होली

होली

कैसी सुहाई जुनहाई
निशा में दिवा फिर आई।

ऊँची अटारी अकास, चाँद मुख,
गोर विभास लोग भूले दुख,
बह बह आते हैं सौरभ-सुख,
फीके शीत क्षिति छाई–
हुई-न-हुई जो सगाई।

पी की धुन गूँजी उपवन-वन,
सूने सुख से सिहरे कानन,
खुले सपरिचय आनन-आनन,
जोत से जोत जगाई,
प्रीति की रीति रमाई।


Image Courtesy: LOKATMA Folk Art Boutique
©Lokatma


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सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' द्वारा भी