सोलह दूनी अड़तीस

सोलह दूनी अड़तीस

फ़लसफ़े और भूख विलोम शब्द हैं
एक दिन सभी फ़लसफ़ों को
सड़कों पर ले जाएँगे
और देखेंगे झोपड़ा
फटा ब्लाउज़
और कैसे भूख फ़लसफ़ों को खाने के लिए मजबूर है
फ़लसफ़े की कतरन ब्लाउज़ पर चिपका
बचे हिस्से को जाड़ा ओढ़ लेगा
फ़लसफ़े की प्रज्ञा एक बार डांसर है
पेट काटकर बच्चों को देती
और रोज़ सड़क के साथ रात बिताती है
बाकी का आधा पेट देने निकल पड़ी है कई योजन
उस बच्चे को जिसकी बढ़ती भूख
कुछ देर में सूरज लील लेगी
रात शीशे के बाहर
मेरी पलकें धुल रही नहर में
एक धक्के से टूट गए
मेरी आँखों के काँच
ये एक साज़िश थी
जैसे हादसे में किताबें जल रही हों
शादी के हवन कुंड में
पेट की माँ को बुढ़िया बोला तो चीखेगा वह
बुढ़ापा शरीर में थक्के और चूल्हे में ठंडी राख भरता है
पटरी पर औंधे लेटे सिसकरते आशिकज़ादे
मासूम उलटी चप्पलें पहनते हैं
जिसकी परिक्रमा करती आकाश गंगा
अखबारों में नास्तिक है
उसका पेट बगावत खाकर
जल रहा है धीमी आँच पर
तुम्हारी बातें गलकर सीने पर ठहरी
तो आँख का पानी आत्मदाह को निकल पड़ा
औरत को भीषण सदमा तब लगता है
जब आँख का पानी मर जाए
एक नाव के पानी में जान फूँक
छोड़ देना उनकी आँखों में
एक नेक काम हो सकता था
पर तुम मर चुके हो
हर मरा हुआ आदमी औरतों को
सिर्फ लाश समझता है
गंगा छोड़ मुझमें बहने आती रही
तुम्हारी अस्थियाँ
वहाँ अब भूखा दरिया है
फ़लसफ़ा मेरी नींद का गला घोंट गाड़ देता है
अपनी बंजर कोख में
मैं नींद में अक्षरों के सड़ने का
इंतजार कर रही हूँ
जो हफ्तों से बासी पड़ा
चूहे के पिंजरे में झूल रहा है
जैसे अर्जियाँ झूलती रहीं
टेबल के नीचे वाले उलटे गाँधी जी पर
मैं एक कहानी में खुद को खोद रही हूँ
और गहरा खोद रही हूँ
चिंता मत करो
मैं यहाँ खुद को दफ्नाने नहीं आई
बल्कि अफसोस को धक्का मारने आई
तो पाती हूँ
कोई शकुंतला के पैर का काँटा नहीं निकाल पा रहा
वो तड़प रही है
दुष्यंत पर सवाल रख
पूरा ज़ोर लगाए गाथ आती हूँ
मैं तुम्हारे दाँत
जो उसकी गर्दन पर पसर
रक्तपान करना चाहते थे

शकुंतला के लिए
ईश्वर आ जाते अनारकली के अवतार में
खंबा फाड़कर बाहर
आज की द्रौपदी को बचाने
लेकिन ईश्वर ऐक्ट आॅफ गाॅड के लिए
उम्रकैद में हैं

उनकी आँख में एक फूल उग आया है
जिसमें किसी रंगरेज़ को कोड़ों से पीटा गया
ऊँची जाति वाले की चदरिया को
रंगने के लिए
जिसे चुपचाप कबीरा देखकर
लिख रहा होगा शायद कुछ ऐसा–

झरि झरि बैठै ओटक रसमा
बुझि बुझि चंदन चाल
कोइ चदरिया चाक भई
ते कोइ के चादर लाल
मंदिर बैठे पूजे पथरा
चंदन लियो संभार
जित टपकी उत खाए अधर्मा
हरि सूँ रंगत राल
कहहिं कबीर सुनहु मोर मििट्टयाँ
ढोंग न जानहि काल

मेरे अंदर का शहर मुझे कोसने में लगा है
एक व्रीड़ा से विवाद में
मैं तरल और हवा दोनों हूँ
सो कहीं से बह सकती हूँ
किसी विवाद से भी
मौन एक मिथ्या है
सकल शांति झिंगुर का संताप है
जो देह को कई कोणों से
उधेड़ना शुरू करती है
अभिसार के दिनों में
कोई ढूँढ़ न ले
इसलिए तुम्हारे महफूज़ हृदय में
छुपी रहती थी
और अंदर की औरत जोर से हाँकेंगी
उसकी टेर में कंठ
से विस्मित करने वाली सुगंध
के अलावा विलाप मिलेगा
रुककर सुनोगे तो बच्चे की हँसी
पंखे की आवाज में घुसकर
ट्रेन की छुक छुक से फिसलकर
चिपका फूटे नारियल से
जिसकी गेंद बना बेघर बच्चे खेलते मिले
ये सब मदद माँगते मिलेंगे
मंदिर में एक पत्थर बनकर
स्लेट पर सोलह दूनी
अड़तीस लिखने वाला
बस्ती का राम अपने कटे पैर से आकर
इन्हें एक औरत बना देगा
अब कल्पों से भूखे ईश्वर पर फ़लसफ़े नहीं लिख सकते
जब तक वह बा-इज्जत बरी नहीं होते
~कनुप्रिया!


Image : Stařena S Dítětem
Image Source : WikiArt
Artist : Jakub Schikaneder
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