नदी-धर्म

नदी-धर्म

पानी से है प्यार अगर तो
पानीदार बनो।

पानीदार बनोगे संवेदना-तरलता से
कल-कल-छल-छल
लहरों की गतिमान चपलता से

किसी पहाड़ी झरने की
निर्मल जलधार बनो।

जीवन की गति है
नदिया का बस बहते जाना
लोक के लिए खा मौसमी थपेड़े, मुसकाना

तृषित धरा की तृप्ति के लिए
मंदिर फुहार बनो।

नदिया में पानी, आँखों का पानी बाकी है
पानी से ही जीवन और रवानी बाकी है

मरे न आँखों का पानी
इसलिए उदार बनो।

खुदगर्जी में खून बहाया, बहा पसीना क्या
नदी-धर्म गर नहीं निभाया, जीना जीना क्या!

किसी डूबती नैया के तुम
खेवनहार बनो।
पानी से है प्यार अगर तो
पानीदार बनो।


Image : A river
Image Source : WikiArt
Artist : Isaac Levitan
Image in Public Domain