वातभक्षा

वातभक्षा

वीथिका अपनी मित्र भारती दत्त के साथ यहाँ आकर देर से खड़ी चढ़ती गंगा को देख रही थी। जून माह का यह आखिरी दिन है। ग्रीष्मावकाश है। परिसर खाली है। आज वीथिका का इस परिसर में प्रोफेसर के रूप में आखिरी दिन है। लगातार छत्तीस वर्ष बिताये हैं यहाँ। भारती की नौकरी अभी बाकी है वह इसी कॉलेज की छात्रा भी रही है। वीथिका नहीं रही। वीथिका ने सीनियर कैम्ब्रिज कर इंटर के दूसरे साल में पटना कॉलेज में ही दाखिल लिया। वहाँ से तीन साल और विश्वविद्यालय के दरभंगा हाउस से दो साल में एम.ए. कर लिया था। शोध छात्रा के रूप में प्रो. शिवरंजन प्रसाद के साथ निबंधित होना गौरव की बात थी। प्रो. शिवरंजन प्रसाद बी.एच.यू. से यहाँ आये थे। वे ही विभाग के संस्थापक विभागाध्यक्ष थे। उनसे पढ़ना ही सौभाग्य था, उनकी छत्रछाया में शोध करना परम सौभाग्य का विषय था।

वीथिका एक उदास लड़की थी जब बी.ए. पार्ट वन में आई थी। आई.ए. के फाइनल में जब आई तो चहकती हुई खुशदिल लड़की थी। अपने सेंट जोसफ स्कूल और होस्टल के परिसर से बड़ा और खूबसूरत परिसर लगा पटना कॉलेज का परिसर। अशोक राजपथ से चलते हुए गंगा घाट तक निर्बाध चलती चली जाओ। वीथिका अपनी सखियों से आगे चली जाती, अग्रगामी अग्रसोची थी। क्यों न होती? दादा निहार रंजन सान्याल सिरपुर राज के मैनेजर थे। उसने उनकी मैनेजरी नहीं देखी पर किस्से जरूर सुने थे। तस्वीरें देखी थीं और देखा था वह विशाल बँगला जो राजा साहब ने उन्हें स्थाई रूप से बनवाकर दिया था। देश आजाद होने के बाद जमींदारी खत्म हो जाने के बाद भी वह बँगला रहा था। अब मैनेजर साहब की भूमिका खत्म हो चुकी थी। पिता विश्वंभर सान्याल ने इसी पटना कॉलेज से अर्थशास्त्र ऑनर्स किया था। उनका पढ़ने से अधिक गॉल्फ तथा बीलियर्ड खेलने में मन लगता। वे जब यहाँ रहते तब नियम से गॉल्फ खेलने जाते। वीथिका और यूथिका दोनों बहनें भी माँ के हाथों के बनाये खूबसूरत फ्रॉक पहन बाबा के साथ मैदान पर जातीं। गहरे हरे मखमली घास का मैदान इसे बहुत भाते। गॉल्फ का बॉल लाने को वह मैदान में सरपट भागती, गुदगुदाता ओस भीगा विस्तार इसे मानो अकसर बुलाता रहता। वहाँ से लेकर अपने अहाते तक इसके पैर कभी न रुके, न थके। वहीं यूथिका स्थिर गंभीर थी। वह खड़ी मुस्कुराती रहती। एक बार उसे किसी गॉल्फर ने पूछ दिया था–‘आप भी दौड़ो बिटिया, देखूँ कौन तेज दौड़ती हो।’ ‘नहीं अंकल, मेरे नये जूते गंदे हो जायेंगे।’ उसने ना में सर हिलाकर कहा–वहाँ बैठे सभी गॉल्फर और उनकी बीवियाँ हँस पड़े।

‘हूँ, कहती तो ठीक है।’ एक महिला ने कहा–‘क्या वीथिका के जूते नये नहीं हैं?’ एक ने पूछा–‘हैं, पर वो ऐसे ही दौड़ती है।’ यूथिका ने मुँह बिचकाया। यह सच था, वीथिका को जूतों, फ्रॉक और अपनी परवाह नहीं होती, वह किसी गुब्बारे वाले या बुढ़िया के बाल, मिष्टि वाले के पास यों ही दौड़ जाती रोकने, कई बार गिर पड़ती, घुटने छिल जाते। वह बेपरवाह थी। माँ से, दादी से डाँट खातीं पर स्वभाव नहीं बदलता। वैसी बेपरवाह वीथिका सान्याल क्यों बदल गई? इतनी चुप चुप सी क्यों रहने लगी। बी.ए. में ऑनर्स के लिए क्या भरे, यह सोच ही रही थी कि मित्र निधि ने एक नई सूचना दी।

‘एक नया विभाग शुरू हुआ है, सुना है कि किसी भी विकासशील देश के लिए यह विषय जरूरी है जानना।’–निधि ने कहा।

‘स्कोप क्या है? मुझे जल्दी नौकरी चाहिए।’–वीथिका ने कहा।

‘अच्छा क्यों? यूथिका दी तो ऐसा नहीं कहतीं। वे थर्ड पार्ट इको कर रही हैं।’–निधि ने कहा।

‘वो शुरू से ही टॉपर, सीरियस हैं। इकोनॉमिक्स गंभीर विषय है न!’–वीथिका ने कहा। यही सच था। अर्थशास्त्र का सर्वत्र उपयोग था, बैंक की परीक्षा पास करने की गारंटी अलग थी।

‘यह तो है। नया विषय भी नौकरी की गारंटी देता है।’

‘कौन सा विषय है?’

‘समाजशास्त्र यानी सोशियोलॉजी।’–निधि ने कहा

‘अच्छा, क्या स्कोप है?’

‘समाज में जाने, सामाजिक कार्य करने…।’

‘एक मिनट निधि, यह फालतू काम जो नेतागिरी की ओर बढ़ता है तुमको स्कोप लगता है?’–रोक कर वीथिका ने कहा।

‘यार, तुमने बात पूरी करने नहीं दी। विकास कार्य के लिए नौकरियाँ सृजित हो रही हैं।’

‘ओफ्फोह, क्या कल्पनाएँ हैं तुम्हारी।’–सर ठोका वीथिका ने।

‘वीथि, यह विषय स्कूलों से लेकर कॉलेज तक में लागू हो रहा है, पढ़ कर देखते हैं यार!’–आजिजी से कहा निधि ने। वीथिका ने उसके दबाव में आकर समाजशास्त्र ले लिया। यूथिका ने सुना तो खूब लताड़ा।

‘तुम्हें कब अक्ल आयेगी वीथि, नया विषय है, किताबें मिलेंगी या नहीं, नोट्स कैसे बनाओगी? मेरे पास इकोनॉमिक्स के एक नंबर नोट्स हैं। कम परिश्रम में पढ़ लोगी, ऑनर्स भी मिल जाएगा माँ के सपनों को पूरा करने के लिए नौकरी मिल जाएगी।’–यूथिका ने खूब लताड़ा था इसे। वीथिका मनमौजी, ठान लिया सो ठान लिया। समाजशास्त्र का क्लास सुबह ही होता था। ऑनर्स पढ़ने भी विभाग में जाना पड़ता था। दरभंगा हाउस बिल्कुल गंगातट पर है। बाढ़ में भरी भरी गंगा, बाढ़ उतरने के बाद तन्वंगी-सी बलखाती गंगा, गंगा पर तिरती नाव से इसे विशेष प्रेम था। और प्रेम था निधि भट्टाचार्य के पिता के छोटे से मंदिर से जो ऐन गंगा की गोद में था। पचपन सीढ़ियों वाला देवी मंदिर छोटा सा गह्वर था। मंदिर की बाजू में पुरोहित राखाल भट्टाचार्य का परिवार रहता। तीन अतीव सुंदरी बेटी और एक बेटा। निधि सबसे छोटी थी। बड़ी अचिरा चौड़ा काजल ऑन्जे रहस्यमय सी लगती। वह अकसर पाड़वाली ताँत साड़ी पहनतीं। मझली रूचिरा कस कर जूड़ा बाँधती। बिना चोटी के जूड़ा, वह प्रायः वायल साड़ी पहनती जिसमें अपने हाथों से कढ़ाई करती। निधि वायल छींट साड़ी की शौकीन थी। साड़ी काफी कीमती दीखती, अकसर अरगंडी या फुलवायल की। लेकिन उसने सदा सस्ती खरीदी।–‘निधि तुम कहाँ से इतनी महँगी साड़ी सस्ती में ले आती हो?’

‘एक दिन चलना, मैं तुम्हें दिखाऊँगी।’–निधि ने आँखें नचाते हुए कहा। वह जगह महेंद्रू के बाजार में कटपीस सेंटर थी। दो टुकड़ों को या तीन टुकड़ों को जोड़कर बनी हुई साड़ी होती।

‘प्लीट में जोड़ है, दीखेगा तो नहीं?’

‘नहीं दीखता है कभी यार निधि।’–दोनों खुश होकर हँस पड़ी। निधि और वीथिका समाजशास्त्र के ऑनर्स की पढ़ाई करने के बाद घंटे भर का अंतराल मिलता। उसके बाद सबसीडियरी की कक्षा लगती। ये लोग सुविधापूर्वक काली मंदिर घाट पर बैठकर पालवाली नावों को गुजरते देखतीं। बच्चों और बड़ों को नहाते कपड़े धोती देखतीं। क्लास करने के बाद निधि अपने घर वीथिका अपने होस्टल चली जाती। दोपहर का भोजन कर कमरे में आकर थोड़ी देर पढ़ना नोट्स बनाना बाकी समय आराम से सो जाना या सिर्फ झूठ मूठ में आँखें बंदकर लेना आदत सी थी। इसके कमरे की साथिनें साइंस कॉलेज की थीं। वे देर से आतीं। एप्रन उतारकर टाँगतीं। कपड़े बदल साथ मेस में शाम की चाय के लिए जातीं। कोने पर वाला सिंगल बेड वाला कमरा यूथिका का था। वह फाइनल में थी, गंभीर उच्च परीक्षाफल लाने वाली छात्रा होने के नाते उसे यह कमरा मिला था। रोज शाम को वीथिका पूछती–‘दीदी, तुम्हारी चाय ले आऊँ?’–अकसर यूथिका साथ चल पड़ती। कई बार किसी प्रश्न के हल में उलझी होती तब ले आने को कहती। वीथिका चाय पीने के बाद अपनी रूममेट छाया तथा राशि के साथ कृष्णा घाट पर जाकर बैठ जाती। वहाँ भी वही सब दृश्य रहता। कृष्णा घाट पर बैठकर ये लड़कियाँ अकसर दिनभर का लेखा-जोखा देतीं एक दूसरे को। केमिस्ट्री ऑनर्स वाली शशि के पास केमिकल की गलत मात्रा मिलाने से टूटने वाले बीकर की दास्तान होती तो छाया जिसने फिजिक्स के प्रैक्टिकल के लिये चार्ट पेपर पर डायग्राम बना कर रखा होता उसकी चोरी के वारदात की चर्चा होती। वीथिका चुपचाप मजे लेकर सुनती। लड़कियों को शक किसी साथी पर ही होता कि वही परेशान करने के लिए केमिस्ट्री का प्रैक्टिकल बिगाड़ता है। दूसरा लड़का फिजिक्स का पेपर दो तीन दिन गायब कर चौथे दिन लौटा देता।

‘वाह, यार, बड़ा रंगारंग प्रैक्टिकल होता है तुमलोग के यहाँ। हमारे यहाँ रूखी सूखी पढ़ाई बस!’–वीथिका जैसी कला संकाय की लड़कियाँ कहती।

‘मत पूछो यार, तुमलोग को मजाक सूझता है हमारी जान जाती है। हमें डाँट सुननी पड़ती है।’–छाया कहती। ‘हमारे सर कहते हैं कि साइंस पढ़ना लड़कियों का काम नहीं है।’–राशि होती।

‘साथ ही लड़के भी पिल पड़ते।’–यहाँ बैठी लड़कियाँ हँस पड़तीं। शाम ढलने तक लड़कियाँ यहाँ बैठतीं। जब पाल उड़ाती नावें क्षितिज में विलीन होने लगतीं, जलपक्षी उड़कर अपने घोंसलों की तरफ जाते दीखते तब वीथिका और उसकी टोली उठकर आती। अँधेरे घाट पर लड़के आ जुटते धुएँ उड़ाने को, एकाध प्रेमी जोड़ा भी टपक पड़ता।

अभी तक समाजशास्त्र की पढ़ाई में कुछ खास मन नहीं रमा था वीथिका का। परिचयात्मक पढ़ाई में क्या मन लगता। लेकिन नोट्स वगैरह बनाकर परिश्रमी वीथिका ने अच्छी अँग्रेजी में जो कुछ टरमिनल परीक्षा में लिखा उसे सर्वाधिक नंबर आये। परीक्षा की कॉपी और नंबर लेकर स्वयं विभागाध्यक्ष आये थे। प्रथम वर्ष में उन्हें पढ़ाने का मौका नहीं मिला था। छात्रों में आदर के साथ दहशत भी थी। विभागाध्यक्ष जब सामने बैठे और प्यार से बात की तब सभी की साँस सम पर आई। युवा विभागाध्यक्ष कोमल शब्दों का व्यवहार कर रहे थे। वे सुदर्शन और सुरुचिपूर्ण थे।

‘सबसे अधिक अंक आये हैं वीथिका सान्याल को।’–लड़के लड़कियों ने ताली बजाई। वीथिका ने खड़ी होकर अभ्यर्थना की।

‘धन्यवाद सर।’

‘आपने बहुत अच्छा लिखा है। आपलोग तीस परीक्षार्थी थे। मैंने बड़ी बारीकी से सबको पढ़ा। आप सभी ने सही सटीक उत्तर दिये हैं। वीथिका सान्याल प्रथम है 74 नंबर लेकर और जो द्वितीय है निधि भट्टाचार्य वे भी 68 नंबर लेकर आई हैं। बाकी सभी साठ से नीचे हैं। क्यों?’

‘सर, क्या गलत उत्तर दिया? मैंने तो पाँचों प्रश्नोत्तर लिखे।’–एक लड़का।… ‘नहीं, गलत नहीं था। यह टर्मिनल है। पहला है। आप ऑनर्स का पेपर पहली बार लिख रहे थे।’

‘तो क्या लिखा जाय सर’–दूसरे लड़के ने पूछा।

‘यही बताने जा रहा हूँ। जो भी विषय आप पढ़ रहे हैं, वह सिर्फ टेक्स्ट् है। कक्षा में जो पढ़ाते हैं उन्होंने आनुषंगिक किताबों की चर्चा की जो सहायक हों, जिन्हें पढ़ना चाहिए?’

‘जी सर, बहुत सारी किताबों के नाम लिखाये। यह भी कहा कि विभाग के पुस्तकालय में सारी किताबें, जर्नल्स हैं।’–एक लड़के ने कहा।

‘आपने किताबें लीं? किस किसने किताबें पुस्तकालय से ली?’–विभागाध्यक्ष ने पूछा। सिर्फ वीथिका सान्याल और निधि भट्टाचार्य ने हाथ उठाया कि उन्होंने किताबें लीं।

‘देखिये, सिर्फ इन्होंने सहायक किताबें पढ़ी। नतीजा आपके सामने है।’

‘सर हमने सारे शिक्षकों के नोट्स लिये।’

‘हमलोग टैक्स्ट् पढ़ा देते हैं जो समझदारी देता है, उसे विकसित करने के लिए सहायक पुस्तकें पढ़नी होंगी। जर्नल्स पर निगाह रखनी होगी यह विकास का विषय है। अगली बार आपलोग सर्वप्रथम आयें यह सोच कर नोट्स तैयार करें।’–विभागाध्यक्ष चले गये! छात्र-छात्राओं में से कुछ तो जलभुन कर निकल गये, कुछ इनके पास आये।

‘तुमलोग ने कैसे इतने नोट्स बना डाले यार, हम तो समझ ही न पाये। कमाल कर दिया’–एक लड़की ने आकर कहा।

‘सर ने कहा है न, इस बार तुमलोग करतब दिखाओ।’–निधि ने कहा।

‘ऐसा कुछ नहीं है, बैठकर नोट्स बना लो, बात बन जाएगी।’

‘नया विषय है न!’–एक लड़की ने कहा।

‘लो, नया विषय तो सब कुछ है हमलोग के लिए।’–निधि ने कहा। इस विषय पर लड़कियों ने थोड़ी देर बहस की। लड़के अलग थलग फुँके से बैठे थे। उन्हें ये सब रास नहीं आ रहा था। फिलॉसफी, साइकोलॉजी में थी ही अब यहाँ भी पर तौल रही है ऐसा भाव था। धीरे-धीरे लड़कियाँ पढ़ाई लिखाई को गंभीरता से लेने लगी हैं।

वीथिका के दादा जी का शानो-शौकत बरकरार रहा क्योंकि जब तक वे जीवित रहे, राज के मामले निपटाते रहे। उनका दस एकड़ का बँगला सिकुड़ने लगा था। बँगला के ऐन आजू बाजू की जमीनें बंदोबस्त होने लगी थीं। निहार रंजन सान्याल के अंदर भी उदासी घर करने लगी थी। बेटा विश्वंभर अपने बच्चों को लेकर पटना चला गया था। उसे अपनी बेटियों को कॉन्वेंट में पढ़ाना था। पत्नी भी बी.ए. पास थी। वह कपड़े बहुत अच्छा सिलना जानती। अब भी उसके पास मिस हैलेट का दिया गया सिलाई विशेषांक रखा है जिसे जब तब खोल कर अपनी बेटियों के फ्रॉक डिजाइन करती। पत्रिका का नाम है ‘वीमेंस वर्ल्ड’।

‘बेटा को राजकुमार की तरह पाला हमने।’–निहार रंजन अपनी बीबी से कहते। ‘राज कुमार लोगों के साथ ही पढ़ता था!’–हँसी विश्वंभर की माँ।

‘पर, वैसा बोक्का नहीं निकला।’–संतुष्ट भाव से हँसे।

‘बोक्का है? सारा जमीन बेचकर खा रहा है।’

‘जमीन बेचकर यहीं पर कोई इंडस्ट्री खड़ा करता तब उसको काबिल समझा जाता, बेचकर खाना कौन होशियारी है?’

