सच की साधना

सच की साधना

होता ही रहेगा यह विक्रम और बैताल,
सच भी चलता रहेगा अपनी चाल।

मैंने उसे सच कहा
और उसको खो दिया।

मैं तो सुनती-पढ़ती
और देखती आई हूँ कि,
सत्य का मार्ग कठिन है;
बाधाएँ हज़ार हैं;
चलना होता है अकेला ही;
अंततः जीत सत्य की होती है।

यही सोचकर इंगित किया,
सोचा, राह बदल जाएगी!
हुआ किंतु विपरीत;
उसने सच को झूठ में बदला;
रंग चढ़ाकर, माप-तौलकर,
झूठ को सच से सजाया।

और सज़ा दी सच को ऐसी,
सच कुम्हलाया, सँभल न पाया;
कह न सका कुछ भी पलटकर;
अनकहे को सहना नहीं आया;
मन-ही-मन रह गया सिमटकर;
समय ने यह कौन-सा पाठ पढ़ाया!

सब कुछ विस्मृत कर के उसने,
सच को झूठा कहकर उसने,
सच को दे दिया घर निकाला;
झूठ को हँसकर गले लगाया।

सच को ही सुनाया खरा-खरा,
सच ही छीज-छीज कर मरा,
झूठ ने रो-रो के सच को डराया।

न्यायिक प्रक्रिया में,
हो न सका, मोहांध में, इंसाफ़;
बिना पड़ताल फ़ैसला सुनाया;
झूठ को मिला संदेह-लाभ;
उस पर प्रभावित करने हेतु
मिल गया उसे अपना-सा साथ।

सच अपनी ही तलाश में
फिर साधना में लीन है
सच क्या सच में दीन-हीन है!
अकेला और अपनों से विहीन है!
सच बतलाना ग़लत हुआ क्या
झूठ को सच का आईना दिखाया!


Image: Young Girl with a Bird
Image Source: WikiArt
Artist: Berthe Morisot
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निशा निशांत द्वारा भी