कभी कभी

कभी कभी

कभी-कभी उलझा लेता है कोई काँटा।
कभी कोई तार, कभी चलते-चलते
कोई कील लेती उलझा!

उलझ कर रह जाता है कोई वस्त्र।
उलझा लेता है कभी-कभी
कोई सन्नाटा!

कभी कोई शोर, कोई तारा, पथहारा!
कभी-कभी कोई फूल।
नदी कूल।
उलझा लेती है कोई धारा।

कभी-कभी उलझा लेती है
किसी ठौर
को दृष्टि, सृष्टि बन,
और हम रह जाते हैं ठगे से खड़े!
जैसे जाना न हो कहीं और!


Image : Thorns and roses
Image Source : WikiArt
Artist : Ludwig Knaus
Image in Public Domain


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प्रयाग शुक्ल द्वारा भी