‘सो तो है।’

‘अभी सब बेच खायेगा, बाल बच्चा भीख माँगेगा।’–उन्हें संतोष है कि उनका बेटा विश्वंभर समझदार है। जंगल की ठेकेदारी ले ली है। वहाँ का रख-रखाव और कुछ व्यापार अपने हाथों में है। पाँच-पाँच साल पर टेंडर भरता है, अच्छे काम और मुनाफा के कारण सबकी आँखों का तारा तो है ही, खेल, टुर्नामेंट वगैरह कराके संपर्क बनाये रखता। राज के साथ जुड़कर यह गुर सीख चुका है बचपन से। निहार रंजन सान्याल और श्रीमती सान्याल को घरऊ सहायक की कभी कमी नहीं पड़ी। पटना के लिये भी उन्होंने ही दे रखा था। विश्वंभर सान्याल ने थोड़ी जमीन लेकर जंगल के निकटस्थ में एक खूबसूरत बँगला बना रखा था। अकसर शहर राजधानी से आने वाले अफसर और उनके बच्चे आते और इनके बँगले में ठहरते। ये सब इनकी ठेकेदारी बुद्धि थी। एक दिन सुबह-सुबह फोन आया कि माँ चल बसीं। यह दुखद समाचार सुनाते सुनाते सहायक रो रहा था। मैनेजर साहब की गाड़ी पुरानी थी सो मँझले सरकार ने अपनी नयी फियेट गाड़ी पहलेजा भेज दी। विश्वंभर सपरिवार मोटर वाली नाव से गंगा पार कर पहलेजा पहुँचे। पहुँचते-पहुँचते शाम हो गई। क्रिया-कर्म के बाद पंद्रह दिन बीतने पर लगा कि बाबा को अकेले छोड़ना असंभव है। दोनों बेटियों को कॉन्वेंट के होस्टल में छोड़कर पिता के पास चले आये विश्वंभर दंपत्ति। यूथिका और वीथिका को पहला शॉक लगा। यूथिका थोड़ी संजीदा हो गई, वीथि कुछ समझती नहीं पर अचानक अनुशासन बदल गया। होस्टल का रूटीन भारी लगने लगा। छुट्टियों में बाबा के घर जाकर मस्ती करती। निहार रंजन बहुत दिन नहीं जी सके। साल दो साल में चल बसे। इस शहर में कोई स्थाई ठिकाना नहीं बनाया था। बनाया था तो दामोदर नदी के किनारे अपने गाँव गोपालपुर में। दोनों पति पत्नी के मन में था कि यहाँ से छुट्टी पाकर अपने इलाके अपने गाँव में जाकर बसें। वहाँ अभी भी सान्याल बाबू का खेत था, मँझोली हवेली थी, हवेली के पीछे बड़ा सा अहाता था जहाँ सभी तरह के नींबू के झाड़ थे–कागजी से लेकर चकोतरे तक। आँवले, करौंदे, अमरे और कमरख के पेड़ थे। केले और पपीते थे। आउट हाउस में रहने वाला माली रखवाला था। शरीफा, बेल और आम का कुछ दाम थमा जाता। खेत पट्टे पर दिये जाते थे। सो हवेली के बाजू में ही नया बँगला था ऐसा अवसर ही न आया कि जा सकें। गोपालपुर जाने के पहले गोपाल ने इन्हें अपने पास बुला लिया। काम के बाद ये सब एक बार गाँव गये थे। नया बँगला आरामदेह था। हवेली झड़ रही थी। विश्वंभर दंपत्ति जंगल के पास वाले नये घर में ही चले गये। वहाँ के जंगल का दौरा करते। वन रक्षक तथा अधिकारियों के संपर्क में रहते। इन दिनों जो अधिकारी आये थे उनकी पत्नी और विश्वंभर की पत्नी अच्छी मित्र हो गईं। वहाँ इन लोगों ने अधिकारी पत्नियों का क्लब बना रखा था। वहाँ ताश और हाउजी जैसे खेलों का बोलबाला था। अखबार और पत्रिकाएँ आतीं, पर वह सब बंद ही पड़ी रहने लगीं। इन लोग को ताश, हाउजी से फुरसत ही नहीं थी। विश्वंभर की पत्नी को कपड़ों के डिजाइन से मतलब था सो वह पत्रिकाएँ खोलकर जरूर देखती। संयोगवश एक दिन पेड़ों के बोनसाई पर आलेख थे और चित्र थे। विश्वंभर सान्याल की पत्नी तरू ने सहेलियों को दिखाया–‘देखिये तो मैम, इस जंगल का सब आकाश छूने वाला पेड़ सब बोनसाई बन कर कितना क्यूट लगता है।’

‘अरे हाँ, यह बड़ा बढ़िया होगा।’–एक मैडम ने कहा। अब उसके बनाने के तरीके को एक जनी ने जोर-जोर से पढ़ा। बहुत भारी नहीं है यह करना, विचारा। ‘क्यों न माली को बुलाकर हम बनवाने की कोशिश करें।’–दूसरी थी। माली को बुलवाया गया।

‘माली बाबा, ये देखिये तस्वीर, ये बोनसाई है सभी बड़े पेड़ों का।’

‘जी मेमसाहब, बौना पेड़।’–माली ने कहा। सभी एक-दूसरे को देख मुस्कुराई।

‘हम पढ़कर आपको तरीका बताते हैं, बना देंगे?’–एक ने कहा।

‘अरे माली हैं, जरूर बना देंगे।’–दूसरी थी। तो सुनिये–

‘हम बनाना जानते हैं मेम साहब।’–माली ने कहा।

‘ऐ? आप जानते हैं?’–एक ने पूछा।

‘कैसे? स्ट्रेंज!’–एक नई मैम ने कहा चमक कर।

‘वर्मा साहब की मैडम विमला वर्मा बहुत बनवाती थीं। बॉस का, चम्पा का, पाम ट्री, गुलमोहर और अमलतास भी। बड़ और पीपल का ढेर सा बनाकर ले गईं।’–निर्विकार भाव से कहा माली ने।

‘बहुत सारा?’–उच्चाधिकारी की पत्नी अचंभित थीं।

‘जी, उनकी बहू का बिजनेस है, बौने पेड़ का।’–माली था।

‘अब भी बनवाती है आपसे?’–एक की बुद्धि जगी।

‘जी न, अब जिधर गई होंगी उधर बनवाती होंगी।’–माली था।

‘जाने दीजिये, आप अब भी बोनसाई तैयार करते हैं क्या?’–

‘जी नहीं। क्यों करेंगे? किसी ने कहा नहीं।’

‘आप बिजनेस करते? बना सकते हैं।’–तल्ख था मैडम का स्वर।

‘यहाँ नहीं चलेगा मैडम। हमको जंगल, फूल पत्ती पसंद है। खूब बड़ा बड़ा, यह बौना देखकर अच्छा नहीं लगता।’–विरक्त स्वर था माली का। उसे सचमुच यह पसंद नहीं था। क्या करे, मैडम जो कहें करना ही है।

‘अच्छा सुनो, हम चौदह मेम साहब लोग हैं। चौदह बॉस का बोनसाई बना दो। बना सकोगे न?’–बड़ी मैडम ने आदेश दिया।

‘जी बना देंगे। चौदह गमला दिलवा दें, हम काम शुरू कर देंगे।’

सारी औरतें खासी संतुष्ट दीखीं। ठीकेदार विश्वंभर की पत्नी तरू सान्याल माली को बोनसाई बनाते, कलमें लगाते देखती। वह कलात्मक स्त्री थी। उसने माली को कभी नाश्ता लाकर दिया, कभी कोल्डड्रिंक। उससे फूलों की बोनसाई बनवा ली। बड़े पेड़ वाले फूलों की। अब मैडम लोग पत्र-पत्रिका खोल कर देखने भी लगी। उसमें कपड़ों के डिजाइन देख खुद वैसे सिलवाने लगीं। सब कुछ बहुत अच्छा चल रहा था कि जाने कैसे जंगल में आग लग गई। काट कर रखे गये कुंदे तो भस्म हो ही गये, कच्चे वृक्ष जलने लगे। जानवरों में हड़कंप मच गया। वे रेता की ओर भाग खड़े हुए। कुछ गाँव की ओर आ गये। हिरन, सूअर तेंदुए। गाँव के लोग डर कर भाग गये। कुछ डरे हुए नौजवानों ने मिल कर लाठी बरछे से बींघकर तेंदुआ को मार डाला। निकट में जल भरी नदी थी। चारों ओर से अग्निशमन शुरू हुआ, आग पर काबू पाने में लगभग पंद्रह दिन तो लग ही गये। लाखों की लकड़ियाँ, बेशकीमती लकड़ियाँ राख में तब्दील हो गईं। विश्वंभर सान्याल किंकर्त्तव्यविमूढ़ हो गये।

अब वे परिवार के मुखिया थे। अकेले भाई थे, पिता रहे नहीं। छोटा-छोटा काम कब तक करते? एक बड़ा काम करने का इरादा था। बैंक से बड़ा ऋण ले लिया, टिम्बर मर्चेन्ट बन गये थे। गोपालपुर का घर हवेली सब गिरवी रख दिया। आग उसी इलाके में लगी थी जिसे इन्होंने लिया था। काट कर रखी महोगनी, बर्मीज टीक का अलम्य कुंदा जलकर भस्म हो गया। जिन कुंदों की चिरान कर शानदार फर्नीचर व्यापारियों को देकर लाखों कमाते आज खाक हो गये हैं। कुछ फर्नीचर मर्चेन्ट ने अग्रिम भुगतान भी कर दिये थे। कोलकाता के ये व्यापारी पिता निहार रंजन सान्याल के समय से मित्र थे। राज की पुरानी हवेलियों के फर्नीचर कौड़ियों के मोल खरीद कर ले जाते, देश विदेश में एंटीक बेचकर सौ गुना कमाते। विश्वंभर अवाक् थे। वे बीमार हो गये। बेटियाँ पढ़ रही थीं; सारे जमीन मकान ऋण में फँसे थे। इलाज के लिए बेटियों की जिद पर पटना आ गये थे विश्वंभर सान्याल टिम्बर मर्चेन्ट। घर किराये पर लिया और संचित धन खर्च होने लगा। ऐसे समय यूथिका फर्स्ट क्लास फर्स्ट हुई विश्वविद्यालय में। यह नहीं हुआ कभी, इकोनॉमिक्स में पहली बार लड़की ने बाजी मारी। उसे स्कॉलरशिप ग्रांट हुआ। एक स्कॉलरशिप सरकार की ओर से मिलता, दूसरा था किसी बड़े अर्थशास्त्री के नाम पर। दोनों बहनों की पढ़ाई का खर्च तो निकल जा रहा था। डॉक्टरों की सलाह पर विश्वंभर सान्याल को दवा दी गई तथा विचार दिया गया कि वे अपने पुराने काम वाले वातावरण में लौट जायें। तरू सान्याल को पटना का किराया अधिक लगा। वे भी कार्यक्षेत्र के अपने बनाये आशियाना में जाना चाहती थीं। दोनों बेटियाँ पुनः होस्टल में चली गईं। जंगल के किनारे आकर एक तरफ सान्याल साहब को हादसा याद आता, दूसरी ओर अपना ऋण। उनके मैनेजर जो अब बेरोजगार थे ने सलाह दी लकड़ी का जलावन वाला ठेका शुरू किया जाय। पहले यह सुनकर विश्वंभर बिदक गये। परंतु फिर ऋण का भय व्यापने लगा। उन्होंने हामी भर दी। मैनेजर स्वयं जो इतने बड़े ठेके को शान से चलाता था अब जलावन आपूर्तिकर्त्ता बन कर प्रसन्न नहीं था। समय जो न कराये। उसकी भी तो रोजी-रोटी चली गई थी। उसके बच्चे छोटे थे, कोई खास जमीन जायदाद भी नहीं थी। सब सुनकर चुप रहता और दोनों ठेका देखता। सान्याल साहब घर के पास वाले ठेके पर कभी कभार चले जाते। ऐसे ही समय तरू सान्याल को बोनसाई का खयाल आया। उन्होंने माली दादा को बुला भेजा और उससे मन की बात कही। माली सहर्ष तैयार हो गया पौधे लाने, गमले पसंद कर बनवाने और बोनसाई बनाने का काम उसने अपने ऊपर ले लिया। तरू सान्याल की सहभागिता रहती। पर यह काम धीमी गति का था। माली ने विचार दिया कुछ और आगे बढ़ने का।

‘मैम यह तो ऊपर का काम है यदि सचमुच आमदनी का काम करना है तो पौधों का व्यवसाय करना चाहिए।’–उसके मन में इनकी स्थिति के प्रति करुणा का भाव था। जंगल में इनकी संपत्ति का स्वाहा होना अपनी नजर से देखा था। माली सरकारी नौकरी कर रहा था जंगल-विभाग का, जो अपने स्तर से संपन्न है। पेड़ पौधों को खरीदने बेचने का गुर मालूम है, इसीलिए कहा था। तरू ने उसकी बात मान ली। धीरे-धीरे बड़े छोटे शहरों के बागीचों से लेकर बालकोनी तक इनके पौधे जाने लगे। तरू का नाम और उसके सेंटर का नाम एकाकार हो गया। तरूवन घर के खर्च काट कर ऋण शोध धीमी गति से होने लगा। विश्वंभर सान्याल सामान्य न हो पाये। बार-बार यूथिका का हाथ पकड़कर कहते–‘तुम सब कर लोगी, अपने पापा की तरह लूजर नहीं होगी।’

‘मैं बड़ी हो गई हूँ बाबा, बैंक की परीक्षा दे रही हूँ। देखिये जरूर कुछ अच्छा होगा।’ यूथिका कहती।

‘उस पगली वीथि का दायित्व तुम्हारे ऊपर है।’–सान्याल कहते।

‘वो भी समझदार है बाबा, फर्स्टक्लास नंबर लाती है।’–आश्वस्त करती। ये सब कहना उनकी महायात्रा की तैयारी थी। इन्हें मँझधार में छोड़ चले गये। यूथिका ने रिजर्व बैंक की अफसरी की परीक्षा पास की, वे देखने को नहीं थे। यहाँ का सब कुछ समेट बैंक का आधा कर्जा चुका माँ को अपने साथ रखने का निर्णय लिया यूथिका ने। यह भी देखने सुनने को वे न थे। वीथिका को जंगल से प्यार था, जंगल के पास वाले का शिल्प के नमूने वाले बँगले से बेहद लगाव था। उसे बेच दिया जाना बिल्कुल पसंद नहीं था। लेकिन न इसकी बात सुनने वाले बाबा थे न वैसी परिस्थितियाँ। यूथिका के अहसान तले दबी थी वीथिका। वह दिन व दिन उदास और चुप्पा होती जा रही थी। निधि के साथ भी घंटों बैठती, बोलती कुछ नहीं। किताबें और सहायक किताबें जर्नल्स खरीद पाने की स्थिति में नहीं थी। देर तक जब तक पुस्तकालय और होस्टल का दरवाजा खुला होता, वहीं बैठ कर नोट्स बनाती। अकसर निधि और उसका छोटा भाई साथ होता। यह विभागीय पुस्तकालय नहीं विश्वविद्यालय का ही पुस्तकालय होता। परिश्रम का फल इसे भी मिला। यह ऑनर्स में प्रथम आ गई। इसे भी मेरिट स्कॉलरशिप मिल गया। इसने मन ही मन सोच लिया था कि यूथिका से अपनी पढ़ाई का खर्चा नहीं लेगी। परीक्षाफल आने पर यूथिका और माँ बहुत खुश थीं। उसे बहुत सारे उपहार दिये यूथिका ने। तीनों जब डायनिंग टेबुल पर थे तब वीथिका ने बात छेड़ी।

‘दीदी, अब तो मुझे भी मेरिट स्कॉलरशिप मिलेगा न?’

‘हाँ स्वीटी, तुम्हें भी मिलेगा।’

‘आपका बोझ थोड़ा कम होगा। मैं अपना खर्चा उठा सकूँगी।’–वीथिका के कहते ही सबको शॉक लगा, एक बड़ा धक्का।

‘तुम मेरे ऊपर बोझ नहीं हो समझी? मेरा दायित्व है तुम्हारी देखभाल जो बाबा ने मुझे सौंपा था।’

‘वो तो है दीदी, पर क्या मेरा कोई कर्त्तव्य नहीं अपने ऊपर?’

