वे दोनों लड़कियाँ

वे दोनों लड़कियाँ

साथ-साथ रहती हैं
वे दोनों लड़कियाँ
दो विपरीत घरानों में पैदा होकर भी
एक मालकिन दूसरी नौकरानी की
दोनों पढ़ती हैं
साथ-साथ एक ही क्लास में
दोनों का सोच एक, चिंतन एक
दोनों मेधावी, व्यवहार-कुशल
दोनों की माँओं में
वर्गीय संस्कार की दूरी
बावजूद इसके दोनों लड़कियों में
दाँत कटी दोस्ती

मालकिन की बेटी
नौकरानी की बेटी को उलाहना देती है–
–क्यों दीदी! तू मुझसे किताबों के सिवा
कुछ और क्यों नहीं माँगती कभी!
–क्यों माँगू जरूरत हो तब न?
–मेरा सब कुछ तुम्हारा है दीदी,
संकोच न करना कभी
–मैंने तुमसे कब संकोच किया है छोटी?
नौकरानी की बेटी उत्तर प्रश्न में देती है
–सर्वेंट क्वार्टर में रहते हुए
तुम्हें कितनी तकलीफ है, पता है मुझे…
–नहीं रे, तू क्या
कम कष्ट झेलती है मेरे लिए…?
–अच्छा बता, तू अपना कमरा छोड़कर
मेरे कमरे में क्यों नहीं आ जाती?
मालकिन की बेटी प्यार से पूछती हैं
–माँ को बुरा लगेगा न…
–नहीं दी, उसे वही अच्छा लगता है,
जो मुझे पसंद हो…
–मैं तुम्हारी माँ की नहीं,
अपनी माँ की कह रही हूँ…

फिर दोनों की
परीक्षाएँ होती हैं साथ-साथ
दोनों विशिष्टता के साथ उत्तीर्ण होती हैं
मालकिन की बेटी के अंक कुछ अधिक हैं
अपराध-बोध के स्वर में कहती है वह
–दीदी, मुझे अफसोस है
मेरे अंक कुछ अधिक आ गए…
तेज होते हुए नौकरानी की बेटी
तत्क्षण बोल पड़ती है
–छोटी, यदि मेरे अंक
अधिक आते तो मैं स्वयं को
माफ नहीं कर पाती कभी
तूने अधिक अंक लाकर
मेरी इच्छा पूरी कर दी है…
–अच्छा दी…यह तो बताओ
तुम जीवन में क्या बनना चाहती हो?
–कुछ नहीं, बस तुम्हारी तरह
उदात्त विचारों वाली लड़की…
–तो फिर मैं क्या बनूँ, यह तो बताओ
–वृत्ति चाहे जो अपनाना, किंतु
वर्गविहीन समाज की संरचना में कोई
कोर-कसर बाकी न रखना…
–यही तो मैं तुमसे
सुनना चाहती थी दीदी!
कहते हुए मालकिन की बेटी
उसके कंधे पर सिर रख देती है
फिर धीरे से पूछती है–
वह क्या है जो हम दोनों को
एक ही विचार में बाँधता है?
–समर्पण, अपने सारे
सांसारिक प्रलोभनों का
अपने अभीष्ट पर समर्पण, छोटी…
–तो फिर क्यों न एक बार फिर
प्रेमचंद का ‘रंगभूमि’ पढ़ा जाय!
और दोनों एक साथ चल पड़ती हैं
मालकिन की बेटी के कमरे की तरफ!!


Image :Portrait of Children
Image Source : WikiArt
Artist :Theo van Rysselberghe
Image in Public Domain

कुमार नयन द्वारा भी