ने कार खोली और इशारा किया। कार स्वयं शम्पा चलाती सो यह उसके पास आगे ही बैठ गई। गाड़ी चौराहे पर रोककर दुकान में गये ये लोग। शम्पा साबुन, शैंपू, सिगरेट वगैरह लेकर निकल आई।

‘अब चलो मैं तुम्हें तुम्हारे घर छोड़ आऊँ।’–शम्पा ने कहा।

‘नहीं मैम मैं रिक्शे से चली जाऊँगी।’

‘कोई बात नहीं बेबी, मैं छोड़ दूँगी न, अगर कहोगी तो उतरकर चाय पीने में भी कोई एतराज न करूँगी।’–कहकर कंधे उचकाये। वीथिका बैठ गई। शम्पा इसके कमरे में आकर बैठी नहीं। घूम घूमकर देखती रही। निधि के तख्त पर एक खादी की दरी बिछी थी। बाकी सब जैसे पहले देखा वैसे ही था। वीथिका ने चाय के साथ झटपट पकौड़े भी तल लिये थे।

‘वाह, इतनी जल्दी पकौड़े भी तल लिये?’–शम्पा ने खाते हुए कहा।

‘मिलाकर रखा हुआ था मैम, इसीलिए झट से बन गये।’–वीथिका ने कहा।…‘तुम यह सब बनाना जानती हो।’

‘जी मैम, कामवाली काटकर मिलाकर रख जाती है, मैं तल लेती हूँ सब्जी और रोटी मैं खुद बनाती हूँ।’

‘तब तो तुम गुणी लड़की हो। मैं सोचती थी कि होस्टल में जीवन भर रहने वाली कैसे जान सकती है।’

‘छुट्टियों में माँ के साथ सीखा मैम।’

‘गुड’–थोड़ी देर बैठकर शम्पा चली गई। शायद इसके सहज शांत व्यवहार से परेशान होकर वे व्यंग्य बाण चलाना भूल गईं, उन्होंने हथियार डाल दिये। जाते जाते वीथिका के गाल मसलकर बोली ‘कभी मेरी तरफ की रास्ता भूल जाया करो, तुम मुझे पसंद हो।’–वीथिका सहम गई। आकर अपना चेहरा दस बार धोया, बड़ी घृणा सी हुई। प्रकृति ने स्त्री पुरुष का संयोग बनाया है, ये क्यों ऐसी है? सब कुछ होते हुए भी कितना भोंडा है इनका आचरण। और वह जूली राणा? क्या वह स्त्री है? पता नहीं हो सकता है न हो स्त्री। कॉलेज में जब वीथिका इनकी गाड़ी में बैठ रही थी तब सारे स्टाफ मुस्कुरा रहे थे। एक दूसरे को देखकर इशारा कर रहे थे। माली वगैरह भी इनका लक्षण जानते थे। जब इनके गमलों की देखभाल करने पहुँचते तब जूली राणा के साथ व्यवहार देखते। ये अच्छी बख्शीश देती सो सब काम करने को तत्पर रहते। किसी की व्यक्तिगत जिंदगी में घुसपैठ की जरूरत नहीं समझते। वीथिका खूब समझ रही थी कि उन्हें लगता होगा एक नई चिड़िया फँसी है। वीथिका इन दिनों अपने गुरु जी के सुरूर में थी। वह अपने कैरियर को लेकर भी चिंतित थी। कोलकाता वाले सेमिनार में ये अकेली भाग लेने गई थी। लेकिन दूसरे दिन प्रो. शिवरंजन भी पहुँच गये। सेमिनार के बाद उनके साथ दो दिन किसी दूसरे होटल में जाकर बिताया। इसने पूर्णतया अपने आपको समर्पित कर दिया। उस प्रसंग में अब यह बुरी तरह फँस गई। इसे भान हुआ कि वह गर्भवती हो गई है। तीसरा महीना चढ़ गया यह जान पड़ा। उसने तुरत प्रो. शिवरंजन को विभाग में जाकर कहा।

‘लगता है मैं फँस गई सर।’

‘क्या हुआ?’–बड़े भोलेपन से पूछा प्रोफेसर ने।

‘मैं गर्भवती हूँ।’

‘क्या? तुमने कोई सावधानी नहीं बरती?’

‘मुझे तो कुछ पता नहीं।’

‘यह तो बड़ी मुश्किलात पैदा करेगी।’–वह रुआँसी हो गई। उन्होंने उसे सँभाला। कोई उपाय निकाला जाएगा। तुम घबड़ाओ नहीं। लेकिन सचमुच यह घबड़ा गई। कैसे ऐसा हुआ? अब क्या करेगी यह? क्या अविवाहित माँ बन जाएगी? इसके इस लांछन का जिम्मेवार क्या ये स्वयं नहीं है? उधेड़बुन में पड़ी घर आई। ऐसे ही उदास आते-जाते चार महीने बीत गये प्रो. शिवरंजन लगातार आश्वासन देते रहे। अब इसके शरीर में कुछ परिवर्तन भी होने लगे। यहाँ तो कोई नहीं जिसे यह कह पाये। उसने मन ही मन संकल्प कर लिया कि वह निधि के पास चली जाएगी। वहाँ जरूर कोई उपाय सूझेगा। फोन कर निधि से पूछा।

‘मैं अगर तेरे पास रहने आ जाऊँ तो तुझे बुरा तो न लगेगा?’

‘कैसी बात करती है? मैं तो पुनर्जीवित हो जाऊँगी। पर तू आयेगी?’

‘मेरा मन है तेरे पास सदा के लिए आ जाऊँ।’

‘क्या हुआ वीथि? तू ठीक तो है?’

‘नहीं हूँ ठीक, मैं आ जाऊँ?’

‘आ जा।’–उसी दिन वीथिका प्रो. शिवरंजन के पास गई और उनसे अपना निर्णय कह सुनाया।

‘सर, वहाँ मैं अकेली हूँ, मेरे कहीं जाने पर विभाग में पढ़ाई ठप हो जाती है। अब मैं लंबे समय तक नहीं रहूँगी। हो सकता है कभी नहीं। विभाग स्थापित है तो कोई व्याख्याता भेजेंगे न?’

‘अभी कहाँ जाना है? दो तीन माह में स्थाई नियुक्ति होने वाली है। ऐसी बातें क्यों करती हो?’…‘सर, मैं अब इस अवस्था में यहाँ नहीं रह सकती। आप किसी और को वहाँ भेज दें।’

‘तुम दो दिन समय दो।’–सचमुच दो दिनों बाद एक व्याख्याता को उस कॉलेज में तथा वीथिका को विश्वविद्यालय तबादला कर दिया गया। थोड़ा आश्चर्य हुआ लोगों को पर कोई कुछ न बोला। वह व्याख्याता भी स्थाई नहीं था। विश्वविद्यालय में आकर वीथिका ने दो चार दिन क्लास लिया तथा आठ दिनों की छुट्टी ली और इलाहाबाद चली गई। अनायास इसे देखकर निधि चौंक गई। उतरते ही समझ गई कि वीथिका गर्भवती है। पर उसने उत्साहपूर्वक इसका स्वागत किया। थकी-थकी सी वीथिका बिस्तरे पर लेट गई। थोड़ी देर में चाय नाश्ता करने के बाद निधि निकट बैठी। वह रविवार की वजह से घर में ही थी।

‘निधि, तू मुझे देखकर सब समझ तो गई न?’–वीथिका ने पूछा।

‘सब नहीं वीथि, बस थोड़ी परेशानी समझ पाई हूँ। बाकी तू बता।’–वीथिका रोने लगी फूट-फूट कर।

‘मैं बुरी फँसी निधि, अब क्या करूँ?’

‘सोचना पड़ेगा।’

‘यहाँ रह गई तो तू बदनाम होगी।’

‘यह सब न बोल वीथि, मुझे सोचने दे उपाय।’–वह पूरा दिन और पूरी रात सोचने में लगी रही। वीथिका कोई अनजान स्त्री नहीं थी। इस विषय के लोग उसे पहचानते हैं। श्यामल दास भी तो हैं। पर श्यामल दास को कैसे कहा जाये? वे इसे इसके परिवार को बचपन से जानते हैं। बड़ी मुश्किल है। सुबह उठकर निधि ने चाय बनाई। दोनों चाय पी रहे थे कि प्रो. शिवरंजन का फोन आ गया।

‘जी प्रणाम अंकल, कैसे हैं आप?’–निधि ने औपचारिकतावश कहा।

‘निधि, क्या वीथिका तुम्हारे यहाँ है?’

‘जी सर मेरे पास ही है।’

‘मैं अगले रविवार को आ रहा हूँ। तुम लोगों से मिलना जरूरी है। निधि वीथिका से कहो वह बिलकुल फिक्र न करे।’

‘आप आयें सर, तब आगे बातें होंगी।’–फोन रख दिया निधि ने।

‘वीथि सर का फोन था, वो आ रहे हैं रविवार को।’–वीथिका ने कुछ न कहा, मुँह ताकती रही। उसके पास बोलने को कुछ न था एक ज्वार ने उसके अस्तित्व को लील लिया हो मानो। तीव्र बुद्धि, सारे आदर्श धरे के धरे रह गये। अनायास यह किसी कटघरे में फेंक दी गई। सींखचों में बंद है। अपने आप को बचाने की जद्दोजहद में बेहद थक गई। यह फिर सो गई। जाते जाते इसे निधि कहती गई कि ये सोई रहे बाहर से ताला बंद कर देगी। उधर टेरेस पर भी एक दरवाजा है, जरूरत हो तो खोल ले। पर इसे कोई जरूरत नहीं थी। निधि चली गई। फिर निधि आई और इसे उठाया तभी जगी, निधि ने कॉलेज कैंटीन से लंच लाया था। टेबुल पर प्लेटें सजाकर उसे ही परोस लिया दोनों सहेलियों ने। प्रो. श्यामल से सायास यह समाचार छुपा लिया गया। अगले रविवार को मानो बम विस्फोट हो गया। प्रो. शिवरंजन के साथ रम्या इंदु भी थीं। निधि ने दोनों के पैर छुए, वीथिका फटी-फटी आँखों से उन्हें देखती रही भावहीन सी। रम्या जी स्वयं उसके पास आईं और उसके माथे पर अपना हाथ रखा। निधि और वीथिका ने खाना खा लिया था। वे दोनों होटल से खाकर आये थे।

‘वीथिका मैं तुम्हें इतनी बेवकूफ नहीं समझती थी। तुम इन पुरुषों के मुलम्मे में पड़ जाओगी मुझे जरा भी गुमान नहीं था। वरना मैं तुम्हें समझा देती। और ये? मैं इनके फिसलन भरे आचरण को खूब ठीक से जानती हूँ।’–वीथिका निःशब्द रोती रही। प्रो. शिवरंजन एक पिटे हुए आज्ञाकारी बच्चे की तरह सिर झुकाकर बैठे थे, निधि चकित थी रम्मा आंटी के व्यवहार से।

‘अब आँसू पोछो और मेरी बात सुनो, उत्तर दो।’–वीथिका ने उनकी ओर अब सीधी नजरों से देखा।

‘छह महीने का गर्भ है न? क्योंकि तुमलोग छह माह पहले ही कलकत्ते गये थे।’

‘जी, छह महीने पूरे होने वाले हैं।’–उसने कहा।

‘यह तुमसे शादी नहीं कर सकते, करेंगे भी नहीं, इनकी आदत ऐसी ही है। यह पहला मौका है जिसे मैं इस अवस्था में देख रही हूँ। पहले पता चलता तो और बात थी अब इस बच्चे को जन्म देना ही होगा।’–वीथिका ने पीड़ा भरी नजरों से उन्हें देखा।

‘ये कैसे होगा आंटी?’–निधि थी।

‘जैसे हर माँ अपना बच्चा जन्म देती है।’

‘पर…’

‘पर वर कुछ नहीं। एक महीने बाद मैं इसे लेकर हिमाचल चली जाऊँगी। वहीं बच्चा होगा। यह तत्काल बच्चा मुझे दे देगी और भूल जाएगी कि इसने जना है।’

‘आंटी…।’–उन्होंने हाथ उठाकर निधि को चुप करा दिया।

‘तुम यह न समझना कि मैं भी तुम्हारे सर प्रो. शिवरंजन की तरह निर्मम और खुदगर्ज नहीं हूँ। मैं इस आदमी से इतना जरूर चाहूँगी कि यह तुम्हें स्थाई व्याख्याता बनवा दे। वहाँ रहोगी तो अपने बच्चे से मिलोगी, उसे देखोगी सिर्फ अपना न कह सकोगी। यह तुम्हें करना पड़ेगा वीथिका।’–वे लोग जैसे आए थे वैसे ही लौट गये। वीथिका को लग रहा था कि वह गश खाकर गिर पड़ेगी। निधि ने उसे सहारा देकर लिटा दिया।

‘देख वीथिका, मुझे लगता है मैम ने जो कहा है वह व्यावहारिक है।’–निधि के मन में क्षोभ उपजा प्रोफेसर शिवरंजन के प्रति और क्रोध वीथिका के प्रति। फिर सोचा कहीं जबरन तो नहीं शारीरिक संबंध बनाया?

