किसकी ध्वनि कानों में आई

किसकी ध्वनि कानों में आई

किसकी ध्वनि कानों में आई
लगता है कोई समीप आ
कहता अरे मनुज! तुम जीवन
भर जग जन-उर में संजीवन
यही रागिनी मन में छाई।

ले कूची कर्तव्य-प्रेम की
धरा-हृदय पर चित्र खींच दो
मन-पाटल रस बीज सींच दो
चाह लता क्षण में गदराई।

लोचन-नभ में जगी कामना
घिर आया अधिकार कर्म बन
भेद खोजकर मर्मीं नूतन
प्रखर कल्पना छवि मुस्काई।

सृष्टि-रंध्र की कथा, युगों से
धड़कन में सुनता आया हूँ
जीवन-निधि पा खिल पाया हूँ
उम्मिल उर-गंगा लहराई।

भागी अंध-प्रहर की छलना
चेतनता कहती, नर चलना
सीख, दीप्त रवि-शशि से कढ़ना
जड़ता की प्रतिमा घबड़ाई।

बीन बजी, स्वर-लहरी फैली
रश्मि गीत की कड़ी रुपहली
कर्म भूमिका, जग चमकीली
नाच रही ध्वनि पर बौराई।