शब्द-शब्द रचता है!

शब्द-शब्द रचता है!

ढहता है कगार
मेरे भीतर
जब मैं खिलता हूँ!
शब्द-शब्द रचता है जीवन
जब मैं लिखता हूँ!

प्रभंजन, हवाएँ
बहती हैं मेरे भीतर,
जब मैं लिखता हूँ!

क्यों मैं हूँ–
शब्द की पंखुरियाँ लिए हथेली में–
ढहती दीवारें हैं,
जब मैं गहता हूँ शब्द-शब्द!
फूल खिलते हैं
दरख्त झूमते हैं!

क्षण-क्षण बढ़ती हैं
बेचैनियाँ मेरी,
शब्दों को जब मैं
गलाता हूँ भीतर!


Image : The writer Hermann Rollett at the waterfall
Image Source : WikiArt
Artist : Anton Romako
Image in Public Domain


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शोभनाथ यादव द्वारा भी