‘है न, तुम अपने लक्ष्य को प्राप्त करो यह कर्त्तव्य है। तुम्हारी दीदी का वेतन पर्याप्त है वीथि, समझी?’

‘दीदी, कुछ करने दो मुझे भी।’

‘वीथि, जरूरत की किताबें खरीद, साबुत साड़ी खरीद, कटपीस दुकान जाना छोड़।’–दोनों बहनें इस बात पर हँसी, माँ तरू सान्याल न समझ पाईं। सब कुछ लगभग सामान्य हो गया था, मन वैसा ही खाली और बुझा बुझा सा था। यूथिका ने अपना लक्ष्य पूरा कर लिया था, माँ तरू मन लगाने के लिए तरूवन का काम देखती। दोनों एक प्रकार के लोग थे। वीथिका अपने पिता की तरह भावुक थी। बहिर्मुखी लोग परिस्थितिवश अंतर्मुखी हो जाते हैं तब अंदर में एक ज्वाला-सी जलती रहती है। वीथिका के साथ यही हुआ। एम.ए. में अधिक समय विभाग में रहना होता था, यह बैठी बैठी गंगा नदी को निहार रही होती, पाल वाली नाव की गति, हवा की गति उससे फैलते सिकुड़ते पाल सब इसकी जद में होते। इसके दु:ख और पीड़ा की सहभागी इसकी अनन्य सखी निधि भी चुप्पी साधे रहती। इन लड़कियों को बिल्कुल यह पता नहीं था कि किनकी निगाहों के वृत्त में ये हैं। ये या तो अपने आप में खोयी रहतीं या अपने भविष्य को लेकर चिंतित रहतीं। स्कोप स्कोप तो बहुत सुना था, पर जाना नहीं। विभागीय पुस्तकालय में किसी किताब के लिए कई दिनों से चक्कर लगा रही थी वीथिका, निधि साथ थी।

‘कई दिनों से आप कह रहे हैं किताब किसी प्रोफेसर ने इशू करा रखा है।’

‘मैं सच ही कह रहा हूँ वीथिका जी।’–पुस्तकालय वाले ने कहा।

‘यह पेपर हेड सर पढ़ाते हैं। नोट्स लेने के लिए इसी किताब का नाम दिया है। हम क्या करें? किनके पास है किताब?’

‘पर यह छात्रों को नहीं दिया जाता है।’

‘मुझे पता है। यहाँ रह कर लेती नोट्स। सर लोगों को सोचना चाहिए।’

‘यह सब न बोलिये, कहीं जाकर कोई शिकायत न कर दे।’

‘ऊँह? बताइये किनके पास है मैं खुद जाकर माँग लूँगी।’

‘हेड सर के पास।’–मुस्कुराया पुस्तकालयाध्यक्ष।

‘ओह?’–कहा वीथिका ने। उसकी मुस्कुराहट गहरी होती जा रही थी। मानो वह जताना चाह रहा है कि अब क्या करोगी?

‘वीथि, क्या हम हेड सर से न मिल लें?’–निधि ने कहा

‘क्या?’–पुस्तकालयाध्यक्ष चौंका।

‘हाँ, और नहीं तो क्या! वे लोग बाबा के पास मंदिर आते हैं। पूजा-पाठ करते हैं? खूब हँसते भी हैं।’–निधि ने समझाया।

‘चलो, देखते हैं अपने चेंबर में हैं क्या?’–वीथिका थी।

‘वो उधर वाली कोठरी में सर बैठकर पेपर वगैरह तैयार करते हैं। वहीं हैं।’– पुस्तकालयाध्यक्ष ने कहा।

‘ओ माँ, बाबा रे, यहीं?’–निधि बोली।

‘तभी तो मैं कह रहा था कि सुन लेंगे।’–फिर मुस्कुराया। लेकिन वीथिका ने सधे कदमों से दरवाजे के पास जाकर दस्तक देते हुए पूछा–

‘क्या मैं अंदर आ सकती हूँ?’

‘आओ, आओ’–आवाज आई। दोनों अंदर आ गई। टेबुल पर कुछ किताबें खुली थीं उनके आगे कागज फैले थे। एक गहरा हरा शेफर्ड पेन खुला था, जिसमें ढक्कन लगाते, उन्हें बैठने का इशारा किया। दोनों संभ्रम-सी बैठ गई।

‘कहिये, मुझसे क्या काम आ पड़ा?’–सामने बैठे सुदर्शन पुरुष ने अपनी दोनों आँखें मानो वीथिका की आँखों में रोप दीं, उसका असर दिल तक गया दिमाग और पूरा वजूद झनझना उठा। कक्षा में भी अब तक चार-पाँच बार पढ़ा चुके हैं। उनकी खूबसूरती और नायाब व्यक्तित्व के सभी छात्र-छात्राएँ कायल हैं। वे आते हैं तो उनके हाथ खाली होते हैं। न रजिस्टर न खली-डस्टर होता। न रोलकॉल होता न ब्लैक बोर्ड की ओर देखते।

‘आज किस टॉपिक पर आगे बढ़ना है?’–पूछते। यदि किसी टॉपिक की तारतम्यता बनती तो छात्र बताते। और वे आगे बढ़ जाते। टेक्स्ट तथा रेफरेंस बुक के साथ प्रकाशक का नाम पता भी मौखिक रूप से बता देते। छात्र छात्राएँ धड़ाधड़ नोट्स लेने लगते।

‘आपलोग कलम बंद करें, मेरी ओर देखकर मेरी बातें सुनें। मैंने जिन किताबों का नाम लिया है वह याद करने को नहीं, पढ़ने को। सिर नीची किये आप लिख रहे होते हैं हम दीवारों को सुना रहे होते हैं। मेरी ओर देखते हुए सुनिये। मैं जबतक आपके भाव न समझूँगा कैसे आगे बढ़ूँगा। चलिये कलम रखिये’–कहते। फाइलें और कलमें डेस्क पर रख दी जातीं। गाल पर हाथ रखकर विनीता सुनती, सभी सुनते। बीच-बीच में वे टोकते।

‘जनाब आप मेरी ओर देख रहे हैं या दीवार पर रेंगती हुई छिपकिली को? ध्यान कहाँ है?’

‘मेरी कक्षा में जिन्हें नींद आने लगे, वे बाहर जायें।’

‘कान खोलकर सुनिये, मुँह खोलकर नहीं।’

‘आपका चेहरा कहीं भाग जाएगा जो हाथों से थाम रखा है?’

इस तरह की बातचीत के कारण प्रो. शिवरंजन प्रसाद खासे लोकप्रिय थे विभाग में छात्र-छात्राओं के बीच।

‘सर आपने जो विषय प्रवेश कराया उसका टेक्स्ट हमने यहाँ लाइब्रेरी से लेकर पढ़ लिया पर रेफरेंस वाली किताब।’–वीथिका ने पूरा किया।

‘मेरे पास है।’–मुस्कुराये।

‘जी’–सर झुका लिया वीथिका ने।

‘अरे अरे यह सचमुच की कमलनाल की गरदन टूट न जाये कहीं, निधि सँभालो अपनी सखी को।’–निधि हँसने लगी। कोहनी से इसे टकोरा यह भी हँसती हुई देखने लगी। वातावरण हल्का हो गया।

‘मेरा काम हो गया।’–उन्होंने घंटी बजाई, पियुन आया। किताब देते हुए कहा–‘साहब से कहो–यह किताब वीथिका सान्याल के नाम चढ़ा कर इन्हें दे दें।’–पियुन किताब लेकर चला गया। दोनों उठने को हुई।

‘थैंक्यू सर,’–कहकर उठीं दोनों।

‘बैठिये, बड़ी मतलबी निकली किताब झींटा और भाग चलीं। चाय वगैरह पीजिये, समय हो रहा है।’

‘नहीं सर, जी सर।’

‘ये क्या है? चाय नहीं या हाँ? वैसे साथ तो देना पड़ेगा।’–उन्होंने चपरासी को बुला कर तीन कप और पॉट में चाय लाने को कहा। दोनों लड़कियों ने एक दूसरे को देखा, वे इन्हें देखते हुए मुस्कुरा रहे थे।

‘वीथिका, मुझे विदेश के एक सेमिनार में जाना है, मैं उसी के लिए तैयारी कर रहा था। अच्छा हुआ आप आईं। टॉपिक मैं देता हूँ, आप आलेख तैयार कर दीजिये।’

‘मैं?’–वीथिका ने अपनी आँखें फैला लीं।

‘नहीं तो कौन?’–मुस्कुरा रहे थे।

‘सर यह कैसे होगा?’–निधि थी।

‘मिस निधि भट्टाचार्य, आप भी तैयार करें। दोनों के पेपर को मिलाकर वहाँ बोलूँगा।’–कहा।

‘ओह नो, माई गॉड!’–निधि ने कहा।

‘यहाँ चल गया सो चल गया, बाबा के सामने दुर्गा दुर्गा कहना है’–फिर हँसी का फव्वारा फूटा। तब तक चाय आ गई। वीथिका ने अच्छी छात्रा बन चाय तैयार की और पीने बैठ गई। बहुत दिनों बाद पॉटवाली दार्जिलिंग चाय पीने को मिली, परितृप्ति से उसकी आँखें अर्धनिमीलित हो उठीं। शिवरंजन प्रसाद उसके आनंद का आनंद लेने लगे।

‘निधि, तुमने प्रचुर दूध और चीनी तो ली होगी।’–फिर सब हँस पड़े ऐसा लग ही नहीं रहा था कि ये अति गंभीर विभागाध्यक्ष प्रो. शिवरंजन प्रसाद के पास बैठी हैं।

‘तुमलोग अलग-अलग बैठकर नोट्स बनाना, आलेख तैयार करना।’ –जाते जाते हिदायत दी।

‘सर, क्या सचमुच लिखना है?’–निधि ने पूछा।

‘हाँ, बिल्कुल। दोनों को अलग-अलग।’

पाँच साल से स्थापित यह विभाग आज खासा ऊष्मा से भर गया था। चपरासी, किरानी, पुस्तकालयाध्यक्ष सभी नये थे। पाँच वर्ष तो हो ही गया था। प्रोफेसर वगैरह भी नये थे जो बाहर के विश्वविद्यालयों से पढ़ कर आये थे। कुछ रिसर्च स्कॉलर थे। गंभीर वातावरण रहता अधिकतर लोग देश के कई भागों में तथा विदेशों में भी विकास पर अपनी बात रखने जाते रहते। थोड़ा कटा कटा सा विभाग तो था। जिन लोगों ने पास किया था वे राजकीय तथा राष्ट्रीय सेवा में चले गये थे। एम.ए. करके पीएचडी में कम लोग आये थे। साल में तीन माह इनका फील्ड वर्क होता। अकसर जूनियर प्रोफेसर साथ होते। इस बार सुदूर गया के जंगल वाले गाँव में चेरो जनजातीय जमात का रहन-सहन खान-पान के संबंध में जानने, अध्ययन करने लड़के लड़कियाँ गये। विपन्न चेरो जनजातीय के लोगों के पास न तो पर्याप्त वस्त्र होते न उनकी जीवन पद्धति वैसी होती कि उन्हें जरूरत होती। स्वल्प कपड़ों में गुजारा करते। लड़के या लड़कियाँ सभी मात्र अधोवस्त्र पहनते, ऊपर नंगे बदन रहते किशोरी और युवतियों को देख लड़के शर्म से भाग खड़े होते। शर्म तो लड़कियों को भी आती पर लड़के टिकते ही नहीं। उनकी कार्यशाला सेकेंड हैंड ही चलती। कुछ युवकों के साथ आखेट करना, जंगल के खेल खेलना उनका शगल होता। प्रोफेसर साहब भी आवास से नहीं निकलते। यह सब पढ़े-लिखे और सभ्य समाज की कुंठायें थीं; वहाँ अभी ये सब नहीं पहुँचा। तीन माह की कार्यशाला के बीच विभागाध्यक्ष पहुँच गये। उन्होंने देखा लड़कियाँ फील्ड वर्क में हैं लड़के चेरो लड़कों के साथ कौड़ी खेल रहे हैं। कारण जानने पर वहीं क्लास लेना शुरू किया।

‘उनकी जीवन दृष्टि, उनकी पद्धति, उनका जीवन-दर्शन देखने सीखने समझने आएँ हैं आपलोग। ऐसे कैसे समझेंगे?’–जोर से कहा।

‘जीवन दर्शन कुछ नहीं है सर, अभावग्रस्त हैं।’–एक छात्र था।

‘अशिक्षा का अंधकार है सर।’–दूसरा था।

‘अध्ययन से अधिक जरूरी है सहायता की।’–तीसरा था।

‘आपलोग ने मोटामोटी समस्या जान ली है। अब इस सबकी रपट बना कर देंगे। विकास की सरकारी दिशा बदलेगी। जंगल में, जंगल के गाँवों में घुसेगी यह जानकर कि हमारे नागरिक यहाँ हैं, इन्हें सहायता चाहिए।’–शिवरंजन प्रसाद ने कहा।

‘सोलह सत्रह साल हो गये आजादी के।’–एक लड़का था।

‘आपलोग ही आगे सरकार में होंगे, ख्याल रखियेगा।’–शिवरंजन बाबू ने कहा और अपने कमरे में चले गये। कपड़े बदलकर चाय पीने पहुँचे, सारे शिविरवासी वहाँ थे।

‘सर, एक बात कहूँ?’–एक छात्रा ने कहा।

‘कहो, क्या कहना है?’–शिवरंजन प्रसाद थे।

‘लड़कियों के साथ हमलोग की अच्छी और सच्ची बातें हुई।’

‘हूँ।’

‘सर हमारे साथी लड़के हमारे विषय में भी कुछ नहीं जानते, न जानना चाहते हैं। रूप-रंग, हाव-भाव देखकर आप कैसे किसी स्त्री की समस्या को ठीक से समझ सकते हैं?’–वह छात्रा विवाहिता थी जिसने कहा।

‘यह सच है, बाहरी आडंबर से समस्या नहीं जानी जा सकती है, न ही समाधान की ओर ध्यान जाता है। मानव मन उलझकर रह जाता है।’

‘सर, सबसे पहले पूरी जमात की समस्या जीवन-रक्षा की है। उस पर ध्यान न गया तो जनजाति विलुप्त हो जाएगी।’–एक छात्र था।

‘जंगल में जानवर की भाँति रहते हैं जबकि जानवर नहीं हैं, वह बनावट भगवान ने नहीं दी है। कपड़े का ज्ञान है पर इनके पास प्रचुर है नहीं, भोज्य पदार्थ की जानकारी है और ये प्राप्त नहीं कर पाते। घर चाहिए धूप, ठंढ और वर्षा से बचने के लिए, वह भी नहीं है। घास और पत्तों के घर बनाते तो हैं। यदि पुख्ता बाँस काठ के घर में हों तो रहना सीख जायेंगे।’–दूसरे लड़के ने कहा।

‘आपका आकलन सही है।’–विभागाध्यक्ष थे।

‘लड़के-लड़कियाँ मिलकर बहुत अच्छा नृत्य करते हैं।’–एक लड़की थी।… ‘संगीत और स्वर भी बढ़िया है।’

‘बर्तन वगैरह बनाना जानती हैं।’

‘हाट से कुछ देकर कुछ ले आते हैं।’

‘जैसे?’ … ‘जैसे मधु सर।’

‘लकड़ी के गट्ठर।’

‘हम इन्हें कुछ दे तो नहीं सकते पर इनको कुछ समझा तो सकते हैं।’

‘हम क्या करेंगे? साधनहीन को सबसे पहले मौलिक आवश्यकता पूर्ति का सामान देना पड़ेगा।’… ‘यह कैसे होगा?’

‘आप अध्ययन कर अपना सामूहिक तथा व्यक्तिगत विचार लिखकर देंगे, फिर उसका उपयोग होगा।’

‘जैसे जलावन देते हैं, आलू बदले में मिलता है।’

‘विनिमय?’… ‘जी सर।’

‘आप चाहें तो अखबारों, पत्रिकाओं में लिखकर छपने दे सकते हैं जिससे आमजन को अपने ही देश के ऐसे बाशिंदे के बारे में जानने का मौका मिलेगा।’

स्ट्डीटूर समाप्त होने के आखिरी दिन वीथिका और निधि किसी बड़े पेड़ से दातौन तोड़ रही थी कि चोट खा गई। एक पतली सी डाल हाथ से छूट गई। वीथिका की गाल पर जा लगी। वीथिका की घुटी सी चीख सुन निधि पास आई; वीथिका ने गाल को हाथ से दबाकर रखा था।

‘क्या हुआ देखूँ?’–अनायास शिवरंजन प्रसाद आ गये।

‘कुछ नहीं सर, जरा सी चोट है।’–वीथिका ने कहा। शिवरंजन प्रसाद ने गाल पर से उसका हाथ हटाया और सहलाने लगे। वीथिका शर्म से गड़ी जा रही थी।

‘अच्छी खासी चोट है। ठंढे पानी से धो लो। निधि, जाओ ट्यूबवेल चला कर इसका चेहरा देर तक धो दो।’–समझाया और चले गये। सारे उपचार हुए। लौटती में वीथिका ने पूरे समय दुपट्टा अपने चेहरे पर लपेटे रखा। सभी सहपाठी उसके इस कष्ट से दुखी थे। प्रो. शिवरंजन की नजर बार-बार उस पर पड़ती। अर्धनिमीलित आँखों से जब कभी वीथिका उनकी ओर देखती एक झनझनाहट का अनुभव करती। उनकी आँखों में भी कुछ था जिसे यह समझ नहीं पा रही थी। कार्यशाला के बाद रपट तैयार करने तक इन्हें रहना था। वीथिका का वह स्थान लाल फिर काला पड़ गया। निधि अपने घर से आकर इसके साथ संयुक्त रपट तैयार कर रही थी। वीथिका बोल रही थी लेटी हुई, निधि लिख रही थी। तभी एक सलोनी सी गदगदी बच्ची आई। आते ही चहकी–‘अरे निधि आंटी?’

