प्यारी सी गौरैया

प्यारी सी गौरैया

जब पढ़ती हूँ गौरैया की संख्या चिंताजनक रूप से कम होती जा रही है, गौरैया संरक्षण पर चर्चा हो रही है, लेख लिखे जा रहे हैं तब मुझे अपने परिसर में बसी शताधिक गौरैयों को देखकर ऐसा गर्व होता है मानो इनका यहाँ होना मेरी वजह से संभव हो रहा है। लोग जब गौरैयों की आश्चर्यजनक उपस्थिति पर दंग होते हैं मैं उपलब्धि से भर जाती हूँ। गौरैया पर बात करने से पहले परिसर का भूगोल बताना चाहती हूँ जहँ कई किस्म के पक्षी निःशंक रहते हैं।

अन्य शहरों की तरह मेरा शहर सतना भी धीरे-धीरे कांक्रीट में बदल रहा है। मैं एक हद तक प्रकृति के संपर्क में रहती हूँ, शायद इसलिए हृदय उत्साहित, मन चमत्कृत बना रहता है। मैं अस्सी के दशक से इस परिसर में निवास कर रही हूँ। उन दिनों आज की तरह नौ फुट ऊँची मजबूत चौहद्दी निर्मित नहीं हुई थी अतः परिसर खुले मैदान की तरह था। बेशरम, गाजर घास, धतूरे, मदार, भटकटैया की काँटेदार झाड़ियाँ तादाद में थी। खुलेपन में नेवले, केकड़े, भिन्न लंबाई के सर्प विचरते। कभी-कभी राह भटक कर सर्प घर में घुस आते। आरंभ में डर लगता था। बाद में समझ में आ गया अधिकतर सर्प विषैले नहीं होते। हमलोग हॉकी और लाठी से ध्वनि कर सर्प को द्वार की ओर जाने के लिए प्रेरित करते। वे भ्रमित होते लेकिन बाहर निकलने में सफल हो जाते। मैदान में कुत्ते घूमते। उन्हें पत्थर मारना कुछ लड़कों का मनोरंजक खेल था। बसोर दिनभर सूअर चराते। सूअर के चारों पैर और मुँह को मजबूत रस्सी से बाँध कर, बसोर अपने अँगूठे और उँगलियों से अच्छी रफ्तार से सूअर की समूची देह के बाल इस तरह खींचते कि अंतिम सिरा भी निकल आता। बालविहीन सूअर विचित्र दिखते। कैंची से काटने पर बालों का अंतिम सिरा नहीं कट पाता अतः बसोर ऐसा क्रूर तरीका अपनाते थे। बाल जितने बड़े, उतने उपयोगी। पीड़ा से तड़पते-चिंचियारते सूअर को घेर कर बैठे लड़के हिंसा के ऐसे अभ्यस्त हो रहे थे कि ताली पीटकर हँसते रहते।

फिर चौहद्दी बन गई। खुले मैदान को परिसर की हैसियत मिली।

आम, नींबू, अमरूद, आँवला, चीकू, जामुन, अमलतास, कनेर, बाँटल ब्रश, गुड़हल, मधुमालती, बोगनवीलिया…कई पौधे रोपे गए। पौधे आज मजबूज दरख्त बन चुके हैं। स्वतः उग आया शीशम गगनचुंबी हो गया है। पक्षियों को दरख्त लुभाते हैं। कौआ, कोयल, महोखा, टिटहरी, कबूतर, हुदहुद, पोड़की, बुलबुल, तोते और भी विविध रंगों और आकार वाले छोटे पक्षी जिनका मैं नाम नहीं जानती, ने आमद बढ़ा ली। परिसर गौरैयों का गढ़ बनता गया। एक-दो बार उल्लू, नीलकंठ जैसे पक्षी भटककर आ गए। नीलकंठ लॉन में लगे झूले के लोहे वाले ऊपरी बार में उदास बैठा रहता। नीलकंठ देखना शुभ होता है तथापि मैं ईश्वर से प्रार्थना करती मेरा दिन शुभ हो, न हो यह अपने साथियों से जा मिले। एक दिन नीलकंठ चला गया। उसके जाने से अभाव महसूस होता पर आशा थी सही जगह गया होगा। एक बार एक उल्लू आ गया। पखवाड़े भर इधर-उधर उड़ा, बैठा फिर चला गया। कहते हैं उल्लू को देखना अशुभ होता है। मेरा कुछ भी अशुभ नहीं हुआ। बरसात में प्रति वर्ष जमीन में पानी भर जाता है। जाने किस दिशा से झुंड में सारस आते हैं। पानी में चोंच डुबो कर कीट पकड़ते हैं। उनका स्वच्छ सफेद रंग सुबह को अधिक चटक बना देता है। कुछ सारस अगली सुबह आने के लिए लौट जाते हैं। कुछ शीशम और बाँटल ब्रश के पेड़ों पर बसेरा करते हैं। बरसात बीतते न बीतते अपने डेरों पर लौट जाते हैं।

