मेघ-गीत

मेघ-गीत

ये आए दूसरे, नए!
गए साल के मेघ गए!!

वह छहराते अमृत-फुहारें,
इनकी असि की, मसि की धारें,
तिरछी बरछी-सी बौछारें,
गगन उतान, न नेक नए!
नए साल के मेघ गए!!

यह कहते–धरती मटमैली,
जब भी हरियाली है फैली,
अजब देखने की है शैली!
अन्य वदान्य, विदूषक ये,
गए साल के मेघ गए!

रीति यही अभिनव दाता की,
प्राण हरण करते त्राता की,
मेट जगत, युग-निर्माता की!
दुर्दिन के घन घिरे, आए!
गए साल के मेघ गए!!

[2]

नभ पर पर्वत-से मेघों का दल छाया,
पावस का कैसा समय सलोना आया!

रवि-रश्मि-सहारे खिँचा स्वरस सागर का;
नव मास गर्भ-धृत उसी रसायन-वर का–
यह जगमग-जगमग बिज्जु-ज्योति-अभिरामा–
है प्रसव कर रही शुभ नभस्थली श्यामा!
यह स्फटिक-विमल जल नीलमघन की माया!
पावस का कैसा समय सलोना आया!!

यह सांध्य अरुणिमा नहीं, रक्त चंदन है,–
जिससे रंजित-सा कोमल, श्यामल तन है,
यह शीतल, मंद, सुगंध समीर नहीं रे,
नि:श्वास छोड़ता गुमसुम, धीरे-धीरे,
कामातुर-सा नभ निष्प्रभ या पँड़राया!
पावस का कैसा समय सलोना आया!!

यह हवा बीच से चली सजल मेघों के,–
ऊजी-ऊदी, इठलाती, खाती झोंके;
इतनी ठंडी कि कपूर तुहिन-छवि छीनी,
भरती सुगंध केतक की भीनी-भीनी,
अंजलि भर-भर पीने को जी ललचाया!
पावस का कैसा समय सलोना आया!!

इन छिटपुट, फुटकल जलदों से तारापथ–
छिपता, दिखता; इसका अक्रम-सा इति-अथ–
ऐसा लगता, जैसे प्रशांत सागर हो,
उत्तुंग-खर्व-गिरि-गह्वर का आगर जो
ज्यों गगन-सिंधु ने एकरूप हो पाया!
पावस का कैसा समय सलोना आया!!

मदमाते, नीरव भौंरे जो लखने पर,
रस से उलबल वे जामुन-फल चखने पर;
ऐसे ही सरस रसाल डाल-डंठल पर,
जो अनिल-चलित हो बिछ जाते जल-थल पर,
यों नील-पीत परिणत कानन लहराया!
पावस का कैसा समय सलोना आया!!

जो पत्र-पुटों पर टप-टप टपक-टपक कर–
आता जल; विहगों का दल लपक-झपक कर–
है उसे पी रहा झुक झुक, उझक-उझक कर,
गीले डैने फड़का, सुलझा उलझे पर,
कोई प्यासा, कोई बिन-पिए अघाया!
पावस का कैसा समय सलोना आया!!

गिरि-सरिताएँ जल्दी-जल्दी हैं भरती–
–उन मुक्ताओं को, जो प्रवाल बन झरतीं!–
घुल कर गैरिक ने जल को लाल बनाया,–
जिस पर कदंब-कुसुमों का परिमल छाया,
जिसका पीछा करता मयूर-स्वर आया!
पावस-रस से है सराबोर मन-काया!!

[3]

जीवन जीव मात्र को देने पावस रस शीतल
आया, छाया रवि शशि पर; आकाश-दिशा चंचल!

तड़ित् – तपक – गर्जन-तर्जनमय
निविड़ नील घन से नभ निश्चय–
दिखता है रे सगुण ब्रह्म-सम, ढँके जीव को सत्व-रजस्-तम,
ज्योति अदृश्य गगन की, तन की, दोनों अति विह्वल!

आठ मास तक वसुधा का धन–
संचित करता रवि-कर बन घन,
लगा लुटाने का यह मेला,
आई बरसाने की वेला,
स्तब्ध भूमि पर अमरपुरी की उतर रही हलचल!

कोई सहृदय देख तप्त जन,
उसे जुड़ाने को, निज जीवन–
दे डाले, त्यों ही महान् घन
निरख दग्ध जग, विद्युल्लोचन,
उष्ण उसाँसों से कंपित हो ढरकाते दृग-जल!

शुभ परिणाम सकाम तपस् का
निरख हृष्ट होता मन कृश का
ग्रीष्म-शुष्क-तनु थी यह धरती
सलिल-सिक्त हो आज हुलसती,
तप तन, मन–दोनों को कर देता निष्कलुष, विमल!

रवि की छवि के झरते-ढरते
जुगनू जगमग-जगमग करते
मलिन किंतु हो जाते तारे,
जैसे पुण्य पाप से हारे!
ज्यों कलियुग में वेद नहीं, होते पाखंड सफल!

मेघ-शब्द सुन दादुर बोले
ज्यों गुरु-स्वर सुन वटु मुँह खोले,
उमगी क्षुद्र नदी की धारा
ज्यों उच्छृंखल धन मद मारा!
बूँद-घात गिरि सहते, रहते भक्त विपद्-अविचल!


Image: After a Rain. Country Road
Image Source: WikiArt
Artist: Fyodor Vasilyev
Image in Public Domain


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आचार्य जानकीवल्लभ शास्त्री द्वारा भी