सामने सागर भरा फिर भी रहे प्यासे!

सामने सागर भरा फिर भी रहे प्यासे!

सामने सागर भरा फिर भी रहे प्यासे!
हो गए जीवन अनोखी एक उपमा-से,
प्रेयसी के हो चुके कवि बहुत ये झाँसे!
ये कनूके फाड़ फेंके प्रेम-पत्रों के,
प्याज़ के छिलके, उखाड़े पंख पाखी के
कब्र पर बिखरे जुही के फूल हैं सूखे!
भीति भी है, प्रीति भी है, गीत क्या सूझे?
इस अबूझे चित्त में हैं एक से दूजे।
हार मेरी भावना तुम संग बुत पूजे!
दुर्ग के खँडहर, निपोरे दाँत ये ईंटे,
याद हैं जैसी दरारें, स्वप्न हों टूटे,
मानवी लत है जहाँ मीठा तहाँ चींटे!
ज्वार उठ्ठा ही नहीं सागर कई फूटे
पत्र लिखे ही नहीं वादे किए झूठे।

प्रभाकर माचवे द्वारा भी

पहले शीर्षक से आप चौंकेंगे–सो उसे समझा दूँ। भगवे से तात्पर्य है हिंदूधर्म की ध्वजा जैसे शिवाजी का भगवा झंडा, ‘हिंदू पद-पादशाही’ की पताका। विभाजित-चिह्न का अर्थ है बनाम। हरा–मुस्लिमों के प्रिय परचम का रंग–सब्जा। हरे पर चाहें तो हिलाल–पश्चिमी कोर पर–शायद इसका प्रतीक कि अब तो सच्ची धार्मिक भावना ईद का चाँद बन रही है, शायद हिंदू-ध्वज के सूर्य और तलवार का जवाब चाँद और खंजर जैसा। दोनों की लड़ाई से निकला क्या? कुछ और खून-खराबा; अपनी ही ज़मीन का अपने ही पैरों पर मारे हुए कुल्हाड़े से खराबा; अपने ही बच्चे के गले को रौंदकर मार डालने की कोशिश में निकली हुई कातर चीत्कार; फिर सब चुप-चुप-चुप-चुप। श्मशान का-सा सन्नाटा; गोरों के मिलिटरी बूटों की तालबद्ध चाप; कड़ाके के फायर–तड़-तड़-तड़-तड़; किसी गली की नोक पर जाती गरीबिनी की जाँघों पर संगीन से उठाए गए लहँगे के बाद एक वीभत्स हँसी; टार की चमाचम सड़कों पर भारी फौजी मोटर-गाड़ियों की खड़-खड़ खड़-खड़; दिन में बोलने वाले उल्लू। अखबारों के मुँह में कपड़ा ठूँसकर साँस लेना बंद–सेंसर; चल गई चल गई की अफवाहें; छत्तीस घंटे का करफ्यू; सामूहिक जुर्माने; एक शब्द में हमारी गुलामी की दर्दभरी अँधेरी रात का और प्रलंबित होना–जब तक कि सप्तर्षि न ढल जाए, जब तक कि शुक्र भी फीका न पड़ जाए, तब तक चट्टान के नीचे दबे इन जिंदा प्रेतों को बाहर आने के लायक प्रकाश कहाँ है। जेल की तंग कोठरी की छत में लगा सांप्रदायिक विद्वेष का बर्र का छत्ता किसी ने छेड़ दिया है, अब भागे भी तो किधर? चारों ओर लोहे की मोटी छड़ें हैं। देश के चेहरे पर, बदन पर सूजन छा रही है। दंगों का बुखार चढ़ रहा है।...