तपती दोपहरी

तपती दोपहरी

जीवन का न साथ छोड़ती
सुख-दुःख की गठरी
क्षण-पल बीत रहे तनाव में
तपती दोपहरी!

बार-बार इस मन पाखी ने
किया है श्वैर बिहार
पंख मार उत्साहित है यह
कभी न खाई हार
पर भटका है छाँव खोजने
मिली नहीं छतरी!

व्यथा-कथा वह किसे सुनाए
धूप-धूप तन तपता
निशा की शीतलता पाकर यह
हरसिंगार-सा झरता
धीरज सहज टूट जाता
जब दिशा हुई बहरी!

जाने इस बौराये मन ने
क्या-क्या नहीं सहा
किरच-किरच हो प्रिय की खातिर
अविरल अश्रु बहा
आँख मुँदी की मुँदी रह गई
नींद नहीं उतरी!

बदल गया है परिवर्तन से
आज का संबोधन
हर मोर्चा पर कोई न कोई
रहता दुर्योधन
दूर नहीं होती बेचैनी
समा गई गहरी!


Image :The Passing Caravan
Image Source : WikiArt
Artist : Eugène Girardet
Image in Public Domain


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भोला पंडित ‘प्रणयी’ द्वारा भी