प्रिय शेष बहुत है रात अभी मत जाओ!

प्रिय शेष बहुत है रात अभी मत जाओ!

इस गीत को मैं अपनी 1949 की कृतियों में सबसे प्यारी मानता हूँ। यह ‘मिलन यामिनी’ में संग्रहीत है यह सर्वप्रथम ‘आजकल’ दिल्ली के मई 1949 के अंक में प्रकाशित हुई थी।

(1)

प्रिय शेष बहुत है रात अभी मत जाओ!
अरमानों की एक निशा में
होती हैं कै घड़ियाँ,
आग छिपा रखी है मैंने
जो टूटी फुलझड़ियाँ,

मेरी सीमित भाग्य-परिधि को
और करो मत छोटी,

प्रिय शेष बहुत है रात अभी मत जाओ!

(2)

अधर पुटों में बंद अभी तक
थी अधरों की वाणी,
‘हाँ-ना’ से मुखरित हो पाई
किसकी प्रेम कहानी,

सिर्फ भूमिका थी जो कुछ
संकोच भरे पल बोले

प्रिय शेष बहुत है बात अभी मत जाओ
प्रिय शेष बहुत है रात अभी मत जाओ!

(3)

शिथिल पड़ी है नभ की बाहों
में रजनी की काया,
चाँद-चाँदनी की मदिरा में
है डूबा भरमाया

अलि अब तक भूले-भूले-से
रसभीनी गलियों में,

प्रिय मौन खड़े जलजात अभी मत गाओ!
प्रिय शेष बहुत है रात अभी मत जाओ!

(4)

रात बुझाएगी सच-सपने
कि अनबूझ पहेली,
किसी तरह दिन बहलाता है
सबके प्राण सहेली,

तारों के झँपने तक अपने
मन को दृढ़ कर लूँगा,

प्रिय दूर बहुत है प्रात अभी मत जाओ।
प्रिय शेष बहुत है रात अभी मत जाओ।


Image Courtesy: LOKATMA Folk Art Boutique
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