स्त्री देह का उत्सव

Costumes Parisiens Fashion Illustration No.30, Journal Des Dames Et Des Modes, 1912. Manteau De Zibeline by George Barbier

स्त्री देह का उत्सव

भूमंडलीकरण के इस दौर में
पश्चिम की तमाम उत्सवधर्मिता
हम चाहे अचाहे कर रहे हैं आयातित
अपने बुद्धि विवेक को
ताखे पर रखकर भी
अपने देश की
देह का उत्सव मनातीं उन्मुक्त स्त्रियाँ
एक ताजादम मिसाल है इसका
फैशन शो की रैम्प की
कामुक जिस्म नुमाईश हो या कि
बार गर्ल्स और खेल के मैदानों में
चीयर गर्ल्स का मद छलकाता
कातिल जलवा
या फिर सिनेतारिकाओं की
मोहक देह अदा
इन सब में कामोत्तेजक अवयवों पर
अधिक फ्लैश होता है
यही गणित आयद होता है
झीने छोटे अल्प वस्त्रों में
स्त्री देह को प्रस्तुत करने में भी
वहीं वहीं वस्त्रों का हरण क्षरण होता है
जिन नार अंगों को निहारते
मर्दों का फन फन से जाग उठता है
स्त्री बसनों की फैशन डिजाइनिंग की
कतर ब्योंत में ही दरअसल
सेक्स अपील की
भरपूर छौंक शामिल होती है
देह का यह चरम उत्सव
नारी स्वतंत्रता की
पुरुषकामित परिभाषा की
आड़ लेकर ही घटित होता है
और यह परिभाषा
नारी देह के वितान में अंटा कर
गढ़ी गई होती है।
मसलन
काम अपील की तन शक्ति को
आम करना बोल्ड नारीत्व का
निदर्शन बन गया है आजकल
काम अंगों का स्त्री देह पर प्रसार
नर की बनिस्बत अधिक मुखर है
बावजूद इसके पुरुष वर्चस्व वाले
इस समाज में
देह को वस्त्र से मुक्त करने का चलन
महिलाओं में अधिक रहा है
दुनिया के किसी आन समाज से
कहीं ज्यादा
दकियानूस उत्सवसेवी रहा है
हमारा समाज
नारी रूप ईश्वर भी पूजे जाते रहे हैं यहाँ खूब
सामंती रचाव वाले पुरुष मन के लिए
अंगना देह का उत्सव
भले ही रहा हो सदियों से
पर कथित आधुनिकताओं का
अपनी मनमर्जी
स्त्री देह का उद्दाम उत्सव मनाना
भारतीय जैसे बंद समाज के देह खुलेपन का
बिलकुल नया प्रसंग हैं
खुलेपन की देह पर भी
बेशक अलग अलग मत होंगे
किसे कोई नाजायज कहे
उसे ही कोई करार दे जायज
पर स्त्री देह के खुलेपन के
जायज नाजायज होने का मापक
हो सकती है यह कवायद
कि आजादी पसंद आधुनिकताएं
अपनी देह का उत्सव मनाना
कर दे स्थगित और आंके
करके इंतजार कि
स्त्री देह से लगी अपनी यौन उत्कंठा एवं
उत्सवप्रियता की बेचैनी का
पुरुष किस बेकरारी से
इजहार करता है।


Image Source: WikiArt
Artist: George Barbier
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