बेटियाँ

बेटियाँ

आपके घर में तो अँधेरा था
एक एहसास काला-काला
मैंने जब दुनिया देखी, पापा!
घर में फैल गया उजाला
बेटी है लक्ष्मी कह माँ ने
चुमा था।
प्रसव के दर्द की स्मृति
माँ को ताजा है
बाहर जो बैठे थे मोहल्ला और बुजुर्गान
सब का चेहरा उदासी से घूमा था
ये किस्सा मेरे पापा
आपने मुझे दुलारते हुए सुनाया था
वे उदास हो लौटने लगे थे
और, आपने रसगुल्ला मँगवाया था
धाइयाँ नहीं मचली थीं
सोने का आभूषण लेने के लिए
पुत्र रत्न प्राप्त होने पर
जो बुआ ने वादा किया था
उन्हें देने के लिए।
आपने कहा था–
यह क्षण मेरे जेहन में
ऐसा बस रहा है
मानो जन्नत उतर आया है
चाँदनी सायास छिटक आई है
और चाँद खुशी से कैसा हँस रहा है
यह कौन आई है? मेरी माँ?
जिसकी याद मुझे
आज भी क्षण-क्षण आती है
गहरे अँधेरे में
सूरज की किरणें चमक जाती हैं
सच मानो दुनियावालो
वह सुखद एहसास
अकथनीय होता है
जब बेटियाँ किसी के घर आती हैं
ये सब कुछ मेरे पापा
आपने मुझसे कहा था
और मैं धन्य हो गई थी
मैं दूर किनारे कर देती हूँ
बेटियों के सभी दुःखों का एहसास
बेटियों की जिल्लतों को
और भ्रूण हत्याओं के सिलसिले को
जब मेरे पापा
अपनी इबादत में कहते हैं
ए खुदा! तेरी रहमत है कि
तूने मुझे बेटियाँ भी दी हैं
जिसकी बातें मुझे
पवित्र आत्मा की याद दिलाती हैं
और जिनकी शालीनता
बीबी फातमा की याद
आमीन!
आज भी पापा आप कहते हैं–
मेरे आँगन में
जब चिड़ियाँ चहचहाती है
मुझे, मेरी बेटियों की याद आती है!


Image: Mother and Child
Image Source: WikiArt
Artist: Eastman Johnson
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