आम और अमरूद तोतों का रुचिकर कलेवा है। सुआ खाए फल खूब गिरते हैं। टिटहरी के लिए परिसर एक श्राप है। अनुमान नहीं है टिटहरी का जोड़ा यहाँ कब आकर बस गया और अभी जो जोड़ा है वह पहले जोड़े की कौन सी पीढ़ी है। टिटहरी जमीन में अंडे देती है। मेरी उपस्थिति से टिटहरी भयभीत होती थी। अब नहीं होती। जान गई है मैं अंडों को क्षति नहीं पहुँचाती। अंडे वाले क्षेत्र में मैं सहज ही चली जाती हूँ। घर के अन्य सदस्य जाते हैं तो नर और मादा टिटहरी तेज टिटकारते स्वर में निषेध करते हैं। परिसर में पले दो किंग साइज कुत्ते टिटहरी के प्रबल शत्रु हैं। कुत्ते फैशन के तौर पर नहीं जरूरत के तौर पर रखे गए हैं। इनके कारण एकांत परिसर में रहना आसान हो जाता है। कहा नहीं जा सकता कुत्तों ने अब तक कितने चूहों, गिरगिट, गिलहरी, टिटहरी के बच्चों और अंडों को मारा-नष्ट किया होगा। शायद यही इनका कर्म है। टिटहरी, कुत्तों का विरोध करने में पूरी शक्ति लगा देती है पर तेज घ्राण शक्ति वाले कुत्ते अंडे ढूँढ़ कर नष्ट कर देते हैं। एक बार किस गुप्त स्थान में अंडे थे कि कुत्तों की कुदृष्टि से बच गए। गहरे काले रंग के दो बच्चे दिनभर परिसर में बागते। टिटहरी उन्हें गाइड करती पर वे मनुष्य के ढींठ बच्चों की तरह नियंत्रण में न आते। नहीं जानती दो में से एक कहाँ गया पर दूसरे का हृदय विदारक अंत मेरे सामने हुआ। कुत्ते ने बच्चे को मुख में इस तरह भर रखा था कि बच्चे के दो नाजुक पैर मुख से बाहर दिख रहे थे। मैं कुत्ते को डपट रही थी। वह अपना गुनाह समझ नहीं रहा था। प्रकृति का यही नियम है। बलशाली, बलहीन पर अत्याचार करता है। क्रंदन करती टिटहरी, कुत्ते के पीछे लगी थी। जैसे ही कुत्ता उसकी ओर घूमता वह उड़ कर चौहद्दी पर बैठ जाती। आत्मरक्षा सभी प्राणियों की पहली प्राथमिकता है। बच्चा नहीं बच सका।