‘वीथि, एक बात सच सच बताना कि इतने गहरे संबंध क्या तूने स्वेच्छा से बनाये?’–वीथिका उसकी ओर मुड़ी और दृढ़ स्वर में जो कहा वह निधि की समझ में आ गया।

‘उन्होंने बार बार पहल की पर मैं स्वयं उनमें अनुरक्त हो गई थी निधि। जब फिसलने की उम्र थी तब घरेलू दबाव के कारण खड़ी रही पर अब जब सब कुछ मेरे सामने सफलता की तरह परोसी थी तब मैं इनसे दिल लगा बैठी। इन्होंने अपने कुछ अफेयर्स भी शेयर किये। पर कहा कि तुमसे मिलकर जान पड़ा कि यही मेरी मंजिल है।’

‘यह सब धोखा है।’

‘उनकी ओर से होगा पर मेरी ओर से धोखा नहीं है। मेरे ये प्रथम प्रेम हैं। यह बच्चा इनके प्यार की निशानी है। जब मैम खुद ले लेंगी तो मुझे सुकून ही होगा।’

‘अब कहने सुनने की कोई बात नहीं रही।’–तभी दरवाजे की घंटी बजी। निधि को किसी अनजान व्यक्ति ने एक पैकेट थमाया और कहा–‘साहब मेम साहब के साथ था दिनभर। अभी उन्हें ट्रेन में बिठाकर आया हूँ। उन्होंने ही दिया है।’–पैकेट में दवायें और प्रेस्क्रीप्शन थे। निधि ने देखा। दवायें और पौष्टिक टॉनिक थे। एक पुरजा था रम्या इंदु के हाथों का लिखा। पटना जाकर बातें करूँगी। निधि तुम वीथिका का ध्यान रखना।’

पूरा एक माह घर में ही बिताया था वीथिका ने। एक माह के बाद दोनों सोलन चले गये। सोलन में एक फ्लैट था इंदुमती जी का। वहीं रहकर समय बिताये दोनों ने। रम्या के गीत विभोर होकर सुनती वीथिका। वह मन को दृढ़ कर रही थी। बच्चा होने का दर्द उठा वीथिका को, नर्सिंग होम की परची में नाम लिखाया रम्या प्रसाद का। पिता का नाम प्रो. शिवरंजन प्रसाद होना ही था। नाल सूखने तक पुत्र को वीथिका ने दूध पिलाया। उसका मोह बढ़ रहा था कि विदा की बेला आ गई।

‘वीथिका, हमारे इस पुत्र का नाम विवस्वान हुआ, यह सूर्य-सा प्रतापी होगा। तुम इसे देखती रहोगी। प्यार भी कर सकोगी पर मौसी कहलाओगी।’–सिर सहलाते हुए इलाहाबाद स्टेशन पर कहा था। निधि की सेवा से वीथिका पूरी स्वस्थ हो गई थी। दो माह बाद स्थाई नियुक्ति में चयनित हो गई थी वीथिका। उसी कॉलेज में आई जिसमें अस्थाई थी।

‘बहुत दिनों बाद आई हो, निखर उठी हो।’–पुरानी शिक्षिकाओं ने कहा। अधिकतर जिन्हें कोई लगाव था उन्हें बताया कि माँ से मिलने गई थी। जिस मकान में उसका आवास था उसका नियमित किराया रम्या मैम देती रही थीं, सो वह था। वीथिका की देहयष्टि और रूपाकार में कोई विशेष परिवर्तन नहीं हुआ था। विषय में कई नवनियुक्त व्याख्याता थे जिन्हें विभागाध्यक्ष के बंगले पर भोजन संग परिचय के लिए बुलाया गया था। सभी पुराने सहकर्मी भी थे। वीथिका यहीं की अस्थायी व्याख्याता थी अतः सारे लोग अपने थे। रम्या ने बच्चे को लाकर इसकी गोद में दे दिया। इसे रोमांच हो आया। लगा कि अभी दूध की धार फूट पड़ेगी। बच्चा गदबदा-सा हँसमुख था। चेहरा हू-ब-हू वीथिका जैसा था। घने बाल थे पर सीधे थे। प्रो. शिवरंजन का कुछ भी नहीं लिया। शायद कद काठी लेगा ऐसा लगा। प्रोफेसर साहब नवनियुक्त लोगों में लगे थे, वीथिका के पास उनकी दोनों बेटियाँ और बेटा थे। किसी को कोई अस्वाभाविक भी न लग रहा था क्योंकि इसके गाइड शिवरंजन प्रसाद ही थे, आना जाना लगा रहता। जाते जाते रम्या ने कहा–‘कभी कभी आ जाया करो।’–भरे गले से इसने हामी भरी थी। लेकिन मन ही मन सोच लिया कि नहीं आना है वरना अपने आपको सँभाल न पायेगी।

उस दिन बच्चे के साथ एक फोटोग्राफर ने इसकी तस्वीर ली थी। उसकी एक कॉपी इसे दे भी गया था। वीथिका ने उस तस्वीर को फ्रेम कराया और अपने टेबुल पर रख लिया।

कॉलेज वही है। वही प्रिंसिपल। सब स्टाफ वे ही हैं, पर जाने क्यों वीथिका को सब बदला बदला सा नजर आ रहा था। यह बदलाव इसके अपने मन और शरीर का था। अब यह पुष्पित पल्लवित स्त्री थी, इसकी न देह कुँवारी थी न मन कुँआरा रहा। एक ठहराव सा आ गया था। कुछ सुस्ती सी थी। यह भाव सिर्फ इसके अंदर था, दूसरे कुछ नहीं सोच रहे थे।

विभाग में मीटिंग थी। सभी नये पुराने प्रोफेसर्स और रिसर्च स्कॉलर्स दरभंगा हाउस में प्रो. शिवरंजन के कक्ष में जुटे हुए थे। जब सब आ गये तब उनका संबोधन शुरू हुआ।

‘हम वर्ष में तीन बार किसी न किसी विश्वविद्यालय में जाते हैं सेमिनार वगैरह में भाग लेने। इस बार हम ही आहूत कर रहे हैं। क्या आप सब इससे सहमत हैं?’

‘जी सर, यह तो गौरव का विषय है।’–एक ने कहा। सभी ने ताली बजाकर समर्थन कर दिया। विषय पर थोड़ी देर बहस हुई फिर सर्वसम्मति से ‘स्त्री और बच्चे’ पर मुहर लग गई। सूची भी बन गई। मजदूर, मेहनतकश, स्कूल कॉलेज ऑफिस में विभिन्न कार्य करने वाली स्त्री और उनके बच्चे के पालन पोषण रख-रखाव पर विषय बने। उनकी स्थिति में सुधार के लिये विषय पर भी विचार हुआ। काम भी बाँट दिये गये। कार्यक्रम स्थल का चयन भी होना था। सर्वसम्मति से यही अपने विभाग में हो ऐसा ही सोचा गया। सभी प्रोफेसर्स को कार्यभार बाँट दिया गया। प्रो. वीथिका ने सांस्कृतिक संध्या का भार स्वयंमेव ग्रहण कर लिया।

तैयारियाँ जोर शोर से चलने लगीं। अस्मिता मैम से जाकर विशेष रूप से वीथिका ने निधि को बुलाने का आग्रह किया।

‘मैम, निधि को तो आप जरूर बुलायेंगी न।’–वीथिका ने कहा।

‘इसमें क्या शक है, मेरी पहली पसंद निधि है।’–अस्मिता थीं।

‘मैम वो मेरे साथ ही रहेगी।’–अत्यंत प्रसन्न थी वीथिका।

‘ऑफ कोर्स, मैं तुम्हारी मित्र स्वस्ति को भी बुलवा रही हूँ। मैं स्त्रीवादी हूँ। अपर्णा को कलकत्ते से बुला रही हूँ।’– हँसकर कहा अस्मिता जी ने। आठ दिनों पर कार्यक्रम संबंधी प्रगति रिपोर्ट करने को।

सब साथ फिर बैठे और अपनी अपनी तैयारी कह सुनाई। वीथिका ने भी सुनाया। सेमिनार शुरू होने से पहले उसके कॉलेज की एक सुकंठी छात्रा सरस्वती वंदना गायेगी। सेमिनार के दोनों सत्रों के अंत में चाय के साथ पहले दिन यहाँ का लोकगीत होगा। इस दिन चाय की व्यवस्था छोटे से स्टेज के पास ही रहेगी। दूसरे और समापन के दिन चाय के बाद स्टेज पर विशिष्ट गायन शास्त्रीय होना है। उसके बाद विभाग में ही डिनर का प्रबंध है।

‘आपका यह कार्यक्रम चाय तथा डिनर से जुड़ा है। बैठने की व्यवस्था से भी जुड़ा है। क्या तीनों प्रबंधकों से तालमेल हो गया है? क्योंकि यह व्यवस्था का एक मामला है। कहीं भंग न हो।’–विभागाध्यक्ष ने कहा, तीनों व्यवस्थापक ने तालमेल की सहमति जताई। इससे अधिक पूछने की जरूरत नहीं थी। सब संतुष्ट थे। दो दिनों की अच्छी गहमागहमी रही। स्वागत से लेकर पहले दिन संध्या तक वीथिका के कॉलेज की लड़कियों ने सांगीतिक समाँ बाँधा।