‘तुम किधर से यहाँ आ गई?’–निधि ने उसे देखकर कहा।

‘वीथिका आंटी कहाँ हैं?’

‘यही तो है।’–निधि ने कहा।

‘ओ माई गॉड, वीथिका आंटी आपको तो बहुत चोट आई है।’–बच्ची ने कहा। ‘बूढ़ी माई, तुम वीथिका से मिलने आई हो? अकेली हो या माँ भी है?’– निधि ने पूछा, वीथिका मुस्कुरा रही थी।

‘नो, नो, मैं ये दवाइयाँ देने आई हूँ। पापा के साथ। पापा बाहर हैं।’

‘कहाँ? अरे? चलो तो!’

‘पहले दवाई तो लो, होमियोपैथी दवाइयाँ हैं। ये जो पुरजी चिपकी है न, वहाँ सब लिखा है। पापा ने कहा है पूरा इंस्ट्रक्शन फॉलो करना है। ठीक है।’–बच्ची ने डॉक्टर की तरह कहा। वीथिका ने दवाइयाँ लीं और पढ़ने लगी। निधि बच्ची को खींचती हुई बाहर निकल गई। नीचे लाउंज में प्रो. शिवरंजन छात्रावास अधीक्षिका के साथ बैठे चाय पी रहे थे।

‘ओ? तुम ही अटेंडेंट हो?’–छात्रावास अधीक्षिका ने कहा।

‘जी मैम, मैं नोट्स तैयार कर रही हूँ।’–निधि ने हकलाते हुए कहा।

‘ओके, तुम रात में तो नहीं रहती न? नॉट अलाउड।’–बेवक्त की वंशी बजाई।

‘नहीं मैम, मेरा घर तो यहीं है।’–निधि ने दिशा-निर्देशित किया।

‘मुझे पता है, मंदिरवाला।’–उन्होंने कहा। प्रो. शिवरंजन मुस्कुरा रहे थे बच्ची उनसे सटकर बैठ गई।

‘जी मैम।’

‘तुमलोग ने मुझे बताया नहीं, वीथिका को चोट लग गई है। इन्हें दवा लेकर आना पड़ा, यह मेरा काम है न!’–वे तैश में थीं।

‘माफ करें सीता कुमारी जी, हम सब तीन महीने से कार्यशाला के सिलसिले में बाहर थे। वहीं चोट लग गई वीथिका सान्याल को। मैं हेड कर रहा था। मेरा अपना भी दायित्व है न! आप अन्यथा न लें। मुझे कोई परेशानी नहीं है। छात्रों का होना गुरु को सार्थक करता है। यही हमारा परिवार है।’–प्रो. शिवरंजन ने कहा और उठ खड़े हुए। उन्हें पता नहीं चला कि दक्षिण भारतीय सीता कुमारी ने उनकी बात समझी या नहीं। परंतु सीता कुमारी ने सर हिलाया।

‘सो काइंड ऑफ यू सर’–कहा।

‘निधि, कैसी है वीथिका?’–प्रोफेसर साहब ने पूछा।

‘सर, स्किन काला पड़ गया है।’

‘इस दवा से ठीक हो जाएगी।’–वे निकल गये। सीता कुमारी ने उन्हें विदा किया। इसी बीच निधि ऊपर वीथिका के कमरे की ओर भागकर चली गई।

‘निधि, मेरा आज जरा भी मन नहीं है लिखने पढ़ने का। दवा खाकर और आँखों में ड्रॉप डालकर लेट जाऊँ? तुम काम करो यहीं, कुछ भूलने लगना तभी टोकना–‘वीथिका ने कहा।

‘हाँ यार, सर ने भी यही कहा है, स्ट्रेन नहीं लेना है।’

‘पर सीता कुमारी दी जरूर आयेंगी। मैं पड़ी रहूँगी।’–वीथिका ने समझाया।

‘तू ड्रॉप डाल, मैं उन्हें सँभाल लूँगी।’–निधि ने कहा।

ये लड़कियाँ, होस्टल सुपरिंटेंडेंट सीता कुमारी को खूब अच्छी तरह जानती थीं। एक तो मैथेमेटिक्स की प्रोफसर, दूसरी चिर-कुँआरी, तीसरी हिंदी भाषा का अल्पज्ञान। सब मिलाकर उन्हें खड़ूस बनाता।

‘वीथिका, वीथिका किधर हो?’–सीता कुमारी की आवाज सुनकर निधि बाहर निकली।

‘मैम वो दवा खाकर सो रही है। प्लीज मैम।’

‘किधर हैं?’

‘दरवाजा खोल परदा हटा चेहरे पर दुपट्टा डाल कर सोती हुई–वीथिका को देखा सीता कुमारी ने। फिर बड़बड़ाती हुई चली गई। कुछ नहीं समझती हैं ये लड़कियाँ, मुझे नहीं बतातीं। दरअसल उन्हें भय था कि कहीं ये शिकायत कुलपति तक तो नहीं पहुँच जाएगी। एकाध हफ्ते में वीथिका ठीक हो गई। रिपोर्ट भी दाखिल हो गया। छुट्टी से पहले निधि को साथ ले प्रो. शिवरंजन के यहाँ उन्हें धन्यवाद देने पहुँची। वीथिका ने सुन रखा था कि प्रो. शिवरंजन की पत्नी प्रो. रम्या इंदु जो किसी कॉलेज की संगीत शिक्षिका है, बड़ी क्लासिकल गायिका हैं। रेडियों में ‘ए’ ग्रेड की गायिका भी हैं। वे बड़ी व्यस्त जीव हैं। कई जगह स्टेज पर गाती हैं। कुछ शिष्य भी हैं इनके। प्रो. शिवरंजन और मैम रम्या सहपाठी रहे हैं। इनका प्रेम विवाह हुआ था। प्रोफेसर साहब के यहाँ जब पहुँची वीथिका और निधि तब वे गमलों की निराई गुड़ाई कर रही थीं। गेट की आवाज सुन पीछे देखा। निधि के साथ वीथिका थी। निधि ने उन्हें वहीं से पुकारा।

‘प्रणाम आंटी’

‘खुश रहो’–उन्होंने हर्षित होकर खुरपी रख उन्हें बुलाया। लॉन में तीन चार कुर्सियाँ और टेबुल लगे थे।

‘आओ बैठो, मैंने जान लिया था कि तुमलोग आने वाली हो तभी तो टेबुल कुर्सी लॉन में लगवाया’–उन्होंने वहीं रखी झाड़ी से जल लेकर हाथ धोया। कमर में खुंसे छोटे तौलिये से हाथ पोंछा और आकर बैठ गई। सफेद वायल की साड़ी पर छोटे छोटे नीले पीले फूल छपे थे। रम्या इंदु जी गहरे काले रंग की थीं। चिकना चेहरा था, उभरे हुए ओठ थे जिससे दाँत जब तब बाहर झाँक जाते थे। असुंदर रम्या इंदु जी की बातचीत स्निग्ध अहसास भरती थी। मन में ए ग्रेड की गायिका जिनकी स्वर लहरी हजारों को बाँध लेती है की यह छवि कतई नहीं थी वीथिका के। साथ ही यह सुना था कि कॉलेज के दिनों से ये प्रेमी थे, छह साल की कोर्टशिप के बाद शिवरंजन के प्रोफेसर लग जाने के बाद ही इनके पिता ने विवाह किया था। प्रो. शिवरंजन प्रसाद साधारण घर के पिताहीन बालक थे, रम्या इंदु बड़े कलाकार की बेटी थीं। यह सब तो ठीक था परंतु वीथिका को यह जोड़ी थोड़ी अटपटी लगी। ‘दिखाओ वीथिका, कहाँ है तुम्हारी चोट?’–वीथिका ने अभी भी दुपट्टे से चेहरा ढँक रखा था। उन्होंने दुपट्टा हटाकर देखा। चेहरा साँवला पड़ गया।

‘अभी घर जाकर भी दवा खाती रहना। खून जमा है।’

‘जी, ले रही हूँ।’–वीथिका ने कहा। मन में अचानक उठा बवंडर थम सा गया कि प्रो. शिवरंजन प्रसाद जैसे स्वरूपवान की पत्नी इतनी कुरूप कैसे है? यह अधिक अचंभे की बात थी कि प्रेम विवाह था। उनका वत्सल स्पर्श और स्नेहिल स्वभाव, अनौपचारिक व्यवहार सब कुछ को दरकिनार कर सामने खड़ा था। घर में प्रोफेसर साहब और दोनों बच्चियाँ नहीं थीं। क्लब में बच्चों वाली फिल्म दिखानी थी, वहीं लेकर गये थे।

‘मैं सर को कुछ कहने लायक तो नहीं हूँ फिर भी उनको आभार कहने आई थी मैम! आप ही कह देंगी।’

‘अरे क्या बात है, वे तुम्हारे अभिभावक हैं। यह उनके कर्त्तव्य में शामिल है। आभार की क्या बात है? लेकिन तुम आई, मैं बता दूँगी।’

‘मैम, मैं अब विश्वविद्यालय खुलने पर ही आऊँगी। मेरा और निधि का ज्वाइंट रिपोर्ट है। आगे का काम निधि कर लेगी।’

‘सही बात है। यह सब मुझे कहने की या उनको कहने की भी कोई जरूरत नहीं। मैं तुम्हारी बात उनसे नहीं कहूँगी। तुम आई यह मैं जरूर कहूँगी।’–उनकी कटी सी बात सुन वीथिका आहत हुई। उसे समझ में ही न आया कि अभी अभी ये इतनी वत्सल थीं अब क्या हो गया? दोनों उनके अहाते से बाहर निकल आईं। रिक्शा लिया और होस्टल की ओर चलीं। निधि ने देखा वीथि का चेहरा उतरा हुआ है, वह चुप ही हो गई।

‘क्या हुआ वीथि? अचानक चुप क्यों हो?’

‘दाँत में दर्द है, आँखें सूज गई हैं, मुँह नहीं खुलता, और कुछ?’

‘अरे तो चिढ़ क्यों रही है?’

‘सच कह रही हूँ। इतनी देर से मुस्कुरा तो रही थी, चैन नहीं पड़ी तुझे?’

‘मैं समझ रही हूँ तू क्यों नाराज है।’

‘वो आंटी ऐसी ही हैं। कोई साइकोलॉजिकल प्रॉब्लम है। हम उनसे मिल गये, यह महज इत्तफाक था, वरना गये तो थे सर से मिलने।’

‘पता नहीं।’–घर जाने तक निधि से नाराज सी रही वीथिका। –‘निधि समझ रही थी कि एक तो बेचारी को तकलीफ है, ऊपर से रम्या आंटी की बात। पर इसमें निधि का क्या दोष?’–यह सब कुछ ही दिनों की बात थी। निधि अपने काम में लग गई और वीथिका माँ की गोद में सर रखकर सोने में लगी। माँ को पता था कि उसकी यह छोटी बेटी अपने पिता की तरह भावुक है। बचपन से जिस बड़ी बहन के साथ रही उसकी बातों का भी बुरा लग जाता है इसे। पता नहीं क्यों तकलीफ में है? यूथिका का कहना है कि चोट के कारण पूरा स्कल दर्द कर रहा होगा, क्या बोले। पर मन ही मन समझती है जब जब किसी पीड़ा में पड़ती है, बाबा याद आते हैं। याद सबसे अधिक यूथिका को आते हैं, जब उसने बैंक में कम्पीट किया, जब कर्जे चुका दिये, जब माँ के साथ तीनों व्यवस्थित हो गये तब बड़ी शिद्दत से उनकी कमी खली। अपनी एक्सलेंट रिपोर्ट कार्ड दिखाने बाबा के पास दौड़ती थी, वैसे ही दौड़कर बताना चाहती थी कि बाबा, ओ बाबा तुम्हारा सारा ऋण सोध कर दिया। गोपालपुर गाँव की जमीन में गोपालभोग धान की फसल लगी है। तब क्या करती है यूथिका, बाथरूम में बैठकर रोती है। माँ का दुःख बढ़ाना नहीं चाहती, वीथिका को विचलित करना नहीं चाहती। बड़ी होना इसे ही कहते हैं, सभी के अभाव का संत्रास का गरल पीती रहो। इस बार वीथि को शारीरिक कष्ट हैं। वह ऑफिस से आकर उसका माथा सहलाती है। उसकी रुचि देखकर कहती है कुछ।

‘वीथि, ओ वीथि तू आगे क्या करेगी? किसी कॉम्पिटिशन में बैठेगी? या सोशलवर्क वाले फील्ड में जाएगी?’–पूछती।

‘दीदी, ज्यादातर लोग सोशलवर्क के फील्ड में जाते हैं, कॉम्पिटिशन का भी यह बहुत ही पापुलर विषय है। मेरा मन है कॉलेज ज्वाइन करने का। बड़ी तेजी से सभी कॉलेज में डिपार्टमेंट खुल रहे हैं।’

‘योजना तो अच्छी है पर पढ़ाई खूब करनी पड़ेगी। पीएचडी करना पड़ेगा।’

‘हाँ दीदी, वह तो करना पड़ेगा।’

‘ठीक है, तुम्हारी इच्छा है तो वही सही।’

सोचते विचारते वीथिका को लगा कि मैडम रम्या इंदु का व्यवहार जो था सो था, अधिक दुःख इसे मिला है अपनी सोच से। उनकी शुरुआती बातचीत से लहालोट हो इसने बड़ी-बड़ी बातें सोच ली थीं। उन्हें पौधों में संलग्न देख इसने निष्कर्ष निकाला कि ये बगीचा सजाने की इच्छा रखती है। इसने सोचा माँ से माँगकर कुछ नये किस्म के सुंदर फूलों वाले पौधे इन्हें लाकर भेंट करेगी। इनके प्रति मन अगाध प्रेम से भर गया था। ऐसा क्यों हुआ था? क्या सिर्फ सद्व्यवहार के कारण कि किसी और कारण? इसके प्रिय प्रोफेसर शिवरंजन प्रसाद की प्रेमिका पत्नी हैं। उनकी ब्याहता होने से पहले से प्रेमिका रही हैं। इन पर प्रोफेसर साहब का दिल लुट गया, यह विशिष्ट हैं। इन्हें वीथिका अतिविशिष्ट श्रेणी में रखकर देखने लगी। इसका मन आहत इसके अपने अतिरंजित सोच के कारण हुआ। ठीक कहती है दीदी और कई बार माँ भी कि भावुक इनसान बात बात में आँखों में पानी भर लेता है। दृष्टि धुँधली हो जाती है। वह सच नहीं देख पाता, झूठ नहीं पहचान पाता। वीथिका ने अपने भावुक मन को खूब लताड़ा। संकल्प किया कि वह भावुकता में कभी नहीं फँसेगी।

इस संकल्प से मनप्राण को सुकून मिल गया। वीथिका ने माँ को पकड़ा और गहरी नींद सो गई। दूसरी सुबह रविवार की थी। सुबह सबेरे तीनों माँ बेटियों ने बिस्तरे पर चाय पी। चाय बनाया वीथिका ने। वीथिका का उत्फुल्ल मन देख माँ और बहन आश्वस्त हुई। अब उन्हें लगने लगा कि चोट के दर्द के कारण ही वीथिका अनमनी सी थी।

छुट्टी खत्म होने पर वह तुरत चल दी। चेहरा ऊपर से सामान्य हो गया था। अंदर से हड्डी में दर्द था। सामान रखकर, नहा धोकर तैयार हुई कि निधि के घर जाया जाएगा। जाते समय अकारण रूठ गई थी, निधि से उसने मुँह फुला रखा है। उसका प्रमाण है कि निधि ने कुशलादि पूछने के लिए एक पोस्टकार्ड तक नहीं डाला। कमरे से बाहर निकली ही थी कि जमादारिन सेमिया मिल गई। युवती जमादारिन इन लड़कियों से खासी हिली-मिली थी।

‘आज आई हैं दीदी?’–उसने पूछा।

‘हाँ, दो-तीन दिन पहले आ गई हूँ। कुछ काम है।’–इसने कहा।

‘आपको निधि दीदी के घर के बारे में कुछ पता है?’