परिसर में कीट-पतंगों की भी अच्छी संख्या है। जाती बरसात और आती ठंड के मनोरम मौसम में तितलियाँ, भँवरे, मधुमक्खियाँ, टिड्डे अपना साम्राज्य बढ़ा लेते हैं। मौसमी पुष्प ही नहीं नेनुआ, नींबू के पुष्प पराग पर भी इनका कब्जा हो जाता है। ऐसा मँडराते हैं मानो फूल, फल तोड़ने से पहले इनकी अनुमति लेनी पड़ेगी। नेनुआ तोड़ते हुए मुझ पर एक भँवरा क्रोधित हो आक्रमण के उद्देश्य से मेरे चौगिर्द घूमने लगा। मैंने घर के भीतर शरण ली तब पीछा छोड़ा। मधुमक्खियों का क्रोध भी ख्यात है। जब रसाल वृक्ष पर विशाल छत्ते बनाती हैं एक तरह से वह प्रतिबंधित क्षेत्र हो जाता है। पर तितलियों की अप्रतिम खूबसूरती अपने आप में अनुपम और अद्भुत होती है। काले, पीले, सफेद, भूरे, पेस्टल, मैटेलिक नैसर्गिक रंगों वाली तितलियाँ परिसर का आकर्षण हैं। पंखों की कलात्मक धारियों, बुंदकियों वाली कलात्मक सज्जा चित्त को हर लेती है। तितलियाँ अक्सर जोड़े में दिखती हैं। भूरे रंग वाली तितली का परिवार लगभग आठ सदस्यीय है। दिनभर उड़ने में उस्ताद ये कीट सूर्य ढलने पर पता नहीं कहाँ लोप हो जाते हैं। शायद अपने आरामगाह में चले जाते हों। याद आता है तितली और टिड्डे पकड़ने वाला अपना बचपन। आज के बचपन पर अफसोस होता है। बच्चे इन कीटों से परिचित नहीं होना चाहते।

गौरैया संकट में है।

घरों में मच्छर जाली, फसल में रसायन का छिड़काव, पेट्रो प्रोडक्ट के जलने से उत्पन्न मिथाइल निब्रेट, मोबाइल टावरों से निकलने वाली सूक्ष्म तरंगों से इनके अंडे नष्ट हो रहे हैं। प्रजनन क्षमता कम हो रही है। कितने पशु-पक्षी विलुप्त हो गए, कितने हो रहे हैं–इसका सटीक आँकड़ा नहीं मिलता। गौरैया की कम होती संख्या मुझे विषाद से भर देती है। यह ऐसा पक्षी है जो घरों में अपने नियत स्थान पर निःशंक सोते, नीड़ बनाते, अंडे देते हुए मनुष्य से अव्यक्त संधि कर लेता है।