सेमिनार का समापन हुआ और सभी कॉलेज के प्रिंसिपल तथा कई विभागाध्यक्ष आ गये। थोड़ा आश्चर्य भी हुआ प्रो. शिवरंजन को। डॉ. रम्या इंदु भी काफी सजधज कर बैठी थीं। गहरे पीले रंग की साड़ी का हरा किनारा था जो उनके साँवले रंग पर खिल उठा था। उन्होंने स्टेज पर जाने योग्य मेकअप कर रखा था। जूड़े में गजरा लगा रखा था। मंच पर साजिंदे बैठ चुके थे तब इनका शुभ नाम पुकारा गया। वीथिका और निधि स्वयं आगे आकर उन्हें स्टेज तक पहुँचा रही थीं। तालियों की गड़गड़ाहट से हॉल गूँज उठा। वीथिका ने अपने सभी अतिथियों को बता रखा था कि समापन में डॉ. रम्या इंदु का अलभ्य गायन सुनने का सौभाग्य मिलेगा। घंटे भर श्रोताओं ने मंत्रमुग्ध होकर गायन सुना। सभी विश्वविद्यालय से आये अतिथिगण ने उन्हें अंगवस्त्र और श्रीफल से सम्मानित किया। प्रो. शिवरंजन प्रसाद विस्मित थे कि कैसे रम्या तैयार हुईं? वह अब मात्र रेडियो में गातीं, मंच पर जाना छोड़ दिया था। परंतु वीथिका तथा निधि ने यह संभव कर दिखाया क्यों न हो, वीथिका ने अपने जीवन का सर्वोत्तम उन्हें उपहार रूप में दे दिया। सरकारी योजना के तहत कई कॉलोनियाँ बसने लगी थीं। छोटे-छोटे प्लॉट में छोटे बड़े अहाते और घर बनाकर सरकार कम कीमत में दे रही थी। कॉलेज की अपनी सहकर्मी लोगों के सहयोग से एक छोटे घर का आवेदन वीथिका ने भी दे दिया। उस समय लोग अपने प्लॉट में अपना घर बनाना अधिक पसंद करते थे। अतः सबसे पहले जिनको दिया गया उसमें वीथिका थी। वीथिका ने अपने घर के उत्साह में यूथिका और माँ को आने का आग्रह किया। दिन तय किया गया गृह-प्रवेश का। छोटा सा दो हजार स्क्वायर फुट का मकान था जिसमें सामने छोटा-सा लॉन, पीछे चारदीवारी से घिरा छोटा सा आँगन था। बरामदे के बाद एक हॉल और दो रहने का कमरा। पीछे बरामदा था बरामदे से लगा स्नानघर और एक शौचालय भी था। चौका छोटा-सा था पर बरामदे से लगा हुआ था। वीथिका ने एक कमरे से संलग्न शौचालय स्नानघर जो इंग्लिश कमोड से युक्त था बनवाया। अच्छा प्लास्टिक पेंट करवाया फूल और गमले रखे। परदे तथा फर्नीचर खरीदे।

गृह प्रवेश में निधि आई। रम्या इंदु जी ने खूब भजन गाये। यूथिका तथा माँ उनसे बहुत प्रभावित थे। यूथिका ने उनसे दुबई आने का आग्रह किया। मंच पर बुलाने का उसका मन था। रम्या ने हाँ कर दी। यूथिका ने माँ को वीथिका के पास छोड़ा और कहा–‘वीथि खुकी, माँ का ध्यान रखना, ऐसा नहीं कि माँ ही तुम्हारा खयाल रखने लगे।’

‘जलती क्यों हो?’–वीथिका ने माँ को अंकवार में भरते हुए कहा।

‘माँ, आप संगम स्नान तो करेंगी?’–निधि ने कहा।

‘हाँ बेटा, करूँगी जरूर, तुम्हारे पास आऊँगी।’–माँ ने प्यार करते हुए कहा। यूथिका माँ को लेकर थोड़ी असुरक्षित महसूस करती।

‘जल में अकेली न जाने देना।’–कहा उसने।

‘नः, तुम ही सिर्फ मासी माँ का ध्यान रख सकती हो। हम तो बुद्धू हैं।’–श्यामल ने आते आते सुना और कहा।

‘तुम तो होगे ही वहाँ, मुझे तब कोई फिक्र नहीं।’

‘अच्छा हुआ तुम अकेली आई, साला चड्ढा साथ आता तो मैं उसे बोटिंग के बहाने गंगा जी में ले जाता और ढकेल देता।’

‘ओ माँ गो, लेकिन क्यों ऐसा करते?’

‘बचपन से जिस शेरनी का चंगुल सहता आया उसको वो ले उड़ा साला!’

‘देखो जरा इसकी शानपट्टी, अरे मेरी नजर बहुत तेज है बच्चू; तेरी नजर उस दूधिया कन्या के सीधे चिकने केशों में जा उलझी है जो कोमल स्वर वाली कोकिला को भी मात देती है। पहले बताओ कब की तारीख निकल रही है? शादी कहाँ करोगे, इसी बंगले में न? कन्यादान करने को मैं मिसेज यूथिका चड्ढा कब आ जाऊँ’–यूथिका के कहते ही निधि ने सर झुका लिया। वीथिका बेवकूफों की तरह दोनों का मुँह ताक रही थी।

‘मैं सीधा पाणिग्रहण करूँगा। तुम सब सिर्फ दूर्वाक्षत छींटोगे क्या समझी?’–शर्माया सा श्यामल बोल उठा था। यूथिका और निधि, श्यामल को जाने से पहले रम्या इंदु ने अपने आवास पर दोपहर का भोजन करने बुलाया। वहाँ विवस्वान के साथ नानी का अतिशय लगाव देख निधि तथा वीथिका का दिल भर आया। यूथिका जो बच्चों को दूर से ही प्यार करती है वह भी इसे प्यार कर रही थी, वह भी गोद में लेकर।

माँ और वीथिका की गृहस्थी खूब ही अच्छी चलने लगी। गोपालपुर में जो हवेली और खेत देख रहे थे, वे अपनी अकेली बहन को माँ की सेवा के लिए छोड़ गये थे। अब वहाँ से चावल मूँग और उड़द की दालें आने लगीं, सारा बेचकर रुपया जमा कर दिया करते थे। फल वगैरह खाते-पीते थे। गोपालभोग चावल खुद खाने का बिलकुल मन नहीं करता था। उसे ऊँचे दाम पर बेच दिया जाता था। अब वह माँ के पास आने लगा।

वीथिका का मन बदलने लगा। वह खुश रहने लगी। निधि आई थी तब वह श्यामल के साथ मंदिर तथा अपने पुराने आवास पर गई थी। श्यामल के बाबा राखाल भट्टाचार्य की समाधि पर खड़े होकर उनकी बेटी का हाथ माँगा तथा संकल्प लिया कि यहीं आकर विवाह करेगा। वही हुआ। उसने उसी भगवती मंदिर में निधि का पाणिग्रहण किया। मंदिर की देवी ने मानो अपनी बड़ी-बड़ी पथराई आँखों से सब कुछ देखा। वे आज विवाह के जोड़े में निधि को देख रही थीं जिसे सफेद लिबास में चंदन का तिलक लगाये देखा था। उसे सन्यस्त जीवन से मानो गृहस्थी की ओर लौटती देख रही थीं। यह पूरा विश्वविद्यालय परिसर तब घोर उथल-पुथल से गुजर रहा था। देश की सीमा पर युद्ध हो रहा था। जनजीवन सामान्य नहीं था। तब इनके विवाह की किसी पार्टी या समारोह की गुंजाइश ही न थी। चार दिन निधि और श्यामल यहाँ रहे फिर चले गये। इलाहाबाद में इनकी गृहस्थी शुरू हो गई। निधि कभी कभी सोचती कि गंगा के ऐन तट पर बने मंदिर के परिसर में जन्म और लालन पालन। सबसे छोटी होने के नाते खेलती नाचती गाती कब बड़ी हुई, कब कॉलेज से विश्वविद्यालय की ओर कदम बढ़ाये और कब एक चट्टान सा मुसीबतों का टूट पड़ा समझ न पाई। वीथिका जैसी गंभीर संवेदनशील लड़की के जीवन का ऐसा रहस्यमय मोड़ आया यह सब निधि ने अपने ऊपर झेला। यह श्यामल दास वीथिका के परिवार का पुराना साथी कोई मदद नहीं कर पाया उसकी। श्यामल दास भी वंचित सा दीख रहा है, यह बड़े अफसर परिवार का लड़का ऐसा लगता है मानो बड़े पेड़ से गिरा हुआ पत्ता हो। अब वह वृक्ष में लग नहीं सकता। वृक्ष को इसकी पीड़ा नहीं सताती शायद इसे भी दर्द का अहसास नहीं है। कैसे निधि के जीवन की अमूल्य थाती बनकर आ जुड़ा। नदी नाव के इस संयोग का कहना ही क्या? श्यामल का इजहार भी चौंकाने वाला था। एक दिन नौका विहार की सोचकर संगम की ओर गये दोनों। पटना के नौका विहार को याद कर रही थी निधि। उसके बाबा प्रतिदिन मंदिर की नाव खेकर उत्तर की ओर बढ़ते और कलसी में गंगाजल भर लाते भगवती के स्नान के लिए। निधि प्रायः साथ हो लेती। कहते कि उत्तर का जल शुद्ध होता है। दक्षिणी तट से जल लेकर पूजा नहीं होती।

इलाहाबाद की विराट गंगा यमुना को देख मचल जाती निधि। वहीं बैठे-बैठे इसने कहा था–‘श्यामल, क्या आप वीथिका को पसंद करते हैं?’

‘बिलकुल, वीथि को मैं बहुत प्यार करता हूँ।’–स्निग्ध हो आया चेहरा।

‘तब आप झिझकते क्यों हैं उससे कहने से?’

‘मैं नहीं झिझकता, सदा कहा है कि मैं उसे बहुत प्यार करता हूँ।’

‘क्या?’–हैरत में थी निधि कि इस नवयुवक को छोड़ वीथिका क्यों विपथगा हुईं? जैसा कि लोग कहते हैं वो मैटेरियलिस्टिक है? सिर्फ कैरियर के लिए रिस्क लिया? नहीं, वीथिका ऐसी नहीं हो सकती है।

‘क्या सोचने लगी मोहतरमा?’–श्यामल दास ने पूछा।

‘सोचने लगी कि उसने मुझे क्यों नहीं कहा?’

‘कभी उसने नहीं कहा कि मैं उसे प्यार करता हूँ?’–

‘नहीं, पर तब देर क्यों कर रहे हैं। आपलोग शादी क्यों नहीं…।’

‘एक मिनट, मैंने शादी कर लेने वाले प्यार के विषय में कहा क्या?’

‘तो?’

‘उसे छोटी बच्ची, बहन के रूप में देखता रहा हूँ।’

‘ओह।’–श्यामल गंभीर थे, उसकी ओर देख रहे थे।

‘निधि, मैं तुम्हें कैसा लगता हूँ?’

‘एक सहृदय विश्वसनीय व्यक्ति लगते हैं आप, तभी आपसे कहा है मौका देंगे तब और कुछ कहूँगी।’

‘मैं अब अपने आप को मौका देना चाहता हूँ। मैं तुम्हें पसंद करता हूँ। वैसा वाला प्यार करता हूँ अगर तुम कहो तो तुमसे विवाह करना चाहता हूँ।’–निधि का चेहरा लाल हो गया। वह शर्मा गई।

‘मेरी पृष्ठभूमि तुम जानती हो पर आंशिक रूप से। मैं एक हरिजन हूँ। तुम उच्च कुलीन ब्राह्मण। मेरे चाहने से कोई फर्क नहीं पड़ता है, क्या तुम मुझे यह जानकर स्वीकार करोगी?’–निधि की जान हलक में आ गई थोड़ी देर को। सचमुच क्या यह बुद्धिजीवी सुदर्शन सुपुरुष हरिजन है? कभी वीथिका ने जिक्र नहीं किया। पर किसी जाति-पाति की चर्चा कहाँ की वीथिका ने? इनलोग के बीच बातचीत के ऐसे विषय कभी नहीं आये। सामाजिक संरचना, परेशान हाल औरतें, भूखे बच्चे तो होते केंद्र में परंतु जाति की चर्चा नहीं होती। इनके पिता वन-अधिकारी थे इन्हें भी हरिजन होने की त्रासदी जो जमीनी है झेलने की कभी जरूरत नहीं पड़ी होगी। उम्दा स्कूल में पढ़ाई, टाई से लेकर चमाचम जूते पहने श्यामल दास कहीं से हरिजन नामक जातीय चौखटें में फिट नहीं बैठ रहा है। क्या यह सच कह रहा है? यह संजीदगी से कह रहा है एक बार भरपूर नजरों से श्यामल दास की ओर देखा निधि ने। श्यामल स्थिर आँखों से इसी की ओर याचक बना देख रहा था।