‘क्यों क्या हुआ? नहीं पता।’–यह घबड़ा गई।

‘बड़ा हादसा हो गया दीदी, भैया गंगा जी में नहाने उतरे थे, मैया ने बलि ले ली। बाबा अचेत हुए सो अब तक क्या कहते हैं कोमा? हाँ उसी में चले गये हैं।’–सुनकर लगा वीथिका को, कि गश खाकर गिर पड़ेगी। आँसुओं से गला तथा नाक बंद हो गया। वह बेसिन की ओर भागी। चाबी सेमिया को पकड़ा कर ताला खोलने को कहा। सेमिया ताला खोल दरवाजा पकड़ कर खड़ी थी। पूरा मुँह आँख नाक धोकर वीथिका कमरे में आई और कटे पेड़ की तरह पड़ गई। फूट-फूट कर रोने लगी। सेमिया झाड़ू कटका छोड़ उसके पैर सहलाने लगी।

‘दीदी, हिम्मत करो।’–थोड़ी देर रोकर आश्वस्त हुई वीथिका को।

‘कब हुआ सेमिया?’

‘आपके जाने के हफ्ते भर बाद।’

‘कहाँ हैं अंकल भर्ती?’

‘यूनिवर्सिटी वार्ड में दीदी।’

‘तेरही के बाद पूजा कराने की बात हुई है। दीदी पेट और जिनगानी बहुत कठिन है चलाना।’

‘मंदिर की पूजा?’

‘जी दीदी। मंदिर के चढ़ावे से ही घर चलता था और मंदिर के पुजारी का जो घर है वहीं रहते थे। अब अगर नया पुजारी आयेगा तो सब उन्हीं का होगा घर में कोई पुरुष है नहीं। बड़ी दीदी लोग शादीशुदा हैं। दूल्हा जी लोग तो बढ़िया नौकरी कर रहे हैं। बच गई निधि दीदी।’

‘तो निधि क्या करेगी?’–वीथिका अचरज में पड़ गई।

‘सुन रहे हैं कि निधि दीदी की तरफ से आवेदन गया है।’

‘हम होकर आते हैं सेमिया।’

‘जी दीदी, हो आइये।’–अपने आपको मजबूत किया वीथिका ने। पिता के जाने का दु:ख यह झेल रही है। यहाँ तो दुहरा दु:ख है। भाई चला गया पिता उसी मार्ग पर हैं। पता नहीं आंटी और तीनों बहनों का क्या हाल होगा। उधेड़बुन करती हुई वीथिका पहुँची। सबसे पहले मंदिर गई। माता के दर्शन किये। माता का शृंगार वैसा ही था जैसा पहले होता था। सामने आसन पर पीठ किये लाल वस्त्रों में निधि आँख बंद किये बैठी थी। माथे पर चंदन और रोली सजी थी। चंदन भी संभवतः रक्तचंदन था। जप करने में निधि तल्लीन थी। वीथिका पार्श्व में बैठ गई। लगभग आधा घंटा वह बैठी होगी, निधि जप करने में डूबी थी। दीन दुनिया की परवाह नहीं थी उसे, वीथिका हौले से उठी, घर की तरफ आ गई।

‘ओ माँ गो, देखो वीथिका आई है।’–अचिरा टेबुल पर खड़ी-खड़ी कपड़ों में इस्तरी कर रही थी।

‘हाँ, देख रही हूँ।’–कोई सब्जी काट रही थी रूचिरा

‘चाची जी किधर हैं दी?’–पूछा वीथिका ने।

‘उधर’–बरामदे पर रखी खाट पर क्षीणकाय चाची पड़ी थीं। सब अपने आप को काम में व्यस्त दिखाने की कोशिश कर रही थी।

‘रूचि दी, मैं अभी मंदिर से आई हूँ। वहाँ निधि ध्यानमग्न होकर जप कर रही है। एकाग्र इतनी कि मैं गई बैठी वह समझ न पाई। दीदी, कहाँ गई वो चंचला निधि।’–दोनों बहनों ने भावहीन चेहरा बनाकर सारी बातें सुनी और कहा।

‘वीथि, तुम उसे तंग न करो। वह बाबा की जगह पुजारी नियुक्त होने वाली है। तांत्रिक जप कर रही होगी। सीखना तो होगा।’–अचिरा ने कहा।

‘कोई पुजारी ढूँढ़ लीजिये दी, वह एम.ए. फाइनल में हैं। सब चौपट होगा।’

‘मंदिर, मंदिर से लगा घर सब दूसरा पुजारी ले लेगा। तांत्रिक पूजा के लिए ही इतना सब मिला हुआ है।’–रूचिरा थी।

‘यह कॉलेज यूनिवर्सिटी है दीदी।’

‘सुनो कॉलेज बनने से पहले से हमारी पाँच पीढ़ी पहले के पूर्वज के समय से है। बाद में कॉलेज ने लिया यह एरिया। हमलोग वैष्णव तांत्रिक परिवार के हैं।’–अचिरा ने कहा।

‘कुछ समझ नहीं पाती। कब मिलूँ निधि से?’

‘दो घंटा बाद आना।’–वीथिका थके पाँव और भारी मन से लौटी अपने कमरे में। मृत्युबोध ही भयावह है। बाबा को घुट-घुट कर मरते देखा है। बिल्कुल इसी की स्थिति है निधि की। बड़ी बहनें हैं दो-दो। दोनों ब्याही, उत्तरदायित्व लेने को कोई तैयार नहीं। माँ अशक्त; वीथिका की दीदी पिता की भूमिका में है। और ये दोनों यहाँ यों ही हैं, चली जायेंगी। कोमा में पिता, अशक्त माता और देवी मंदिर निधि के हवाले छोड़कर। कैसे यह सब निधि कर पायेगी। वीथिका दो घंटे बाद फिर आई। दोनों बहनें अपना-अपना सामान बाँधकर रिक्शे में बैठी थीं। माँ वैसे ही खाट पर लेटी थीं। निधि ने सफेद धोतीनुमा साड़ी पहन रखी थी। हाथ खाली लंबे खुले बाल और ललाट पर चंदन का टीका लगा था। वीथिका को देख उनलोग को बिल्कुल अच्छा नहीं लगा निस्पृह भाव से वे चल दीं। वीथिका निधि के पास आई। उसका हाथ पकड़ा और रोने लगी। इसके रोने से उद्वेलित होकर निधि भी भरभरा कर रोने लगी। धीरे-धीरे दोनों हिचकियाँ लेकर रोती रहीं। खाट पर पड़ी माँ चुपचाप दोनों को देखती रही। बरामदे के सामने एक गोल चबूतरा था, वह इनलोग की पसंदीदा जगह थी। वहीं जाकर बैठ गईं।

‘निधि ये मैं क्या सुन रही हूँ। क्या तुम मंदिर की पुजारी बनोगी? ये कैसे होगा?’

‘कोई चारा नहीं है। खुशी है कि देवी मंदिर है।’

‘अरे यार, दीदी लोग कह रही थीं तांत्रिक पूजा होती है। तो क्या तुम मशान जाती हो?’

‘यहाँ वैष्णव तंत्र है, वह भी सात्विक। क्या तुमने कभी बलि वगैरह देखा है यहाँ?’–कहा निधि ने।

‘नहीं, कभी नहीं। वो तो नहीं देखा।’

‘लेकिन उसकी, जो मैं करूँगी, दीक्षा लेनी होगी।’

‘मैं कुछ नहीं समझ रही हूँ तेरी ये अजीबोगरीब बातें।’

‘रहस्यमय तो है पर यही रोजी-रोटी है।’

‘छह माह है, एम.ए. पास कर लेगी। चाहे तो अभी भी काम मिल जाएगा। काम की इतनी भी किल्लत नहीं है।’

‘है न, इतना बड़ा आवास और चढ़ावे की सामग्री, रुपये पैसे कहाँ मिलेंगे? यदि हमसे यह सध जाएगा तो ठीक है।’–तब तक माँ धीरे धीरे चल कर आ पहुँची। हमलोग के सामने बैठ गई। धीमी आवाज में बोली–‘अचिरा का एक ममेरा देवर है। वह वैष्णव तंत्र जानता है। उसको वह लेकर आई थी। वह रहता और पूजा-पाठ करता। उसी से निधि का ब्याह भी कर सकते हैं।’–सुनकर वीथिका का कलेजा धक् से रह गया।

‘यहाँ आया था?’–निधि की ओर देखकर कहा।

‘यह कहती है बियाह टियाह नहीं करेंगी। ऊ बोला, बिना बंधन के हम रहेंगे, किसी दिन कोई पीठ पर लात मार के भगा देगा तब हम क्या कर लेंगे? धोड़े का अंडा?’

‘चाची, शादी ब्याह ऐसे ही कैसे कोई लड़की कर लेगी?’

‘जरूरत पर गदहे को बाप कहते हैं वीथि बेटी।’

‘वीथि, तुम बेकार बहस करती हो, मैं खुद तैयार हूँ पुजारी बनने के लिए वह आई.ए. फेल लड़का क्या पूजा करेगा? वह गाँजा फूकेगा बैठकर। गंदा लड़का।’

‘तू मजबूर है निधि यह सब करने के लिए, लेकिन सक्षम है सभी प्राचीन आडंबरों को तोड़ डालने के लिए।’

‘मैं समझती थी तुम इसको समझाकर सीधा रास्ता पर लाओगी, लेकिन तुम उलटा ही बोल रही हो। मेरी तरफ कोई नहीं है।’

‘देखो क्या कह रही है।’–निधि ने विरक्त होकर कहा।

‘मैं देख रही हूँ कि तुम्हारे एक तरफ कुआँ है दूसरी तरफ खाई। तुम इस परिस्थिति से कैसे निकलोगी? मैं समझती हूँ यह सामाजिक मामला है, सर से पूछना चाहिए समाधान।’–वीथिका की इस नादानी पर निधि हौले से मुस्कुराई।

‘सर के पास? समाधान? वो यदि कर पावे तो अपने घर में इतना न सह रहे होते। फिर भी करती हूँ बात।’–निधि ने कहा।

‘मैं चलूँ निधि अभी तक सीता कुमारी से मिली नहीं।’

‘रुको, रिपोर्ट ले जाओ।’–वह कोठरी में जाकर रिपोर्ट ले आई।

‘लो, मैं तैयार कर चुकी थी, टाईप नहीं करवाया करवाने जा रही थी कि तब तक।’–निधि थी।

‘लाओ, मैं करवा लूँगी।’–वीथिका ने लिया और होस्टल पहुँच गई। सीता कुमारी से मिलने गई। उन्हें बताया कि वो सुबह नौ बजे ही आ चुकी थी। लेकिन निधि के यहाँ चली गई।

‘मैम, मुझे नहीं पता था, यहाँ आकर पता चला।’

‘बहुत बुरा हुआ, मैं गई थी, रोना आ रहा था।’–सीता कुमारी ने कहा वह अभी भी रुआँसी हो गई।

‘सबसे बुरा है कि बाबा कोमा में चले गये हैं।’

‘क्या करोगी? सब उनके हाथ में है।’–कहा सीता कुमारी ने और पढ़ाई ठीक से करने की हिदायत दी। इसका मन कर रहा था कि यह जाये प्रो. शिवरंजन प्रसाद के घर और उनसे आग्रह करे कि वो निधि को उस आडंबर से निकालें, जिसके विषय में निधि कुछ नहीं जानती वह न करे। कोई उपाय निकालें। उन्हें फोन करना चाह रही है। लेकिन डर है कि कहीं रम्या मैडम न उठा लें। इसके मन में उनके प्रति भय समा गया था। रातभर ठीक से नींद नहीं आई। सुबह नहा-धो, चाय नाश्ता कर निधि के यहाँ गई। निधि मंदिर में ही मिली। संयोग से प्रो. शिवरंजन प्रसाद भी निकट ही आसन पर बैठे मिले।

‘आओ वीथिका, बैठो।’–प्रोफेसर साहब अनौपचारिक थे। खिसककर पार्श्व में जगह बना दी। निधि ने दूसरी आसनी खिसका दी। वीथिका बैठ गई।

‘मैंने निधि से कहा है कि एक पुजारी लड़का ढूँढ़ लेता हूँ। वह सुबह-शाम मंदिर का काम कर लेगा, पूजा कर लेगा, सफाई करेगा। जो पूजा करने वाली आती है उन्हें पूजा करवा देगा। उसे वेतन और भोजन देगी। दान-पेटी तथा चढ़ावे पर उसका अधिकार नहीं होगा। विश्वसनीय लड़का देखता हूँ। यही अपने राधाकृष्ण मंदिर के पुजारी को देखता हूँ पूछकर।’–प्रोफेसर साहब ने कहा।

‘मुझे आपका विचार सही लगता है सर।’–निधि ने कहा

‘तांत्रिक पूजा का क्या होगा?’–वीथिका ने पूछा

‘अभी नहीं होगी वह पूजा।’–प्रो. शिवरंजन ने कही यह बात।

‘पर चाची तैयार होंगी?’

‘उनके न तैयार होने से क्या होगा?’–निधि तल्ख थी।

‘देखो वीथिका, मैं भट्टाचार्य महोदय का बहुत आदर करता हूँ। इसीलिए इतना सब कर दूँगा वरना किसी को क्या पड़ी है। इन सबके बाद, पंडित जी के स्वस्थ्य हो जाने के बाद ही कोई और निर्णय लिया जा सकता है। कुलपति से मिलकर हमने यथास्थिति को बरकरार रहने देने का आग्रह किया है।’

‘जी सर’–वीथिका थी।

‘निधि पढ़ने में मन लगाये। फाइनल परीक्षा नजदीक है।’ यही हुआ। राधेश्याम मंदिर के पंडित जी का शिष्य सेवा में लग गया स्कूल में पढ़ने वाला था वह, किशोर। निधि के छोटे भाई की तरह रहता। निधि उसे पढ़ा भी देती। वह निधि की माँ को बिल्कुल पसंद नहीं था। उसे दुरदुराती रहती। लेकिन निधि अब एम.ए. की तैयारी में जी जान से जुट गई।

लाइब्रेरी में अकसर अपने कक्ष में प्रोफेसर साहब वीथिका को बुला भेजते। परीक्षायें हुई। वीथिका तो प्रथम आई पर निधि का अंक ठीक ठाक ही आया।

‘वीथि, तेरे लिए मुझे बहुत खुशी है। मैं जरा ज्यादा ही परेशान रही। बाबा की देखभाल, माँ का चिड़चिड़ापन। हर माह आकर दीदी लोग का हिसाब किताब, मैं तबाह थी। यार, तूने कहा तो परीक्षा दे दी।’

‘तुम क्या सोचती हो निधि कि एक साल के बाद अच्छी परिस्थिति हो जाएगी? तुम्हारा वहम है। क्या हुआ? उच्च द्वितीय श्रेणी का नंबर है तेरा पीएचडी के लिए रजिस्टर हो जा।’

‘हो जाऊँगी। रम्या आंटी भी यही कह रही हैं।’

‘मैं भी होने वाली हूँ।’

‘तेरे वी.सी. अपॉइंटमेंट के लिए सर लगे हैं। हो ही जाएगा। हर टॉपर का हो जाता है। ऐसे भी जगह है विश्वविद्यालय में, रमोला मैम मेटरनिटी लीव में गई हैं, भगवंत सर अब्रोड गये हैं दो साल के लिए।’

‘तेरा कहा सच हो काश!’–संयोग ऐसा कि दोनों को नौकरी मिल गई। कुलपति द्वारा बहाल हुई कमीशन से हो जाने की प्रत्याशा में। साथ ही इनलोग ने शोध के लिए निबंधन भी करा लिया।

निधि के पिता जी दिन व दिन छीजते जा रहे थे। निधि ने मन में सोच लिया था कि अब यदि बाबा के नाम पर मिला हुआ यह आवास हाथ से चला जाएगा तो उतना डर नहीं है क्योंकि इसके पास नौकरी है, वह भी इसी परिसर की। माँ बहुत अधिक परेशान रहने लगी थी। रूचिरा और अचिरा आतीं तो अधिक उग्र हो जातीं। उन्हें अपने पोला शंखा सहित सिंदूर अंकिता परलोक जाना था। यही रहती कहतीं।

‘निधि? देखो रात में वो लड़का मेरे माथे पर एक लोटा पानी डाल दिया देखो मेरी माँग धुल गई।’–कहती। निधि हाथ का आइना लेकर दिखाती।

‘नहीं माँ, देखो तुम्हारी माँग भरी है।’–

‘और चूड़ी चुरा लिया मेरे हाथ से। वह काली मंदिर का चढ़ावा था।’

‘नहीं माँ, उसने नहीं चुराया। ये देख।’–हाथ पकड़कर दिखाती। निधि को पता था कि माँ का द्रोह है उस बच्चे के प्रति, सो कुछ भी कहती रहती है।

धीरे धीरे माँ छीजने लगी, सब कुछ भूलने लगी। निधि की बहनों की ही उपस्थिति में शांखा पोला सिंदूर सहित महाप्रयाण कर गईं। क्रियाकर्म के बाद बहनों का दबाव बढ़ गया विवाह करने पर। वर खोजा हुआ था, वही मूर्ख गँजेड़ी तांत्रिक।… ‘तुम अकेली यहाँ कैसे रहोगी?’–अचिरा ने कहा।

‘काम करने वाली को एक कमरा दे रही हूँ दीदी।’–निधि ने कहा था।

‘बेकार जिद है तुम्हारी। यहाँ इस मंदिर में कोई नहीं आते। सब अब काली मंदिर में जाते हैं। पूजा ही बंद है।’–रूचिरा ने कहा।

‘ऐसा कुछ नहीं है दीदी, वहाँ जो जाते थे वे ही जाते हैं।’

‘तुम शादी कर लो ये हमारा देवर सब सँभाल लेगा।’

‘सँभालने के लिए मैं उस नालायक गँजेड़ी भँगेड़ी से शादी कर लूँ?’