…चरी।

विज्ञान में इसे पेसर डोमिस्टिक्स कहते हैं। याद नहीं इतनी गौरैया परिसर में कब और कैसे आ गई। तब मेरे घर के दरवाजों, खिड़कियों, रोशनदानों में मच्छर जाली नहीं लगी थी। मच्छरदानी मच्छरों से बचाव का अकाट्य साधन थी। लोग कहते हैं मच्छरदानी में असहजता लगती है पर यह मच्छर भगाने-मारने के रासायनिक तरीकों से बेहतर और सुरक्षित है। खुले भागों से गौरैया आती-जाती। तीन-चार ने अपने सोने के स्थान नियत कर लिए थे। मैं आँगन में आसन बिछा कर खाना खाती। कई गौरैया आँगन में आ जातीं। मैं उनकी तरफ भात फेंकती। उनकी दावत हो जाती। भात को चोंच में दबाये सुरक्षित दूरी पर जातीं फिर खातीं। जब समझ गईं मैं उनके लिए हानिकारक नहीं हूँ निर्भीक हो गईं। मेरी थाली के समीप आ जातीं। एक-दो उत्साहित हृदय वाली चिड़िया थाली से इस तरह भात ले जातीं जैसे मैंने अभयदान दे दिया है। वे दिनभर आवाजाही बनाये रखतीं। अँधेरा होने से यह नियत स्थान पर सो जातीं। लकड़ी की मोटी धन्नियों पर रखी पटियों वाली छत, सीमेंट की गोल छेदों वाली जालियों से बने रोशनदानों वाला मेरा पुराना घर गौरैया के लिए अनुकूल है। गौरैया रोशनदानों, बल्ब के छोटे चौकोर बोर्ड पर सोतीं। एक ने अभिनव प्रयोग किया। मेरा बिस्तर दीवार से लगा हुआ है। बिस्तर की ठीक ऊपर वाली धन्नी में इस तरह घुन लगा है कि धन्नी और पटिया के बीच खोल जैसा रिक्त स्थान बन गया है। धन्नी का घुना हुआ भाग चूँकि दीवार से लगा है, खोल को दीवार का सपोर्ट मिल गया है। एक चतुर चिड़िया खोल में घुस कर सोती थी। सोचती हूँ चिड़िया ने वह स्थल कैसे ढूँढ़ा होगा? वहाँ सोने की युक्ति कैसे लगाई होगी? गौरैया सोते समय गिरती क्यों नहीं? करवट का प्रावधान नहीं है, शायद इसलिए नहीं गिरतीं। गर्मी का आरंभ होते ही गौरैया अपनी आवाजाही बढ़ा लेतीं। बच्चों की सालाना परीक्षा की तैयारी और चिड़ियों का नीड़ बनाने का उपक्रम साथ-साथ चलता। तिनके ला रही मादा चिड़िया सीलिंग पंख से टकरा कर ठीक गर्दन से कट गई। सिर अलग, धड़ अलग। गहरे रंग की नर चिड़िया अधीरता में इधर-उधर उड़ कर मानो अपनी मादा की मृत्यु का कारण ढूँढ़ रही थी। सोचती हूँ गौरैया अपना जोड़ा कैसे बनाती होंगी? एक-दूसरे को पसंद कैसे करती होगी? या कि पसंद नहीं करतीं, आस-पास रहने वाले नर-मादा में स्वतः जोड़ा बन जाता है? इनमें रंग-रूप, कद-काठी, देखने-परखने की चतुराई होती है? मुझे तो सूरत और आयु में सभी एक समान लगती हैं। न कोई कुरूप, न वृद्ध। बल्ब के बोर्ड पर सोने वाली चिड़िया का संकट पृथक था। नहीं समझ रही थी जगह सोने के लिए पर्याप्त है नीड़ के लिए नहीं। तिनके रखती। गिर जाते। अंडे देने की अवधि पूर्ण हो रही थी। दो-चार अटके तिनकों में अंडे दे दिये। गिर कर फूट गए। अंडों के खोल से निकला गाढ़ा तरल, चीटियों का स्वादिष्ट आहार बन गया। रोशनदान में सोने वाली चिड़िया ने रोशनदान में नीड़ बना लिया। अंडे दिये। बच्चे जन्मे। नर चहुँओर गर्दन घुमा कर रक्षा में तैनात। मादा चोंच में दबा कर दाने और कीड़े लाती। नवजातों की चोंच में डालती। पुष्ट होकर बच्चे उड़ गए। नीड़ वीरान हो गया। सोचती हूँ चतुर चिड़िया रोशनदान के छोटे गोल छेद से बच्चों को कैसे सफलतापूर्वक बाहर निकाल ले गई होगी? कैसे उड़ना सिखाया होगा? कैसे कौआ और कुत्तों की कुदृष्टि से बचाया होगा? वयस्क बच्चे अपने जन्मदाता को पहचानते होंगे? सचमुच पक्षी समाज कौतूहल से पूर्ण है।

बचपन में अम्मा कहती थीं चिड़िया के बच्चों को मत छूना। चिड़िया उन्हें छोड़ देगी। नैतिकता सीखने के लिए ऐसे कुछ भय जरूरी होते हैं। यह संज्ञान मुझे बहुत बाद में मिला कि गिद्ध, टर्की जैसे पक्षियों के अलावा अधिकतर पक्षियों में गंध ग्रंथियाँ नहीं होतीं। वे गंध को महसूस नहीं कर पाते हैं। यदि उनकी अनुपस्थिति में अंडों या बच्चों को स्पर्श किया गया है, वे उनका त्याग नहीं करते। यदि वे हमें अंडे या बच्चे को स्पर्श करते हुए देख लेते हैं तब भयभीत हो जाते हैं कि उन्हें भी हानि पहुँचाई जाएगी। आत्मरक्षा प्रत्येक जीव की पहली प्राथमिकता है। पक्षी उस स्थान का त्याग कर अन्यत्र चले जाते हैं। भले ही वहाँ अंडे अथवा बच्चे हों। फड़फड़ा रहे बच्चे के लिए मैं दया से भर गई थी। सहायता नहीं करूँगी तो यह लटके रह कर मर जाएगा। स्पर्श करूँगी तो चिड़िया के त्यागने से मरेगा। विकट असमंजस। आखिरकार मैंने बिछावन पर स्टूल रखा। बच्चे के पंजे को फॉस से विलग किया। फड़फड़ाता हुआ बच्चा मेरे हाथ से फिसल कर बिछावन पर गिर गया। देर तक स्तब्ध बैठा रहा। शायद अपनी माँ को ढूँढ़ रहा था। शायद मुक्ति पर विश्वास नहीं कर पा रहा था। शायद मुझसे डर रहा था। फड़फड़ाते हुए पलंग से गिर गया। देर तक पलंग के नीचे छिपा रहा। दूसरे दिन वह वहाँ नहीं था। सोचती हूँ क्या चिड़िया उसे अपने साथ उड़ा ले गई? छोटे गोले से बच्चा एकदम सटीक कैसे निकला होगा? बाहरी दुनिया का आचार-विचार कैसे सीखा होगा? चिड़िया ने उसके लिए कोई योजना बनाई होगी? योजना का क्रियान्वयन संभव हुआ होगा?