‘आप अब तक हमारे आदरणीय वरीय प्रोफेसर थे; हम साथ-साथ मिल बैठ कर पेपर तैयार करते, एक ही थाली में खाते समय बिता रहे थे श्यामल जी, मुझे नहीं लगा कि हममें कोई फर्क है। हमारी शिक्षा दीक्षा एक है, हम एक ही हैं। मैं तो जाने कब से आप पर रीझ चुकी थी। मुझे लगता आप वीथिका को प्यार करते हैं। यही सोच कर सिमट जाती थी। मैं आपसे जरूर विवाह करूँगी। मुझे किसी से आदेश भी तो नहीं लेना है, कोई है कहाँ कन्या आपके हाथों में सौपने को।’–साफ साफ कहा निधि ने। श्यामल ने उसके दोनों थरथराते हाथ अपने मजबूत हाथ में गह लिये। आश्वस्ति का उदय हुआ यमुना की लहरों को कत्थई करती दिनमान की आभा विलीन हो रही थी। यहाँ मानो गंगा यमुना का संगम अपने आपको सार्थक कर रहा था।

नके राग को यूथिका ने वहाँ पहचान लिया था। ऐसी परिपूर्ण गृहस्थी की साक्षी बनी वीथिका और माँ। माँ इन दिनों काफी कमजोर हो गई थी, गाँव से आई फूलमती ने उनकी पूरी सेवा की पर वह अधिक कमजोर हो गई। एक दिन उन्होंने भी शरीर छोड़ दिया। वीथिका ने माँ को अग्नि प्रदान किया, यूथिका आ गई थी। दोनों बहनों ने गोपालपुर जाकर श्राद्ध किया। खेत और कुछ घर सेवकों को दे दिये, परंतु रिहायशी हवेली तथा धान के खेत, आम कटहल के बाग रख लिये। यूथिका ने प्रो. शिवरंजन से गोपालपुर चलने का आग्रह किया था। उन्होंने टालमटोल की परंतु रम्या इंदु जी ने दोनों बेटियों और विवस्वान को साथ कर लिया। वे गईं। उनकी मंशा साफ थी वे चाहती थीं कि वह अपनी सगी नानी के क्रियाकर्म का हिस्सा बने। गाँव के खुले वातावरण में सभी बच्चों को बहुत नया नया सा लगा। आते वक्त उन्हें भी गोपालभोग चावल की बोरी मिली जिसका चावल सुगंधित खीर बनाने के काम आता। माँ के साथ रहने वाली फूलमती वीथिका के साथ रहने न आई। घर बेहद सूना सूना लगता। गृह प्रवेश से लेकर अब तक घर भरा-भरा था। अब काट खाने दौड़ता। ऐसे समय में इसे छात्रावास अधीक्षिका होने की पेशकश की गई। यह सहर्ष तैयार हो गई। एक कमरे में अपना सामान रख वीथिका ने घर को किराया पर उठा दिया।

अपने कॉलेज परिसर के छात्रावास नंबर एक की अधीक्षिका हुई। साठ लड़कियों के बीच रहकर यह फिर से जीवन में लौट आई। जिंदगी बार-बार अकेला करती है, फिर जीवन की ओर लौटा लाती है। वीथिका अपने विषय की लोकप्रिय शिक्षिका थी ही, कॉलेज की अन्य लड़कियों की भी प्रिय शिक्षिका थी। यह ड्रामेटिक सोसायटी की अध्यक्षा भी थी। अक्सर लड़कियों के खेल तमाशों में भाग लेने बैठ जाती। रविवारीय फिल्में देखने चली जातीं। इसके दिन भी कटते। पढ़ना पढ़ाना कितना होता? सेमिनार वगैरह जो होते उसमें किसी का कितना समय जाता? एक या दो दिन। छात्रावास की पिकनिकें, एक्सकर्षन वगैरह का आयोजन करती वीथिका। नई लड़कियाँ प्रथम वर्ष में आती उन्हें थोड़ा सँभालना पड़ता। कुछ तो खूब रोती धोतीं। बाकी उदास तो होती ही। चूँकि वीथिका खुद छात्रावास में रहने वाली छात्रा थी सो उन्हें इनका अवसाद समझ में आता जिसे होशियारी से सुलझा लेती।

फ्रांस से घूम-फिर कर आने के बाद प्रो. शम्पा प्रसाद थोड़ी अधिक खोई-खोई रहने लगीं। कक्षा में छात्राओं को पढ़ाते समय टॉपिक भूल जाती। अपने कक्ष में कई बार दौरे से पड़ते तब जूली राणा आकर सँभालती। प्रिंसिपल के लिए कई बार बहुत अजीब परिस्थिति हो जाती। बहन और बहनोई से न के बराबर संबंध था और अपना कोई कहने को नहीं था। प्रिंसिपल ने ही मनोचिकित्सक डॉ. श्रीवास्तव से संपर्क किया था। उनका पर्सनालिटी डिसऑर्डर ठीक होने का नाम ही नहीं लेता। जूली राणा एम.ए. फाईनल में थीं। यहाँ इस कॉलेज में मात्र एन.सी.सी. के संयोजक के रूप में आती थीं। वो जिस दिन आती उस दिन शम्पा जितना हो सकता था उतना नखरा दिखातीं। अभी इनके दुःख का कारण था कि जूली की शादी ठीक हो गई थी। वह शादी के बाद अमेरिका जाने वाली थी। एक हल्ला था कि कोर्ट मैरेज हो चुका था, बीसा के लिए आवेदन दिया जा चुका था। उसके इंजीनियर पति को ग्रीन कार्ड था। सुनने में आया था कि शम्पा प्रसाद ने जूली को कहा था कि वो कैसे किसी पुरुष से शादी कर सकती है? वह तो शम्पा की पुरुष संगी है। पर जूली राणा ने सिगरेट के धुएँ में उसे उड़ा दिया। उसने स्त्रियोचित शलवार सूट दुपट्टे लेने शुरू कर दिये। माथे पर बिंदी और एक ढीली चोटी करनी शुरू कर दी। जूली राणा एक कद्दावर सुंदर स्त्री में तब्दील हो गई थी। यह शम्पा के सीने को चाक कर गया। वह उसे मारने पीटने पर उतारू हो गई।

‘मैं इनके इस मेंटल डिसॉर्डर की कारण नहीं हूँ। इन्होंने मुझे बर्बाद करने में कोई कसर बाकी नहीं रखी। वह तो मेरे निजी परिवार के लोगों ने मुझे मेरी पहचान बताई। अब मैं क्या कर सकती हूँ? मैं आगे बढ़ गई हूँ।’–कंधे उचका कर जूली राणा ने कहा।

‘यू आर राइट जूली सिर्फ ह्यूमैनिटी के नाते तुम जब तक हो तब तक इनका ध्यान रखो।’–मनोविज्ञान की अध्यक्षा ने कहा था।

‘ओह नो, आइ कान्ट! मैं बहुत जल्द जाने वाली हूँ।’–उन्हें छोड़कर जूली चली गई। शीघ्र ही जूली के विवाह का कार्ड मिला सब को, शम्पा प्रसाद की प्रतिदिन आने वाली कामवाली ने देखा वे जले हुए बिस्तर पर पड़ी कराह रही है। उसी ने दौड़ भाग कर अपने रिक्शे वाले पति की मदद से अस्पताल में भर्ती कर दिया और वीथिका सान्याल को खबर की। वीथिका ने डरते-डरते रम्या इंदु को सूचना दी। रम्या ने बड़ी बहन का कर्त्तव्य निभाते हुए उसे एक नर्सिंग होम में भर्ती करा दिया। परिचर्या से शम्पा ठीक हो गई। अकेली वीथिका ही थी जो प्रतिदिन शम्पा के पास बैठती, उसे मनुहार कर खिलाती पिलाती।

‘तुम अकेली हो न वीथिका?’–एक दिन पूछा था शम्पा ने।

‘मैं अकेली नहीं रहती शम्पा दी, कभी नहीं रही। अभी मैं छात्रावास में हूँ।’

‘पर हो तो अकेली।’

‘अकेले होने का एहसास सचमुच जानलेवा है, मैंने अकेला रहना कभी चाहा नहीं। आप भी चाहतीं तो यह वरण नहीं करतीं।’

‘मुझे लगा मैं एक उपेक्षित प्राणी हूँ। छुटपन में अम्मा के पास छोड़ कर पापा चले गये। अम्मा सिगरेट और शराब पीती थी, मैं सीख गई। उसका गुण नहीं सीखा, वह दीदी ने सीखा अवगुण मैंने ले लिया।’

‘आप अब नशे को अवगुण समझती हैं दीदी?’

‘मैं सदा समझती रही। अपने आप से बदला लेने के लिए ही मैंने यह सब धारण किया। जानती हो वीथिका, दीदी की सूरत अच्छी नहीं है, मेरी ठीक-ठाक है, तुम सी तो नहीं पर युवाकाल में मैं भी अच्छी दिखती थी।’–मुस्कुरा कर कहा शम्पा प्रसाद ने।

‘आप अभी भी अच्छी दिखती हैं मैम, आयु के अनुसार अपने को धारण करें, यही सुंदरता है।’

‘क्या तुम मेरे बिगड़ने की कहानी सुनोगी वीथिका? अब कुछ सुनकर न तो सँभलोगी न बिगड़ जाओगी। मेरे विचार से वह समय निकल गया है। तुम काफी मैच्योर हो गई हो। शायद रीडर भी हो गई हो?’

‘जी दीदी!’

‘यों ही, कह रही हूँ। संगीत प्रेमी शिवरंजन प्रसाद मेरी माँ और बहन के पास आते थे। उन्होंने मुझे पहले प्रपोज किया था। मैं पूरी तरह उनसे समर्पित हो गई थी पर मुझे पुरुष का साथ रास नहीं आता था। तब मैं उनसे दूर हो गई। इन्होंने दीदी से शादी कर ली। मेरी माँ ने मेरी शादी भी जबरन कर दी जो चली नहीं। वह आदमी ठीक नहीं है लेकिन मैं भी निर्वाह नहीं कर पाती। मेरी माँ को मुझसे कुछ लेना देना न था। यहाँ मैंने विज्ञापन देख कर आवेदन दिया था। नौकरी मिल गई। आज मैं इतनी दूर तक चल कर अपने बल पर आई हूँ।’–वह थक गई थीं।

‘मैम, आपकी प्रखर बुद्धि की चर्चा सब करते हैं।’–हौले से हँसी–शम्पा। प्रिंसिपल से शम्पा को अपने पास लेकर आने की बात पूछ रही थी वीथिका। ‘मैम, अकेली है शम्पा दी, क्या उन्हें पूरी तरह स्वस्थ होने तक मैं अपने साथ होस्टल में रख सकती हूँ?’

‘उसकी बहन है, बहनोई है वहाँ रहेगी। तुम क्यों रखोगी?’–उत्तर सुन उदास हो गई वीथिका और स्टाफ रूम में जाकर बैठ गई। आमतौर पर वीथिका कुछ पढ़ती रहती। अभी दीवार की ओर देखती चुप बैठी थी।

‘वीथिका, तुम क्या सोच रही हो?’–मनोविज्ञान की विभागाध्यक्ष ने पूछा।

‘कुछ खास नहीं।’–उदास मुस्कुराहट थी।

‘मैं समझती हूँ कि जरूर तुम शम्पा दी के बारे में सोच रही हो।’

‘यस मैम!’…‘कैसी हैं अब वो?’

‘मन स्थिर हो रहा है। घाव सूख गये हैं दी।’

‘डिस्चार्ज हुईं?’

