गजलों में बसी लोक भारती की आत्मा

गजलों में बसी लोक भारती की आत्मा

‘लोक’ साहित्य का ‘गोल’ भी है और ‘भूगोल’ भी। रामचंद्र शुक्ल जब कविता में लोकमंगल और लोकसत्ता की बात करते हैं तो उनके सामने भी यही रूपात्मक लोक जगत होता है। ‘लोक’ का अर्थ यह रूपमय भौतिक जगत और उसमें रहने वाले लोक हैं। इसलिए साहित्य में वर्णित लोक रहस्यमय लोक नहीं है, जो वास्तविक कौतूहल का विषय है।

भारत का ‘लोक’ पश्चिम के ‘फोक’ से भिन्न है। पश्चिमी फोक की अवधारणा या संकल्पना  है कि ‘फोक वह है जो पीछे छूट गया है। वे उसे अनपढ़’ लोगों की वाचिक परंपरा मानते हैं तथा आदिम जातियों, अर्द्ध विकसित जातियों या असंस्कृत समाज से जोड़कर देखते हैं। इनसाइक्लोपीडिया ब्रिटानिका में भी ‘फोक’ शब्द का अर्थ ग्रामीण समुदाय से लिया गया है जबकि भारतीय दृष्टि कहीं अधिक व्यापक है और संवादधर्मी है। चराचर से संवाद तथा प्रत्येक वर्ग से संवाद उसका इप्सित है। उसकी संवादधर्मिता में कहीं भी विभेद नहीं है। इस संवाद में भी ग्रामीण व नगरीय का अंतर नहीं होता। पश्चिम की फोक दृष्टि निर्जीव तो भारतीय लोक दृष्टि सजीव है। इसमें आपसी साझेदारी व अंतरावलंबन है। इसके बिना लोक व्यापार असंभव है। भारतीय लोक दृष्टि की सबको अपने में समेटने की सामर्थ्य शक्ति अद्भुत है। यह लोग दृष्टि साहित्य सृष्टि का बीज तत्त्व रही है।

यह सही है कि साहित्य लेखन रचनाकार के ‘मूड’ और ‘मोड़’ पर निर्भर करता है। एक वर्ग के साहित्य की चिंता अलग है जो व्यक्तिगत अस्मिता की पहचान के लिए प्रयासरत है तो दूसरा वर्ग जीवनयापन के साधन जुटाने के लिए प्रयासरत है। उस वर्ग में निम्न वर्ग, निम्न मध्य वर्ग, किसान, श्रमिक और विभिन्न जनजातियों के लोग आते हैं। इनके लिए साहित्य कला की उत्कृष्टता नहीं बल्कि जीवन की उत्कृष्टता की जद्दोजहद है। इसी चेष्टा की परिधि में यह ‘लोक’ आता है।

इस दृष्टि से उर्दू गजल संसार की परिधि से हिंदी गजल संसार की विधि अलग है। बहुतांश हिंदी गजलकार भुक्तभोगी है और उसी परिवेश से आए हैं जो लोक का बहुत बड़ा भूभाग है। इसलिए इनकी व्यथा और कथा भी आमजन की व्यथा और कथा को बयाँ करती हैं। इनकी रचना का केंद्र वह आमजन है जो चहुँ ओर से हारा है, वह सर्वहारा ही हिंदी गजल का नायक बना हुआ है। चाहे वह गाँव का हो या शहर का, यहाँ कोई भेद नहीं। इनकी दृष्टि उस लोक पर है जिस पर अभी तक कोई आलोक नहीं पड़ा। इसलिए वे उस लोक को आलोकित करना चाहते हैं। जो भारतीय दृष्टि की जीवनी शक्ति रही है। भारतीय लोग दृष्टि की जीवनी शक्ति आरण्यक व ग्राम्य संस्कृति में निहित है। यहाँ हम इसी दृष्टि से विचार करेंगे।

