जब सुधि आती गा लेता हूँ।

जब सुधि आती गा लेता हूँ।

जब सुधि आती गा लेता हूँ।
प्रिये! तुम्हारे गाये गीतों को गा मन बहला लेता हूँ।
मैं न खुला-सा गा भी सकता,
और न तान उड़ा ही सकता,
फिर भी प्रति दिन चुपके-चुपके उर के तार बजा लेता हूँ!!
उर की आग न बुझती रानी,
भर-भर आता दृग में पानी,
अंतर की ज्वाला से गीले-गीले नयन सुखा लेता हूँ!!!
पास तुम्हारे मन है बसता,
कैसे आऊँ पास विवशता,
बंदी तन कर खाली भीतर-ही-भीतर पछता लेता हूँ!!
प्यार सिसककर सोता रहता,
मिलने का मन होता रहता,
सुधि में घुल-घुल जलता फिर भी सुधि की आग जला लेता हूँ!!
जब सुधि आती गा लेता हूँ!


Image: The Lonely Cedar
Image Source: WikiArt
Artist: Tivadar Kosztka Csontvary
Image in Public Domain


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सरयू सिंह ‘सुंदर’ द्वारा भी