कहीं के न रहोगे

कहीं के न रहोगे

वर्षों बाद
आई है मेरे हाथों में कलम
मैं अब करूँगा
अपनी पीड़ा की अभिव्यक्ति
दिखाऊँगा–
समय और समाज को आईना
एक-एक करके खोलूँगा
तुम्हारे झूठ के पुलिदे को।

लज्जा आ जाएगी
तू शर्म से डूब मरोगे
दर्पण में
अपना चेहरा देखकर।

कहीं के न रहोगे
अपने पप्पी-साहित्य और
पराजित इतिहास के बारे में जानकर।


Image : Portrait of a Venetian Gentleman
Image Source : WikiArt
Artist : Titian
Image in Public Domain

सूरजपाल चौहान द्वारा भी