‘नहीं होने वाली हैं। पर समस्या है कि वे फिर उसी घर में अकेली गई तो बीमारी लौट न आये। अभी सिगरेट और शराब छूट गई है? पर…।’

‘क्या उपाय है?’

‘मैंने सोचा कुछ दिन हमलोग साथ रहते पर प्रिंसिपल मैम ने परमीशन नहीं दिया। कहा उनकी बहन है न!’

‘तुम क्या सोचती हो कि अगर शम्पा दी यहाँ तुम्हारे साथ कुछ दिन रहेंगी तब सदा के लिए ठीक हो जाएगी? पर कैसे? कभी भी किसी समय उन्हें दौरा पड़ गया तो?’

‘दीदी मैं समझती हूँ मैं और साठ लड़कियाँ उनके साथ होंगी। वे अकेली नहीं होंगी। मैंने अनुभव किया है कि वो अपने को असुरक्षित महसूस करती हैं।’

‘हूँ।’–‘यही सब परेशान किये हुए हैं मुझे।’

‘मैं अपनी ओर से कोशिश करती हूँ प्रिंसिपल मैम के पास।’

‘हाँ जाइये शायद आपकी बात समझें। मनोचिकित्सक की।’–यही हुआ, सचमुच प्रिंसिपल मान गईं। यद्यपि कुछ वरीय प्रोफेसर लोगों के सामने यह बात रखी गई। सब ने वीथिका के आग्रह को मान लिया। वीथिका ने शम्पा प्रसाद से जब यह किस्सा सुनाया तब वह उसके हाथ पकड़कर रोने लगी।

शम्पा को अपने साथ छात्रावास में ले आईं वीथिका। पहले उनके विषय की, बाद में दूसरी लड़कियों ने भी उनसे बातचीत किया। वे सामान्य होने लगीं। बैडमिंटन वगैरह खेलने लगीं। माली के साथ बागीचा में समय बिताने लगीं। दो तीन माह के अंदर वे कॉलेज में पढ़ाने योग्य हो गईं। कॉलेज की नयी इमारत बनकर तैयार हो गई थी। उसके बन जाने से कुछ नये विभाग भी बढ़े और कुछ सीट भी बढ़े। कॉलेज में छात्राओं की संख्या बढ़ा दी गई। ऐसे में परिसर में एक और छात्रावास बनाया गया। इन दिनों शम्पा का परिवर्तन पूरे विश्वविद्यालय में चर्चा का विषय बना हुआ था। कॉलेज की प्रिंसिपल ने उन्हें बुलाया और पूछा

‘शम्पा आप अब अच्छी तरह स्वस्थ हैं, आपको देखकर लगता है। क्या मैं सही कह रही हूँ?’

‘जी मैम, मैं बहुत हल्की हो गई हूँ। आपलोग को धन्यवाद। आपने पूरे धैर्य से मुझे झेला है।’–उसने नजरें झुका लीं।

‘यह भूल जाइये। आपको शायद पता हो कि परिसर में एक और छात्रावास बना है। आप क्या उसकी सुपरिंटेंडेंट बनना पसंद करेंगी?’–शम्पा ने हैरत से उन्हें देखा। वे मुस्कुरा रही थीं।

‘आपका मुझ पर भरोसा है?’

‘बिलकुल है।’

‘तो मैं भरसक आपका भरोसा नहीं तोड़ूँगी।’–प्रिंसिपल ने एक फार्म सामने रख दिया जिसे हाथों हाथ शम्पा ने भरकर दे दिया। नये छात्रावास एक ही परिसर में होने के कारण शम्पा का साथ वीथिका को मिलता रहा। दोनों प्रतिदिन चाय का मग लिये गंगा किनारे के बेंच पर बैठ कर गप्पे मारतीं।

‘वीथिका, मैं तुमसे एक बात पूछूँ?’–शम्पा ने कहा।

‘पूछिये मैम।’

‘तुम शादी कब करोगी?’

‘अब यह प्रश्न पूछने में देर हो गई मैम।’

‘क्यों? अब भी समय है, कर लो शादी।’

‘मन नहीं है।’

‘तुम इतनी खूबसूरत हो क्या किसी ने प्रपोज नहीं किया?’

‘अब यह सब कोई मानी नहीं रखता मैम।’–हँसकर टाल गई।

‘निधि का क्या हाल है?’

‘वह अपने जीवन से खुश है मैम। उसकी दो प्यारी-प्यारी बेटियाँ हैं।’

नये छात्रावास की अधीक्षिका होने के बाद शम्पा ने रम्या और बच्चों को बुलाया था। परिसर और नये आवास को देख विवस्वान बहुत खुश हो गया था। दोनों बेटियाँ मेडिकल में थीं। संगीत की ओर किसी का रुझान नहीं था। विवस्वान के स्कूल की परीक्षायें चल रही थीं। बड़े-बड़े बच्चों को देख शम्पा ने हँसते हुए कहा–‘दीदी, मुझे लगता है अब बूढ़ी हो गई हूँ।’

‘अभी हम क्यों बूढ़े हों शम्पा, बच्चे जरूर जवान हो गये हैं।’–कहा रम्या ने।

सफलता की सीढ़ियाँ चढ़ती वीथिका एक प्रख्यात प्रोफेसर है। राष्ट्रीय समिति में रहती है। बड़े-बडे़ सेमिनारों की मुख्य अतिथि रहती है। प्रो. शिवरंजन नवस्थापित विश्वविद्यालय के कुलपति होकर चले गये। विवस्वान आगे की पढ़ाई के लिए दिल्ली चला गया था। दोनों बेटियाँ डॉक्टर बन चुकी थीं। विवाह भी डॉक्टर से हो गया। बड़ी बेटी अपने डॉक्टर पति के साथ इंग्लैंड उच्च शिक्षा के लिए चली गई। वीथिका की लिखी किताबें कई विश्वविद्यालय की विषय सूची में दर्ज थी। न यूथिका न वीथिका को कोई जरूरत रह गई थी गोपालपुर के बंगले की न खेत की। उसके माता-पिता की पीढ़ी कब की गुजर चुकी थी। गोपालपुर के खेतिहर नक्सलवाद के प्रकोप के कारण गाँव घर छोड़ महानगर की ओर चले गये। यूथिका ने वीथिका से पूछा–‘क्या वहाँ के खेत बेच लिये जायें?’

‘मेरा विचार है माँ बाबा के नाम का स्कूल खोल कर जमीनें उसी ट्रस्ट में दे दिया जाये।’–इसी पर सहमति हुई। यूथिका भारत आकर सारा कागज तैयार कर गाँव की ओर गई। पुराने मैनेजर के पढ़े लिखे पोते के साथ मिलकर योजना बना डाली। हवेली को स्कूल की शक्ल दे दी गई। गोपालपुर से लौटती दोनों बहनें बेहद भावुक हो गईं। दादा जी की उँगली पकड़कर घूमती छोटी बच्ची के रूप में यूथिका वीथिका। पापा के साथ बगीचे में अमरूद तोड़ती यूथिका वीथिका। माँ के साथ मालगुजारी का हिसाब करती आज आखिरी बार गोपालपुर को अलविदा कर रही है। कोई आलता लगाने वाली नहीं है, कोई हाथ छापा लेने वाली भी नहीं है। न है वो लोग न है वह रिवाज। समय के साथ रिवायतें बदल गई हैं। एक पूरी ग्रामीण दुनिया बदल गई है।

ये विश्वविद्यालय के पहले कुलपति के रूप में बहुत सारे काम निपटाने थे प्रो. शिवरंजन को। वे देर रात तक फाइलें देख रहे होते। यह दुनिया शिक्षा की दुनिया से अलग थी। यहाँ सिर्फ व्यवस्था करनी थी जिसमें अनेक बाधायें थीं, बेईमानी थी, टाँग खिंचाई थी। प्रो. शिवरंजन को यह सब रास नहीं आ रहा था। वे पुनर्विचार करने लगे थे।

‘मैं लौट जाना चाहता हूँ अपनी किताबों की दुनिया में।’ एक दिन उन्होंने रम्या से कहा था।

‘क्यों आपने दो-दो जगह विभाग स्थापित कर यश अर्जित किया है। यह कौन-सा बड़ा भारी काम है।’–रम्या ने कहा।

‘भारी है। वह एक विभाग था। यह सैकड़ों कॉलेज और दर्जनों विभागों की बात है। कोई तुलना नहीं है।’

‘उसके लिए विभागाध्यक्ष आदि तो हैं।’

‘मुझे रास नहीं आता रम्या जी।’

‘क्या चाहते हैं?’

‘मेरा कार्यकाल मुश्किल से साल भर है विश्वविद्यालय में। पर मैं लौट जाना चाहता हूँ। इज्जत से अपने द्वारा स्थापित विभाग में, दरभंगा हाउस के गंगातट वाले परिसर से सेवानिवृत्ति चाहता हूँ।’–भावुक स्वर था इनका। रम्या ने देखा एक व्यावहारिक, समझदार प्रोफेसर जो दुनिया के छल प्रपंच से पूरी तरह वाकिफ हैं वह निरीह-सा दीख रहा है। जीवन के दुरूह से दुरूह अगम्य गलियों से बेदाग निकल कर खड़ा हो जाता है, वह आज दाग लगने से डर रहा है। यह सच है कि सारे दाग धोने या छुपाने में इन्होंने उनकी मदद की, पर यहाँ यह संभव नहीं है। पर रम्या इंदु ने क्यों इनकी सदा मदद की? क्या वो इन्हें सच में प्रेम करती हैं? इस सौंदर्य लोलुप भ्रमर को क्या रम्या इंदु सी स्त्री प्रेम कर सकती है? यह प्रेम है या प्रतिदान? क्या रम्या को लगता है कि इसकी तरह की साधारण रूप वाली स्त्री से इस व्यक्ति ने विवाह किया और सदा अनुगत रहा यह बड़ी बात है। रूप स्वरूप ही सब कुछ नहीं होता, गुण ग्राहक गुण को देखते हैं। यह व्यक्ति सच्चा गुण ग्राहक तो है। सारी साध प्रो. डॉ. शिवरंजन की ही क्यों पूरी हो? नियति ने अपना काला वितान खड़ा कर लिया। दूसरे दिन सुबह शिवरंजन अपने स्टडी के तख्त पर शांत महानिद्रा में डूबे हुए पाये गये। अर्थी तो उनकी जरूर दरभंगा हाउस लाई गई, गंगा लाभ भी उनका कराया गया पर मन की मन में ही रही। बेटियाँ दामाद छात्र-छात्राएँ और पुत्र विवस्वान प्रसाद शोकाकुल चकित थे। रिटायरमेंट के पहले प्रो. शिवरंजन प्रसाद अकूत यश और हजारों शिष्य छोड़कर पंचतत्त्व में विलीन हो गये।

विवस्वान स्टेट बैंक के अधिकारी चुन लिये गये थे। आग्रह पर वे इसी शहर में पदस्थापित कर दिये गये। दोनों बहनें बाहर थीं, विवस्वान माँ के पास रहता। शम्पा तथा वीथिका लगातार साथ थीं। दोनों बेटियाँ अपने अपने काम पर लौट गई। रह गये मात्र विवस्वान और रम्या।

‘विभु बेटा, तुम बिलकुल अकेले हो गये हो, अब शादी करने का सही समय है।’…‘आपको बहू चाहिए क्या मम्मी?’–विवस्वान ने कहा।

‘हाँ मुझे भी चाहिए। क्या किसी लड़की को पसंद किया है?’

‘नहीं मम्मी, मुझे अलग से कोई लड़की पसंद नहीं है।’

‘बिलकुल पक्का?’

