नया लेखक :: क्या करे बेचारा?

नया लेखक :: क्या करे बेचारा?

नया लेखक क्या करे बिचारा?
कोई है काँटों का रास्ता दिखाता,
कोई मन भावने प्रलोभन दे बुलाता,
कोई बतलाता जीव-ब्रह्म का नाता,
नया लेखक क्या करे बिचारा?
सपने देखना तो अपने बस की बात है
कोई परवाह नहीं कि दिन है या रात है
देखो सपने–बहुत खूब; मगर ठहरो!
कोई आवाज़ दे रहा है उधर से–
कहता है–कविजी, आज क्या खाइएगा?
अपना तो पेट हवाखोरी से भर लेंगे
लेकिन घर वालों को क्या खिलाइएगा?
टेढ़ा सवाल है, जवाब क्या दें, कैसे दें?
नया लेखक क्या करे बिचारा?
ऐसी बौखलाहट में नज़र उठे अगर आसपास
खुश हो जाए तबीयत, लौट आए फिर उल्लास
वाह, भई वाह, क्या खूब इमारतें हैं,
गगनचुंबी प्रासाद, लंबे चौड़े बाजार
रात में जगमग-जगमग करता नगर
फ्लैट, बँगले, मैंसन, कॉटेज सुहावने
पोर्टिंको, बारजे, बागीचे लुभावने,
सब पैसे का जादू है–
रोशनी, चमक, उजाला, प्रकाश!
कैसे चकाचौंध कर देने वाले शब्द हैं!
आती-जाती मोटरें, फ़ोर्ड, व्यूक, मारिस, हिलमन
नए सन् के मॉडल, तेज़ रफ्तार–क्या समाँ है!
हलके-सुरों में बातें करते हुए स्त्री-पुरुष
बाहरी बेफिक्री! धन-दौलत भी क्या चीज़ है!
रेसकोर्स, होटल, रेस्टोराँ, मार्केटिंग!
पैसे के लिए कैसे उन्मुक्त, खुले द्वार हैं!
इधर आए : उधर जाए–
कितना रोमैंटिक है!
क्या करे नया लेखक–
पूँजी की महलों की, सट्टे की प्रशस्ति करे?
बदले में सिल्क का कुरता, शोलापुरी धोती पहन
खुद भई चमक-दमक भरी सड़कों पर मौज करे,
सजे-बजे ड्राईंग रूमों में कविता करे, गुनगुनाए–
गीत गाए?
नया लेखक क्या करे बिचारा?
खुद भी हो जाए वह वैसा ही दीन-हीन?
क्षुब्ध, असंस्कृत, मलीन
जैसे वे अनगिन खेतिहर, असंख्य मजदूर
जिन्हें इस व्यवस्था ने कर दिया मजबूर
कि पैदा होकर मर जाए नाबदान के कीड़ों की तरह!
क्रांति की आवाज़ बुलंद करने में बेबेस
नए युग की संभावनाओं से अपरिचित,
गंदे, नीच, घृणित, कुत्सित!
ऐसों के साथ नया लेखक मिले-जुले?
फूस की झोपड़ियों में जिंदगी बसर करे?
उनके सुख-दुख को अपना करके समझे,
उनके लिए जान की बाज़ी लगा दे?
जेल जाए, कोड़े खाए, ठोकरें खाता फिरे
मज़लूमों की क्रांति की योजनाएँ बनाए
हवा में विद्रोह भरने वाले गीत गाए
नया लेखक क्या करे बिचारा?


Image: Abul Hasan Saʿdi presents a book of his poems
Image Source: Wikimedia Commons
Artist: Baltimor
Image in Public Domain

अजित कुमार द्वारा भी