‘क्यों, करने में क्या हर्ज है? उच्च कुलीन, संस्कृत का पंडित है।’

‘मैं अपने पैरों पर खड़ी हूँ। आपलोग यह घर सँभालिये। मैं चली यहाँ से।’

‘तुम कहाँ चली? बाबा को कौन देखेगा?’

‘अगर आपलोग इतनी निर्मम हो कि बाबा की संपत्ति के तो हिस्सेदार बन जाओ, पर उनकी देखभाल न कर सको तो जाने दो मैं देख लूँगी। इसके लिए मुझे शादी करनी पड़े यह मंजूर नहीं।’–निधि थी। दोनों बहन एक दूसरे का मुँह देखने लगी। निधि ने उस दिन रेलिंग पर खड़े गंगा की ओर देखते हुए कहा सब कुछ वीथिका से।

‘रिसर्च स्कॉलर के रूप में होस्टल में ही रह गई हूँ निधि। लेकिन ऐसी बात होगी तो हम एक फ्लैट साथ में ले लें किराया पर और रह जाये साथ।’–वीथिका ने निधि को सुझाया।

‘यह अच्छा विचार है, रोज की किचकिच से दूर रहेंगे हम।’–दोनों लौटी रास्ते में ही पुरानी दाई मिल गई। उसने रोककर घर का हाल चाल पूछा, निधि ने कहा–‘सब ठीक है, दीदी लोग है उनसे मिल लो।’

‘मैं तो जरूर मिलूँगी। तुम बताओ तुम्हें कितने रुपये अशर्फी वगैरह और गहने दिये बहनों ने बाँट कर?’–पूछा उसने।

‘कुछ भी नहीं।’–निधि ने कहा। ‘तू जा मैं दो घंटे बाद आती हूँ।’ सचमुच दो घंटे बाद वह पहुँच गई। बरामदे पर माँ वाली खाट पर निधि लेटी थीं, दोनों बहन इसे कोस रही थीं।

‘क्या सब चल रहा है बबुनी लोग?’–कामवाली ने पूछा।

‘कुछ नहीं दाई, ये राजकुमारी शादी नहीं करेंगी। इनके लिए स्वयं राजा वल्लाल सेन आयेंगे रथ लेकर, इसका हाथ पकड़के रथ में बैठा देंगे समझी?’–रूचिरा ने कहा।

‘मैं शादी नहीं करना चाहती, कहा न!’

‘प्रतिमा दीदी की तरह अकेले रहेगी, मनमर्जी है न निधि!’

‘ठीक समझी दाई। प्रतिमा दीदी की तरह कुँआरी रहेगी।’

‘हाँ, तुम्हारा ब्याह होगा समझी’–अचिरा ने कहा।

‘दीदी गहने वगैरह तो होंगे ही पुराने वाले।’

‘हाँ बेचारी ने अपनी बहू के लिए भारी, भारी कंगन, सीताहार चूड़ी बनवा के रखा था। लेकिन माँ काली को मंजूर नहीं था।’–अचिरा थी।

‘छोटी बॉबी के लिये?’–कामवाली ने पूछा।

‘उसके लिये भी है। शादी करेगी तो देंगे न!’ बहनों ने सोच रखा था कि शादी निधि को करनी ही पड़ेगी, वह भी उसी लड़के से।

‘मैं यदि शादी न करना चाहूँ तो क्या मुझे मेरा भाग नहीं मिलेगा? और बहू वाले गहनों का क्या होगा?’–निधि ने कहा।

‘ठीके कहती है छोटी बबुनी।’–कामवाली थी।

‘तुमको किसने बीच में बोलने कहा बुढ़िया?’–रूचिरा ने डाँटा।

‘ये लो, हमही तो आकर बात चलाये हैं, न तो तू लोग? तू तो बड़ी घाघ हो। हमारे हाथ की जन्मी हो लोग, सबको तेल लगा के, पोतड़ा धो के बड़ी किये हैं, कहती है का मतलब है? छोटकी बॉबी सीधी है तो तू लोग उल्टा पुल्टा बात बोलती हो?’

‘ये तुम जाओ यहाँ से निकलो।’–अचिरा ने डाँटा।

‘हम नहीं जायेंगे, लो यहीं बैठ गये, चलो निकालो कैसे निकाल बाहर करती हो।’–वह बैठ गई चबूतरे पर। दोनों बहनें एक दूसरे का मुँह देखने लगीं। निधि को भीतर ही भीतर हँसी आ रही थी। वैसे दोनों में पटती नहीं, निधि का भाग हड़पने में एक हो गई है। समाधान यह निकला कि रूचिरा ने चाय बनाई और बिस्किट संग उसे दी।

‘लो दाई माँ, चाय पी लो। गुस्सा न करो। हमें पाला है तुम्हीं ने। हम सब तुमको माँ का दर्जा ही तो देते हैं।’–देते हुए कहा।

‘हमलोग का दिमाग ऐसे ही खराब है।’–अचिरा ने आँसू बहाते हुए कहा।

‘नः, मत रो बेटी, हम समझते हैं, भारी विपदा पड़ी है, तुमलोग पर। एक साथ इतना सब।’–चाय पीने लगी। वह तुरत पिघल गई। जाते हुए हिदायत करती गई कि उस अनपढ़ गँजेड़ी से नहीं करना शादी। कामवाली के जाने के बाद दोनों बहनें फट पड़ीं निधि पर–

‘उसे घर का मामला क्यों बताई? वह सब जगह बोलती चलेगी।’

‘हमलोग पर वह शासन करेगी?’

‘दीदी, मेरी उससे देखा-देखी ही यहाँ गेट पर हुई है। मैं नहीं जानती वह कैसे ये सब जानती है। बहुत सी बातें तो मुझे भी नहीं पता छोड़िये भी।’–निधि ने कहा।

‘देख हमने तेरी भलाई के लिए ही शादी की बात छेड़ी है।’–अचिरा थी।

‘दीदी, मैं बच्ची नहीं। यूनिवर्सिटी में पढ़ाती हूँ। शादी नहीं करनी है।’

‘देख निधि शादी तो तुम्हें करनी ही पड़ेगी। उस प्रोफेसर के बहकावे में आकर बेकार की रट न लगा। उसने नौकरी देकर तुझे जरखरीद गुलाम बना लिया है। हम सब समझते हैं।’–रूचिरा को कहते ही मानो वज्र गिर पड़ा इसके सामने। हे प्रभु, हे देवी, यह क्या, जिसे मैं अंकल कहती हूँ उन पर यह लांछन! इसका रोना सूख गया। यह उठी और सीधे होस्टल आई। वीथिका से कहा कि ‘हमें अब वहाँ नहीं रहना।’

‘ठीक है। तुम बैठो, मैं आती हूँ।’–वीथिका चली गई। वह सीधे सीता कुमारी के पास गई।

‘मैम, एक समस्या है, निधि का मन विचलित है। क्या आज रात मैं उसे अपने कमरे में रख सकती हूँ?’–सीता कुमारी से कहा।

‘ओके, कोई बात नहीं। वह कागज लो और अप्लीकेशन मेरे नाम से लिख दो कि रात में निधि तुम्हारी गेस्ट बन कर रहेगी।’–सीता कुमारी ने कहा। वीथिका ने आवेदन लिखकर रख दिया और ऊपर आ गई। दूसरे दिन इन्हें कहीं जाना नहीं पड़ा वहीं कैंपस में अपने ही क्वार्टर में ललिता दीदी ने एक कमरा दे दिया। सीता कुमारी ने भी कहा कि दोनों को रिसर्च स्कॉलर के रूप में रखा जा सकता था। इस बीच पंडित जी भी कोमा से निकल कर महाप्रयाण कर गये। वही जो होना था सो हुआ। मंदिर की पूजा राधेश्याम मंदिर वाले ने अपने हाथों में ले ली। जब तक वे छोटे से आवास को कब्जा करते कॉलेज के चपरासियों ने कब्जा कर लिया। वह स्थान अब नशेड़ी छात्रों के अड्डे के रूप में कुख्यात हो गया।

छुट्टियों में इस बार वीथिका के साथ निधि भी गई थी। चंचल निधि चुप्पी हो गई थी। लेकिन यहाँ माँ तथा यूथिका के साथ मुखर होने लगी। एक बैठे बैठे सोचने लगी, प्रकृति ने यहाँ चार स्त्रियों को मात्र एक स्थान पर इकट्ठा किया है। जहाँ जीवन के सारे रंग हैं। यहाँ किसी पुरुष की जरूरत कहाँ है? तब मेरी दीदी लोग क्यों मुझे किसी भी एक पुरुष से बाँधने की उतावली दिखा रही थी? यह बात शाम की चाय के समय इसने कही।

‘मैं कहूँ?’–यूथिका ने कहा।

‘जरूर दीदी, आप कहें कि क्या सोचती हैं आप।’

‘तुम्हारी बहनें लालची हैं। माँ साधारण धर्मभीरू स्त्री थीं। यदि तुम्हें अपने अधिकार के लिए लड़ना है तो तुम दावा ठोक सकती हो रुपयों और गहनों पर, नहीं तो भूल जाओ।’–यूथिका ने कहा।

‘आपने एकबारगी सच समझ लिया। वे लोग बहुत लालची हैं। मेरे कारण उनका प्लान गड़बड़ा गया, वो तो मेरी खून की प्यासी हैं। मुझे नहीं चाहिए सोना-चाँदी।’–निधि ने कहा।

‘बेटा, यह योगिनी वाला रूप क्यों धर लिया है?’–देर बाद माँ ने कहा।

‘चाची, बाबा को माँ को उस अवस्था में देख, मंदिर की पूजा का दायित्व ले यह रूप धर लिया था। अब नहीं है फिर भी मन इसी पर अटका है। शायद कुछ दिन अटका रहे।’–आँसू भर आये निधि की आँखों में।

‘ठीक है, जैसा रुचे तुम्हें।’–माँ ने कहा। दूसरी सुबह को यूथिका की ओर ध्यान गया निधि का–‘दीदी, आप अब एक अच्छा सा दूल्हा ढूँढ़ कर शादी कर लीजिये। हमें भी जीजा जी का शौक है।’–इठला कर कहा निधि ने।

‘हूँऽऽ, बात तो ठीक है। कोई पसंद आयेगा तब बताऊँगी।’

‘जरा कोमल भाव बनाकर देखिये ऐसे-ऐसे।’–पोज बनाया निधि ने, सब हँस पड़े।

‘ऊँह, यह तो खड़ूस बॉस बनी बैठी रहती होगी।’–वीथिका ने कहा।

‘तो क्या ऑफिस में वैसे रहूँ जैसे निधि पगली ने कहा।’

‘वैसे नहीं पर थोड़ा सा कम खड़ूस…।’

‘धत, चुप रहो सब।’–यूथिका ने डाँटा।

‘वैसे कुछ गलत नहीं कह रही है ये लोग।’–माँ ने भी कह डाला।

‘माँ तुम भी? घर में पुरुष लाना जरूरी है क्या?’

‘आपके जीवन में दीदी, रहें चाहे आप जंगल में जाकर हमारे लिए एक जीजा चाहिए।’ वरना…

‘वरना क्या?’–यूथिका थी।

‘वरना हम एक ट्रिप चाय फिर पीयेंगे, आपको ऑफिस जाने में देर होगी।’–वीथिका ने कहा। सबने ठहाका लगाया।

छुट्टियाँ बीतते न बीतते निधि का मूड ठीक हो गया। तब उसने कहा वीथिका से–‘यार चल एक फ्लैट ही लेते हैं हम, नीचे वाला हो और थोड़ी जमीन हो तो अच्छा होगा। कुछ फूल पत्ती लगाया जाय। इन लोग को एक कमरे में छात्रों की तरह रहना नहीं भाता अब। दोनों ने राजेंद्र नगर का एक नया बना फ्लैट पसंद किया। वहाँ पहले से ही फूल पत्तियाँ थीं। सामने सीढ़ी और गोल बरामदा था। दो बड़े बड़े कमरे, ड्राइंग रूम, डाइनिंग हॉल थे। इन लोग ने पलंग तथा सोफा वगैरह से तरतीबवार सजाया घर को। वीथिका की माँ और यूथिका एक दिन देखने और मिलने आईं। उन्हें घर सुरक्षित और संतोषजनक लगा। गृहस्वामिनी और उनके बच्चे सलीकेदार थे। एक दिन प्रो. शिवरंजन प्रसाद तथा रम्या इंदु जी भी आईं। साथ में उनकी बहन शम्पा भी थीं। खूब चहल-पहल रही। शम्पा विश्वविद्यालय के ही एक महिला महाविद्यालय में प्रोफेसर थीं। विषय अलग था। वे भी अकेली अपने खरीदे गये एक फ्लैट में रहती हैं ऐसा कहा। पूरा परिवार उनका बौद्धिक और अभिजात था। शम्पा प्रसाद अकेली रहती हैं। उम्र काफी थी, क्यों अकेली थी यह इनलोग को नहीं पता। शम्पा ने जाते जाते इन्हें आमंत्रित कर लिया।

महिला कॉलेज में समाजशास्त्र का विभाग खोलना था। प्रो. शिवरंजन को निरीक्षण करने जाना था। उन्होंने इन्हें भी अपने साथ कर लिया। निरीक्षण के बाद चाय नाश्ता चल रहा था। तभी शम्पा प्रसाद आ गईं। अपने जीजा जी से अधिक इन लोग से मिलना उसे भाया। अब फिर इन दोनों को अपने घर के पते का कार्ड देकर आमंत्रित कर दिया। विभाग शुरू होने की अनुशंसा कर दी गई। अनुमान लगाया जा रहा था कि इन दोनों को ही इस कॉलेज में पढ़ाई शुरू करने भेजा जाएगा। चलो ठीक है, इन दोनों ने सोचा। राजेंद्र नगर से यह स्थान भी उतना दूर नहीं है। उसी रविवार को शम्भा के घर पहुँची वीथिका और निधि। एक कमरा, बड़ी सी बालकनी, रसोइघर बड़ा सा जिसमें डाइनिंग टेबुल भी लगा था, स्टोर की रैकें भी थीं, घर में था। एक शौचालय स्नानघर था, बस!

‘यह बन रहा था तभी मैंने डिजाइनकर यह घर बनवाया। मैं अपना बालकनी बड़ा रखना चाहती थी, जहाँ गमले रख सकूँ।’–कहा शम्पा प्रसाद ने।

अपार्टमेंट के पिछले भाग में प्रथम तल पर इनका फ्लैट था। शम्पा प्रसाद के बारे में थोड़ा बहुत निधि जानती थी। यही कि ये रम्या इंदु की बहन शम्पा इंदु है जिन्होंने अपनी माँ का दिया नाम हटा लिया। बनारस के एक बड़े यशस्वी प्रोफेसर की बेटी इंदुमती सिन्हा प्रसिद्ध गायिका हुईं। उनके पिता तबलावादक थे। दो बेटियों के जन्म के बाद वे किसी बड़े सितारवादक के संगीतकार बनकर अमरीका गये तो लौटकर नहीं आये। शम्पा की माँ ने इन्हें पढ़ाया लिखाया। रम्या गायिका बन उनका विरासत सँभाल रही है परंतु शम्पा ने संगीत की ओर कभी रूख नहीं किया। वह शुरू से ही पढ़ने लिखने वाली रही है। भारी-भारी वैचारिक किताबें। बालकनी में शीशे की गोलमेज लगी थी। चार कुर्सियाँ लगी थीं। कई मोटी किताबें रखी थीं; शम्पा प्रसाद ने कोई पत्रिका पकड़ रखी थी। निधि और वीथिका जब पहुँची तब उनके सामने ग्लास में बीयर भरा हुआ था, हाथों में सिगरेट धुआँ रहा था।

‘आओ आओ,’–सिगरेट की राख शीशे की ऐश ट्रे में झाड़ते हुए कहा। दोनों ने कुर्सियाँ खींच लीं। शम्पा ने हाथ की पत्रिका रख दी।

‘यह देखकर अच्छा लगा कि तुमलोग ने अपना स्वतंत्र आवास लिया है अकसर लड़कियाँ डिपेंडेंट होती हैं।’–शम्पा ने कहा।

‘मेरा तो कोई रहा नहीं, कि उस पर डिपेंडेंट रहूँ मैडम।’–निधि ने कहा

‘वह तो बना लिया जाता है, शादी ब्याह करके।’–हँसी शम्पा।

‘हमने नहीं, देखा जाये मैम,’–वीथिका ने कहा।’

‘शम्पा मैम, यह वीथि भी मेरी तरह सोचती है, जो होगा देखा जाएगा।’

‘आजकल क्या पढ़ रही हो?’–शम्पा ने रूख बदला, बीयर सिप करने लगी।… ‘हमलोग पीएचडी कर रहे हैं।’–वीथिका ने कहा।

‘और वह तो रूरल एरियाज, स्लम्स पर होगा।’–शम्पा ने सिगरेट का कश लिया, धुआँ छोड़ा । दोनों लड़कियों को यह सब भारी पड़ रहा था। मन ही मन सोचने लगीं कि नाहक आईं।

