गिरवी दर गिरवी

गिरवी दर गिरवी

जिस माँ के कुपोषित स्तन में
न उतर सका ममता भर दूध भी
जिस स्तन से लगकर चुभका मारकर
दूध पी अघा सका न कभी उसका बच्चा
जो माँ अपनी छाती के दूध के सिवा
अपने लाड़ले को दे न सकी
किसी दूसरे पोषाहार का पूरक संबल
और बीत गया उसके लाल का अदूध ही
दूध पीता बचपन
माँ की छाती को मन भर जुराए बिना ही

वह माँ आज हो गई है और कमजोर
किसी कानों सुनी बात पर
इतनी आतुर यकीनी हो गई है वह
कि दो निवाले रोटी की जुगत कराते
अपने तवे तक को लगा आई है बंधक
और बदले में मिले धन से
खरीद लाई पवित्र मान कर
सवा सेर गाय का दूध
दुर्गा माँ को पिलाने की
ममत्व विरुद्ध जिद्द पालकर

क्या यह सवाल हो सकता है
कि क्यों हम हुए हैं ऐसे
कि जो जिद्द ममत्व को नहीं नसीब।


Image: Village Scene
Image Source: WikiArt
Artist: Amrita Sher-Gil
Image in Public Domain


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मुसाफिर बैठा द्वारा भी