सुनो, कबीरा कोरी

सुनो, कबीरा कोरी

कहा, कबीरा ने
रे पंडित बाद-बदंते झूठा…
इसी बात पर दुनिया रूठी
सारा काशी रूठा।
बाबा, मैं पंडित घर-जारा
मैंने झूठ न बोला
सच कहने-करने की धुन में
साधू चला अकेला।

बाबा, तुम कपड़ा बुनते थे
मैं बुनता हूँ दुनिया
दुनिया तो तुमने बुन डाली
मैं हूँ केवल धुनिया।

इस धुनिया ने कभी न सोचा
रैन-सुबह और शाम
वंशज हूँ तो धुन है मेरी
आऊँ जग के काम

एक कुल-बोरनी
बोर-बोर कुल
गंगा चली नहाने,
कुल तो रहा महा अविनाशी
बैठी हाट बिकाने।

बिकी हाट और बाट
बिक गए हम तो देश-विदेश
फिर तो हुई जहाँ में केवल
यह बिकने की रेस।

बिक गए पांड़े
बिके मौलवी
गोविंद बिके सयाने।
अब यह जो बाजारवाद है
बिकते हैं हरिचंदा
घर-घर बिकीं-लुटीं सतवंती…
सब कुदरत के बंदा।

कविताई जो बिकी
ओ बाबा
हम भी लगे ठिकाने।

बाबा, मैं भी
वही राम का
कूता हूँ और सूता हैू…
दुनिया जरे
भला क्या मेरा
मैं चमरौधा जूता हूँ।
इंतजार है मुझे खरीदे
कोई पाँव सजाये
मुझे पहनकर खेती गोड़े
या सिंहासन पाए।

बाबा, तुम्हीं कहो दुनिया से
मैं किस-किस सिर बीता हूँ।
दुनिया मुझे भला क्या बूझे
मैं तो सकल पलीता हूँ।


Image: Kabir004
Image Source: Wikimedia Commons
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