‘हाँ पक्का, यह काम आपको ही करना है।’

‘मैं खोजबीन शुरू कर देती हूँ। फिर अड़ंगा न लगाना।’

‘बिलकुल नहीं। जब कहेंगी मैं दूल्हा बन खड़ा हो जाऊँगा।’–दोनों हँसे दूसरे दिन रम्या ने वीथिका को बुला भेजा। वीथिका आई तो कहा–

‘वीथिका, मैं विवस्वान की शादी करना चाहती हूँ।’

‘जी दीदी, अब करने का समय आ गया है। किसी लड़की को चुना है क्या? आपसे कहा क्या?’

‘नहीं, कहा यह काम आपको करना है। वह बाप पर नहीं अपनी अम्मा पर गया है।’–हँसी रम्या, वीथिका शरमा गई।

‘यह काम थोड़ा कठिन है दीदी।’

‘है तो, तभी तो तुम्हें बुलाया। मेरे लिये दोनों बेटियों ने आसान कर दिया था सब कुछ। खुद दूल्हे चुन लिये। पर यह तो भार दे ही दिया, मेरे मन में एक विचार आया है। तुम कहो तो बात चलाऊँ।’

‘कहिये न दीदी। आप निर्णय लेने को स्वतंत्र हैं।’

‘मेरा विचार है निधि से बात चलाई जाय। उसकी बेटी ने दिल्ली विश्वविद्यालय में पीएच.डी. का रजिस्ट्रेशन कराया था। हो भी गया होगा।’

‘हाँ शायद–अर्थशास्त्र में। उसने अगर किसी को न पसंद किया हो तो बात चलाऊँ?’

‘जी दीदी, पूछना पड़ेगा।’

‘बहुत खूबसूरत लड़की है और गंभीर समझदार भी लगी।’

‘निधि की बेटी है दीदी, रूप गुण तो हैं ही उसके वाले।’

‘पत्र लिखूँ क्या? तुम लिखोगी क्या?’

‘मैं उससे बात कर लेती हूँ दीदी। पूछूँगी कि बिटिया कृति ने किसी को पसंद किया है या नहीं अब तक?’

‘हाँ, पहले पता कर लो तब उसे आगे बढ़ने को प्रेरित करूँगी।’

‘ठीक है दीदी। पर एक बात मैं कह दूँ कि यदि जाति वगैरह के संबंध में कोई पूर्वाग्रह हो तब बात न करें।’

‘मुझे कोई एतराज किसी जाति से नहीं है वीथिका। विवस्वान को मैंने पाला है, उसे भी नहीं है। अब समय भी बदल गया। पर यह तुमने क्यों कहा? क्या तुम्हें एतराज है?’

‘नहीं दीदी, मुझे नहीं है एतराज।’

‘तब? निधि बड़े ब्राह्मण की बेटी है, श्यामल दास भी कायस्थ जान पड़ते हैं। हम वही तो हैं।’

‘यही भ्रम है जो मैं मिटाना चाहती हूँ।’

‘क्या भ्रम है?’

‘श्यामल दादा दलित हैं कायस्थ नहीं; क्या कभी कहा उन्होंने?’

‘नहीं नहीं, ऐसी कोई बात कभी नहीं कही उन्होंने।’

‘प्रसंगहीन रहा होगा पर अभी प्रसंग है सो मैं कह दे रही हूँ।’

‘मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता है वीथिका। मुझे मनुष्य से ही मात्र मतलब है। मेरे पिता अमेरिका जाकर एक क्रिश्चियन स्त्री से विवाह कर दो भाई बहन हमें दे गये। उनसे मेरी मुलाकात है। वे मेरे सगे भाई बहुत स्नेही हैं। उनका धर्म ही अलग है। तो क्या हुआ। तुम्हें तो नहीं एतराज है?’

‘नहीं दीदी, मुझे कोई एतराज नहीं है, मैं आज पूछती हूँ निधि से।’

वीथिका के अंतस् में उमंग-सा छा गया। पर रम्या के अतिरिक्त कहे किससे? उछाह में आकर गंगा किनारे वाले बेंच पर बैठ निहारने लगी। सूर्य अस्ताचलगामी था। गंगा उत्तर की ओर थी सीधे सीधे न यहाँ से सूरज का उगना दीखता न डूबना। परंतु स्वर्णाभा पसरी मिलती। हवा की सिहकी से हौले हौले मचलती लोल लहरियाँ दीप्त हो उठी थीं। यह तो प्रतिदिन होता आज इसे खींच रहा था अपनी ओर। उसका कोख जाया, इसके हाड़ मांस का पुतला आज इतना बड़ा हो गया कि विवाह होगा। वह गुनगुना उठी एक मंगल गीत।

‘क्या हो रहा है वीथिका? बड़ी खुश नजर आ रही हो।’–शम्पा पहुँच गई थी। वीथिका ने कोमल दृष्टि से उन्हें देखा और मुस्कुराई।

‘इंतजार करें दीदी, खुशखबरी आने वाली है।’

‘अच्छा, कोई पसंद आ गया क्या?’–शम्पा ने बैठते हुए कहा।

‘पसंद आ गई है हमें अब पक्की भी हो जाय।’

‘पहेलियाँ न बुझाओ, सीधे सीधे बताओ अकेले में क्या सोच कर मुस्कान फैली थी तुम्हारे चेहरे पर?’

‘अपना विवस्वान अब दूल्हा बनेगा।’–हर्ष से भरी थी।

‘अच्छा, किस लड़की को पसंद किया है उसने?’

‘नः, उसने नहीं पसंद किया है, रम्या दी को कह दिया है कि वे पसंद करें। रम्या दी ने मुझे कहा है कि मैं निधि से उसकी बड़ी बेटी के लिए पूछूँ। वही सोचकर हँस रही थी कि यदि तय हो जाय तो कितना अच्छा होगा, है न दीदी?’

‘हूँ अच्छा होगा। स्ट्रेंज, यह लड़का अपने पापा पर नहीं गया।’

‘आप भी न दी।’–हँसने लगी।

जब निधि से वीथिका की बात हुई तो वह चौंक गई। रम्या मैम ने बहुत सोच समझकर यह प्रस्ताव रखा है। दोनों सहेलियों को एक सूत्र में बाँधने की चेष्टा की है।

‘वीथि, मेरी बेटी कृति ने किसी से दिल न लगाया है पर वह विवस्वान से विवाह के लिए तैयार है कि नहीं यह पूछकर बताती हूँ। एक और एतराज है कि वह बिना सेटल हुए शादी करना चाहती है क्या?’

‘ये सब तुम्हें सुलझाने पड़ेंगे। वैसे किस कैरियर को चुनना चाहती है कृति?’

‘पीएच.डी. किया है, पेपर पब्लिश कराती रहती है, जाहिर है कि हमारी लाइन में जाना चाहती है।’

‘किसी प्रतियोगी परीक्षा में नहीं बैठती हैं?’

‘नहीं।’

‘तब शादी करने में हर्ज क्या है? पीएच.डी. हो गई है। आगे की राह अब कहीं से भी तय की जा सकती है।’

‘सही बात, पहले पूछ लूँ तब श्यामल से कहूँगी।’–इस तरह की बातों के बाद मन में बेचैनी हो गई वीथिका को। श्यामल को संभवतः नहीं पता है कि विवस्वान वीथिका का पुत्र है। मुझे नहीं लगता है उसे कोई फर्क पड़ेगा। मन के गोपन का साक्षात्कार कर उछाह से भर रही थी वीथिका। उसके स्तन दूध से भर रहे थे, पीते हुए बच्चे को जिस निर्ममता से रम्या ने खींचा था रम्या इंदु प्रसाद ने वह पुनः आकर चिपट गया है। दुग्ध धार बह रही है वैसी ही जैसी उस वक्त! दबाने से नहीं दबती थी। वह धवल धार, जिसने इसके बदन पर नीले निशान छोड़ दिये थे। आप से आप अभी इसके दोनों हाथ स्तन पर चले गये। इसने दूध की तरह मन के भाव को दबा रखे थे वह आँखों से चुपचाप निकल कर कपोल सिक्त कर रहा था। पीड़ा का यह सुख भी वीथिका का नितांत निजी है जैसा दुःख निजी था। बाँटने को थी निधि। वही निधि इसके सभी गोपन की साक्षी है, कई अर्थों में वह भोक्ता भी है।

दूसरे दिन निधि ने उसे खुशखबरी सुनाई। कृति विवस्वान से विवाह करने को तैयार है। वे दिल्ली विश्वविद्यालय में मिल चुके हैं। विवस्वान ने भी अर्थशास्त्र ही पढ़ा था। वहाँ के स्टडी सेंटर में मुलाकात हुई। पटना कनेक्शन के कारण ये निकट आये थे। जाहिर है विवस्वान एक आकर्षक व्यक्तित्व का युवक था। उसने कभी सोचा न हो पर निधि के कहने पर तुरंत तैयार हो गई।

‘निधि, मैं यहाँ रोमांचित हो रही हूँ। पर एक आग्रह है।’

‘क्या? वही भी कह डाल।’

‘तुम श्यामल दा को बता देना कि मैंने अवैध संतान को जन्म दिया जो विवस्वान है।’

‘संतान अवैध नहीं होती है ओ समाजशास्त्री। इतने दिन यही पढ़ा गुना प्रो. वीथिका द ग्रेट? आत्म प्रताड़ना की शिकार न बनो।’

‘अरे यार, मुझे ही पढ़ाने न लग जा, श्यामल दा को बता दे।’

‘जरूर बता दूँगी। तू ज्यादा न सोच।’–वीथिका ने रम्या मैम को यह खुशखबरी दी और प्रतीक्षा करने लगी कि विवस्वान क्या कहता है।

रम्या इंदु ने नाश्ते की टेबुल पर विवस्वान से कहा सब कुछ–

‘मैंने तुम्हारे लिये लड़की पसंद कर ली है बेटे। फोटो और कोई परिचय नहीं दिखाऊँगी क्योंकि तुमने उसे देखा है।’

‘कौन है माँ, मैंने कब देखा है?’

‘कृति कल्पना को तुमने दिल्ली विश्वविद्यालय के स्टडी सेंटर में देखा है। वह भी अर्थशास्त्र की छात्रा थीं।’
‘अच्छा वो चूने की बोरी?’

‘क्या मतलब? अरे वह बिलकुल चूना की तरह सफेद है।’

‘ऊँह, गोरी लड़की को चूने की बोरी कहता है। अपनी काली मम्मी को देख देख कर गोरी लड़की पर छींटाकशी करता है। मैंने उसे ही तेरे लिए चुना है। तुझे कोई ऐतराज है तो बताना।’

‘तुमने पसंद कर लिया हो गया।’

‘अच्छा, तुम्हें नहीं?’–वह हँसता हुआ चला गया। रम्या के मन को बहुत शांति मिली। इलाहाबाद से आई हुई रम्या पूरी तरह से पटना की हो चुकीं। पटना की निधि इलाहाबाद की हुई। दोनों संस्कृति का मिलन होगा। खुशी हुई कि कृति कल्पना विश्वविद्यालय सेवा के लिए अपने आप को तैयार कर रही है। ऐसे समय उन्हें प्रो. डॉ. शिवरंजन प्रसाद याद आये। प्रखर और संवेदनशील व्यक्ति थे। रूप गुण संपन्न। एक ही अवगुण था कि भौंरा-सा स्वभाव था। जिस पर दिल आ जाता बिना हासिल किये न मानते थे। रम्या की बेहद इज्जत करते थे पर अपने मन पर वश नहीं था। वीथिका उनकी अंतिम पड़ाव थी। रम्या को मलाल है कि उन्होंने वीथिका का जीवन-रस सोख लिया। वीथिका ने किसी दूसरे पुरुष को पसंद नहीं किया। इन्होंने कई बार कोशिश की। अनेक स्त्री अनेक कारणों से प्रो. शिवरंजन के संसर्ग में आईं, देख समझ रही थीं रम्या इंदु पर इसका आना, इसकी समस्या और इसका विराग भरा जीवन भीतर तक साल गया। इसके लिए उन्होंने कभी प्रो. शिवरंजन को माफ नहीं किया। भरसक वीथिका के जख्म पर मरहम लगाने की कोशिश करतीं।

निधि ने प्रो. श्यामल दास से इस संबंध में चर्चा की।

‘आपको विवस्वान कैसा लगता है?’

