अपराजित

अपराजित

हो नहीं सकती पराजित युग-जवानी!
संगठित जन-चेतना को,
नव-सृजन की कामना को,
सर्वहारा-वर्ग की युग-
युग पुरानी साधना को,
आदमी के सुख-सपन को,
शांति के आशा-भवन को,
और ऊषा की ललाई
से भरे जीवन-गगन को,
मिटने वाली सुनी है क्या कहानी?
हो नहीं सकती पराजित युग-जवानी!

पैर इस्पाती कड़े जो,
आँधियों से जा लड़े जो,
हिल न पाए एक पग भी
पर्वतों से दृढ़ खड़े जो,
शत्रु को ललकारते हैं,
जूझते हैं मारते हैं,
विश्व के कर्त्तव्य पर जो
जिंदगी को वारते हैं,
कब शिथिल होती, प्रखर उनकी रवानी!
हो नहीं सकती पराजित युग-जवानी!

शक्ति का आह्वान करती,
प्राण में उत्साह भरती,
सुन जिसे दुर्बल मनुज की
शान से छाती उभरती,
जो तिमिर में पथ बताती,
हर दिशा में गूँज जाती,
क्रांति का संदेश नूतन
जा सितारों को सुनाती,
बंद हो सकती नहीं जन-त्राण वाणी!
हो नहीं सकती पराजित युग-जवानी!


Image: Finch, Poppies, Dragonfly, and Bee (Deccan)
Image Source: Wikimedia Commons
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