पावस गीत

पावस गीत

आज घिरे पावस-घन काले!
आज हँसी धरती खिल, खिल-खिल, आज गगन ने दीपक बाले!

तुम पावस के फूल झरो हे, तुम उतरो सावन-घन-कज्जल
घन के आँसू वर बन बरसो, तुम बरसो वर्षा के बादल
अंग-अंग प्यासी वसुधा को आज करो शीतल हरियाले
आज घिरे पावस-घन काले!

विद्युत-दीप जले नभ में, या नयन जले प्रलयंकर हर के
छूट रही बिजली, कि धरा पर टूट रहे तारे अंबर के
मेघ दामिनी गगन-गली में आज चली घन-घूँघट डाले
आज घिरे पावस घन काले!

आए मेघदूत विरही के, भींगी यक्ष-प्रिया की पलकें
संध्या ने कच-जाल बिखेरे, भीग चली संध्या की अलकें
अमा चली रक्ताभ गगन से खोल अलक काले घुँघराले
आज घिरे पावस-घन काले!

नभ-आँगन में आज विचरती धरती की चिर-संचित चाहें
चिर-सपने मानव-मन के फिर घेर रहे अलका की राहें
इंद्र धनुष के शर शत छूटे, फूट चले नभ-उर के छाले
आज घिरे पावस घन काले!

पावन-घन नभ घिर-घिर आए, व्योम-पंथ पर बादल डोले
आओ हे घनश्याम, श्याम घन घिर आए, आओ–मन बोले
दृग बरसे पर जलन बुझे ना, उर ने क्या अंगारे पाले
आज घिरे पावस-घन काले!


Image: During Rain
Image Source: WikiArt
Artist: Stefan Popescu
Image in Public Domain


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हरिश्चंद्र प्रियदर्शी द्वारा भी