‘अपना विवस्वान? प्रो. शिवरंजन का बेटा?’

‘हाँ वही।’

‘बहुत अच्छा लड़का है। क्यों पूछ रही हो?’

‘बताती हूँ। वह स्टेट बैंक में अफसर है। पटना में ही है।’

‘हाँ, पता है।’

‘आज उनकी मम्मी, रम्या मैम ने फोन कर उसके लिए अपनी कृति का हाथ माँगा?’

‘क्या? अपनी कृति अभी शादी के लिए तैयार होगी?’

‘वह तैयार है सर।’

‘ओहो, तो तुमने सारे होमवर्क कर लिये हैं। एक मिनट, ये दोनों दिल्ली में एक ही विभाग में थे। वहीं तो नहीं एक दूसरे को पसंद कर लिया था?’

‘हाँ थे, परिचय भी था लेकिन यह प्रस्ताव रम्या मैम की ओर से आया है। दोनों को पूछा गया, दोनों ने हाँ कह दी।’

‘बहुत खुशी की बात है, पर हमारी जाति बता दी? वे तब भी राजी हैं, तब मुझे कोई शंका नहीं।’

‘वह सब वीथिका ने बता दी है, कोई एतराज नहीं। आप बेसुरी वंशी बजाना छोड़िये। मैं एक अति महत्त्वपूर्ण राज खोलने जा रही हूँ। ध्यान से सुनिये।’

‘कहो’–उसने कान आगे कर कहा। निधि ने आँखें तरेरीं। वह मुस्कुराकर सीधा बैठ गया।

‘विवस्वान प्रो. शिवरंजन और वीथि का पुत्र है।’

‘अच्छा, तो?’

‘यही सूचना देनी थी।’

‘यह सूचना देकर तुमने कौन सा तीर मार लिया?’

‘क्या आप जानते थे?’

‘बिलकुल जानता था। तुम्हारे पास लगातार रही। बीच में ही महीने दिन के लिए चली गई। फिर वह आकर तब तक थी जब तक उसे पटना में परमानेंट नौकरी नहीं लगी। मैं जानता था।’

‘मुझे कभी नहीं कहा?’

‘तुम कहो यह चाहता था।’

‘मैं अपनी प्रिय सहेली का गोपन कैसे कहती? वह तो उसी ने कहा है कि श्यामल दा को कह दो।’

‘तुम्हारी यही ईमानदारी मुझे पसंद है निधि; तुम एक सच्ची मित्र हो ऐसी ही रहना सदा। मैंने समझ बूझकर तुम्हारा मान रखा।’

‘विवाह कब करें?’

‘अब तक विचार किया जा रहा है। प्रस्ताव भेजना होगा। क्या हमें स्वयं जाना चाहिए?’

‘बिलकुल, इसी रविवार को चलते हैं।’–वहाँ खबर बिना किये ये दोनों पटना पहुँच गये। रम्या जी के यहाँ इनका आना सुखद आश्चर्य से भर गया। बातचीत हुई। रम्या, शम्पा, वीथिका तो थे ही, थोड़ी देर के लिए विवस्वान भी बैठा रहा। विवाह का समय तय हुआ, खुशी-खुशी सब ने मिठाइयाँ खाईं और चलते बने।

‘वीथिका, तुम अमरूद डॉक्टर बेटियों के लिए भी रखना। ये नहीं कि सारा गड़प कर जाओ।’–श्यामल ने कहा।

‘ऊँह, मैं जो भी करूँ क्या आप देखने आयेंगे?’–वीथिका ने भी तुर्की बतुर्की उत्तर दिया।

‘उस मिसेज चड्ढा से कहना, मुंबई कोई दूर नहीं है। वो पूरे चार दिनों की छुट्टी लेकर आ जाये।’–श्यामल ने कहा।

‘मैं कहूँगी तो पटना के लिए, आप अपने लिए कहिये।’

‘ओह, यह बात तो हुई नहीं।’–रम्या जी ने कहा।

‘क्या बात दीदी?’–शम्पा थी।

‘यही कि शादी यहीं से होगी।’–रम्या थी। निधि और श्यामल दोनों ने एक दूसरे को देखा। सहमति आँखों आँखों में हो गयी।

‘जी, जैसा आप चाहें।’–श्यामल ने कहा।

‘वीथिका, एक बात याद रखना, चड्ढा से कहना वो मेरे सामने जरा कम ही आये वरना पिटेगा।’–समवेत हँसी गूँजी।

‘माई गॉड अब तक क्रश बाकी है।’–रम्या इंदु ने कहा।

‘सच मैम, वो जिगर कहाँ से लाऊँ?’–उसकी अदा निराली थी।

‘वो जिगर तो लाना पड़ेगा मित्र!’–शम्पा थीं।

विवाह की तैयारियों में समय पंख लगाकर उड़ गया। गंगा किनारे बेंच पर बैठी शम्पा ने वीथिका से कहा–‘मैं यहाँ से अपने पुराने फ्लैट में नहीं जाना चाहती हूँ।’

‘कहीं और बात करूँ क्या?’

‘विवस्वान कह रहा था कि गंगा किनारे अपार्टमेंट बन रहा है वैसा ही जैसा बंबई में होता है। उसमें इसने दो फ्लैट अपने नाम पर बुक कर लिया है।’

‘कब तक बना लेंगे वे लोग?’–वीथिका थी।

‘मुझे लगता है बन गया है। कहा है चलिये देख लीजिये।’

‘यह तो नये प्रकार की बिल्डिंग बन रही है।’

‘पटना के लिए नया है।’

‘चलिये, देख लेते हैं।’

‘वहाँ लोगों से अधिक बैंक वालों ने बुक कराया है। अभी समझ में नहीं आ रहा है लोगों को। पर मुझे लगता है सुरक्षित होगा।’

‘बाँम्बे की तरह होगा तब गार्ड वगैरह रहेगा। सुरक्षित तो होगा।’

दोनों ने संध्याकाल जाकर अपार्टमेंट देखा। देखकर अच्छा लगा गंगा की ओर खुलने वाली खिड़की वाला फ्लैट शम्पा के लिए चुना था विवस्वान ने।

‘मौसी, आप पेंट का रंग खिड़की के पल्ले के पेंट का रंग बता दें। परदे देख लें कितने लगेंगे, सब ठीक रहेगा। आप फर्नीश्ड फ्लैट में रिटायरमेंट के बाद रहेंगी।’

‘और लोग तो रहेंगे न?’–वीथिका थी।

‘करीब दस परिवार आ गया है। हमलोग का गेस्ट-हाउस भी शुरू हो गया है। जब तक ये आयेंगी, सब गुलजार हो जाएगा।’

‘यह कॉर्नर पूरा मैंने बुक किया है। मेरा मन है, मम्मी को भी मनाऊँ कि वह आ जाये।’–फिर कहा विवस्वान ने।

‘तब तो बड़ा अच्छा रहेगा।’

‘हाँ शम्पा दीदी, आपकी किताबों की रैक सजेंगी और बड़ी दी के साज-बाज।’

‘काश! तुम भी आ जाती।’–शम्पा ने कहा।

विवस्वान की शादी के कुछ ही दिन बाद शम्पा सेवानिवृत्त हो रही थी। तब तक फ्लैट तैयार था। उसके अपने पुराने मकान से किताबें आ गई थीं। उस फ्लैट को एक स्टेट बैंक के कर्मचारी ने किराये पर ले लिया था। शादी के समय आई हुई बहनों को गंगा टावर का फ्लैट दिखाया। उन्हें काफी पसंद आया। जब शम्पा का गृह प्रवेश हो रहा था तब विवस्वान ने वीथिका से कहा–‘मौसी, आपके लिए भी एक फ्लैट बुक कर दूँ?’

‘अभी बहुत दिन है रिटायर करने में, यह क्यों आयेगी?’–शम्पा थी।

‘कितने दिन है मौसी?’

‘सात साल।’–वीथिका ने कहा।

‘चुटकी बजाते ही बीत जाएगा। बनने में समय लगेगा। ऊपर एक फ्लोर बन रहा है। आधे में फ्लैट्स आधे में बागीचा। मनोरम होगा।’–कहा विवस्वान ने।

बेटी का विवाह करने के बाद निधि बाबा की समाधि की ओर गई। देखा समाधि को चारदीवारी से घेर दिया गया था। पूरे परिसर में कई अनगढ़ झोपड़ियाँ बनी पड़ी थीं। कुछ गायें और भैंसे पागुर करती बैठी थीं। यह दुर्दशा देख, समाधि पर फूल चढ़ा मंदिर की ओर गई। मंदिर में पूर्ववत् दीया जल रहा था। पूजा होने का संकेत था। वह वहीं बैठ गई। प्रणाम कर उठी और बाहर निकली कि भुवन आ गया।

‘प्रणाम दीदी, विवाह विदाई संपन्न हो गया?’

‘हाँ भुवन तुम तो थे ही।’

‘बहुत शालीन ढंग से विवाह हुआ, अति सुंदर।’

‘यहाँ तुम कहाँ रहते हो?’

‘यही,’ मंदिर में बनी छोटी सी कोठरी की ओर दिखायी उँगली।

‘यहाँ?’

‘इससे अधिक की मुझे जरूरत कहाँ है दीदी?’

‘पर उसमें झोपड़ियाँ कैसी है?’

‘यहीं के कर्मचारियों की है। जबरन बना लिया।’

‘किसी ने रोका नहीं?’

‘मैंने नहीं देखा रोकते दीदी। मैं पुजारी हूँ पूजा करता हूँ।’–निधि मायूस हो गई पर इसके वश में कुछ न था।

‘समाधि की चारों तरफ चारदीवारी मैंने बनवा दी क्या जाने गायें-भैंसे चढ़कर तोड़ डालतीं। वे अनजान जीव हैं।’

‘वो तो ठीक किया तुमने।’–भारी मन से लौटी थी निधि, वीथिका से सारा हाल कह सुनाया था।

‘निधि बहुत दिन बीत गये। विश्वविद्यालय का तौर तरीका बदल गया। उनकी शह पर ही यह सब होता है।’

‘ऐसी अवस्था में किसी से कुछ कहना नामुमकिन है।’–निधि ने सब कुछ सुन कर कहा।

‘मोह छोड़ निधि, मोहपाश की जकड़न जानलेवा होती है।’

‘सही कहा तुमने। यही भुवन ने भी कहा था।’

न दिनों कई नये विश्वविद्यालय स्थापित हो चुके थे। उनके कई कॉलेज स्थापित हो गये। जागरूकता आने से शिक्षा की दिशा में लोग आगे बढ़ने लगे। तकनीकी शिक्षा, व्यवहारिक शिक्षा का भी खासा प्रचार प्रसार हो रहा था। कई कॉलेजों का पूर्णतया सरकारीकरण हो गया था सरकारीकरण की प्रक्रिया में अच्छी संख्या में नयी प्रतिभायें अब कॉलेज में नियुक्ति पा रही थीं। कृति कल्पना को भी ऐसे ही सरकारीकृत संस्थान में मन लायक काम मिल गया था। एक दिन रम्या इंदु जी अपने स्नानघर में गिरी पाई गई। वे अचेत थीं। आवाज सुनकर कामवाली दौड़कर आईं। उसी ने आवाज लगाई तो कृति भी आ पहुँची। दोनों ने मिलकर बिस्तरे पर लिटाया और एक साथ डॉक्टर तथा विवस्वान को फोन लगाया। विवस्वान डॉक्टर साहब के साथ आये। जाँच करने पर पता चला कि मात्र ब्लडप्रेशर बढ़ जाने के कारण वे अचेत होकर गिर पड़ी थीं। लेकिन अधिक सावधानी की आवश्यकता तो हो ही गई थी। समय बाँट लिया गया था। शम्पा दिनभर रहती। गपशप और सहायक को बुलाने का काम तो वह करती ही, दवा वगैरह भी दे देती। दोपहर बाद वीथिका, कृति, शाम को विवस्वान आ जाते। दोनों डॉक्टर बेटी आकर चली गईं।

