शांतिः शांतिः शांतिः

शांतिः शांतिः शांतिः

नहीं गया हूँ मैं वहाँ कभी
जा ही नहीं सका
न हिरोशिमा, न नागासाकी।

फिर भी गया हूँ
की हैं यात्राएँ
बार-बार की हैं
कितनी ही कविताओं की
आज तक रिस रहे उनके घावों की,
बचा बचाकर पाँव
बचाया है जख्माया
शब्द शब्द।

मैंने भोगा है कविताओं के जख्मों को
देखा है उन्हें
खाँस-खाँस कर
बाहर निकालते परमाणु-भस्म
घुसेड़ा था जिसे जबरन,
भीतर दम फूलती साँसों में
बिना किसी भेदभाव के
पुरुष हो चाहें औरतें
बच्चे हो चाहे वृद्ध
या फिर युवा ही
जमीन की तो छोड़िए।

मैंने झाँका है जख्मों में
आज भी धँसे गालो वाली उस प्रेमिका को
लिपटी हुई है जो आज तक
पत्थराए प्रेमी की बाँहों में…
नहीं, अदृश्य बाँहों की मुद्राओं में…
अपनी सूजी हुई हड्डियों के
माँस में आँख चुराती
छिपाती अपनी कराहती आत्मा को
लटकी खाल को।

मैंने देखा है
देखा है बावजूद हटती नजरों के
करोड़ों करोड़ों कीड़ों को
रिसते हुए,
पीठ के जख्मों में बिलबिलाते
देखा है उनके रेंगते हाथों में
आज भी उठाए तख्तियाँ
छह अगस्त की।

उफ! कितना भयंकर था देखना
जख्मों से लुढकते आते बच्चियों के
धड़ से अलग सिरों को
भुरभुरा कर राख होते पाँवों को,
हाथों को, कानों को, आँखों को।

कितनी जख्मी हैं ये कविताएँ
आज तक सिहर सिहर उठती हैं
सरहदों पर
किसी पटाखे की आवाज तक से।

कैसे हैं ये जख्म इन कविताओं के
जो बहुत ऊँचा उठ नफरतों से, द्वेषों से
उठाए हाथ
बस कर रहे हैं पाठ…
शांतिः शांतिः शांतिः ।


Image : wiki File Firestorm cloud over Hiroshima
Image Source : Wikimedia Commons
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दिविक रमेश द्वारा भी