हिंदी गजल अब केवल सामंती महफिलों की शोभा नहीं बढ़ाती बल्कि जनसंवादधर्मिता को भी ऊर्जा प्रदान करती है। हिंदी में गजल अपनी पाँचवीं-छठी दहाई में है। इस आलोक में हिंदी गजल के मौजूदा स्वरूप पर नजर डालें तो यह दृष्टिगत होता है कि पिछले तीन दशक में उसने अपना वजूद अपनी शख्सियत और अपनी पहचान अर्जित की है।

वस्तु जगत और जीवन के बीच संबंधों-अंतरसंबंधों की नई अर्थवत्ता तलाश की और यह तलाश निरंतर जारी है। यह नैरंतर्य हिंदी गजल की सार्थकता है। सार्थकता यह भी है कि वह निरंतर सार्थक संवाद की कोशिश कर रही है। यह जिरह जारी है अपने परिवेश, अपने आसपास, गाँव-कस्बों की जिंदगी व घर आँगन से। वैसी पूर्व की अधिकतर गजलों में प्रायः दुर्लभ है। समकालीन हिंदी गजल में जहाँ मिट्टी की महक है, पसीने की खुशबू है, रंभाती गायों का वात्सल्य है, धूल की स्वच्छंदता है, तो दूसरी ओर शोषण, महँगाई के खिलाफ एक आक्रोश भी है, तो जन-जन तक पहुँचने वाली जनसंवादधर्मिता भी।

विहंगम दृष्टि डालें तो गजलकारों ने सभी विषयों पर बेबाकी से लिखा है। माँ, माटी, मानुष भले ही यह कोई  मुहावरा हो या किसी के  द्वारा दिया गया नारा। लेकिन गजल ने इसे भी अपने भाव जगत का विषय बनाया है। भारत की मौलिक आत्मा और बहुतांश जनजीवन ग्राम में ही निवास करता है। ऋतु परिवर्तन और सात्विक व आस्तिक जीवन का प्रत्यक्ष दर्शन हमें ग्रामों में ही होता है। भौतिक व यांत्रिक युग तथा भूमंडलीकरण से उपजे नवीनीकरण के अभिशाप से ग्राम भी प्रभावित हुए हैं। लेकिन आज भी गाँव की सात्विकता जीवंत है। इस निर्माण की होड़ ने और शहरी जीवन के ग्लैमर ने गाँव के युवाओं को विचित्र रूप से आकर्षित किया है। तब ग्रामीण बाला वंदना राजस्थान की गजलकारा एक आर्त ध्वनि में गुहार लगाती है–

‘चाँद रोटी-सा लगे तो लौट आना गाँव में
गंध सौंधी-सी उठे तो लौट आना गाँव में

धड़कनें कहने लगी है माँ के जीवन की कथा
आशीषें झर-झर झरें तो लौट आना गाँव में।

यह अनुभूति व संवेदना सभी रचनाकारों में उसी पीड़ा, कसक और गहराई के साथ मौजूद है यह कहना जरा कठिन है। हिंदी जनवादी गजलों की जमीन उर्वर करने वाले तथा लोकधर्मिता की धार  को कुंद न होने  देने वाले गजलकारों में विशेष हैं–सर्वप्रथम अदम गोंडवी, दुष्यंत कुमार, बल्ली सिंह चीमा, हरजीत सिंह, रामकुमार कृषक, गोपालदास नीरज, डॉ. कुँवर बेचैन, नूर मुहम्मद नूर, अनिरुद्ध सिन्हा, कमलेश भट्ट ‘कमल’, ज्ञानप्रकाश विवेक, वशिष्ठ अनूप, सूर्यभानु गुप्त, देवेंद्र आर्य, राजेश रेड्डी, अशोक रावत, हनुमंत नायडू, चंद्रसेन विराट, विज्ञानव्रत, डॉ. उर्मिलेश, माधव कौशिक, शिवनारायण, ब्रह्मजीत गौतम, शिवओम अंबर, मालिनी गौतम, डॉ भावना, बी.आर. विप्लवी, द्विजेंद्र द्विज, अशोक अंजुम, जहीर कुरैशी, हरेराम समीप, महेश अश्क, दरवेश भारती, के.पी. अनमोल आदि।