‘मम्मी, तुम सिर्फ कमजोर हो गई हो और कोई बीमारी नहीं है समझ लो। मेरे साथी डॉक्टर आते रहेंगे तुम्हें देखने।’–डॉक्टर बेटी ने कहा। मम्मी मुस्कुराकर रह गई। अब सारा काम पूरा हो गया है, चली भी जायें तो कोई बात नहीं, ऐसा विचारतीं रम्या इंदु अपने समय की सुकंठी गायिका। पुत्र और पुत्रवधू के स्नेह समर्पण से अभिभूत एक दिन रम्या ने उन्हें पास बैठाकर कहा।

‘बेटे विवस्वान, तुम सूर्य से समदर्शी हो यही कामना थी मेरी, तुम मेरी कामना के अनुरूप हो। तुम सदा सुखी रहो। मैं आज तुम्हें एक विशेष बात बताने जा रही हूँ। पूरे भरे हृदय से सुनना।’–कहती हुई मानो साँस लेने को रुकीं।

‘विभु मेरे बेटे, तुम मेरे पेटजाये नहीं हो।’–विवस्वान की ओर देखा रम्या ने। उसका चेहरा लाल हो रहा था। ‘तुम्हारी माँ वीथिका है। उसी ने तुम्हारा अंश तुम्हारे पिता से लेकर गर्भ में पाला, उसी ने दुग्ध पान कराया। वही तुम्हारी जन्मदात्री माँ है, मैं बस धात्री हूँ बेटे।’–फिर चुप हो गईं। विवस्वान उनके गले लग गया। वह चिपट कर रोने लगा–‘मम्मी आप मेरी माँ हैं, मैं आपका ही पुत्र हूँ।’

‘जरूर हो पर मैं मात्र यशोदा की भूमिका में थी देवकी वीथिका है।’

‘मम्मी’

‘उसे वंचित न करना कभी। मैंने तुमसे दूर कभी न रखा। तुम दूर न करना वह समाज के कठघरे में कैद बिन ब्याही माँ की और तुम्हारे पिता के विवाहेतर संबंध का दंश लिये जी रही है। वह तुम्हारा मुँह देख कर ही जी रही है। दूसरी कोई होती तो जीवन में आगे बढ़ जाती। ऐसे अनेक अवसर उसके जीवन में आये लेकिन वह साधिका है, तुम्हारी माँ सबसे अलग है।’

‘आपकी आज्ञा शिरोधार्य है। मैं उन्हें आदर देता हूँ अब माँ ही समझूँगा। पर उनसे अभी न बतायें कि मैं जानता हूँ।’–आग्रह किया विवस्वान ने।

‘नहीं बताऊँगी। तुमने और कृति ने जान लिया। वह जानती है। मेरे सीने पर से मानो पत्थर हट गया।’

‘मम्मी, मुझे पता है कि वीथि मौसी विभु की माँ हैं।’–कृति ने कहा और सिर झुका लिया।

‘अच्छा यह तो बड़ी खुशी की बात है।’

‘मैं प्रतीक्षा कर रही थी कि आप स्वयं इनकी जन्मदात्री का नाम बतायेंगी। सही समय पर बता दिया।’

कुछ ही दिनों बाद इस आख्यान का अवसान हो गया। रम्या इंदु जी हृदयाघात से चल बसीं। क्रियाकर्म के बाद विवस्वान ने माता-पिता का बंगला उनके ही नाम पर क्लिनिक के लिए बहनों को समर्पित कर दिया। वह स्वयं गंगा टावर में रहने चला गया।

गंगा टावर का ऊपर वाला फ्लैट तैयार हो चुका था जिसमें वीथिका का आना तय था। उसके अधिकतर सामान जा चुके थे। छात्रावास से दो दिन पहले विदाई पार्टी हो चुकी थी, आज विभाग से विदा हो गई। शून्य में ताक रही है। गंगा किनारे वह बेंच नहीं है, न खुला किनारा है। दीवारों से घिरा परिसर एक फॉन्क से कभी कभी धारा को झाँक लेता है।

‘वीथिका दी, कॉलेज छूटने का यह मतलब तो कतई नहीं है कि हमारा संबंध टूट गया।’–भारती ने कहा।

‘बिलकुल नहीं। तुम आती रहना। मैं भी कॉलेज आती जाती रहूँगी। संबंध नहीं छूटते।’

‘दी, आपने इतना बड़ा जीवन सिर्फ किताबें पढ़कर सेमिनार में हिस्सा लेकर, लिखकर कैसे काटा? क्या किसी ने आपको प्रपोज भी नहीं किया? आपका दिल नहीं आया किसी पर?’

‘अब यह सब पूछने की क्या जरूरत है भारती? सबकी अपनी अपनी नियति होती है, मैं क्या तुम्हें कभी उदास दीखी?’

‘आप मुझे अच्छी खासी संवेदना की धनी दिखाई पड़ती हैं कोई रूखी सूखी शख्शियत होती तो और बात थी। इतनी खूबसूरत हैं, स्मार्ट हैं, कैसे बची रह गईं?’

‘अब छोड़ो इन बातों को। मैं प्रतीक्षा कर रही हूँ कि विवस्वान आ रहा है। कैंपस खाली है। शायद हम दो ही बचे हैं। चलो आगे सामने वाले बगीचे में बैठें।’–वीथिका निर्मोही-सी गेट की ओर बढ़ गई। भारती साथ थी। गेट खुला। विवस्वान की गाड़ी खड़ी हुई। उतर कर वीथिका के पैर छुए, भारती को नमस्ते की और गाड़ी का गेट खोला। वीथिका बैठ गई, दरवान ने विदाई सामग्री पीछे की सीट पर रखी। गाड़ी चल पड़ी, भारती हाथ हिलाती हुई अपनी कार की ओर बढ़ गई।

बहुत सारे परिवर्तन हो गये हैं, छत्तीस वर्ष पहले सा कॉलेज नहीं रहा, फिर भी एक आभावलयित सा कुछ है जो अपने गुंजलक में इसे आविष्ट कर रहा है। सोचते विचारते कब गंगा टावर पहुँची, कब लिफ्ट में चढ़ी और कब अपने फ्लैट के दरवाजे पर पहुँची यह खयाल ही न रहा। अनायास अपने फ्लैट के दरवाजे पर सजे गेंदा के बंदनवार की ओर नजर गई। लिखा था–‘स्वागत माँ।’

‘आपके घर में आपका स्वागत है माँ’–कृति ने बायाँ और विवस्वान ने दायाँ हाथ पकड़ा। हौले-हौले वे सोफा की ओर बढ़े।

‘बैठिये माँ’–उन्हें बैठा कर दोनों ओर दोनों बैठ गये। उलझी सी वीथिका ने देखा शम्पा को व्हील चेयर पर लेकर दोनों डॉक्टर बहनें श्रेया और प्रेया सामने खड़ी हैं। तस्वीरें ली जा रही हैं। व्हीलचेयर पर बैठी शम्पा ने खुली आँखों से देखा है अपनी बहन रम्या को बच्चा पालते पर वीथिका को आत्मा से। जिस दिन जीजा कुलपति आवास में मृत पाये गये थे उसी दिन शोक के आवेग में मन की गाँठ खोली थीं।

‘इसे अभी नहीं जाना था शम्पा, ऐसे तो बिलकुल नहीं।’–रम्या ने कहा था। उनके स्वर में तल्खी भरी थी।

‘हाँ दीदी, अभी तो जीवन का उत्कर्ष आना बाकी था।’

‘मैं इसलिए नहीं कर रही हूँ। मैं चाहती थी कि विवस्वान पूरी तरह वयस्क हो जाय, काम-धाम में लग जाये, तब मैं इसकी बाजू में वीथिका को खड़ी करके बताऊँ कि यही हैं तेरे माता-पिता। वीथिका कब तक एक वातभक्षा नारी अहिल्या-सी बनकर रहेगी?’

‘दीदी, क्या कह रही है?’–चकित हुई थी शम्पा।

‘यही सच है। अपनी अनैतिकता का बोझ मुझ पर डालकर चला गया।’–शम्पा गले से लग गई।

‘दीदी सुपात्र को प्रकृति चुनती है। आप ही बिगड़े को बना सकती हैं। मैं आपको रूखा समझती थी पर आप तो फल्गु नदी सी अंत:सलिला हैं। अब मेरी समझ में आ रहा है कि वीथिका को इतना अधिक तरजीह क्यों देती हैं, उसे क्यों बुलाती रहती हैं।’

‘मैं विवस्वान की सारी प्रगति से उसे रू-ब-रू कराती रहना चाहती हूँ।’

‘आप के सामने नतमस्तक हूँ दीदी। अब तक की उपेक्षा के लिए मुझे माफ करें।’–यह सब याद आ गया शम्पा को।

‘हम पापा के जाने के बाद जान पाये, वीथिका माँ’–श्रेया ने कहा।

‘क्रियाकर्म के बाद माँ ने समझाया कि पिता की गरिमा न भंग हो इसलिए तब न कहा! पर वीथिका को उसका दाय मिले सो अब कह रही हूँ’–प्रेया ने कहा।

‘वीथिका माँ, आप सा धीरज हम में नहीं हैं। आप लेकिन हमारी रोल मॉडल नहीं हो सकतीं। आपने अपने पूरे जीवन को एक बिंदु के घेरे में कैद कर लिया। ऐसा क्यों किया?’–श्रेया ने कहा।

‘अपने समय का सच है, तुम कैसे जानती हो कि इसके मन में क्या है? यह यदि अपने आप में परिपूर्ण नहीं तो इतनी नॉर्मल क्यों रहीं? यही विचारणीय है। मेरी तरह असहज हो सकती थी, पर इसके सामने यह था’–विवस्वान की ओर उँगली उठाकर कहा शम्पा ने।

‘कोई व्यक्ति मात्र अपनी महानता साबित करने को ऐसे नहीं रह सकता है। वीथिका माँ मुझे बताइये क्या था आपके मन में?’–श्रेया थी। वीथिका का चकित चेहरा अब धीरे धीरे तनाव मुक्त हो गया था। वह मुस्कुरा रही थी। अच्छा, तो सब ने तुम्हें ठीक से पहचान लिया है वीथिका। तुम्हें किसी ने कम करके न आँका। किसी ने तुम्हें दोष नहीं दिया है। तुम्हें एक संपूर्ण स्त्री के रूप में जाना है। तुम अपने आप को वृथा खाली समझती रही, अपने को छाया समझती रही। नः, तुम संज्ञा हो वीथिका। यह तुम्हारी ओर देखता तुम्हारा परिवार ही समाज है। इसके सामने टेबुल पर रखा मोबाईल बजा नाम चमक उठा–यूथिका।

‘बधाई, काँग्रेच्युलेशन्स वीथि बेबी, तुम्हारी लाइफ के नये सूरज की; याद रखना वही मेरा भी है विवस्वान!’


Image: Portrait of Nina and Wolfgang Slevogt (Children in the Forest)
Image Source: WikiArt
Artist: Max Slevogt
Image in Public Domain