मुझे चिड़ियों की संगत अच्छी लगने लगी थी।

गौरैया घर से अपदस्थ हो गई थीं लेकिन उनसे मेरी संधि कायम रही। मुझे उनकी चेष्टाएँ देखने में आनंद आता है। मैं इनके हिस्से का एक मुट्ठी भात आज भी पकाती हूँ। जहाँ इनकी दृष्टि सरलता से जाती है ऐसे तीन स्थानों पर मिट्टी के चौड़े पात्रों में लबालब पानी भरती हूँ। वे पात्र के किनारी पर बैठ कर पानी में चोंच डुबा कर पानी पीती हैं। जिस दिन रसोई में भात नहीं बनता चावल के सूखे दाने देती हूँ। कुक्ड राइस की चटोर गौरैया दानों के लिए विशेष आतुरता नहीं दिखातीं। अर्थात् इनकी पसंद और रुचि होती है। सूर्योदय और सूर्यास्त के क्षणों में इनका कलरव सुनने लायक होता है। दोपहर में भोजन की तलाश में चली जाती हैं अतः शांति रहती है। कुछ चिड़िया दोपहर में भी परिसर में रहती हैं। सोचती हूँ ये बीमार हैं या छोटी हैं या उड़ान भरने के लिए योग्य नहीं हैं या इन्हें खुराक (भात) यहीं मिल जाती है तो दूर जाने का कष्ट नहीं करतीं? वैसे भात से इनका पेट नहीं भर पाता होगा। सुनती हूँ उपलब्ध हो तो ये अपनी भूख से अधिक खा लेती हैं।

मधुमालती का वृक्ष सफेद, गुलाबी, लाल छोटे पुष्पों से आच्छादित था। उसकी सोहबत में गौरैया सुरक्षा पा रही थीं लेकिन विस्थापन का दर्द पक्षियों को भी सहना पड़ता है। मधुमालती की लतरें छज्जे और छत को घेरती हुई लैंडलाइन टेलीफोन के केविल से इस मजबूती से लिपटती गई कि हेमिंग होने के कारण फोन में स्पष्ट आवाज न सुनाई देती। लाइन मैन को कई बार बुलाया। हेमिंग का कारण न ढूँढ़ पाते हुए आखिर उसने ढूँढ़ लिया–

‘पेड़ से मिलने वाली नमी के कारण हेमिंग हो रही है। इसे काट-छाँट दें।’

साप्ताहिक विजिट पर आने वाले बागवान को मैंने समस्या बताई। उसने ऐसी निर्ममता से कतर-ब्योंत की कि सुंदर पेड़ को ठूँठ कर दिया। मैं अवाक रह गई। बोला–‘ढींठ पेड़ है। फिर फुटुक (अंकुरित) जाएगा।’

