एक प्रश्न ?

एक प्रश्न ?

प्राण ! पलकों में थिरकती प्रीत सी
प्रिय प्रवासी के अधर के गीत सी
पंथ के परिचित, अपरिचित मीत सी
हार के मन में समायी जीत सी
हो किसी की वेदना के भार सी
बंध में उलझी सलिल की धार सी
प्यार से उन्माद मन का कह रहा उन्मादिनी हो
कामना से प्राप्ति कहती है कि कोई कामिनी हो
साधना से सिद्धि कहती है कि तुम अनुरागिनी हो
साँझ से कहता सवेरा तुम मिलन की यामिनी हो
प्रीत में पालित ललित मनुहार हो
या कि बीणा की मधुर झंकार हो
साँस हो तुम साँस का संसार हो
मौन मुग्धा का मुखर शृंगार हो
वंदना के छंद सी तुम मौन हो
तर्क कहता सान से तुम कौन हो ?
प्रश्न से परिकल्पना कहती कि तुम घन-कुंतला हो
सर्जना से सृष्टि कहती है कि तुम विधि की कला हो
राग से ध्वनि कह रही तुम गीत की गति मजुला हो
शीत से मधुमय कहता तुम शरद की चंचला हो
कोकिला की कूक सी एकांत में
लड़खड़ाती प्रतिध्वनि सी शांत में
दामिनी सी, दूर नीरद-प्रांत की
या भटकती साध हो उद्भ्रांत की
मूक अंतर्द्वंद्व सी अनजान हो
या कि मेरे पूर्व की पहचान हो ?
शब्द संयत काव्य में प्रिय भाव की अभिव्यंजना सी
देवता के मौन के आगे झुकी पल-वंदना सी
भावना सी दार्शनिक की और कवि की कल्पना सी
चिर विरह में मधु में मधु मिलन की ध्यान-विखचित अल्पना सी
कर्म पर आधार भूता शक्ति सी
धर्म के हो साथ नवधा भक्ति सी
भाव मय तुम हो सरस अभिव्यक्ति सी
किंतु कविता की अधूरी पंक्ति सी–
दूर तन से और मन के पास हो तुम !
लग रहा ऐसा कि मेरी प्यास हो तुम !


Image: Dreams On the hill
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Artist: Vasily Polenov
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शलभ द्वारा भी