कभी आते कभी जाते हुए थक जाता हूँ

कभी आते कभी जाते हुए थक जाता हूँ

कभी आते कभी जाते हुए थक जाता हूँ
दोस्तो, पाँव उठाते हुए थक जाता हूँ

मैं तो हर रोज निकल पड़ता हूँ घर से बाहर
भीड़ में राह बनाते हुए थक जाता हूँ

मैंने माना कि मैं सर्कस का हूँ जोकर लेकिन
दूसरों को मैं हँसाते हुए थक जाता हूँ

मेरे कमरे में नहीं आती कोई भी तितली
कागजी फूल सजाते हुए थक जाता हूँ

मैं तो इक मील का पत्थर हूँ मेरी मत मूछो
राहगीरों को बुलाते हुए थक जाता हूँ

कोई दोस्त निकलता नहीं घर से बाहर
उनको आवाज लगाते हुए थक जाता हूँ

तुझको पत्थर के ये दस्ताने मुबारक लेकिन
तुझसे मैं हाथ मिलाते हुए थक जाता हूँ

आईना हूँ मुझे सब तोड़कर के चल देते हैं
और मैं किरचें उठाते हुए थक जाता हूँ

जो आतिशदान में थे वो शरारे बाँट आया हूँ
अँधेरी बस्तियों में माहपारे बाँट आया हूँ

वो जिनकी झोपड़ी में बुझ गए थे दीप मिट्टी के
मैं ऐसे गम के मारों को सितारे बाँट आया हूँ

किसी को क्या बताऊँ किसलिए खुश हो रहा हूँ मैं
जो मेरे पास थे सिक्के वो सारे बाँट आया हूँ

शजर होता जो मैं तो छाँव सबको बाँटता रहता
मैं दरिया हूँ कि अपने जल के धारे बाँट आया हूँ

जो अपनी जिंदगी के रेगजारों में भटकते थे
उन्हें उम्मीद के दिलकश नजारे बाँट आया हूँ।


Image : The tramp
Image Source : WikiArt
Artist : Émile Friant
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