कभी तपती हुई

कभी तपती हुई

कभी तपती हुई सी धूप हूँ मैं
नारी हूँ पेय शीतल रूप हूँ मैं

कभी हूँ अंत तो आरंभ भी हूँ
काली, चंडी, कई स्वरूप हूँ मैं

सदा मिहनत कि रोटी तोड़ती हूँ
लबालब स्वेद की इक कूप हूँ मैं

रचा ईश्वर ने जो अनमोल तौफा
वही सबसे अलग अभिरूप हूँ मैं

अलग किरदार हैं मेरे धरा पर
निभाती ले के इच्छा रूप हूँ मैं

मुहब्बत बाँटना है काम मेरा
जहाँ में प्रेम का प्रतिरूप हूँ मैं

समझ लो ‘अंजु’ को अब जिस नजर से
तुम्हारी नजरों के अनुरूप हूँ मैं।


Image : Portrait of the painter’s mother
Image Source : WikiArt
Artist : Nikolaos Lytras
Image in Public Domain