गजलकारों ने हिंदी गजल को संवाद धर्मिता की नई ऊर्जा प्रदान की है। प्रभावी गजल के लिए कसक, घनीभूत पीड़ा, और नीर भरी वेदना होना जरूरी है। इस दुख या तकलीफों से ही गजल में जीवन की सच्चाई आ पाती है। श्रेष्ठ गजल केवल कला के निकष पर ही खरी नहीं उतरती बल्कि उसमें जीवन का सच भी अभिव्यक्त करती है। जीवन के विविध पहलू जब उसमें अभिव्यक्त हों, तब उसमें प्रभावोत्पादकता आ जाती है। देवेंद्र आर्य जी के अशआर कृषि कानून व किसान बिल के विरोध में किसानों के आंदोलन से उपजे भाव बोध की उपज है–

‘खेत-खेत तैयारी है, अब किसान की बारी है
लागत मेहनत खेतिहर की, फसल पर हक सरकारी है।’

गजलकार जो लिख रहे हैं, वह युग की माँग है और समय का आग्रह भी। गजलकार ग्राम्य जीवन का वही चित्र रेखांकित कर रहे हैं। वही समस्याएँ उठा रहे हैं, जो इस समय के ज्वलंत प्रश्न हैं। गाँव में ही और गाँव से ही भारत की विशिष्ट पहचान है। जीवनयापन की बेहद सरलता, सहजता, सादगीपूर्ण रहन-सहन, खानपान की प्राकृतिकता, चकाचौंध और ग्लैमर से कोसों दूर, सीधे-सादे मन मानस का लोक, ग्राम! इस ग्राम जीवन का संपूर्ण सटीक और यथार्थ परिदृश्य गजल में उभर कर आया है। जब गजलकार वशिष्ठ अनूप कहते हैं–

‘खेलते मिट्टी में बच्चों की हँसी अच्छी लगी
गाँव की बोली हवा की ताजगी अच्छी लगी

मोटी रोटी साग बथुए का व चटनी की महक
और ऊपर से वो अम्मा की खुशी अच्छी लगी।’

हिंदी कवि जिस समय गजल विधा से प्रभावित हुए, तो प्रथमतः ‘सुखन अज जनान’ की ओर आकृष्ट हुए। लेकिन उनका यह आकर्षण विकर्षण में परिवर्तित होकर लोक की ओर मुड़ा उसमें भी लोक के बृहत्तर वृत्त गाँव की ओर। क्योंकि उनकी आत्मा अपने गाँव से मिलने के लिए परम व्याकुल दिखी। जिन्होंने अपना संपूर्ण बचपन धूल-मिट्टी की सोंधी गंध में गुजारा हो, जो गाँव के रेशे-रेशे से परिचित हो, उसे यह जिंदगी भला क्यों न आकर्षित कर पाती! ग्रामीण जीवन के आचार-विचार, त्योहार, बोली-भाषा, गीत-संगीत, सुख-दुख, इनका अपना अनुभूत था। उनके चित्रांकन से लगता है, अभी भी हमारे ग्राम जीवन में बहुत कुछ है, जो अभी तक उपेक्षित व दुर्लक्षित रहा है। जब गजलकारा डॉ. भावना कहती है–

‘किसी से एक ख्वाब में इस कदर तल्लीन लगती है
नदी वह गाँव वाली आजकल गमगीन लगती है।’

