लोग कद से खासे लंबे जा रहे है

लोग कद से खासे लंबे जा रहे है

लोग कद से खासे लंबे जा रहे हैं
किंतु मन से बौने होते जा रहे हैं

जिंदगी में लोग हैं बिल्कुल अकेले
फेसबुक पर दोस्त जुड़ते जा रहे हैं

आगे बढ़ने की ललक में किसने देखा
लोग कितना पीछे छूटे जा रहे हैं

हमने रिश्तों के लिए दौलत कमाई
अब उसी दौलत से रिश्ते जा रहे हैं

वक्त यूँ भी तो न कर ले दर्ज हमको
देखो कैसे-कैसे झूठे जा रहे हैं

कुछ भी तो हासिल नहीं होना है इससे
लोग क्यों सागर उलीचे जा रहे हैं

पहले खुद अपने इरादे साफ कर लें
मंजिलों तक तो ये रस्ते जा रहे हैं

इस तरफ उत्सव है तो क्या देखना है
उस तरफ देखो कि भूखे जा रहे हैं

उन कलमकारों की कोई क्या सुनेगा
जो समय के पीछे-पीछे जा रहे हैं

कौन मंदिर जाय है ईश्वर से डर कर
लोग अपने-अपने डर से जा रहे हैं

देखते रहिए इसे बाजार है ये
कितने ही बेचे-खरीदे जा रहे हैं!


Image : Portrait of a man sitting on a park bench
Image Source : WikiArt
Artist : Vladimir Makovsky
Image in Public Domain