ज़िंदगी के स्वप्न मेरे

ज़िंदगी के स्वप्न मेरे

ज़िंदगी के स्वप्न मेरे गान के आधार होंगे।
आज के विश्वास मेरे कल सभी साकार होंगे।

रश्मियाँ बन कर खिलेंगे
मधुर मेरे प्राण के स्वर,
दीप बन कर के जलेंगे–
नित्य मेरे गान के स्वर,
क्षीर-सा हम पी चलेंगे
पीर सारी ज़िंदगी की–
पतझरों में खिल उठेंगे
फूल बन निर्माण के स्वर;
शृंखलाएँ टूट चरणों में गिरेंगी अर्चना को–
प्राण, मेरे गान युग की वीण की झनकार होंगे।

शूल के शव पर कली का
जब हमेशा राज होगा–
हर सुमन की ज़िंदगी का
तब नया अंदाज़ होगा,
चीर मरु का वक्ष पनपेंगे
नए पौधे धरा पर–
मौत की तब मौत होगी,
ज़िंदगी का साज होगा;
लोचनों में घिर उठेंगे विकल सौ-सौ प्यार के क्षण,
एक ही स्वर में बँधे हर ज़िंदगी के तार होंगे।