गाँव के अपेक्षित और उपेक्षित विषयों को गजलकारों ने सूक्ष्म भंगिमाओं के साथ बड़ी आत्मीयता से उठाया है। उनके शेर विडंबनाओं के खिलाफ जमकर संघर्ष करते हैं। कमलेश भट्ट ‘कमल’ अपने अशआर में इस संघर्ष को गति देते हैं–

‘गाँव खुद मिट गए दुरियाँ पाटते-पाटते ही मगर
आज तक जो नहीं मिट सका वह अजब फासला है शहर।’

अनिरुद्ध सिन्हा भी गाँव का वह बिंब प्रस्तुत करते हैं कि समूचा परिदृश्य उभरकर सामने आता है–

‘प्रेम के बोल मिल ही जाएँगे
गाँव के पनघट पर जाकर देखिए।’

गाँव के पनघट पर ही नहीं गाँव में कहीं पर भी जाइए आपको अनजाना-सा नहीं लगता। वशिष्ठ अनूप जी की गजलों में गाँव और परिवेश पूरी आत्मीयता से उतरा है। जब वे कहते हैं–

‘गाँव घर का नजारा तो अच्छा लगा
सबको जी भर निहारा तो अच्छा लगा

गर्म रोटी के ऊपर नमक तेल था
माँ ने हँस कर दुलारा तो अच्छा लगा

अजनबी शहर में नाम लेकर मेरा
जब किसी ने पुकारा तो अच्छा लगा।’

अजनबी शहर की अजनबीयत हिंदी गजल में खूब उभर कर आई है। हिंदी गजल में नगरीय बोध ग्राम बोध के समानांतर आया है। नगरीय जीवन व सभ्यता की विडंबनाएँ तथा शहरी जीवन की संवेदनहीनता, हीन भावना, अपार स्वार्थ, व्यक्ति केंद्रित सोच, विकृत मानसिकता व मूल्यहीनता आदि विद्रूपताओं को हिंदी गजल ने करीब से देखा है। भौतिकतावादी युग में सुविधा संपन्न जीने की ललक ने महानगरीय जीवन और सभ्यता को पोषक तत्त्व प्रदान किए है। परिणाम स्वरूप गाँव से शहर की ओर गमन हो रहा है, तो बड़े गाँव कस्बों में, कस्बे नगरों में और नगर महानगरों के रूप में परिवर्तित होते जा रहे हैं। अतः महानगरीय बोध तेजी से बढ़ रहा है–

‘किसानी छोड़कर बापू शहर तो आ-जा रहे हो पर
वहाँ फुटपाथ से ज्यादा किसी को कुछ नहीं मिलता।’

–अनिरुद्ध सिन्हा

‘गम मिला मुझे खुशी के शहर में
लुट गया मैं रोशनी के शहर में।’

–कृष्णकुमार प्रजापति

गाँवों में जो घर होता है
शहरों में नंबर होता है।

–विज्ञानव्रत

शहर की संवेदनहीनता के कारण डॉ. गिरिराजशरण अग्रवाल को अपना गाँव अनायास आकर्षित करता है–

‘अब तो नस-नस में मेरी भरने लगी कड़वाहटें
शहर में वह रसभरे देहात लेते आओ न।’

नगरीय सभ्यता में केवल कृत्रिमता है, न वहाँ शांति है न चैन। सांप्रदायिक विद्वेष चरम पर है। ऐसे में कृष्ण कुमार ‘नाज’ जी को अपना गाँव याद आता है–

‘शहर के हादसों में ‘नाज’ मुझे
गाँव के लोग याद आते हैं

हमारा गाँव बेहतर है तुम्हारे शहर से अब भी
जो हर मजहब का, हर एक धर्म का सम्मान करता है।’

वरिष्ठ गजलकार व आलोचक ज्ञानप्रकाश विवेक जी यंत्रवत जीवन जीते शहर की यांत्रिक सोच व उनकी बकासुर-सी प्रवृत्ति पर चिंता व्यक्त करते हैं–

‘कालोनियाँ नगर की उसे मिल के खा गई
वो खेत जो किसी का बुरा सोचता न था।’

