हमारे बीच का अभिमानी

हमारे बीच का अभिमानी

मैं जानता हूँ
उस आदमी को
मनुष्य को
और अभिमानी को
सदियों से!

उसके हाथ में
तलवार या हथियार
या कंधे पर जाल
नहीं होता था
उसे गेहूँ से था प्यार
और दीवारों से
महासागरों से भी
इसलिए कि उसमें फल आएँ
उसमें द्वार खुलें!

हम जानते हैं
कितनी ही दीवारें
तहस नहस हो गईं
कितने ही शहर
राख बनकर मुट्ठी में भर गए
और कितनी ही पोशाकें
धूल में अट गईं
इन पोशाकों से
राजनीति भी की गई
धमाके के बाद
लेकिन–
वह आदमी
वह सदाचारी
सदियों पहले का अभिमानी
आज भी हम सब के बीच
जिंदा है,
धरती, कोयला और सागर की वर्दी में
वह संयमी
दूसरों से भिन्न नहीं
या बिल्कुल दूसरे
जो वह खुद ही था
बिना विरासत का
बिना ढोर-बैलों का
बिना शस्त्र कवच का
वह आदमी आज कौन है
मैं? तुम? वह?!


Image : Landscape with brother s figure
Image Source : WikiArt
Artist : Vasily Surikov
Image in Public Domain


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मनाजिर आशिक हरगानवी द्वारा भी