‘जी, वैसा ही कुछ है।’–वीथिका ने कहा।

‘हाँ, सोशल वर्क में लगोगी तो काफी फॉरेन मनी है, फॉरेन जाने का स्कोप है। यहाँ भी वैसा ही काम है।’–विद्रूप से कहा शम्पा ने।

‘हम तो टीचर हैं, वहीं लक्ष्य भी है शम्पा मैम।’–निधि ने कहा

‘तो फिर तुम सोशल वर्कर पैदा करोगी।’–शम्पा सुरूर में थी।

‘मैम आपके एक ही पौधे में तीन तरह के गुलाब हैं। यह तो बहुत ही सुंदर लगता है।’–निधि ने बात बदली।

‘वो माली है, कॉलेज वाला, वह बड़ा गुणी है। उसी का प्रयोग है यह, और देखो वो बोनसाई कटेली चम्पा का।’–दिखाया शम्पा ने।

‘जी मैम, देखा।’–निधि थी।

‘ऐसा खिला खिला बोनसाई तुमने पहले कहीं नहीं देखा होगा।’

‘मैम मैंने पलाश और कृष्ण चूड़ के खिलते हुए बोनसाई भी देखे हैं।’–वीथिका थी।… ‘अरे कहाँ?’–शम्पा अब चकित थी।

‘चाहिए तो ला दूँगी।’–हँसी निधि। शम्पा को नशा तारी हो गया था। सिगरेट और बीयर का नहीं; अपने आप को खोल देने का नशा।

‘हम स्त्रियों की जिंदगी बोनसाई ही तो है। हम कितने भी स्वतंत्र क्यों न हों हमारी जड़ें काट दी जाती हैं, हमारे डाल छाँट दिये जाते हैं। हमारे सारे फूल निष्फल हो जाते हैं।’–उन्होंने इन लोग को अपनी पूरी कहानी सुना दी। कैसे अम्मा ने विदेश में बसे अपनी मित्र के इंजीनियर बेटे से शादी करवा दी। वहाँ जाकर पता चला कि वह वहाँ शादीशुदा है या लिव इन रिलेशन में है। यह उल्टे पैर लौट आई और तलाक ले लिया। जॉब जल्दी ही मिल गई। शम्पा ने वीथिका को पास बुलाकर कहा–‘तुम मुझे अच्छी लगी, मैं तुम्हें अपनी पार्टनर बनने का ऑफर देती हूँ। मेरे साथ शिफ्ट हो जाओ।’–वीथिका हँसी। वह समझ गई ।

‘हम साथ रहते हैं शम्पा मैम, पार्टनर नहीं, मित्र हैं।’

‘वह भी हो जाओगी। मर्दो की खूँखार दुनिया से बड़ी अच्छी है अपनी यह दुनिया, पार्टनर बनने का प्रस्ताव दिया है, बन गई तो फायदे में रहोगी नुकसान में नहीं।’–दोनों सहेलियाँ एक-दूसरे को देखने लगीं। आँखों में साफ उकताहट का भाव था।

‘मैम, हमें आज कोठिया गाँव जाना है उसकी तस्वीरें लेनी हैं। यह देखिये कैमरा,’–बैग से कैमरा निकाल कर दिखाया।

‘ओके, जाओ।’–निर्लिप्त सी दूसरा सिगरेट सुलगाने लगीं। यह उनका पाँचवाँ सिगरेट था। पता नहीं कॉलेज में कैसे रहती हैं। सोचती, विचारती ये सीढ़ी फलाँगती हुई ऐसी भागी जैसी कोई लट्ठ लेकर पड़ा हो। नीचे आकर जान में जान आई। रिक्शा पकड़ वे सीधे अपने आवास पर आई और धड़ से बिस्तर पर गिर पड़ीं। ‘यह परिवार ही पागल है।’–निधि ने कहा।

‘कौन-कौन पागल है?’

‘रम्या आंटी, शम्पा और इनकी माँ इंदुमती। तभी भागा बेचारा संगतवाला और यह, जिससे इसकी शादी हुई वह। पता नहीं क्या सच है।’

‘महिला कॉलेज में हमारा तबादला हो जाएगा, तब तो इनसे साबका पड़ेगा हम क्या करेंगे?’–वीथिका थी।

‘धत्, हमारा डिपार्टमेंट अलग रहेगा।’–निधि बोली।

इन दोनों को दो महिला कॉलेज में ही भेजा गया। अब इनके पास अपने अपने कॉलेज के किस्से होते। दिन ठीक ही बीत रहे थे। उस दिन पहले कॉलेज से निधि आ गई थी, वह कॉलेज से सीधे आवास पर आई। वीथिका नहीं पहुँची थी। उसे आने में देर हो गई। उसके आते ही निधि ने पॉट में पत्ती डाला और पानी गरम कर डाल दिया। दूध चीनी चम्मच लेकर स्टूल पर रखा और चाय तैयार कर उठाया।

‘उठ चाय पी ले, कहाँ से थक-थका कर आई है?’–निधि ने टोका।

‘ओह, यूनिवर्सिटी से।’

‘वहाँ क्या अरजेंसी थी?’

‘प्रिंसिपल मैम के पास सर ने फोन कर दिया था कि किसी सेमिनार की तैयारी करनी है। वहीं गये थे। जाते ही डिक्टेशन देने लगे। मेरा हाथ दुख गया।’–एक हाथ को दूसरे हाथ से दबाते हुए उसने विरक्त होकर कहा।

‘सुकुमारी! चल चाय पी।’–निधि ने कहा। दोनों चाय पीने लगी।

‘कल फिर जाना होगा। अपने कॉलेज में दो क्लास लेकर।’

‘पूरा नहीं हुआ था क्या?’–निधि ने पूछा।

‘टाइप में तो दे दिया। सर ने कहा आकर प्रूफ देख लेना। हो सकता है मैं न रहूँ।’

‘कहाँ पर टाइप हुआ है?’

‘नहीं पता, विभाग वाले ही हो। सर अपने लाइब्रेरी वाले चेंबर में थे।’

‘अच्छा है मुझे नहीं बुलाया।’

‘लखनऊ में एक सेमिनार है। टॉपिक वही जनजातियों वाला है इसलिए शायद मुझे बुलाया।’

‘ठीक कहा, मेरा विषय होता तो मुझे बुलाते।’

‘हाँ, अभी मैं ही थक रही हूँ।’

दूसरे दिन फिर वीथिका विश्वविद्यालय चेंबर पहुँची। लाइब्रेरियन महोदय से पूछा–‘सर का चेंबर खुला है? टाईपिस्ट ने टाइप किया पेपर लाया है?’

‘सर बैठे हैं, टाइप का प्रूफ देखकर दे दिया।’–उन्होंने कहा।

‘अच्छा, तो मैं जाऊँ?’

‘बुलाया है तो जायेंगी न? अब आप प्रोफेसर हैं मैम? मुझसे पूछने की जरूरत नहीं है।’–लाइब्रेरियन मुस्कुराया।

‘अरे सर, हम आपकी छोटी बहनें हैं।’

‘सो तो है।’–वीथिका चेंबर में गई तो देखती है कि प्रो. शिवरंजन कुर्सी से सर टेक कर आँखें मूँदें बैठे हैं।

‘सर, मैं आ गई।’–उन्होंने धीरे से आँखें खोलीं। उनींदी-सी आँखें। उनके घुँघराले बाल चौड़ी पेशानी पर झूल आये थे। अभी वे भोले-भाले उनींदे बालक जान पड़ते थे। वीथिका ने अपना बैग टेबुल पर रखा और घंटी बजा दी। चपरासी आया तो चाय का ऑर्डर दे दिया। जग से ढालकर पानी उनकी ओर बढ़ाया। उन्होंने पूरा ग्लास खाली कर दिया।

‘आप प्यासे थे सर, नींद में समझ न पाये।’

‘मैं तो चिर प्यासा हूँ, वीथिका मैम!’–कहा।

‘जी सर’–चौंकी।

‘चलिये, आपने यह अच्छा किया कि चाय के लिए ऑर्डर किया।’

‘आपकी थकान देखकर सर।’

‘हाँ, मैंने प्रूफ देख लिया है। वह लेकर आता ही होगा।’

‘जी, इसीलिये थक गये हैं।’

‘वीथिका, इस सेमिनार में आपको भी चलना है।’

‘कहाँ सर?’

‘लखनऊ।’

‘ओह, मैं कभी गयी भी नहीं।’

‘जो आपसे लिखवाया वह आप ही पढ़ेंगी। आप शोधार्थियों के लिए यह जरूरी भी हैं।’… ‘यह मेरा सौभाग्य होगा सर।’

‘ठीक है तो अगले हफ्ते के लिए इस पत्र को संलग्न कर छुट्टी लेना होगा ड्यूटी लीव।’–उन्होंने पत्र थमाया जिसमें सेमिनार में भाग लेने का निमंत्रण था। पत्र लेते इसके पूरे बदन में झुरझुरी-सी उठी। यह बड़े-बड़े विद्वानों के बीच परचा पढ़ेगी, यह भी अब इस लायक हो गई है। चाय पीकर दोनों का मन हल्का हुआ। टाइप पेपर आ चुका था। उन्होंने इसे दिया और कहा कि जाकर अच्छी तरह पढ़कर आत्मसात कर ले। अलग अलग बिंदु बना ले और बिना आलेख देखे बोले। वह आने लगी तो कहा, कॉलेज से घर जाने के बजाय यही आ जाये। साथ चाय पीये वीथिका अबूझ-सी देखती रही।

‘ऐसे क्यों देख रही हो वीथिका, कितने बजे क्लास खत्म होता है?’

‘तीन बजे तक सर।’

‘हाँ तो यहाँ आ जाओ चाय पी लो साथ फिर तुमको छोड़ते हुए हम अपने घर चले जायेंगे।’–वीथिका उनको नमस्कार कर आवास आ गई। निधि आ चुकी थी। पेपर उसके हाथों से लेकर पढ़ने लगी। वह चमत्कृत थीं। वीथि, सर का लैंग्वेज कितना अच्छा है? वह कितनी तह तक जाते हैं, तभी तो इतना मान है!’… ‘हूँ’–कहा वीथिका ने और चुप ही रही।

‘इतनी अच्छी अच्छी बातें तेरे कैरियर में हो रही है वीथि, तुम हूँ हाँ कर के टाल दे रही हो।’

‘देख न निधि, सर ने एक प्रकार से आदेश दिया है कि रोज मैं विभाग जाऊँ अपने कॉलेज के बाद, चाय उनके साथ पीऊँ, वे आकर मुझे ड्रॉप कर देंगे। धत्, समझ नहीं पाती, क्यों ऐसा अन्याय कर रहे हैं।’

‘इसमें अन्याय की क्या बात? कुछ डिसकशन्स होंगे।’

‘क्या यार, थकान होती है न!’–निधि ने इस समस्या को कुछ नहीं माना; बल्कि कहने लगी कि वीथिका भाग्यशाली है। वीथिका प्रोफेसर शिवरंजन का कहा टाल नहीं सकती। वह चाहे जैसी भी थकी हो वहाँ जाना ही था। पाँच दिनों तक इस सिलसिले के बाद उन्हें साथ ही लखनऊ जाना था। जाने से दो दिन पहले रजिस्टर रख कर निकल रही थी कि शम्पा सामने पड़ गई। इसने नमस्ते किया।

‘वीथिका, भई बधाई हो तुम पहली बार सेमिनार में भाग लेने लखनऊ जा रही हो।’

‘धन्यवाद मैम, मैं डर भी रही हूँ।’

‘अरे नहीं नहीं डरने की बात नहीं है, प्रोफेसर प्रसाद बहुत सॉफ्ट हैं अच्छा रहेगा।’–रहस्यमय मुस्कुराहट खेल रही थी चेहरे पर।

‘जी मैम, पेपर तैयार करने में मदद की उन्होंने।’

‘तभी तो रोज चेंबर जाना पड़ता था और प्रो. शिवरंजन अपनी फियेट कार से तुम्हें तुम्हारे आवास पर छोड़ते रहे हैं।’–यह सुन वीथिका हक्की बक्की रह गई। इन्हें कैसे पता? वीथिका आकर चुपचाप अपने बिस्तरे पर पड़ गई। निधि ने पूछा–‘क्या हुआ?’

‘अरे क्या कहें यार!’

‘पहली बार सेमिनार से डरती हो? अपने यहाँ तुमने कई सेमिनार तो संचालित किये हैं। तुम सब कर सकती हो।’

‘नहीं निधि, आज एक ऐसी बात कही प्रो. शम्पा ने कि क्या कहें?’

‘क्या कहा?’

‘उन्हें मेरा विभाग जाना, सर का मुझे यहाँ छोड़ जाना पता है। सो उसने मुझे ऐसा कुछ कहा कि कोई जाने न जाने पर बोलने का तरीका उनका ठीक नहीं लगा।’

‘जाने दे, वे मुझे सिक लगती हैं; खुद बीमार मानसिकता वाली हैं। मैं तो कहूँ पूरा घर ही पागल है।’–निधि ने कहा।

‘अब तू उनके कुनबे की फिर विरुदावली न सुनाने लग।’

‘चल तेरे कपड़े निकालूँ जो वहाँ पहनेगी।’

‘हाँ निकाल दे। दो दिन रहना है।’

‘डायस पर रहेगी उसके लिए अलग बढ़िया सिल्क साड़ी दूँ?’

‘इतनी गर्मी में सिल्क न दे।’

‘तो एक ढाकाई देती हूँ।’

‘वह दे दे।’–इन चोंचलों में लग तो गई वीथिका पर उसे बार-बार उनकी टेढ़ी मुस्कुराहट याद आ रही थी। रहस्यमयी होकर बोल रही थीं। सामान पैक हो गया। सारे पेपर्स रख लिये गये अटैची में। दूसरे दिन दोपहर में ही गाड़ी थी अपर इंडिया एक्सप्रेस।

‘हम थोड़ी जल्दी ही चलेंगे।’–कहा निधि ने।

‘हाँ, जल्दी चलें सो ठीक।’–लेकिन दूसरे दिन सुबह-सुबह फोन आ गया कि प्रोफेसर साहब ही इसे लेते हुए जायेंगे। वे लोग सही समय पर आये। प्रोफसर साहब के साथ रम्मा जी थी। निधि ने पैर छुए। उन्होंने न आने का उलाहना दिया। निधि कुछ न बोली। उन्हें पता था कि निधि अब पढ़ाने लगी हैं, पीएचडी कर रही है। सो उलाहना देने के लिए मात्र था यह कहना। निधि की सारी तकलीफों से रम्या इंदु जी वाकिफ थीं। स्टेशन तक चलने को रम्या जी ने निधि से आग्रह किया। निधि तैयार तो थी ही। गाड़ी में बैठ गई। उन्हें गाड़ी पर बैठा, विदा कर दोनों कार में बैठी। रम्या जी स्वयं कार चलाती थीं। उन दिनों कम ही स्त्रियाँ पटना शहर में कार चलातीं। ये उनमें से एक थीं और दूसरी इन्हीं की छोटी बहन शम्पा हैं। रास्ते में निधि से रम्या इंदु ने कहा–‘चलो मेरे घर, वहीं खाना, गप मारेंगे और फिर तुमको छोड़ दूँगी, चलती हो?’

‘जी आंटी, चलूँगी जरूर।’–निधि को देख दोनों बेटियाँ खूब खुश हुई। बगीचा का लॉन अधिक सुंदर सजीला हो गया देखा निधि ने। क्यारियों में फूल थे। गमले और फूल सब चाक चौबंद जैसे वे परेड पर निकले हों।

‘कब तक तुम साधु की तरह सफेद कपड़े पहनोगी? चंदन लगाती हो। बिल्कुल साध्वी लगती हो।’–रम्या जी ने कहा।

‘रंगीन किनारी वाली ही पहनती हूँ न आंटी। अभी मन नहीं कर रहा है।’

‘जान पड़ता है तुम्हारे रंगीन होने के लिए प्रेम का रंग भरना जरूरी है। कोई होगा जो तुम्हारे मन का तार झंकृत कर दें।’

‘आंटी, आप क्या लेकर बैठ गईं।’–वह शरमा गई।

‘सच कहती हूँ पगली। मैं भी पहले बिल्कुल सादा वस्त्र पहनती थी। जब इनकी निगाह पड़ी तब से मैं रंगीन हो गई।’

‘जी आंटी।’–सचमुच अभी भी उन्होंने चटक पीले सिल्क की साड़ी पहन रखी थी जो गहरे नीले पाढ़ में अधिक चटक जान पड़ती थी। यह मुस्कुराई।

‘तुम इतनी खूबसूरत हो जरूर जल्दी ही तुम्हें कोई पसंद आ जाएगा।’–आंटी की ये बातें चुपचाप सुन रही थी निधि। उनका प्रतिवाद कर रसभंग करना नहीं चाहती थी। वरना वो चिढ़ रही थी। इसकी तनिक भी इच्छा नहीं थी कि विवाह का नाम भी कोई इसके सामने ले। विवाह के नाम से शरीर घृणा से भर उठता। झुरझुरी सी होने लगती। इसे अपनी बहनों की वे साजिशें याद आ जाती जो उन्होंने इसे बेहोश करके करना चाहा था। जाने क्यों वे इतनी उतावली थीं। उनके उतावलेपन के कारण ही सब कुछ चला गया हाथ से वरना न जाता।

कई बार हम संपूर्ण हड़प जाने की दुराशा में संपूर्ण गँवा देते हैं। यही हुआ इसकी बहनों के साथ। क्यों किया ऐसा। सुखपूर्वक ब्याही हुई वे, सोने-चाँदी का जखीरा लेकर क्यों तुष्ट नहीं हुईं।

‘तुमलोग शम्पा के यहाँ गई थी क्या निधि?’–रम्या जी ने पूछा।

‘जी आंटी, उस दिन बुलाया था न उन्होंने, तो सोचा क्यों न हो आयें?’

