निर्झरिणी

निर्झरिणी

निर्झरिणी, तेरी जल-धारा,
ढोती मेरे सजग भाव को,
तोड़ हृदय की कारा!

पड़ा हुआ था, यथा सुप्त हो,
बंदी था, पर आज मुक्त हो,
विचर रहा, मकरंद-भुक्त हो,
तेरा वह चिर-प्यारा।

लगे हुए तेरी वेणी के,
वन के विविध कुसुम से,
ले पराग, वह अंचल तेरा, रंगता मन-कुंकुम से;
अपनी तूली से करता है,
तेरा रूप सँवारा।

सलज-षोड़शी खड़ी हुई जो,
निकट ग्राम में रहती,
भाव-भार से झुकी हुई-सी,
घट में पानी भरती;
कर देती है आसमान जो
तेरा कूल-किनारा।

कहीं वहीं वह देख, अली-सा,
लगे नहीं मँड़राने,
मन-मकरंद छिपा अंतर में,
छिप कर उसे चुराने,
जिसके मृदु मुसकान-विभव पर
जग ने सब कुछ वारा।

गगन-देश से तारे जग कर,
देते उसे निमंत्रण,
अर्द्धनिशा की नीरवता में
करते जब मिल गुंजन,
तो मिलने को उनसे उत्सुक
करता पंख पसारा।

वह भी अश्रु बहाता दृक् से,
मोती – के – से गोल,
क्रम-क्रम से करती जब आँखें
बंद शेफाली लोल।
चुक जाता जब तेल दीप का,
उग आता शुकतारा।

निर्झरिणी!–तरणी भावों की
सरणी प्रेम – प्रभा की!
री ज्योर्तिवरणी, कर-कंकिणी,
चिर-संगिनि वसुधा की!
चिर-यौवने, भाव यह मेरा,
चिर – संगी हो तेरा;
तेरे संग सदा बहता हो,
मुक्त, न कोई घेरा
भव-भव में नव-नव भावों का,
करती रहे पसारा–
निर्झरिणी, तेरी यह धारा।


Original Image: Summer evening River
Image Source: WikiArt
Artist: Isaac Levitan
Image in Public Domain
This is a Modified version of the Original Artwork


Notice: Undefined variable: value in /var/www/html/nayidhara.in/wp-content/themes/oceanwp-child/functions.php on line 154
राजेश्वर प्रसाद नारायण सिंह द्वारा भी