कोरोना समय

कोरोना समय

यह कोरोना तुम्हारी करुणा पर
भारी पड़ गया देव!

हम निरीह प्राणी
इसकी चपेट में बिलबिला रहे हैं
कुछ जा चुके हैं, कुछ जा रहे हैं
कुछ को कुछ भी पता नहीं
कि तुमने उनकी किस्मत में
लिखा क्या है
सड़के सुनसान
इस वक्त शायद भूत भी
सड़कों पर नहीं निकलें
पीपल के पेड़ पर बैठी चुड़ैलें
चेहरे पर पत्तियों के मास्क पहने
दूर-दूर से ही बतिया रही हैं,
ऐसा सन्नाटा है देव!

कि सुई के गिरने से
बर्तनों के गिरने की सी ध्वनि होती है
गलियों में एकाकी भटक रही हवा की
पदचाप सुनाई देती है
यह तो बाहर का दृश्य है देव!

हमारे भीतर झाँक कर देखो
हरेक के अंदर किसी अँधेरे कोने में
बची-खुची जिंदगी थरथरा रही है
अपने में हौसला भरने की
कर रही है कोशिश
कोई अन्य विकल्प भी तो नहीं देव!

कुत्ते, गायें, बकरियाँ हैरान कि
यकायक धरती आदमी से रहित कैसे हो गई!
यह क्या हुआ कि बंद हो गईं हमारी
रोटियाँ, बंद हो गया पानी
कोई प्यार से या नफरत से भी हमारे
लिए उच्चारता नहीं कोई शब्द
ये मुहों पर पट्टियाँ क्यों बँध गईं?
इन्हीं में से तो आती थीं
हमारे लिए आवाजें
यह क्या हो रहा है देव!

अस्पतालों में तुम्हारे प्रतिरूप
डॉक्टर, नर्सें स्वयं विदा लेकर
जा रहे हैं तुम्हारी दिशा में
बच्चे तड़प रहे हैं दूध के लिए
तरुण भोजन और बूढ़े दवाओं के लिए
तुम पर तो ब्रह्मांड को
बचाने का दायित्व है
फिर पृथ्वी तो क्या है
रेत का कण मात्र भी नहीं
फिर भी तुम कुछ कर ही
नहीं पा रहे देव!

अब यह मत कहना
कि सब मनुष्यों के कर्मों का फल है
हम गलत हुए फिर भी
यहाँ का हर पत्ता तो
तुम्हारी ही इच्छा से हिलता है न,
हमने अपने घरों में इतनी प्रार्थनाएँ कीं
और वहाँ-वहाँ जाकर भी कीं
जहाँ-जहाँ ज्ञानियों ने बताया कि
तुम्हारे घर हैं
कुछ नहीं हुआ देव! कुछ नहीं
इस महाविनाशक आपात समय में
जब हमें तुम्हारे आसरे की जरूरत है
तुम कहीं दिखाई नहीं दे रहे
न ही कहीं तुम्हारी लीला,
सच सच बताना देव!
और सच के सिवा कुछ नहीं
कि तुम कहीं हो भी या नहीं?


Image : Rocky Mountain Sheep
Image Source : WikiArt
Artist : Albert Bierstadt
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राजेन्द्र नागदेव द्वारा भी