स्वाधीनता के बाद गाँव का बदलाव और उन बदलावों में अवसरवादी नेताओं की अवसरवादिता को जहीर कुरैशी बेनकाब करते हैं–

‘गाँव में उस भूख का परिवार बसता है
जिस पे बहसे हो रही है राजधानी में।’

शासन के कुप्रबंध पर व्यंग करते हुए गाँव की भीषण समस्या–भुखमरी की व्याख्या संतरामपुर की डॉ. मालिनी गौतम जी करती हैं–

‘कितने घरों में आज फिर चूल्हा नहीं चला
सरकार के गोदाम में गेहूँ सड़ रहा।’

शहरों की तरक्की के मजे लूटनेवाला
गाँव का फटेहाल बशर अभी भी वही है

अब महानगरों का हर शौक इधर आने लगा
अब मेरा गाँव भी शहरों-सा नजर आने लगा।

–माधव कौशिक

ग्रामीण जीवन में शोषण एवं तद्जन्य निर्धनता और बेबसी का अत्यंत यथार्थ अंकन गजलकारों ने किया है। ग्रामीण जीवन में विभिन्न स्तरों पर व्याप्त आर्थिक, सामाजिक शोषण को भी इन गजलकारों ने बेपर्दा किया है। नूर मोहम्मद नूर का एक शेर दृष्टव्य है–

‘सुबह का चावल नहीं है रात का आटा नहीं
किसने ऐसा वक्त मेरे गाँव में काटा नहीं।’

जनधर्मी परंपरा के जनकवि बल्ली सिंह चीमा जी में ग्राम्य-बोध अधिक प्रखर रूप में सामने आता है–

‘अब भी होरी लूट रहा है अब भी धनिया है उदास
अब भी गोबर बेबसी से छटपटाएँ गाँव में

यूँ तो बल्ली किसान है लेकिन
दाने-दाने को तरस जाता है।’

अशोक रावत जिस ‘वह’ की बात करते हैं वह देश का बृहत्तर समुदाय हैं। उस बृहत्तर समुदाय के महत्तर सच की कहानी अशोक रावत की जुबानी–

‘सिर्फ निकला था एक दाने को
लौटकर फिर वह घर नहीं आया।’

रोटी का सच एक अजीब सच है जो रचा तो जाता है बार-बार, किंतु बच जाता है प्रत्येक बार अपने उसी रूप में! आज आम आदमी, गरीब, किसान व मजदूर के लिए सबसे बड़ा सवाल रोटी का ही है और जवाब रोटी के लिए ही है और सारी जद्दोजहद उसे हासिल कैसे करें के लिए ही है। महेश कटारे सुगम कहते हैं–

खेत की पकती फसल घर आती-आती रह गई
रोटियों की लोरियाँ अम्मा सुनाती रह गई।

यही सच किसान और मजदूर की जिंदगी का वास्तविक सच है किंतु इस सच को झुठलाया नहीं जा सकता और न ही यह प्रदर्शनीय है। परिणाम स्वरूप गाँवों में धीरे-धीरे परिवर्तन होने लगे, ग्रामीण परिवेश की अपनी विशेषताएँ हैं साथ ही अपने गुण-दोष भी। गाँव की सामाजिक रीतियों, अभिरुचियों एवं मूल्यों में विषम ढंग से परिवर्तन हो रहे हैं। ग्रामीण जीवन का हर पक्ष संक्रमण के दौर से गुजर रहा है, कहीं-कहीं संक्रमण में वह फँस भी रहा है, इन स्थितियों से संदर्भित कुछ अशआर–

