नदी नहीं बहती

नदी नहीं बहती

देखा है बचपन में खेतों के पीछे
एक नदी दात्रया निकालती हुई बहती थी
नाम था उसका बाणगंगा

खूब नहाते थे उसमें
जब पानी का बहाव कम होता था चरती थी
नदी के ढावा के ऊपर हमारी बकरियाँ
गायें, भैंसें और हम सभी ग्वाल
नदी के किनारे नहाते हुए खूब मस्ती करते थे
लेकिन, अब उस नदी की यादें हैं
जो बार-बार याद आती
वर्षों पहले धनाढ्य व्यवसायियों ने
एक साथ मिलकर पूरी नदी गाँव वालों से
कौड़ियों के दाम में खरीद ली थी
चरते थे उसमें दिनभर जंगली जानवर
आवारा पशु, लेकिन नहीं दिखते अब वो भी

खरीदते वक्त बोला गया
आपको पक्की नौकरी देंगे
आपके गाँव में स्कूल अस्पताल और
पक्की सड़क बनाएँगे
आपकी जमीन की मुँह माँगी कीमत देंगे
इसी लालच में
सीधे-साधे गाँव वालों ने
कौड़ियों के दाम अपनी नदी को बेच दिया
इस उम्मीद के साथ कि कम-से-कम
हमारे बच्चे गाय बकरियाँ भैंसें चराने की बजाय
एक दिन स्कूल तो जाएँगे

नहीं है अब वहाँ कोई नदी या नदी का निशान
कानून को दिखाने के लिए
एक पक्का नाला बना दिया गया
और नदी में पेड़ों के बीच
छोटे-छोटे क्लब खोल दिए गए हैं
जिसमें विदेशी संस्कृति का नंगा नाच होता है
और ग्रामीणों की बोली भाषा वेशभूषा
को देख देखकर
भारतीय संस्कृति पर
अट्टहास किया जाता है
गाँववालों को असभ्य, जंगली वनमानुष
और न जाने क्या-क्या बोला जाता है
बना दी गई है नदी के चारों तरफ
ऊँची-ऊँची दीवारें
उनकी इजाजत के बिना
जहाँ न कोई आ सकता
और न ही जा सकता

वर्षों बाद आज भी गाँव में न स्कूल
बनी और न ही पक्की सड़क आई।


Image: View of an Indian Village with a Man Seated in the Foreground
Image Source: Wikimedia Commons
Artist: William Hodges
Image in Public Domain


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लहरी राम मीणा द्वारा भी