मैं अवाक थी। वह पेड़ मात्र नहीं, चिड़ियों की बस्ती थी। भावनाओं से भरा-पूरा संसार था। एक अर्थ था जो मिनटों में खत्म हो गया। चिड़ियों ने नहीं सोचा होगा सूर्यास्त की बेला में जब लौटेंगी उनका ठिकाना नेस्तनाबूत हो चुका होगा। वे हतप्रभ थीं। फरियाद करना नहीं जानतीं। धरना प्रदर्शन नहीं जानतीं। इधर-उधर उड़ते-फड़फड़ाते हुए वृक्ष को ढूँढ़ रही थीं। आज की रात कहाँ गुजारेंगी? उनकी अकुलाहट और अपनी गलती पर मेरा विवेक जागृत हुआ। पेड़ न कटवाती। केबिल की जगह बदलवा देती। पर हम मनुष्य अपने साधन-सुविधा से पृथक कब सोचते हैं? मैंने केबिल की जगह बदलवा दी। मधुमालती की जड़ों को नियमित सींचने लगी। वृक्ष लहलहाने लगा लेकिन चिड़िया शायद विरोध करना जानती हैं। उन्होंने फिर मधुमालती का रुख नहीं किया। पर उन्हें परिसर अनुकूल लगता है। चारों ओर कांक्रीट के निर्माण के कारण उनके पास यही विकल्प है। उनका पूरा समूह रसोई की बाहरी दीवार के समीप लगे नींबू वृक्ष में बस गया जो आज भी बसा है। नहीं जानती यह उनकी कौन सी पीढ़ी है। परिसर में कई वृक्ष हैं पर ये उन्हीं वृक्षों में रहती हैं जो घर के समीप हैं। शायद सुरक्षा का बोध होता है। शायद मनुष्य के साथ रहने का अभ्यास है। शायद जानती हैं बड़े वृक्षों में रहने वाले कौआ, कोयल, महोखा आदि बड़े पक्षी इनकी दिनचर्या में विघ्न डालते हैं। नींबू के नुकीले काँटों से खुद को कैसे बचाती होंगी? परिसर में इनकी कई पीढ़ियाँ जन्मीं, खत्म हुई पर मैंने स्वाभाविक रूप से मृत गौरैया या तितली कभी नहीं देखी। मृत्यु का आभास पाकर क्या अपने समूह और स्थान को तज कर अन्यत्र चली जाती हैं? क्या है इनका मनोविज्ञान? सुविधा-असुविधा का आकलन कैसे करती हैं? इनका चहकना इतना आनंदप्रद है कि दिनभर लिखने-पढ़ने से उत्पन्न हुआ मेरा तनाव और दबाव खत्म हो जाता है। पता नहीं वे कैसे लोग हैं जिन्हें पक्षियों की चहक नहीं, माँस लुभाता है। पशु-पक्षियों का माँस, सींग, फर, चमड़ा लुभाता है। माँस पशु का हो, पक्षी का, जलचर का, खाए बिना माँसाहारियों को तृप्ति नहीं मिलती। मनुष्य को धन चाहिए। वह माँस से मिले या सींग, चमड़े, फर से मिले या सरी सर्प के विष से। अच्छा हो यदि मनुष्य इनके संसार में दखल देना बंद कर दे। प्रकृति पर निर्भर रहते हुए इन्हें अपना जीवन यापन करने दे। 24 से 40 ग्राम की सदा फुदकने वाली गौरैया की न जरूरत बहुत अधिक है, न इनका जीवन बहुत लंबा (अधिकतम चार या पाँच वर्ष होता है) है। इन्हें थोड़े से दाने, थोड़ा पानी, चाहिए। बस। इतना हम दे सकते हैं। इनके संरक्षण के लिए प्रयास न किए गए तो आने वाली पीढ़ी इन्हें इंटरनेट पर देखेगी–यह भी एक पक्षी हुआ करता था।


Image : Lesbia with her Sparrow
Image Source : WikiArt
Artist : John William Godward
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सभापुर नगर भी आखिर बाजारवाद की लपेट में आ ही गया। बाजारवाद से जिसका जो नफा-नुकसान हुआ वह तो हुआ ही, सबसे अधिक क्षति हुई मुख्य पथ पर ‘होटल सर्वश्रेष्ठ’ और उसके ठीक बगल से लगे जय भवानी पान भंडार की। बहुत पहले जो समय था तब सभापुर ने समाजवाद नामक शब्द खूब सुना था। अब बाजारवाद जैसा भ्रम उपजाता शब्द चारों ओर दस्तक दे रहा है। एक वह समय था जब बाजारवाद ने दस्तक नहीं दी थी। सभापुर में दो-चार होटल थे उनमें ‘सर्वश्रेष्ठ’ को अच्छी ख्याति प्राप्त थी। इसकी बुकिंग सदा फुल रहती थी जिसका पूरा लाभ जय भवानी का मालिक सूबेदार लूटता था। ‘सर्वश्रेष्ठ’ में ठहरे लोगों के लिए भर-भर तश्तरी पान जाते थे। सूबेदार ऐसा जायकेदार बीड़ा बनाता था कि खाकर लोगों के चेहरे में सराहना साफ देखी जा सकती थी।