अब कहाँ वह पीपलों की छाँव मेरे गाँव में
खो गया है मेरा अपना गाँव मेरे गाँव में।

–डॉ. शिवओम अंबर

अब महानगरों का हर शौक इधर आने लगा
अब मेरा गाँव भी शहरों-सा नजर आने लगा।

–डॉ.कृष्ण कुमार नाज

हर तरफ अब यहाँ भुखमरी देखिए
चीख से गूँजती झोपड़ी देखिए

खेत की हर फसल धूप फिर ले गई
इन किसानों की अब जिंदगी देखिए।

–शिवनारायण

भारतीय गाँवों में थोड़े बहुत परिवर्तन के साथ सामंती व्यवस्था आज भी जीवित है। इस व्यवस्था ने अनेक सामाजिक बुराइयों को जन्म दिया, इससे उपजी विलासिता, कामुकता, आत्महत्या एवं भ्रूण हत्या जैसी कई सामाजिक विद्रूपताओं को डॉ. कुँवर बेचैन उद्धृत करते हैं–

‘कैसे बताएँ हम तुम्हें क्या क्या है रामफल
आँसू के एक गाँव का मुखिया है रामफल

मारा है जिसको रोज महाजन के ब्याज ने
बेबस से उस गरीब का रुपया है रामफल।’

जिनको जीने का रास्ता नहीं मिलता
हार के न जाने क्यों छत से झूल जाते हैं।

–अशोक रावत

गाँव व किसान की करुणाजनक स्थिति को देखकर गजलकार का हृदय वेदना से भर जाता है–

फिर किसी बुधिया की काया बेकफन रखी रही
फिर किसी होरी की बेटी बिक गई बाजार में।

–वशिष्ठ अनूप

शिवनारायण ग्राम्य-संवेदना के चेतनप्रज्ञ गजलकार हैं। उनके दो गजल-संग्रह आ चुके। वे बदलते गाँव पर टिप्पणी करते हुए कहते हैं–

‘खेत में बारूद की फसलें उगाई जा रहीं
आँगनों में खौफ का दरिया बहाया जा रहा!’

उनके यहाँ उजड़ते गाँव पर, उसकी त्रासदी पर भारत की बदलती आर्थिक व्यवस्था को जिम्मेदार बताया जाता है।

के.पी. अनमोल आशावादी गजलकार हैं। उनके यहाँ आशा संचालक शक्ति के रूप में आती है। वह निस्पंद जीवन को स्पंदित करने और निष्प्राण को जीवंत बनाने की जीवनी शक्ति है। वास्तविक हिंदी गजलकारों के यहाँ आशावादी व्यक्ति उम्मीद का पल्ला पकड़े प्रलोभनों को रौंदता हुआ दिखाई देता है, न वह विचलित होता न उसे कोई पराजित कर सकता है, क्योंकि सब शक्तियों का विकास करने वाली आशा की शक्ति सदैव उसकी आत्मा को तेजोमय करती है। के.पी. अनमोल का बेहद उम्दा शेर–

‘गाँव के बरगद में जो एक हौसला महफूज हैं
कह रहा है गाँव की आबो-हवा महफूज है।’

रिश्ते नातों की अहमियत व प्रेम की ऊष्मा का गाढ़ापन व्यक्त करता के.पी. अनमोल का एक अन्य शेर–

‘गाँव के रास्ते पे धर कर कान बूढ़ा मन
चाप बेटे के कदम की सुन रहा होगा।’

यह आशावाद घोर अंधकार में भी आलोक फैलाता है। आशा का प्रकाश हमारी आकांक्षा, प्रतीक्षा और आनंद की भावना को मुखरित करता है। कष्ट सहिष्णुता के साथ जीवन-यापन का अभ्यास करने वाले बूढ़े कान जब बेटे के कदमों की चाप सुन रहे होंगे या तो निस्संदेह यह बूढ़े बरगद के अपार-अविचल धैर्य की पराकाष्ठा है। यही ग्राम जीवन की विशेषता है और इसी में सुंदरता है। यही भाव बोध लोक जीवन को आकर्षक बनाए हुए हैं। यहीं इस लोक जीवन का प्रकृत सौंदर्य है।