‘वो उसी कॉलेज में हैं, जहाँ वीथिका है।’

‘हाँ पता है, शम्पा से बातें हुई थी। वह रोज रात में जब नीम बेहोशी में होती हैं और कोई उसके पास नहीं होती तब मुझे फोन करती है।’–उसने बताया।

‘किसी को साथ रखना चाहती हैं। हमसे भी कहा था।’–

‘उसके यहाँ सोच समझकर जाना।’–हँसी रम्या।

‘जी’–शाम ढलने के पहले निधि को रम्या जी ने आवास पर पहुँचा दिया। थोड़ी देर अंदर आकर बैठीं। सादगी से रहती हुई इन लड़कियों के आवास को देख खुश हुईं।

लखनऊ में स्टेशन पर बग्धी लेकर खड़े युवा प्रोफेसर श्यामल दास थे। ‘स्वागत सर’–कहते हुए श्यामल दास ने प्रोफेसर शिवरंजन के चरण स्पर्श किये और वीथिका से कहा–‘मैंने तुम्हें बुला ही लिया।’

‘अच्छा, तो तुम्हें पता था कि सर के साथ मैं ही आनेवाली हूँ?’

‘लो तुम्हारे नाम से विश्वविद्यालय का गेस्ट हाउस बुक हुआ है न मिस सान्याल?’–बग्घी पर सामान रखते प्रोफेसर को चढ़ाते यह सब चल रहा था।

‘कोई दूसरी वीथिका सान्याल नहीं हो सकती क्या?’

‘बिल्कुल नहीं, मेरी पगली छुटकी ही होगी यह मैं जानता था।’

‘ऊँह! मैंने ही यह विषम पढ़ा है तुमको कैसे पता?’

‘यूथिका से मुलाकात हुई थी मैम, यहीं लखनऊ में।’–उसने कहा।

‘अच्छा चलो ठीक है।’–प्रोफेसर साहब इनलोग की बातें गौर से सुन रहे थे। और गुन रहे थे कि इस युवा प्रोफेसर को वीथिका सान्याल की पीएचडी का विषय तक पता है। स्ट्रेंज! वीथिका ने कभी कोई चर्चा नहीं की।

‘आपका डॉक्टरेट हो चुका है न, प्रो. श्यामल दास?’–प्रो. शिवरंजन ने पूछा। अब श्यामल साकांक्ष हुआ।

‘जी सर, मेरा रिसर्च थारू जनजाति के इर्द-गिर्द है।’

‘अभी तो जनजाति में वे शामिल नहीं हैं।’

‘सर राजनीतिक रूप से नहीं पर सामाजिक रूप से है न! सर मेरा अपना पर्चा इसी प्रश्न को सुलझाता है।’–श्यामल ने उत्साह से कहा।

‘बहुत अच्छा! दिलचस्प रहेगा सुनना।’–गंभीर स्वर था उनका।

‘सर फ्रेश हो लें। चाय नाश्ता यहीं कर लें। हम गाड़ी लेकर समय पर पहुँच जायेंगे। तुम भी मैडम, ज्यादा मेकअप के फेरे में न रहना।’–श्यामल दास कह कर चला गया। प्रोफेसर साहब और वीथिका साथ ही नाश्ते के टेबुल पर बैठे।

‘यह श्यामल दास तुम्हारा पूर्व परिचित है, बताया नहीं था?’–पूछा उन्होंने वीथिका से।

‘मुझे नहीं मालूम था कि इसने यही विषय लिया है और यहाँ है।’

‘अच्छा, लगता तो अनौपचारिक है।’

‘जी सर, हमलोग का साथ बचपन से था। मेरे पिता जी जंगल के बड़े ठेकेदार थे और इसके पिता जी सबसे बड़े अधिकारी।’–वीथिका थोड़ी उदास हुई। ‘ओह हो, अब पिता जी कहाँ हैं?’

‘बहुत पहले हमें छोड़ गये। माँ हैं और बड़ी बहन यूथिका। श्यामल और यूथिका एक ही कक्षा में पढ़ते थे। दोनों में फर्स्ट आने की प्रतियोगिता रहती। मैं दो साल जूनियर थी। इनके पिता दिल्ली चले गये थे।’

‘ओह, सॉरी!’

‘ओके सर, अब एक युग बीत गया।’

‘यह श्यामल तुम्हारी बहन से संपर्क में है। वह कहाँ हैं?’

‘वह रिजर्व बैंक की ऊँची अफसर है, माँ उसी के साथ है। मैं छुट्टियों में वहीं जाती हूँ। पटना के इस आवास में दोनों आये थे। श्यामल से लखनऊ में किसी सेमिनार में ही मुलाकात हुई होगी। कह तो रहा था।’

‘ओह, अच्छा!’–दोनों पेपर्स वगैरह लेकर आ गये। एक कार लेकर एक दूसरी प्रोफेसर आई थीं। सेमिनार हॉल में सभी से मुलाकात हुई। स्वागत और उद्घाटन सत्र के बाद ही अपराह्न का भोजन था। प्रोफेसर शिवरंजन वहीं आकर बैठे जहाँ श्यामल प्रो. स्वास्ति और वीथिका खा रहे थे।

‘प्रो. श्यामल, आप भी बिहार से हैं, जानकर खुशी हुई।’–बातचीत शुरू करने की कोशिश की प्रो. शिवरंजन ने। सूप पी रहे थे कि प्रो. श्यामल को उनके विभागाध्यक्ष जो निदेशक भी थे ने बुला भेजा। वो उठा और प्रो. शिवरंजन से क्षमा माँगी।

‘सॉरी सर, व्यवस्था की बात के लिए बुलाया जा रहा है। मैं इधर वीथिका को अकेली देख कंपनी देने आ गया था। अब आप हैं ही तो मेरी क्या जरूरत।’–कहा और चला गया। थोड़ी देर प्रो. शिवरंजन उसको देखते रहे। फिर हाथ से इशारा किया–‘गजब बात।’

‘कुछ लेंगे सर?’–प्रो. स्वस्ति थी।

‘मैं ले आता हूँ।’–उठे वो। स्वस्ति ने विनीता से कहा।

‘प्रो. शिवरंजन का इतना नाम है, पर ये मिलनसार खूब हैं।’

‘हाँ, बहुत शांत और स्नेही हैं।’–वीथिका ने कहा।

‘सर अकेले आये हैं, जबकि बाकी लोग परिवार के साथ हैं।’

‘बेटी लोग का स्कूल था, वे कैसे आतीं?’

‘सुना है वे प्रसिद्ध गायिका इंदुमती की बेटी हैं।’

‘वो खुद भी ए ग्रेड गायिका हैं।’

‘अच्छा?’

‘आपने गायिका रम्या इंदु को कभी ऑलइंडिया रेडियो पर नहीं सुना?’

‘हाँ सुना तो है, वही है क्या?’

‘वही हैं मैम!’

‘वो तो सचमुच बहुत अच्छी गायिका हैं। सर कितने लकी हैं? वाह क्या अच्छा संयोग है!’–प्रोफेसर साहब अपना खाना लेकर टेबुल पर आ गये। तब ये लोग गईं प्लेट लेने। यह टेबुल खाली देख बहुत से प्रोफेसर आकर परिचय का आदान-प्रदान करने लगे। सेमिनार के प्रथम-सत्र में कनीय लोग अपना-अपना वक्तव्य दे रहे थे। वीथिका और स्वस्ति जो रिसर्च स्कॉलर थीं ने सर्वप्रथम दिया, तब कनीय प्रोफेसर्स देने लगे। समीक्षा दिल्ली विश्वविद्यालय के वरीय प्रोफेसर तथा टाटा इंस्टीटयूट के एक प्रोफेसर ने की। समापन वक्तव्य के बाद चाय और फिर रात्रि भोज तक सब अपने अपने कक्ष में थे। वीथिका स्वस्ति के कक्ष में थी, दोनों हिल-मिल गई थीं। वे सहेलियाँ बन गई थीं। रात्रि-भोज से पहले थोड़ा तैयार होना चाहिए यह सोचकर वीथिका अपने कक्ष में आई। निधि ने एक ऐबस्ट्रैक्ट प्रिंट की सिल्क साड़ी पहनने का निर्देश दिया था। वीथिका ने वही पहना। लंबे बालों की ढीली चोटी बनाई। देखा प्रो. शिवरंजन कक्ष में ही थे उनको नॉक किया। उन्होंने दरवाजा खोला। वे तैयार थे।

‘चलें सर?’

‘तुम प्रो. श्यामल के साथ थीं न?’

‘नहीं सर, स्वस्ति के साथ। बाजू वाले कमरे में’

‘ओह!’–कमरा में फिर से गये और लौटे।

‘मैं स्वस्ति को बुला लाऊँ?’–कहा और चली गई वीथिका

‘स्वस्ति, चलो’–नॉक करती बोली वीथिका। स्वस्ति निकल आई। उसने सुनहरी किनारी की शिफॉन साड़ी पहन रखी थी। फिरोजी रंग की साड़ी में जँच रही थी। दोनों ने एक दूसरे को आँखों-आँखों में सराहा। क्योंकि प्रोफेसर साहब साथ थे अधिक वाचाल होना उचित नहीं था। रात्रि-भोज इसी होटल के भोजन कक्ष में था। सभी जुट गये थे।

‘आइये आइये, स्वागत है आपका’–कहा सभी ने एक साथ।

‘आइये सर’–एक युवा प्रोफेसर ने प्रो. शिवरंजन से बातचीत की है उन्हें सीनियर लोगों की टेबुल पर बैठा दिया।’

‘कहाँ रहते हो आजकल यार?’–एक बुजुर्ग प्रोफेसर ने हाथ बढ़ाया। उसने नीले रंग की शर्ट और चेक हाफ जैकेट पहन रखा था।

‘वहीं, जहाँ आपलोग ने भेज दिया सर!’–ये बी.एच.यू. के थे।

‘वहाँ तुम सबसे बड़े आदमी हो यार!’–उन्होंने कहा।

‘पोजीशन अब भी बदल लो।’

‘ना बाबा ना, तुमने परिश्रम से जमाया है।’–ये प्रो. शिवरंजन के सहपाठी भी थे और साथ ही पढ़ाने भी लग गये थे। कई विश्वविद्यालय में विभाग खुले और साथी लोग चले गये। दूसरे दिन का सेमिनार वरीय प्रोफेसर लोगों द्वारा संबोधित था। वही एक प्रकार से समापन भी था। बीच में मध्याह्न भोजन के समय स्वस्ति और वीथिका बाजार निकल गई। माँ बहन और निधि के लिए चिकन की साड़ियाँ ली। स्वस्ति ने भी लीं। अपने लिये दोनों ने एक दूसरे की पसंद से लीं। शाम को चाय के वक्त प्रो. श्यामल ने पूछा कि बाजार जाना है या नहीं? तब पता चला कि इनका काम संपन्न हो गया।

‘सर, आपको बाजार जाना है?’–प्रो. शिवरंजन ने मना कर दिया। लौटते समय बड़ा भावुकता भरा माहौल था। चर्चा थी कि अगला सेमिनार हिमाचल में होगा।

लौटते समय प्रो. शिवरंजन की भँवें तनी थीं। वीथिका ने आराम से बैठने के बाद गदगद भाव से कहा–‘सर, आपकी कृपा से इतना अच्छा मौका मिला।’

‘ऐसा लग तो नहीं रहा था कि यह सेमिनार का आयोजन है और आप इसमें भाग लेने आई हैं।’ उन्होंने उपालंभ दिया।

‘क्यों सर? मेरा वक्तव्य बहुत निराशाजनक था क्या?’

‘वक्तव्य में क्या था वह तो मैंने लिखवाया था; आपने तो बस रट्टामार कर तोते की तरह बोल दिया।’

‘तो फिर मुझसे क्या भूल हुई सर?’

‘इतना बेवकूफ मुझे न समझिये।’

‘कोई भूल हुई हो तो मुझे माफ कर दें।’

‘भूल मुझसे हुई है, किसी और को मौका देता तो वह मेरे साथ बना रहता, यहाँ तो अपने आप में अपने पुराने आशिक में लिप्त रही तुम।’

‘ऐसा कुछ नहीं है सर!’–कहकर उसने खिड़की के बाहर देखना उचित समझा। तब से वे चुप थे। वीथिका उनके चाय नाश्ते जरूर करवा देती। गंतव्य पर पहुँचकर स्वाभाविक हो गये। रम्या मैम गाड़ी लेकर आई थी। दिन था सो निधि कॉलेज गई थी। वह घर आ गई। नहा धोकर चाय पी। खाना खाने के पहले बिस्तरे पर लेटी तो नींद आ गई। अपने बिस्तरे की सुखद नींद में गहरी डूबी निधि के आने के बाद ही जगी।

‘निधि, क्या चाय बना रही है?’–उनींदी सी कहा इसने।

‘बन गई। उठो।’–दोनों ने चाय पी। वीथिका ने साड़ियाँ निकाली सफेद पर सफेद काम माँ के लिए, गुलाबी यूथिका के लिए और हल्की पीली निधि के लिए।… ‘पसंद है न?’

‘तुम लाई मेरी जान, पसंद तो होगा ही।’–लिपट गई उससे।

‘मेरा मन खूब चटक लेने का था पर सोचा तू पहनेगी या नहीं?’

‘अपना दिखा।’–अपने लिए फिरोजी साड़ी ली थी।

‘चल ठीक है, मैं कहाँ छोड़ देने वाली, मैं तेरी साड़ी पहनूँगी न?’

‘पहन ले न। जहेनसीब, उस सफेद साड़ी से तो पीछा छूटे। पागल बना दिया है जोगिन बनकर।’–साड़ियाँ समेट कर वहाँ की पिटारी खुली। अब अपना दिल खोला वीथिका ने।

‘निधि, सर का व्यवहार बड़ा अजीब था।’

‘क्या था?’… ‘एक तो यहीं रोज बुलाकर हलकान कर दिया था। दूसरे वहाँ हद ही कर दी।’

‘तेरा वक्तव्य कैसा रहा?’

‘वह तो अच्छा रहा।’

‘तब क्यों नाराज थे?’

‘वहाँ एक हमारे बचपन का परिचित प्रो. श्यामल मिल गया। उसने माँ, यूथिका दीदी और मेरे बारे में अनौपचारिक होकर बातें की यह इन्हें नहीं अच्छा लगा। एक लड़की रिसर्च स्कॉलर हिमाचल की आई थी उससे मेरी खासी दोस्ती हो गई थी। उसके कमरे में बातें करती तो इन्हें शक होता कि मैं श्यामल दास से बातें कर रही हूँ। मेरे पास बने रहते। नजर मेरी ओर रखते। मैं कुछ समझ नहीं पाई।’… ‘तुम्हारे प्रति पॉजेसिव हो गये हैं, लगता है।’

‘जान पड़ रहा था मैं इनकी जरखरीद गुलाम हो गई हूँ।’

‘मदद करने का फायदा उठाते हैं।’–निधि उदास हो गई थी।

‘अजब परिवार है भाई। रम्या जी बड़ी कलाकार पर बड़प्पन का लेश भी छू नहीं गया है। शम्पा प्रसाद का रवैया देखा ही उस दिन। पर एक मिनट, उस दिन वो कैसे बड़े व्यंग्य से बोल रही थीं कॉलेज में। अब उनका व्यंग्य समझ गई।’

‘नॉर्मल तो नहीं हैं लोग। अंकल सबसे अधिक नॉर्मल लगे मुझे।’–निधि थी।

‘इधर बहुत दिनों से मैं घर नहीं गई थी। उस दिन तुमलोग को स्टेशन पहुँचाकर लौटती में मुझे ले गई थीं अपने घर पर वो खासी नॉर्मल थीं। उन्होंने ही पहुँचा भी दिया था।’

‘मैं मानसिक रूप से थक गई।’

‘जैसा तुम बता रही हो, थकने का कारण तो है।’

‘अब कलेक्शन पूरा हो गया है। शोध प्रबंध लिखने बैठना है।’

‘मेरा भी हो गया। नोट्स भी ले लिये हैं।’

‘तुम्हारी गाइड तो अस्मिता मैम हैं। वो कैसी हैं?’

‘बहुत सहयोगी हैं। और मजेदार भी।’

‘वो कैसे?’

‘कहा कि हमलोग तुमलोग से अच्छा व्यवहार करेंगे। तुमलोग हमारी तारीफ करोगी। तब तो छात्र-छात्रा ऐडमिशन लेंगे ज्यादा से ज्यादा।’

‘है तो मस्त बात’–दोनों हँस पड़ी।

‘मैं कल अपने क्लास के बाद तुम्हारे पास आऊँगी। हम दोनों साथ ही विभाग में चलेंगे। सर से भी मिलूँगी। तुम लिखने की आज्ञा ले लेना।’

‘हाँ ठीक है आना।’…

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Artist: Alfred Sisley
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