ग्राम जीवन को आकर्षक बनाए रखने वाली ग्राम बालाएँ भी कम आकर्षक नहीं है। वैज्ञानिक प्रगति से अविष्कृत विभिन्न सौंदर्य प्रसाधनों से विभूषित शहरी ललनाओं से कई अधिक आकर्षित करता ग्राम-युवतियों का प्रकृत सौंदर्य यहाँ वर्णित है–

‘कुछ सकुचाना कुछ घबराना अच्छा लगता है
तेरा हँसना फिर शर्माना अच्छा लगता है

हीरे जैसी चमक रही यह काली लड़की सुंदर है
बलखाती कजरारे नैनों वाली लड़की सुंदर है

नई उम्र है मगर इरादे फौलादी लगते इसके
छुई मुई-सी नहीं है यह बलशाली लड़की सुंदर है।’

–डॉ. वशिष्ठ अनूप

ऐसी सुंदरता, सशक्तता व सुदृढ़ता बलशाली भारत में ही निवास करती है। लेकिन विडंबना है कि इस सुंदर को असुंदर और सशक्त को नि:शक्त बनाने की कोशिश जारी है। जिंदगी के सारे अनिवार्य सार तत्त्व गाँव में ही मिलते हैं। जिस धूल भरे हीरे से गाँव की पहचान व महत्ता है। वह धूल में लिपटा व सना किसान आज भी तथाकथित अभिजात वर्ग व नगरीय सभ्यता की उपेक्षा का पात्र है। वह सब की उपेक्षा सहकर भी अपनी मिट्टी से प्यार करता है। इसी भाव-बोध को व्यक्त करता डॉ. ब्रह्मजीत गौतम का यह शेर–

‘सब कहते हैं गाँव में ही बसता भारतवर्ष है
फिर क्यों चिंता है न किसी को धरती-पुत्र किसान की।’

इस ‘धूल भरे हीरे’ की उपेक्षा और दुर्दशा शोचनीय है। ये हीरे विपरीत परिस्थिति में भी अपने अटूट होने का प्रमाण देते हैं। धूल मिट्टी में लिपटकर कठोर परिश्रम से देश की उन्नति में योगदान देते हैं। वास्तविक, यहाँ ही लिखा गया है भारतीय लोक साहित्य का अध्याय और यहीं विकसित हुई है भारतीय लोक दृष्टि! यहीं पर हुआ है उस मनोरम सृष्टि का निर्माण! यहीं मनोहरता व मनमोहकता भारतीय लोक दृष्टि है जिसे कभी त्यागने का मन नहीं करता। यह लोक दृष्टि लोक जीवन में ही विकसित हुई है। कभी जंगल में विचरण करते हुए, कभी पहाड़ों की सैर करते हुए या कभी समुंदर किनारे टहलते हुए, कभी पक्षियों की चहचहाटें सुनते हुए, तो कभी पगडंडी से ‘वनराई’ या वनखंडी की ओर बेभान चलते हुए जिस शाश्वत आनंद की प्राप्ति है वह अन्यत्र दुर्लभ है।

नर्मदा प्रसाद उपाध्याय कहते हैं–‘लोक उपवन नहीं वन है। लोक की धरती के गुलाब गमलों में नहीं फूलते, जंगली बेल के वृंतों पर इठलाते हैं। जहाँ उपवन के राजपथ समाप्त होते हैं वहाँ से लोक की पगडंडी आरंभ होती है। लोक की धरोहर पथ नहीं पगडंडियाँ होती है और पगडंडी में राजपथ जैसी चकाचौंध भले न हो लेकिन उसके पास सरलता की वह दीप्ति होती है जिससे युग जगमगा जाते हैं, इतिहास आलोकमान हो उठता है।’


Image: Pattachitra artist at work in Odisha
Image Source: Wikimedia Commons
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भागीनाथ वाकले द्वारा भी